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70695 47534159 Maharstra (kartick) *आत्मचिंतन - (नं.2580)* ************************** *"9 अप्रैल"* *विश्व णमोकार महामंत्र दिवस* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ (भाग *1* ) """"""""""""""""""""""'" *जैन धर्म एक पूर्णतया स्वतंत्र और प्राचीन धर्म है और इसका दर्शन, देवता, मंदिर, पूजा पद्धति, शास्त्र, मुनि परंपरा, संस्कृति आदि सभी स्वतंत्र हैं और इस प्रकार यह परंपरा हजारों वर्षों से निर्बाध रूप से चलती आ रही है और भविष्य में भी चलती रहेगी..* जैन धर्म में सर्वश्रेष्ठ मंत्र *णमोकार महामंत्र* है और हर साल *9 अप्रैल* को *विश्व णमोकार महामंत्र दिवस* के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर, आइए इस *णमोकार महामंत्र* के बारे में कुछ जानकारी लेते हैं। सबसे पहले सर्वश्रेष्ठ णमोकार महामंत्र.. *ॐ नमः सिद्धेभ्यः।* *ॐ नमः सिद्धेभ्यः।* *ॐ नमः सिद्धेभ्यः।* *णमो अरिहंताणं ।* *णमो सिद्धाणं ।* *णमो आइरियाणं ।* *णमो उवज्झायाणं ।* *णमो लोएसव्वसाहूणं ।* *एसो पंच णमुक्कारो,* *सव्व पावपणासणो ।* *मंगलाणंच सव्वेसिं,* *पढमं हवइ मंगलम् ॥* *( क्रमसे ) ( ता. 09 अप्रैल 2026 )* *--डॉ.अजीत जे.पाटिल जैन, सांगली, महाराष्ट्र* ??? (कु.9620/आ.3239) 2026-04-09 06:34:49
70696 47534159 Maharstra (kartick) *आत्मचिंतन - (नं.2580)* ************************** *"9 अप्रैल"* *विश्व णमोकार महामंत्र दिवस* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ (भाग *1* ) """"""""""""""""""""""'" *जैन धर्म एक पूर्णतया स्वतंत्र और प्राचीन धर्म है और इसका दर्शन, देवता, मंदिर, पूजा पद्धति, शास्त्र, मुनि परंपरा, संस्कृति आदि सभी स्वतंत्र हैं और इस प्रकार यह परंपरा हजारों वर्षों से निर्बाध रूप से चलती आ रही है और भविष्य में भी चलती रहेगी..* जैन धर्म में सर्वश्रेष्ठ मंत्र *णमोकार महामंत्र* है और हर साल *9 अप्रैल* को *विश्व णमोकार महामंत्र दिवस* के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर, आइए इस *णमोकार महामंत्र* के बारे में कुछ जानकारी लेते हैं। सबसे पहले सर्वश्रेष्ठ णमोकार महामंत्र.. *ॐ नमः सिद्धेभ्यः।* *ॐ नमः सिद्धेभ्यः।* *ॐ नमः सिद्धेभ्यः।* *णमो अरिहंताणं ।* *णमो सिद्धाणं ।* *णमो आइरियाणं ।* *णमो उवज्झायाणं ।* *णमो लोएसव्वसाहूणं ।* *एसो पंच णमुक्कारो,* *सव्व पावपणासणो ।* *मंगलाणंच सव्वेसिं,* *पढमं हवइ मंगलम् ॥* *( क्रमसे ) ( ता. 09 अप्रैल 2026 )* *--डॉ.अजीत जे.पाटिल जैन, सांगली, महाराष्ट्र* ??? (कु.9620/आ.3239) 2026-04-09 06:34:49
70693 40476112 +120363390826692662 *---पाँचवी ढाल----* मुनि सकलव्रती बड़भागी, भवभोगन तैं वैरागी। वैराग्य उपावन माई, चिन्तैं अनुप्रेक्षा भाई॥(1) इन चिन्तत समसुख जागै, जिमि ज्वलन पवन के लागै। जब ही जिय आतम जानै, तब ही जिय शिवसुख ठानै॥(2) जोवन गृह गोधन नारी, हय गय जन आज्ञाकारी। इन्द्रिय भोग छिन थाई, सुरधनु चपला चपलाई ॥(3) सुर असुर खगाधिप जेते, मृग ज्यों हरि काल दले ते। मणि मन्त्र तन्त्र बहु होई, मरते न बचावै कोई ॥(4) चहुँगति दु:ख जीव भरै हैं, परिवर्तन पंच करै हैं। सब विधि संसार असारा, यामें सुख नाहिं लगारा ॥(5) शुभ-अशुभ करम फल जेते, भोगैं जिय एकहिं तेते। सुत दारा होय न सीरी, सब स्वारथ के हैं भीरी ॥(6) जल-पय ज्यौं जिय-तन मेला, पै भिन्न-भिन्न नहिं भेला। तो प्रगट जुदे धन-धामा, क्यों ह्वै इक मिलि सुत रामा॥(7) पल-रुधिर राध-मल-थैली, कीकस वसादि तैं मैली। नवद्वार बहैं घिनकारी, अस देह करै किम यारी ॥(8) जो जोगन की चपलाई, तातैं ह्वै आस्रव भाई। आस्रव दुखकार घनेरे, बुधिवन्त तिन्हैं निरवेरे ॥(9) जिन पुण्य-पाप नहिं कीना, आतम अनुभव चित दीना। तिन ही विधि आवत रोके, संवर लहि सुख अवलोके॥(10) निज काल पाय विधि झरना, तासौं निज-काज न सरना। तप करि जो कर्म खिपावै, सोई शिवसुख दरसावै ॥(11) किन हू न कर्यो न धरै को, षट्द्रव्यमयी न हरै को। सो लोकमाँहिं बिन समता, दु:ख सहै जीव नित भ्रमता॥(12) अन्तिम ग्रीवक लौं की हद, पायो अनन्त बिरियाँ पद। पर सम्यग्ज्ञान न लाधौ, दुर्लभ निज में मुनि साधौ ॥(13) जे भाव मोह तैं न्यारे, दृग ज्ञान व्रतादिक सारे। सो धर्म जबै जिय धारै, तब ही सुख अचल निहारै ॥(14) सो धर्म मुनिन करि धरिये, तिनकी करतूति उचरिये। ताको सुनिये भवि प्रानी, अपनी अनुभूति पिछानी॥(15) 2026-04-09 06:34:40
70694 40476112 +120363390826692662 *---पाँचवी ढाल----* मुनि सकलव्रती बड़भागी, भवभोगन तैं वैरागी। वैराग्य उपावन माई, चिन्तैं अनुप्रेक्षा भाई॥(1) इन चिन्तत समसुख जागै, जिमि ज्वलन पवन के लागै। जब ही जिय आतम जानै, तब ही जिय शिवसुख ठानै॥(2) जोवन गृह गोधन नारी, हय गय जन आज्ञाकारी। इन्द्रिय भोग छिन थाई, सुरधनु चपला चपलाई ॥(3) सुर असुर खगाधिप जेते, मृग ज्यों हरि काल दले ते। मणि मन्त्र तन्त्र बहु होई, मरते न बचावै कोई ॥(4) चहुँगति दु:ख जीव भरै हैं, परिवर्तन पंच करै हैं। सब विधि संसार असारा, यामें सुख नाहिं लगारा ॥(5) शुभ-अशुभ करम फल जेते, भोगैं जिय एकहिं तेते। सुत दारा होय न सीरी, सब स्वारथ के हैं भीरी ॥(6) जल-पय ज्यौं जिय-तन मेला, पै भिन्न-भिन्न नहिं भेला। तो प्रगट जुदे धन-धामा, क्यों ह्वै इक मिलि सुत रामा॥(7) पल-रुधिर राध-मल-थैली, कीकस वसादि तैं मैली। नवद्वार बहैं घिनकारी, अस देह करै किम यारी ॥(8) जो जोगन की चपलाई, तातैं ह्वै आस्रव भाई। आस्रव दुखकार घनेरे, बुधिवन्त तिन्हैं निरवेरे ॥(9) जिन पुण्य-पाप नहिं कीना, आतम अनुभव चित दीना। तिन ही विधि आवत रोके, संवर लहि सुख अवलोके॥(10) निज काल पाय विधि झरना, तासौं निज-काज न सरना। तप करि जो कर्म खिपावै, सोई शिवसुख दरसावै ॥(11) किन हू न कर्यो न धरै को, षट्द्रव्यमयी न हरै को। सो लोकमाँहिं बिन समता, दु:ख सहै जीव नित भ्रमता॥(12) अन्तिम ग्रीवक लौं की हद, पायो अनन्त बिरियाँ पद। पर सम्यग्ज्ञान न लाधौ, दुर्लभ निज में मुनि साधौ ॥(13) जे भाव मोह तैं न्यारे, दृग ज्ञान व्रतादिक सारे। सो धर्म जबै जिय धारै, तब ही सुख अचल निहारै ॥(14) सो धर्म मुनिन करि धरिये, तिनकी करतूति उचरिये। ताको सुनिये भवि प्रानी, अपनी अनुभूति पिछानी॥(15) 2026-04-09 06:34:40
70691 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ ?????? 2026-04-09 06:34:29
70692 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ ?????? 2026-04-09 06:34:29
70690 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ वंदामी माताजी ?? 2026-04-09 06:34:24
70689 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ वंदामी माताजी ?? 2026-04-09 06:34:23
70687 40449679 ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಜೈನಧರ್ಮ 2 2026-04-09 06:34:17
70688 40449679 ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಜೈನಧರ್ಮ 2 2026-04-09 06:34:17