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230312 45644158 +120363403286452801 2026-06-14 19:13:34
230309 45644158 +120363403286452801 महाराष्ट्र और जैन समाज — अलग कैसे? जरा इतिहास की आंखों से देखिए। कुछ लोग जैन समाज को "बाहरी" बताने का प्रयास करते हैं, लेकिन इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और परंपराएं स्वयं इसकी सच्चाई बयान करती हैं। सबसे पहले यह समझना होगा कि भारत की सनातन आध्यात्मिक परंपरा किसी एक राज्य की सीमाओं में बंधी नहीं है। अयोध्या के श्रीराम, द्वारका के श्रीकृष्ण, काशी के शिव, कैलास के गणपति और पुष्कर के ब्रह्मा सम्पूर्ण भारत के आराध्य हैं, किसी एक प्रदेश के नहीं। इसी प्रकार जैन धर्म भी केवल किसी एक क्षेत्र का नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन आध्यात्मिक धरोहर है। और महाराष्ट्र में इसका इतिहास कोई 50-100 वर्ष पुराना नहीं, बल्कि लगभग 2000 वर्षों से भी अधिक पुराना है। Riya jeet Rathod ? नालासोपारा (प्राचीन सोपारक नगर) प्राचीन काल में जैन धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र था। ? विरार का नाम जैन साधुओं के "विहार" से जुड़ा माना जाता है। ? ठाणे और आसपास के क्षेत्रों में जैन संस्कृति के अनेक ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। ? एलोरा की भव्य जैन गुफाएं लगभग 1200 वर्षों से महाराष्ट्र की धरती पर जैन कला, वास्तुकला और आध्यात्मिकता की गवाही दे रही हैं। ? लोहगड़, पाले, चांदवड़, नाशिक, लातूर सहित अनेक स्थानों पर प्राचीन जैन गुफाएं, शिलालेख और मंदिर आज भी विद्यमान हैं। ? पुरातत्व विभाग द्वारा प्राप्त हजारों वर्ष पुराने जैन अवशेष, मूर्तियां और अभिलेख महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। इतिहास यह भी बताता है कि जैन समाज ने महाराष्ट्र को केवल व्यापार और उद्योग ही नहीं दिए, बल्कि अहिंसा, जीवदया, शिक्षा, दान, अस्पताल, गौशालाएं, धर्मशालाएं और सामाजिक सेवा की समृद्ध परंपरा भी दी है। जिन लोगों को सफेद पट्टी, अहिंसा या जीवदया से समस्या है, उन्हें इतिहास पढ़ना चाहिए। क्योंकि जैन समाज ने कभी किसी पर अपनी मान्यताएं थोपने का प्रयास नहीं किया, बल्कि "जियो और जीने दो" का संदेश दिया है। जब 2000 वर्षों का इतिहास, शिलालेख, गुफाएं, मंदिर और सांस्कृतिक योगदान यह प्रमाणित करते हैं कि जैन धर्म महाराष्ट्र की आत्मा में रचा-बसा है, तो विभाजन और वैमनस्य फैलाने का कोई औचित्य नहीं बचता। महाराष्ट्र केवल मराठाओं का नहीं, बल्कि उन सभी का है जिन्होंने इस भूमि को समृद्ध बनाया है। और जैन समाज उन समुदायों में से एक है जिसने अपने परिश्रम, संस्कार, करुणा और राष्ट्रभक्ति से महाराष्ट्र के विकास में अमूल्य योगदान दिया है। महाराष्ट्र और जैन समाज का संबंध अतिथि और मेजबान का नहीं, बल्कि मिट्टी और सुगंध का है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। अहिंसा हमारी शक्ति है, सद्भाव हमारी पहचान है, और एकता ही हमारा भविष्य है। जय महाराष्ट्र। जय जिनेंद्र। ??। Follow the ? जैन इकोसिस्टम (Jain Ecosystem) ? channel on WhatsApp: <a href="https://whatsapp.com/channel/0029VbBUKYtBVJlC8SdeP60f" target="_blank">https://whatsapp.com/channel/0029VbBUKYtBVJlC8SdeP60f</a> 2026-06-14 19:13:19
230310 45644158 +120363403286452801 महाराष्ट्र और जैन समाज — अलग कैसे? जरा इतिहास की आंखों से देखिए। कुछ लोग जैन समाज को "बाहरी" बताने का प्रयास करते हैं, लेकिन इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और परंपराएं स्वयं इसकी सच्चाई बयान करती हैं। सबसे पहले यह समझना होगा कि भारत की सनातन आध्यात्मिक परंपरा किसी एक राज्य की सीमाओं में बंधी नहीं है। अयोध्या के श्रीराम, द्वारका के श्रीकृष्ण, काशी के शिव, कैलास के गणपति और पुष्कर के ब्रह्मा सम्पूर्ण भारत के आराध्य हैं, किसी एक प्रदेश के नहीं। इसी प्रकार जैन धर्म भी केवल किसी एक क्षेत्र का नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन आध्यात्मिक धरोहर है। और महाराष्ट्र में इसका इतिहास कोई 50-100 वर्ष पुराना नहीं, बल्कि लगभग 2000 वर्षों से भी अधिक पुराना है। Riya jeet Rathod ? नालासोपारा (प्राचीन सोपारक नगर) प्राचीन काल में जैन धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र था। ? विरार का नाम जैन साधुओं के "विहार" से जुड़ा माना जाता है। ? ठाणे और आसपास के क्षेत्रों में जैन संस्कृति के अनेक ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। ? एलोरा की भव्य जैन गुफाएं लगभग 1200 वर्षों से महाराष्ट्र की धरती पर जैन कला, वास्तुकला और आध्यात्मिकता की गवाही दे रही हैं। ? लोहगड़, पाले, चांदवड़, नाशिक, लातूर सहित अनेक स्थानों पर प्राचीन जैन गुफाएं, शिलालेख और मंदिर आज भी विद्यमान हैं। ? पुरातत्व विभाग द्वारा प्राप्त हजारों वर्ष पुराने जैन अवशेष, मूर्तियां और अभिलेख महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। इतिहास यह भी बताता है कि जैन समाज ने महाराष्ट्र को केवल व्यापार और उद्योग ही नहीं दिए, बल्कि अहिंसा, जीवदया, शिक्षा, दान, अस्पताल, गौशालाएं, धर्मशालाएं और सामाजिक सेवा की समृद्ध परंपरा भी दी है। जिन लोगों को सफेद पट्टी, अहिंसा या जीवदया से समस्या है, उन्हें इतिहास पढ़ना चाहिए। क्योंकि जैन समाज ने कभी किसी पर अपनी मान्यताएं थोपने का प्रयास नहीं किया, बल्कि "जियो और जीने दो" का संदेश दिया है। जब 2000 वर्षों का इतिहास, शिलालेख, गुफाएं, मंदिर और सांस्कृतिक योगदान यह प्रमाणित करते हैं कि जैन धर्म महाराष्ट्र की आत्मा में रचा-बसा है, तो विभाजन और वैमनस्य फैलाने का कोई औचित्य नहीं बचता। महाराष्ट्र केवल मराठाओं का नहीं, बल्कि उन सभी का है जिन्होंने इस भूमि को समृद्ध बनाया है। और जैन समाज उन समुदायों में से एक है जिसने अपने परिश्रम, संस्कार, करुणा और राष्ट्रभक्ति से महाराष्ट्र के विकास में अमूल्य योगदान दिया है। महाराष्ट्र और जैन समाज का संबंध अतिथि और मेजबान का नहीं, बल्कि मिट्टी और सुगंध का है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। अहिंसा हमारी शक्ति है, सद्भाव हमारी पहचान है, और एकता ही हमारा भविष्य है। जय महाराष्ट्र। जय जिनेंद्र। ??। Follow the ? जैन इकोसिस्टम (Jain Ecosystem) ? channel on WhatsApp: <a href="https://whatsapp.com/channel/0029VbBUKYtBVJlC8SdeP60f" target="_blank">https://whatsapp.com/channel/0029VbBUKYtBVJlC8SdeP60f</a> 2026-06-14 19:13:19
230307 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म 2026-06-14 19:13:07
230308 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म 2026-06-14 19:13:07
230306 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-14 19:13:04
230305 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-14 19:13:03
230304 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-14 19:12:57
230303 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-14 19:12:56
230301 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी मंदसौर में मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महामुनिराज को आहार दान दिया और आशीर्वाद प्राप्त किया आश्रम के सभी भैया जी ने 2026-06-14 19:12:51