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जिनोदय?JINODAYA |
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*मुझे किसी भीड़ की ज़रूरत नहीं
मैं अकेला ही खुद एक कारवां हूं*
मुझे किसी भीड़ की ज़रूरत नहीं मित्र, मैं अकेला ही खुद एक कारवां हूं। यह वाक्य कोई अहंकार नहीं, यह आत्मविश्वास की सीधी और सच्ची घोषणा है। भीड़ हमेशा सच के साथ नहीं होती, अक्सर भीड़ सुविधा के साथ खड़ी होती है। जो सही होता है वह प्रायः अकेला होता है, और जो अकेला चलने का साहस रखता है वही इतिहास में अपनी पहचान छोड़ता है। भीड़ का हिस्सा बनना आसान है, सवाल उठाना कठिन। तालियां पाना सरल है, सच बोलना भारी पड़ता है। इसलिए जिसने सच को चुना, उसने अकेलेपन को भी स्वीकार किया।
अकेला चलने वाला व्यक्ति किसी के इशारे पर नहीं चलता, वह अपनी अंतरात्मा के निर्देश पर आगे बढ़ता है। उसे न तो मंच की ज़रूरत होती है, न समर्थन की भीख। वह जानता है कि समय लग सकता है, चोटें लगेंगी, बदनामी भी होगी, पर अंततः सच को ही रास्ता मिलना है। भीड़ का सहारा अक्सर कमजोर इरादों को चाहिए होता है, मजबूत सोच को नहीं। मजबूत सोच तो अकेले भी खड़ी रह सकती है, तूफानों के बीच भी।
आज के समय में जब लोग संख्या से ताकत आंकते हैं, तब यह समझना ज़रूरी है कि संख्या नहीं, संकल्प बड़ा होता है। एक सच्चा व्यक्ति सौ झूठों पर भारी पड़ता है। भीड़ कभी ज़िम्मेदारी नहीं लेती, वह बस दिशा बदलती है। ज़िम्मेदारी हमेशा अकेले कंधों पर आती है, और वही कंधे इतिहास का बोझ उठाने लायक बनते हैं। इसलिए अगर रास्ते में आप अकेले हैं, तो इसे कमजोरी मत समझिए, यह इस बात का संकेत है कि आप भीड़ से आगे सोच रहे हैं।
कारवां बनने के लिए ऊंटों की कतार नहीं चाहिए, कारवां बनने के लिए लक्ष्य चाहिए। जिस दिन लक्ष्य साफ़ हो जाता है, उसी दिन अकेलापन शक्ति में बदल जाता है। लोग पीछे से पत्थर फेंकते हैं, सवाल उठाते हैं, चरित्र पर उंगलियां रखते हैं, पर वही लोग समय आने पर उसी रास्ते पर चलने की कोशिश करते हैं जिसे कभी गलत कहा था। इतिहास गवाह है, हर परिवर्तन पहले एक व्यक्ति के भीतर जन्म लेता है, भीड़ बाद में जुड़ती है।
इसलिए मुझे किसी भीड़ की ज़रूरत नहीं। मैं समर्थन से नहीं, सत्य से चलता हूं। मैं शोर से नहीं, विवेक से निर्णय लेता हूं। अगर रास्ता लंबा है तो भी ठीक है, अगर संघर्ष ज्यादा है तो भी स्वीकार है, क्योंकि मंज़िल भीड़ की नहीं होती, मंज़िल उस अकेले की होती है जो अंत तक खड़ा रहता है। मैं अकेला हूं, पर कमजोर नहीं। मैं अकेला हूं, पर दिशाहीन नहीं। मैं अकेला हूं, क्योंकि मैं खुद एक कारवां हूं।
नितिन जैन
संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा)
जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल
मोबाइल: 9215635871 |
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2026-02-12 09:41:15 |
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? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? |
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*इंडिया को प्राचीन भारत की ओर दो ही व्यक्ति ही लौटा सकते हैं, माता पिता और शिक्षक शिक्षिकायें....*
युगश्रेष्ठ संतशिरोमणी
आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज
???✨✨???
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???⭐⭐???
कहाँ तक कहें यह कहानी,
कहते कहते थकती वाणी ।
रह गई दूर वीर वाणी,
विस्मरित हुई, हुई पुराणी।।
? *समकित लाभ* ?
आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज |
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2026-02-12 09:41:03 |
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