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Message
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Status
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Date |
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40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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Vandami mataji?????? |
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2026-04-12 08:39:49 |
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| 79174 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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Vandami mataji?????? |
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2026-04-12 08:39:49 |
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| 79171 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*परम पूज्य गुरुदेव भारत गौरव तपस्या के सम्राट उत्तम सिंह निष्क्रिडित व्रतकर्ता आचार्य श्री 108 अंतर्मना प्रसन्न सागरजी महाराजजी अपने दीक्षा भूमि परतापुर जिला बांसवाडा में अपने चतुर्विघ संघ सहित दिनाँक 15 अप्रेल 2026, बुधवार को भव्याति भव्य मंगल प्रवेश होगा।।* |
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2026-04-12 08:39:35 |
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| 79172 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*परम पूज्य गुरुदेव भारत गौरव तपस्या के सम्राट उत्तम सिंह निष्क्रिडित व्रतकर्ता आचार्य श्री 108 अंतर्मना प्रसन्न सागरजी महाराजजी अपने दीक्षा भूमि परतापुर जिला बांसवाडा में अपने चतुर्विघ संघ सहित दिनाँक 15 अप्रेल 2026, बुधवार को भव्याति भव्य मंगल प्रवेश होगा।।* |
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2026-04-12 08:39:35 |
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| 79170 |
40449727 |
GROUP ??दसा नरसिंहपुरा समाज?? |
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*नवाचार्य श्री 108 समयसागर जी यतिराज के द्वितीय आचार्य पदारोहण दिवस के उपलक्ष्य में संस्कारधानी जबलपुर की धरती पर आ रहा है -*
*✨ रत्नत्रय*
*✨ गाथा : छोटे बाबा के बड़े शिष्य की*
? पूज्य मुनिश्री 108 निर्दोषसागर जी मुनिराज ससंघ एवं पूज्य मुनिश्री 108 निष्कंपसागर जी एवं पूज्य मुनिश्री 108 निष्कामसागर जी की प्रेरणापूर्ण सन्निधि में जबलपुर की धरती पर आ रहा है भारत के इतिहास का सबसे बड़ा आध्यात्मिक शो - रत्नत्रय।
*? तो याद रखिए* 16 अप्रेल 2026 रात्रि 08 बजे से
*? स्थान :* शहीद स्मारक, गोल बाजार, जबलपुर (म.प्र.)
*<a href="https://www.instagram.com/the_ratnatrya_show?*" target="_blank">https://www.instagram.com/the_ratnatrya_show?*</a>
☀️ आयोजक - श्री दिगम्बर जैन संरक्षिणी सभा, जैन पंचायत सभा
? निवेदक - श्री पार्श्वनाथ दिग. जैन स्वर्ण मंदिर, लार्डगंज, जैन नवयुवक सभा
? सहयोगी संस्था - जाप मण्डल, अ.भा. दिग. जैन महिला परिषद् एवं सकल जैन समाज, जबलपुर
*॥ वर्धतां जिनशासनं ॥* |
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2026-04-12 08:39:32 |
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40449727 |
GROUP ??दसा नरसिंहपुरा समाज?? |
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*नवाचार्य श्री 108 समयसागर जी यतिराज के द्वितीय आचार्य पदारोहण दिवस के उपलक्ष्य में संस्कारधानी जबलपुर की धरती पर आ रहा है -*
*✨ रत्नत्रय*
*✨ गाथा : छोटे बाबा के बड़े शिष्य की*
? पूज्य मुनिश्री 108 निर्दोषसागर जी मुनिराज ससंघ एवं पूज्य मुनिश्री 108 निष्कंपसागर जी एवं पूज्य मुनिश्री 108 निष्कामसागर जी की प्रेरणापूर्ण सन्निधि में जबलपुर की धरती पर आ रहा है भारत के इतिहास का सबसे बड़ा आध्यात्मिक शो - रत्नत्रय।
*? तो याद रखिए* 16 अप्रेल 2026 रात्रि 08 बजे से
*? स्थान :* शहीद स्मारक, गोल बाजार, जबलपुर (म.प्र.)
*<a href="https://www.instagram.com/the_ratnatrya_show?*" target="_blank">https://www.instagram.com/the_ratnatrya_show?*</a>
☀️ आयोजक - श्री दिगम्बर जैन संरक्षिणी सभा, जैन पंचायत सभा
? निवेदक - श्री पार्श्वनाथ दिग. जैन स्वर्ण मंदिर, लार्डगंज, जैन नवयुवक सभा
? सहयोगी संस्था - जाप मण्डल, अ.भा. दिग. जैन महिला परिषद् एवं सकल जैन समाज, जबलपुर
*॥ वर्धतां जिनशासनं ॥* |
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2026-04-12 08:39:31 |
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| 79168 |
40449749 |
जिनोदय?JINODAYA |
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*त्याग के प्रतीक महावीर और संग्रह के जाल में फँसता साधु समाज – अब मौन नहीं, निर्णायक चेतावनी आवश्यक*
जिन प्रभु भगवान महावीर ने राजपाट, ऐश्वर्य, परिवार, शरीर की सुख-सुविधाएँ—यहाँ तक कि वस्त्र तक का त्याग कर दिया, जिनका सम्पूर्ण जीवन “अपरिग्रह” का सजीव उदाहरण है, आज उसी महावीर के नाम पर खड़ा कुछ साधु समाज जिस दिशा में जा रहा है, वह केवल चिंता का विषय नहीं, बल्कि धर्म के मूल अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न है। महावीर ने स्पष्ट कहा था कि संग्रह ही बंधन है, और त्याग ही मुक्ति का मार्ग है। लेकिन आज विडम्बना यह है कि उसी त्याग की परंपरा के नाम पर संग्रह के नए-नए रूप खड़े कर दिए गए हैं—और सबसे खतरनाक बात यह है कि यह सब धर्म के आवरण में हो रहा है, जिससे सामान्य श्रद्धालु इसे पहचान ही नहीं पा रहा।
आज संग्रह केवल धन या वस्तुओं का नहीं रहा, बल्कि यह एक सुव्यवस्थित “सिस्टम” बन चुका है। सीधे हाथ से कुछ न लेना, लेकिन अपने प्रभाव से सब कुछ नियंत्रित करना—यह नई प्रवृत्ति है। चातुर्मास के नाम पर पहले से तय होना कि कहाँ ठहरना है, कैसी व्यवस्था चाहिए, कितनी भीड़ जुटेगी, कितना प्रचार होगा—यह सब त्याग नहीं, बल्कि एक प्रकार की “प्लानिंग” है। प्रतिष्ठा महोत्सवों में कौन-सा मंच होगा, कौन-सा भंडारा किसके द्वारा कराया जाएगा, किस ठेकेदार को काम मिलेगा, किस कलाकार को बुलाया जाएगा—इन सभी निर्णयों में यदि साधु का प्रत्यक्ष या परोक्ष हस्तक्षेप है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि संग्रह अब केवल भौतिक नहीं, बल्कि प्रभाव और नियंत्रण का भी हो चुका है।
आज कुछ स्थानों पर यह भी देखने में आता है कि साधु अपने अनुयायियों की संख्या को बढ़ाने में लगे हैं, मानो यह कोई आध्यात्मिक यात्रा नहीं, बल्कि एक प्रतिस्पर्धा हो। सोशल मीडिया पर प्रचार, बड़े-बड़े बैनर, स्वागत में दिखावा, और अपने प्रभाव को स्थापित करने की होड़—क्या यह सब उस महावीर के मार्ग का हिस्सा है, जिन्होंने अकेलेपन, मौन और आत्मचिंतन को अपनाया था? जब साधु ही अपने “ब्रांड” को बढ़ाने में लग जाए, तो फिर वह साधु नहीं, एक प्रबंधक बन जाता है।
संग्रह के तरीके इतने सूक्ष्म हो गए हैं कि आम व्यक्ति उसे समझ नहीं पाता। उदाहरण के लिए—सीधे धन स्वीकार नहीं करना, लेकिन अपने अनुयायियों के माध्यम से सारी व्यवस्थाएँ करवाना; स्वयं कुछ न कहना, लेकिन संकेतों से यह तय कर देना कि क्या होना चाहिए; साधु के नाम पर ट्रस्ट, संस्थाएँ और समितियाँ बनाकर उनके माध्यम से आर्थिक और सामाजिक नियंत्रण स्थापित करना—यह सब एक ऐसा जाल है जिसमें धर्म का नाम है, लेकिन आत्मा का कल्याण कहीं पीछे छूट गया है।
और सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि समाज यह सब देखकर भी मौन क्यों है? क्या यह मौन श्रद्धा है या डर? क्या हम इसलिए कुछ नहीं कहते क्योंकि हमें “धर्म विरोधी” कह दिया जाएगा? यदि कोई व्यक्ति महावीर के नाम पर महावीर के सिद्धांतों के विपरीत आचरण करे, और हम चुप रहें, तो यह चुप्पी भी पाप में भागीदार बन जाती है। सच्ची श्रद्धा अंधी नहीं होती, वह विवेकपूर्ण होती है।
यह भी सत्य है कि सभी साधु ऐसे नहीं हैं। आज भी अनेक सच्चे त्यागी, तपस्वी और आत्मलीन संत इस परंपरा की गरिमा को बचाए हुए हैं। वे न प्रचार चाहते हैं, न सुविधा, न संग्रह—वे केवल साधना में लीन हैं। लेकिन कुछ लोगों के कारण पूरी साधु परंपरा की छवि धूमिल हो रही है। और यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ साधु और प्रबंधक में अंतर ही भूल जाएँगी।
अब समय आ गया है कि समाज स्पष्ट रूप से निर्णय ले। साधु का सम्मान केवल उसके वस्त्र या उपाधि से नहीं, बल्कि उसके आचरण से होना चाहिए। जो महावीर के मार्ग पर चलेगा, वही पूजनीय होगा—और जो संग्रह, प्रभाव और नियंत्रण की राजनीति करेगा, उसे प्रश्नों के कटघरे में खड़ा किया जाएगा। यह विरोध नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा है।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि जहाँ संग्रह है, वहाँ साधुत्व नहीं हो सकता। जहाँ प्रभाव की लालसा है, वहाँ त्याग नहीं हो सकता। और जहाँ त्याग नहीं, वहाँ महावीर का मार्ग नहीं हो सकता। इसलिए अब समय है कि हम केवल जय-जयकार करने वाले अनुयायी न बनें, बल्कि जागरूक और जिम्मेदार श्रावक बनें, जो सत्य को पहचान सके और उसे स्वीकार करने का साहस भी रखे।
यदि आज भी हम नहीं जागे, तो कल बहुत देर हो जाएगी। महावीर का नाम रहेगा, लेकिन उनका मार्ग खो जाएगा। और यह हानि किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे जैन समाज की होगी। इसलिए अब मौन नहीं, बल्कि स्पष्ट और निर्णायक चेतावनी आवश्यक है—धर्म के नाम पर चल रहे इस संग्रह के खेल को पहचानो, और महावीर के सच्चे मार्ग की ओर लौटो, यही समय की पुकार है।
नितिन जैन
संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा)
जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल
मोबाइल: 9215635871 |
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2026-04-12 08:39:01 |
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जिनोदय?JINODAYA |
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*त्याग के प्रतीक महावीर और संग्रह के जाल में फँसता साधु समाज – अब मौन नहीं, निर्णायक चेतावनी आवश्यक*
जिन प्रभु भगवान महावीर ने राजपाट, ऐश्वर्य, परिवार, शरीर की सुख-सुविधाएँ—यहाँ तक कि वस्त्र तक का त्याग कर दिया, जिनका सम्पूर्ण जीवन “अपरिग्रह” का सजीव उदाहरण है, आज उसी महावीर के नाम पर खड़ा कुछ साधु समाज जिस दिशा में जा रहा है, वह केवल चिंता का विषय नहीं, बल्कि धर्म के मूल अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न है। महावीर ने स्पष्ट कहा था कि संग्रह ही बंधन है, और त्याग ही मुक्ति का मार्ग है। लेकिन आज विडम्बना यह है कि उसी त्याग की परंपरा के नाम पर संग्रह के नए-नए रूप खड़े कर दिए गए हैं—और सबसे खतरनाक बात यह है कि यह सब धर्म के आवरण में हो रहा है, जिससे सामान्य श्रद्धालु इसे पहचान ही नहीं पा रहा।
आज संग्रह केवल धन या वस्तुओं का नहीं रहा, बल्कि यह एक सुव्यवस्थित “सिस्टम” बन चुका है। सीधे हाथ से कुछ न लेना, लेकिन अपने प्रभाव से सब कुछ नियंत्रित करना—यह नई प्रवृत्ति है। चातुर्मास के नाम पर पहले से तय होना कि कहाँ ठहरना है, कैसी व्यवस्था चाहिए, कितनी भीड़ जुटेगी, कितना प्रचार होगा—यह सब त्याग नहीं, बल्कि एक प्रकार की “प्लानिंग” है। प्रतिष्ठा महोत्सवों में कौन-सा मंच होगा, कौन-सा भंडारा किसके द्वारा कराया जाएगा, किस ठेकेदार को काम मिलेगा, किस कलाकार को बुलाया जाएगा—इन सभी निर्णयों में यदि साधु का प्रत्यक्ष या परोक्ष हस्तक्षेप है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि संग्रह अब केवल भौतिक नहीं, बल्कि प्रभाव और नियंत्रण का भी हो चुका है।
आज कुछ स्थानों पर यह भी देखने में आता है कि साधु अपने अनुयायियों की संख्या को बढ़ाने में लगे हैं, मानो यह कोई आध्यात्मिक यात्रा नहीं, बल्कि एक प्रतिस्पर्धा हो। सोशल मीडिया पर प्रचार, बड़े-बड़े बैनर, स्वागत में दिखावा, और अपने प्रभाव को स्थापित करने की होड़—क्या यह सब उस महावीर के मार्ग का हिस्सा है, जिन्होंने अकेलेपन, मौन और आत्मचिंतन को अपनाया था? जब साधु ही अपने “ब्रांड” को बढ़ाने में लग जाए, तो फिर वह साधु नहीं, एक प्रबंधक बन जाता है।
संग्रह के तरीके इतने सूक्ष्म हो गए हैं कि आम व्यक्ति उसे समझ नहीं पाता। उदाहरण के लिए—सीधे धन स्वीकार नहीं करना, लेकिन अपने अनुयायियों के माध्यम से सारी व्यवस्थाएँ करवाना; स्वयं कुछ न कहना, लेकिन संकेतों से यह तय कर देना कि क्या होना चाहिए; साधु के नाम पर ट्रस्ट, संस्थाएँ और समितियाँ बनाकर उनके माध्यम से आर्थिक और सामाजिक नियंत्रण स्थापित करना—यह सब एक ऐसा जाल है जिसमें धर्म का नाम है, लेकिन आत्मा का कल्याण कहीं पीछे छूट गया है।
और सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि समाज यह सब देखकर भी मौन क्यों है? क्या यह मौन श्रद्धा है या डर? क्या हम इसलिए कुछ नहीं कहते क्योंकि हमें “धर्म विरोधी” कह दिया जाएगा? यदि कोई व्यक्ति महावीर के नाम पर महावीर के सिद्धांतों के विपरीत आचरण करे, और हम चुप रहें, तो यह चुप्पी भी पाप में भागीदार बन जाती है। सच्ची श्रद्धा अंधी नहीं होती, वह विवेकपूर्ण होती है।
यह भी सत्य है कि सभी साधु ऐसे नहीं हैं। आज भी अनेक सच्चे त्यागी, तपस्वी और आत्मलीन संत इस परंपरा की गरिमा को बचाए हुए हैं। वे न प्रचार चाहते हैं, न सुविधा, न संग्रह—वे केवल साधना में लीन हैं। लेकिन कुछ लोगों के कारण पूरी साधु परंपरा की छवि धूमिल हो रही है। और यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ साधु और प्रबंधक में अंतर ही भूल जाएँगी।
अब समय आ गया है कि समाज स्पष्ट रूप से निर्णय ले। साधु का सम्मान केवल उसके वस्त्र या उपाधि से नहीं, बल्कि उसके आचरण से होना चाहिए। जो महावीर के मार्ग पर चलेगा, वही पूजनीय होगा—और जो संग्रह, प्रभाव और नियंत्रण की राजनीति करेगा, उसे प्रश्नों के कटघरे में खड़ा किया जाएगा। यह विरोध नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा है।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि जहाँ संग्रह है, वहाँ साधुत्व नहीं हो सकता। जहाँ प्रभाव की लालसा है, वहाँ त्याग नहीं हो सकता। और जहाँ त्याग नहीं, वहाँ महावीर का मार्ग नहीं हो सकता। इसलिए अब समय है कि हम केवल जय-जयकार करने वाले अनुयायी न बनें, बल्कि जागरूक और जिम्मेदार श्रावक बनें, जो सत्य को पहचान सके और उसे स्वीकार करने का साहस भी रखे।
यदि आज भी हम नहीं जागे, तो कल बहुत देर हो जाएगी। महावीर का नाम रहेगा, लेकिन उनका मार्ग खो जाएगा। और यह हानि किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे जैन समाज की होगी। इसलिए अब मौन नहीं, बल्कि स्पष्ट और निर्णायक चेतावनी आवश्यक है—धर्म के नाम पर चल रहे इस संग्रह के खेल को पहचानो, और महावीर के सच्चे मार्ग की ओर लौटो, यही समय की पुकार है।
नितिन जैन
संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा)
जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल
मोबाइल: 9215635871 |
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1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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