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जिनोदय?JINODAYA |
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*जड़े उखाड़ देता है वो तूफान जिसकी शांति का मज़ाक बनाया जाता है*
कई बार समाज में कुछ लोग शांत स्वभाव के होते हैं। वे हर बात पर प्रतिक्रिया नहीं देते, हर उकसावे का उत्तर नहीं देते और हर अन्याय पर तुरंत शोर नहीं मचाते। लोग उनकी इस शांति को कमजोरी समझ लेते हैं। मज़ाक उड़ाते हैं, तंज कसते हैं और यह मान बैठते हैं कि यह व्यक्ति कभी कुछ कर ही नहीं पाएगा। लेकिन इतिहास और अनुभव दोनों बताते हैं कि जब वही शांत व्यक्ति या समूह भीतर से ठान लेता है, तब उसकी प्रतिक्रिया तूफान बन जाती है। शांति का अर्थ कायरता नहीं होता, बल्कि वह संयम, धैर्य और आत्मविश्वास की निशानी होती है। जो व्यक्ति हर बात पर गरजता है, वह अक्सर भीतर से खाली होता है; पर जो चुप रहता है, वह भीतर ही भीतर अपनी शक्ति को संजोता रहता है। जब अन्याय अपनी सीमा पार कर देता है, जब अपमान आदत बना दिया जाता है और जब सत्य का लगातार उपहास होता है, तब वही शांत धारा प्रचंड वेग में बदल जाती है। तूफान अचानक नहीं आता, वह लंबे समय तक जमा हुई पीड़ा, अपमान और उपेक्षा का परिणाम होता है। इसलिए किसी की सहनशीलता को उसकी सीमा मत समझिए। सहनशील व्यक्ति जब तक सहता है, तब तक व्यवस्था सुरक्षित रहती है; जिस दिन वह उठ खड़ा होता है, उस दिन जड़ें हिल जाती हैं। समाज, संगठन और व्यक्ति—तीनों को यह समझना चाहिए कि शांति का सम्मान करना ही बुद्धिमानी है। किसी भी सज्जन, संतुलित या धैर्यवान व्यक्ति का बार-बार मज़ाक बनाना अंततः स्वयं के लिए हानिकारक सिद्ध होता है। समय हमेशा गवाह है कि अत्याचार और अहंकार की उम्र लंबी हो सकती है, पर स्थायी नहीं होती। अंततः सत्य और संयम की शक्ति ही विजयी होती है। इसलिए हमें दूसरों की शांति का सम्मान करना चाहिए, संवाद को स्थान देना चाहिए और किसी की चुप्पी को उसकी हार समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जड़े उखाड़ देता है वो तूफान जिसकी शांति का मज़ाक बनाया जाता है।
नितिन जैन, संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा), जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल, मोबाइल: 9215635871 |
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2026-02-15 11:02:01 |
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