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*॥ चरणानुयोग॥*
* _!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम: !!_*
श्रीमद्-भगवत्कुन्दकुन्दाचार्य-देव-प्रणीत
*श्री बारसणुपेक्खा*
मूल प्राकृत गाथा : उग्रसेन जैन
पूज्य श्री आचार्य नमिसागर जी महाराज
_मंगलाचरण और प्रतिज्ञावाक्य -_
*णमिऊण सव्वसिद्धे, झाणुत्तमखविददीहसंसारे।*
*दस दस दो दो व जिणे, दस दो अणुपेहणं वोच्छे ॥1॥*
_अध्रुव अनुप्रेक्षा का स्वरूप -_
*वरभवणजाणवाहणसयणासणदेवमणुवरायाणं ।* *मादुपिदुसजणभिच्चसंबंधिणो य पिदिवियाणिच्चा ॥3॥*
_वर भवन यान वाहन शयनाऽऽसनं देवमनुज राज्ञाम् ।_
_मातृ पितृ स्वजन भृत्य सम्वन्धिनश्च पितृव्योऽनित्याः ॥_
*सूत्रार्थ* - (वरभवणजाणवाहण सयणासणदेवमणुवरायाणं) (वर) श्रेष्ठ (भवण) भवन (जाण) यान (वाहण) वाहन (सयणासण) शयन, आसन (देवमणुवरायाणं) देव, मनुष्य, राजा (मादु पिदु) माता पिता (सजण) अपने लोग (भिच्च) नौकर चाकर (य) और (संबंधिणो) सम्बन्धी (पिदिवियाणिच्चा) अपने से पृथक् होने से अनित्य है ॥ 3 ॥
*अन्वयार्थ* : उत्तम भवन, यान, वाहन, शयन, आसन, देव, मनुष्य, राजा, माता, पिता, कुटुंबी और सेवक आदि सभी अनित्य तथा पृथक् हो जाने वाले हैं ॥३॥
देवों के, मनुप्यों के, राजाओं अर्थात् इन्द्र तथा चक्रवर्तियों के बड़े-बड़े सुन्दर महल, सवारी, पालकी, शय्या, आसन और माता-पिता, कुटुम्बी जन, सेवक, संबंधी तथा प्रिया आदि सब ही अनित्य हैं। इनमें से कोई सदा रहने वाला नहीं है निश्चय से ये सब अथिर हैं। |
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2026-02-18 22:55:40 |
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