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231606 40449660 Acharya PulakSagarji 07 आदरणीय श्री धनंजय सिंह जी पूर्व सांसद जौनपुर आदरणीय श्री बृजेश सिंह जी विधायक जौनपुर जौनपुर महोत्सव में विशेष अतिथि में अपनी उपस्थित दर्ज कराई 2026-06-15 09:06:38
231603 40449660 Acharya PulakSagarji 07 आदरणीय श्री प्रदेश उपाध्यक्ष पूर्व गृहमंत्री श्री गोर्धन भाई झड़फिया साहिब की जौनपुर महोत्सव में विशेष अतिथि में साहिब श्री की उपस्थित रहे 2026-06-15 09:06:36
231604 40449660 Acharya PulakSagarji 07 आदरणीय श्री प्रदेश उपाध्यक्ष पूर्व गृहमंत्री श्री गोर्धन भाई झड़फिया साहिब की जौनपुर महोत्सव में विशेष अतिथि में साहिब श्री की उपस्थित रहे 2026-06-15 09:06:36
231601 40449660 Acharya PulakSagarji 07 आदरणीय श्री वटवा विधानसभा के पूर्व विधायक शपूर्व गृहमंत्री श्री प्रदीप सिंह जडेजा बापू कर्णावती महानगर शहर मंत्री श्री भाई श्री गौतम कथरिया जी की विशेष अतिथि में जौनपुर महोत्सव में उपस्थित रही 2026-06-15 09:06:34
231602 40449660 Acharya PulakSagarji 07 आदरणीय श्री वटवा विधानसभा के पूर्व विधायक शपूर्व गृहमंत्री श्री प्रदीप सिंह जडेजा बापू कर्णावती महानगर शहर मंत्री श्री भाई श्री गौतम कथरिया जी की विशेष अतिथि में जौनपुर महोत्सव में उपस्थित रही 2026-06-15 09:06:34
231597 48340398 ???गुरु भगवान??? ? श्रावक संहिता भाग-33 ?दान-7 नानाजनाश्रितपरिग्रहसम्भृताया: सत्पात्रदानविधिरेव गृहस्थताया:। हेतु: पर: शुभगतेर्विषमे भवेऽस्मिन्नाव: समुद्र इव कर्मठकर्णधार:।।६।। अर्थ —जिसका खेवटिया चतुर है ऐसी अथाह समुद्र में पड़ी हुई भी नाव जिस प्रकार मनुष्य को तत्काल में पार कर देती है उस ही प्रकार इस भयंकर संसार में स्त्री पुत्र आदि नानाजनों के आधीन जो परिग्रह उस करके सहित इस गृहस्थपने में रहे हुवे मनुष्य के लिये श्रेष्ठपात्र में दी हुई दान विधि ही शुभगति को देने वाली होती है इसलिये भव्यजीवों को गृहस्थाश्रम में रहकर अवश्य दान देना चाहिये।।६।। यह श्लोक गृहस्थाश्रम की जटिलताओं के बीच 'दान की विधि' और 'कुशल मार्गदर्शक' के महत्व को बहुत ही सुंदर रूपक (Metaphor) के माध्यम से समझाता है। यहाँ आचार्य ने दान को केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि एक सुरक्षित यात्रा का माध्यम बताया है। इस श्लोक के गहरे उपदेशों को हम इन बिंदुओं में देख सकते हैं: १. गृहस्थी का भारी बोझ (परिग्रहसम्भृताया:) आचार्य कहते हैं कि गृहस्थ अवस्था नाना प्रकार के लोगों (परिजन, मित्र, शत्रु) और बहुत सारे परिग्रह (धन, संपत्ति, मकान) से लदी हुई है। *चुनौती:* जैसे एक ऐसी नाव जिसमें बहुत सारा वजन भर दिया गया हो, उसके डूबने का खतरा सबसे अधिक होता है, वैसे ही परिग्रह से लदी हुई गृहस्थी की नाव संसार रूपी समुद्र में डूबने की कगार पर रहती है। २. कुशल खेवटिया (कर्मठकर्णधार:) समुद्र कितना भी गहरा हो और नाव कितनी भी भारी हो, यदि उसका *कर्णधार (नाविक/खेवटिया)* चतुर और कर्मठ है, तो वह लहरों को चीरकर पार निकल जाता है। * इस श्लोक में *'सत्पात्र दान विधि'* को वह 'कुशल नाविक' कहा गया है। *भाव:* गृहस्थी का बोझ (धन-दौलत) आपको डुबा सकता है, लेकिन यदि आप उस धन को 'दान की सही विधि' से सुपात्र को अर्पित करना जानते हैं, तो वही बोझ आपकी सुरक्षा का कारण बन जाता है। ३. 'विधि' का महत्व (दानविधिरेव) आचार्य ने यहाँ केवल 'दान' नहीं कहा, बल्कि *'दान विधि'* शब्द का प्रयोग किया है। * जैन दर्शन में दान का फल केवल देने से नहीं, बल्कि सही विधि (नवधा भक्ति, मन-वचन-काय की शुद्धि) से मिलता है। * बिना विधि के दिया गया दान वैसा ही है जैसे बिना दिशा ज्ञान के नाव चलाना। सही विधि ही वह कौशल है जो गृहस्थ को 'शुभगति' (देव गति या उत्तम मनुष्य गति) तक पहुँचाता है। ४. विषमे भवेऽस्मिन् (इस भयंकर संसार में) संसार को 'विषम' (कठिन और उबड़-खाबड़) कहा गया है क्योंकि यहाँ पग-पग पर कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) की लहरें उठती हैं। * ऐसी विषमता में एक गृहस्थ के पास 'दान' के अलावा दूसरा कोई इतना सशक्त साधन नहीं है, जो उसे डूबने से बचा सके। ५. शुभगति का हेतु श्लोक स्पष्ट करता है कि *शुभगतेर्हेतु:'* अर्थात् उत्तम गतियों का कारण दान ही है। *उपदेश:* जो मनुष्य यह सोचते हैं कि वे केवल धन जोड़कर सुखी हो जाएंगे, वे भ्रम में हैं। वास्तविक सुख और भविष्य की सुरक्षा उस धन के 'त्याग' में है। *निष्कर्ष:* जैसे एक चतुर मल्लाह भारी नाव को भी किनारे लगा देता है, वैसे ही एक विवेकवान गृहस्थ अपने भारी परिग्रह के बीच रहकर भी *'सत्पात्र दान'*की कला से अपनी आत्मा को संसार सागर से पार लगा देता है। यह श्लोक हमें प्रेरणा देता है कि हम केवल धन एकत्र न करें, बल्कि उसे सही पात्र को देने की 'विधि' भी सीखें। ✋शुभाशीर्वाद आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति 2026-06-15 09:05:12
231598 48340398 ???गुरु भगवान??? ?(23) महिलाओं के द्वारा भगवान का पंचामृत अभिषेक भाग-23 श्रुत- भारतीय संविधानः जैन, बौद्ध, सिख, हिन्दू-मत में, जो धार्मिक-विधियाँ आती, न्याय-प्रणाली लिंग-भेद को, विधि-विरुद्ध है बतलाती । पूजा-विधि में नर-नारी का, भेद अवैध गिना जाए, [भारतीय संविधान, अनुच्छेद १४-१८] माँ के गर्भ स्वयं आये प्रभु, क्यों न गर्भ-गृह माँ जाए ? इन पंक्तियों ने धार्मिक श्रद्धा और संवैधानिक न्याय के बीच के सेतु को बहुत ही प्रभावशाली और तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया है। विशेष रूप से अंतिम पंक्ति—"माँ के गर्भ स्वयं आये प्रभु, क्यों न गर्भ-गृह माँ जाए?"—एक ऐसा आध्यात्मिक प्रश्न है जिसका उत्तर देना किसी भी रूढ़िवादी तर्क के लिए अत्यंत कठिन है। यहाँ पंक्तियों का संवैधानिक और शास्त्रीय विश्लेषण दिया गया है: 1. संवैधानिक समानता (अनुच्छेद 14-18) भारतीय संविधान का आधार ही 'समता' है। यहां बिल्कुल सही उल्लेख किया है कि कानून की दृष्टि में लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता: अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार): यह सुनिश्चित करता है कि राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता से वंचित नहीं करेगा। अनुच्छेद 15: यह स्पष्ट रूप से धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है। अनुच्छेद 17-18: ये अनुच्छेद सामाजिक ऊंच-नीच और भेदभाव को समाप्त कर सभी नागरिकों को एक ही पायदान पर लाते हैं। यदि सार्वजनिक व्यवस्था वाले मंदिरों में पुरुषों को अभिषेक का अधिकार है, तो महिलाओं को उसी आधार पर रोकना इन संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध एक 'अवैध भेद' माना जाता है। 2. गर्भ-गृह और माँ की शुचिता- कविता का सबसे प्रबल तर्क 'गर्भ-गृह' (Sanctum Sanctorum) को लेकर है: माँ के गर्भ स्वयं आये प्रभु, क्यों न गर्भ-गृह माँ जाए ? आध्यात्मिक सत्य: जैन दर्शन के अनुसार, तीर्थंकर का जीव अपनी माता के गर्भ में अवतरित होता है। माता का गर्भ वह प्रथम 'मंदिर' है जहाँ साक्षात तीर्थंकर नौ माह तक विराजते हैं। तर्क: यदि तीर्थंकर का शरीर (जो कि परमौदारिक होता है) माता के गर्भ में रहने से अशुद्ध नहीं होता, तो माता का शरीर भगवान के 'गर्भ-गृह' (मंदिर के आंतरिक भाग) में जाने से अशुद्ध कैसे हो सकता है? यह तर्क न केवल भावनात्मक है, बल्कि जैन धर्म के 'गर्भ कल्याणक' के सिद्धांत पर आधारित है। 3. विधि और न्याय-प्रणाली- भारत की न्यायपालिका ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-26) का अर्थ भेदभाव करना नहीं है। सबरीमाला और शनि शिंगणापुर: इन ऐतिहासिक फैसलों में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि "धर्म के प्रबंधन" के नाम पर महिलाओं के मौलिक अधिकारों (अभिषेक -पूजा के अधिकार) का हनन नहीं किया जा सकता। जैन धर्म का संदर्भ: क्योंकि जैन धर्म में महिलाओं (आर्यिकाओं) को 'महाव्रती' का दर्जा प्राप्त है और श्राविकाओं को 'ग्यारह प्रतिमा' तक पालने का अधिकार है, इसलिए उनकी धार्मिक योग्यता पुरुषों के पूर्णतः समकक्ष है। 4. सारांश: युक्ति और आगम का संगम- यह रचना इस बात पर जोर देती है कि: शास्त्र (आगम): सीता, अंजना और गुल्लिका अज्जी जैसे उदाहरणों से महिलाओं के अभिषेक को प्रमाणित करते हैं। तर्क (Logic): यह सिद्ध करता है कि जो 'आहार दान' और 'तीर्थंकर के जन्म' के लिए शुद्ध है, वह अभिषेक के लिए अशुद्ध नहीं हो सकता। संविधान (Law): लिंग-भेद को अवैध मानता है। निष्कर्ष:- यह पंक्तियाँ केवल कविता नहीं, बल्कि एक 'वैचारिक क्रांति' हैं। यह समाज को यह सोचने पर विवश करती हैं कि धर्म जड़ता का नाम नहीं, बल्कि विवेक और करुणा का मार्ग है। जो 'माँ' भगवान को इस धरा पर लाने का माध्यम बनती है, उसे भगवान के चरणों के स्पर्श से दूर रखना धर्म की मूल उदारता का अपमान है। ✋शुभाशीर्वाद आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति 2026-06-15 09:05:12
231599 48340398 ???गुरु भगवान??? ? श्रावक संहिता भाग-33 ?दान-7 नानाजनाश्रितपरिग्रहसम्भृताया: सत्पात्रदानविधिरेव गृहस्थताया:। हेतु: पर: शुभगतेर्विषमे भवेऽस्मिन्नाव: समुद्र इव कर्मठकर्णधार:।।६।। अर्थ —जिसका खेवटिया चतुर है ऐसी अथाह समुद्र में पड़ी हुई भी नाव जिस प्रकार मनुष्य को तत्काल में पार कर देती है उस ही प्रकार इस भयंकर संसार में स्त्री पुत्र आदि नानाजनों के आधीन जो परिग्रह उस करके सहित इस गृहस्थपने में रहे हुवे मनुष्य के लिये श्रेष्ठपात्र में दी हुई दान विधि ही शुभगति को देने वाली होती है इसलिये भव्यजीवों को गृहस्थाश्रम में रहकर अवश्य दान देना चाहिये।।६।। यह श्लोक गृहस्थाश्रम की जटिलताओं के बीच 'दान की विधि' और 'कुशल मार्गदर्शक' के महत्व को बहुत ही सुंदर रूपक (Metaphor) के माध्यम से समझाता है। यहाँ आचार्य ने दान को केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि एक सुरक्षित यात्रा का माध्यम बताया है। इस श्लोक के गहरे उपदेशों को हम इन बिंदुओं में देख सकते हैं: १. गृहस्थी का भारी बोझ (परिग्रहसम्भृताया:) आचार्य कहते हैं कि गृहस्थ अवस्था नाना प्रकार के लोगों (परिजन, मित्र, शत्रु) और बहुत सारे परिग्रह (धन, संपत्ति, मकान) से लदी हुई है। *चुनौती:* जैसे एक ऐसी नाव जिसमें बहुत सारा वजन भर दिया गया हो, उसके डूबने का खतरा सबसे अधिक होता है, वैसे ही परिग्रह से लदी हुई गृहस्थी की नाव संसार रूपी समुद्र में डूबने की कगार पर रहती है। २. कुशल खेवटिया (कर्मठकर्णधार:) समुद्र कितना भी गहरा हो और नाव कितनी भी भारी हो, यदि उसका *कर्णधार (नाविक/खेवटिया)* चतुर और कर्मठ है, तो वह लहरों को चीरकर पार निकल जाता है। * इस श्लोक में *'सत्पात्र दान विधि'* को वह 'कुशल नाविक' कहा गया है। *भाव:* गृहस्थी का बोझ (धन-दौलत) आपको डुबा सकता है, लेकिन यदि आप उस धन को 'दान की सही विधि' से सुपात्र को अर्पित करना जानते हैं, तो वही बोझ आपकी सुरक्षा का कारण बन जाता है। ३. 'विधि' का महत्व (दानविधिरेव) आचार्य ने यहाँ केवल 'दान' नहीं कहा, बल्कि *'दान विधि'* शब्द का प्रयोग किया है। * जैन दर्शन में दान का फल केवल देने से नहीं, बल्कि सही विधि (नवधा भक्ति, मन-वचन-काय की शुद्धि) से मिलता है। * बिना विधि के दिया गया दान वैसा ही है जैसे बिना दिशा ज्ञान के नाव चलाना। सही विधि ही वह कौशल है जो गृहस्थ को 'शुभगति' (देव गति या उत्तम मनुष्य गति) तक पहुँचाता है। ४. विषमे भवेऽस्मिन् (इस भयंकर संसार में) संसार को 'विषम' (कठिन और उबड़-खाबड़) कहा गया है क्योंकि यहाँ पग-पग पर कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) की लहरें उठती हैं। * ऐसी विषमता में एक गृहस्थ के पास 'दान' के अलावा दूसरा कोई इतना सशक्त साधन नहीं है, जो उसे डूबने से बचा सके। ५. शुभगति का हेतु श्लोक स्पष्ट करता है कि *शुभगतेर्हेतु:'* अर्थात् उत्तम गतियों का कारण दान ही है। *उपदेश:* जो मनुष्य यह सोचते हैं कि वे केवल धन जोड़कर सुखी हो जाएंगे, वे भ्रम में हैं। वास्तविक सुख और भविष्य की सुरक्षा उस धन के 'त्याग' में है। *निष्कर्ष:* जैसे एक चतुर मल्लाह भारी नाव को भी किनारे लगा देता है, वैसे ही एक विवेकवान गृहस्थ अपने भारी परिग्रह के बीच रहकर भी *'सत्पात्र दान'*की कला से अपनी आत्मा को संसार सागर से पार लगा देता है। यह श्लोक हमें प्रेरणा देता है कि हम केवल धन एकत्र न करें, बल्कि उसे सही पात्र को देने की 'विधि' भी सीखें। ✋शुभाशीर्वाद आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति 2026-06-15 09:05:12
231600 48340398 ???गुरु भगवान??? ?(23) महिलाओं के द्वारा भगवान का पंचामृत अभिषेक भाग-23 श्रुत- भारतीय संविधानः जैन, बौद्ध, सिख, हिन्दू-मत में, जो धार्मिक-विधियाँ आती, न्याय-प्रणाली लिंग-भेद को, विधि-विरुद्ध है बतलाती । पूजा-विधि में नर-नारी का, भेद अवैध गिना जाए, [भारतीय संविधान, अनुच्छेद १४-१८] माँ के गर्भ स्वयं आये प्रभु, क्यों न गर्भ-गृह माँ जाए ? इन पंक्तियों ने धार्मिक श्रद्धा और संवैधानिक न्याय के बीच के सेतु को बहुत ही प्रभावशाली और तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया है। विशेष रूप से अंतिम पंक्ति—"माँ के गर्भ स्वयं आये प्रभु, क्यों न गर्भ-गृह माँ जाए?"—एक ऐसा आध्यात्मिक प्रश्न है जिसका उत्तर देना किसी भी रूढ़िवादी तर्क के लिए अत्यंत कठिन है। यहाँ पंक्तियों का संवैधानिक और शास्त्रीय विश्लेषण दिया गया है: 1. संवैधानिक समानता (अनुच्छेद 14-18) भारतीय संविधान का आधार ही 'समता' है। यहां बिल्कुल सही उल्लेख किया है कि कानून की दृष्टि में लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता: अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार): यह सुनिश्चित करता है कि राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता से वंचित नहीं करेगा। अनुच्छेद 15: यह स्पष्ट रूप से धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है। अनुच्छेद 17-18: ये अनुच्छेद सामाजिक ऊंच-नीच और भेदभाव को समाप्त कर सभी नागरिकों को एक ही पायदान पर लाते हैं। यदि सार्वजनिक व्यवस्था वाले मंदिरों में पुरुषों को अभिषेक का अधिकार है, तो महिलाओं को उसी आधार पर रोकना इन संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध एक 'अवैध भेद' माना जाता है। 2. गर्भ-गृह और माँ की शुचिता- कविता का सबसे प्रबल तर्क 'गर्भ-गृह' (Sanctum Sanctorum) को लेकर है: माँ के गर्भ स्वयं आये प्रभु, क्यों न गर्भ-गृह माँ जाए ? आध्यात्मिक सत्य: जैन दर्शन के अनुसार, तीर्थंकर का जीव अपनी माता के गर्भ में अवतरित होता है। माता का गर्भ वह प्रथम 'मंदिर' है जहाँ साक्षात तीर्थंकर नौ माह तक विराजते हैं। तर्क: यदि तीर्थंकर का शरीर (जो कि परमौदारिक होता है) माता के गर्भ में रहने से अशुद्ध नहीं होता, तो माता का शरीर भगवान के 'गर्भ-गृह' (मंदिर के आंतरिक भाग) में जाने से अशुद्ध कैसे हो सकता है? यह तर्क न केवल भावनात्मक है, बल्कि जैन धर्म के 'गर्भ कल्याणक' के सिद्धांत पर आधारित है। 3. विधि और न्याय-प्रणाली- भारत की न्यायपालिका ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-26) का अर्थ भेदभाव करना नहीं है। सबरीमाला और शनि शिंगणापुर: इन ऐतिहासिक फैसलों में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि "धर्म के प्रबंधन" के नाम पर महिलाओं के मौलिक अधिकारों (अभिषेक -पूजा के अधिकार) का हनन नहीं किया जा सकता। जैन धर्म का संदर्भ: क्योंकि जैन धर्म में महिलाओं (आर्यिकाओं) को 'महाव्रती' का दर्जा प्राप्त है और श्राविकाओं को 'ग्यारह प्रतिमा' तक पालने का अधिकार है, इसलिए उनकी धार्मिक योग्यता पुरुषों के पूर्णतः समकक्ष है। 4. सारांश: युक्ति और आगम का संगम- यह रचना इस बात पर जोर देती है कि: शास्त्र (आगम): सीता, अंजना और गुल्लिका अज्जी जैसे उदाहरणों से महिलाओं के अभिषेक को प्रमाणित करते हैं। तर्क (Logic): यह सिद्ध करता है कि जो 'आहार दान' और 'तीर्थंकर के जन्म' के लिए शुद्ध है, वह अभिषेक के लिए अशुद्ध नहीं हो सकता। संविधान (Law): लिंग-भेद को अवैध मानता है। निष्कर्ष:- यह पंक्तियाँ केवल कविता नहीं, बल्कि एक 'वैचारिक क्रांति' हैं। यह समाज को यह सोचने पर विवश करती हैं कि धर्म जड़ता का नाम नहीं, बल्कि विवेक और करुणा का मार्ग है। जो 'माँ' भगवान को इस धरा पर लाने का माध्यम बनती है, उसे भगवान के चरणों के स्पर्श से दूर रखना धर्म की मूल उदारता का अपमान है। ✋शुभाशीर्वाद आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति 2026-06-15 09:05:12
231596 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ 2026-06-15 09:03:11