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1408 40449663 ? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? बात तो सही कह रहा है ? 2026-02-13 05:16:48
1407 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ 2026-02-13 05:16:40
1406 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ जमीनधारकांसाठी आनंदाची बातमी! आता 'NA' परवानगीची कटकट संपली! ​महाराष्ट्र शासनाचा ऐतिहासिक निर्णय! बांधकामासाठी आता जिल्हाधिकाऱ्यांच्या चकरा मारण्याची गरज नाही. ७/१२ उताऱ्यावर आता आपोआप नोंद होणार आणि वार्षिक अकृषक करही रद्द झाला आहे. महायुती सरकारचा सर्वसामान्यांना मोठा दिलासा! #ravindrchavanfc #bhartiyajanataparty #bjp4maharashtra 2026-02-13 05:16:25
1405 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा 2026-02-13 05:14:20
1404 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा ??आनन्द का दिन आयेगा आयेगा, निर्ग्रन्थ जीवन आयेगा आयेगा✨ टेक स्वरूप निर्ग्रन्थ, श्रद्धा है निर्ग्रन्थ। भाऊँ सहज ही मैं भावना निर्ग्रन्थ।। निर्ग्रन्थ परिणाम आयेगा2 ।।1।। अणुमात्र भी मुझको, मेरा न दिखता। ज्ञायक स्वयं में ही परिपूर्ण दिखता।। प्रचुर स्वसंवेदन आयेगा2 ।।2।। संयोग के काल में ही हैं न्यारे। संयोग होते कभी न हमारे।। निरपेक्ष जीवन आयेगा2 ।।3।। वैभव स्वयं का, स्वयं में ही शाश्वत। प्रभुता स्वयं की स्वयं में ही शाश्वत।। स्वाधीन जीवन आयेगा2 ।।4।। बाहर से कुछ भी आता नहीं है। अपना कभी कुछ न जाता कहीं है।। निश्चिंत जीवन आयेगा2 ।।5।। स्वभाव से ही ज्ञानमयी हूँ। स्वभाव से ही आनंदमयी हूँ।। निर्द्वन्द जीवन आयेगा2 ।।6।। तृप्त स्वयं में, तुष्ट स्वयं में। लीन स्वयं में, मग्न स्वयं में।। सिद्धों सा जीवन आयेगा2 ।। 7।। वस्तु स्वरूप सदा है अवस्थित। मार्ग यही है हुई मति व्यवस्थित।। प्रभुतामय जीवन आयेगा2 ।। 8।। 2026-02-13 05:14:18
1403 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ??आनन्द का दिन आयेगा आयेगा, निर्ग्रन्थ जीवन आयेगा आयेगा✨ टेक स्वरूप निर्ग्रन्थ, श्रद्धा है निर्ग्रन्थ। भाऊँ सहज ही मैं भावना निर्ग्रन्थ।। निर्ग्रन्थ परिणाम आयेगा2 ।।1।। अणुमात्र भी मुझको, मेरा न दिखता। ज्ञायक स्वयं में ही परिपूर्ण दिखता।। प्रचुर स्वसंवेदन आयेगा2 ।।2।। संयोग के काल में ही हैं न्यारे। संयोग होते कभी न हमारे।। निरपेक्ष जीवन आयेगा2 ।।3।। वैभव स्वयं का, स्वयं में ही शाश्वत। प्रभुता स्वयं की स्वयं में ही शाश्वत।। स्वाधीन जीवन आयेगा2 ।।4।। बाहर से कुछ भी आता नहीं है। अपना कभी कुछ न जाता कहीं है।। निश्चिंत जीवन आयेगा2 ।।5।। स्वभाव से ही ज्ञानमयी हूँ। स्वभाव से ही आनंदमयी हूँ।। निर्द्वन्द जीवन आयेगा2 ।।6।। तृप्त स्वयं में, तुष्ट स्वयं में। लीन स्वयं में, मग्न स्वयं में।। सिद्धों सा जीवन आयेगा2 ।। 7।। वस्तु स्वरूप सदा है अवस्थित। मार्ग यही है हुई मति व्यवस्थित।। प्रभुतामय जीवन आयेगा2 ।। 8।। 2026-02-13 05:14:11
1402 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-02-13 05:14:10
1401 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ 2026-02-13 05:12:37
1400 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ 2026-02-13 05:08:39
1399 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ *कहानी बड़ी सुहानी* (1) *कहानी* *पुण्य किसी को दगा नहीं देता और पाप किसी का सगा नहीं होता।* गांव-देहात में एक कीड़ा पाया जाता है, जिसे गोबरैला कहा जाता है। उसे गाय, भैंसों के ताजे गोबर की बू बहुत भाती है! वह सुबह से गोबर की तलाश में निकल पड़ता है और सारा दिन उसे जहां कहीं गोबर मिल जाता है, वहीं उसका गोला बनाना शुरू कर देता है। .. शाम तक वह एक बड़ा सा गोला बना लेता है। फिर उस गोले को ढ़केलते हुए अपने बिल तक ले जाता है। लेकिन बिल पर पहुंच कर उसे पता चलता है कि गोला तो बहुत बड़ा बन गया मगर उसके बिल का द्वार बहुत छोटा है। बहुत परिश्रम और कोशिशों के बाद भी वह उस गोले को बिल के अंदर नहीं ढ़केल पाता, और उसे वहीं पर छोड़कर बिल में चला जाता है।... यही हाल हम मनुष्यों का भी है। पूरी जिंदगी हम दुनियाभर का माल-मत्ता जमा करने में लगे रहते हैं और जब अंत समय आता है, तो पता चलता है कि ये सब तो साथ नहीं ले जा सकते और तब हम उस जीवन भर की कमाई को बड़ी हसरत से देखते हुए इस संसार से विदा हो जाते हैं।। .. पुण्य किसी को दगा नहीं देता और पाप किसी का सगा नहीं होता। जो कर्म को समझता है, उसे धर्म को समझने की जरूरत नहीं पड़ती। संपत्ति के उत्तराधिकारी कोई भी या अनेक हो सकते हैं, लेकिन कर्मों के उत्तराधिकारी केवल और केवल हम स्वयं ही होते हैं,इसलिए उसकी खोज में रहे जो हमारे साथ जाना है, उसे हासिल करने में ही समझदारी है। **************************************** (2) *कहानी* मानव और दानव में अंतर: माँ हैं ममतामयी मूरत ??तीन दिन से भूखे थे शेर दम्पत्ति मिल नही पाया था जंगल में कोई शिकार घने पेड़ की छांव में अधलेटे राजा - रानी नजर पड़ी एक जीव पर मिल गया आहार शेरनी ने मुंह उठाकर सूंघी उसकी गंध आवाज दिशा में दौड़ पड़ी लगाकर पूरा जोर गाय का नवजात बच्चा था अकेला खड़ा मौत आती देखकर मां - मां चिल्लाया पुरजोर शेरनी भी तेजी से दौड़ी आगे - आगे बच्चा अपनी कोशिश भर उसने भी भरी कुलांचें नवजात शिशु भी अपनी मां को रहा पुकार थोड़ी देर में ही फूल गई उस अबोध की आंतें अचानक दोनों के बीच हुआ ह्रदय परिवर्तन बच्चा स्वयं शेरनी को मां - मां कहकर पुकारा अपनी मां समझकर मांग रहा था दूध ढूंढ रहा था स्तन पीने दूध बेचारा अपने मुंह से शेरनी पर कर रहा था प्रहार मां की ममता जीत गई हार गए पकवान शेरनी ने भी त्याग दिया मारने का विचार मां शब्द की वेदना न समझ सका इन्सान? ऐसा करिश्मा न देखा न सुना तीन दिन की भूखी शेरनी छोड़ दी आहार खेलने लगी उसके साथ पशु प्रेम का खेल अचानक देने लगी उसे अपने बच्चे सा प्यार ढूढते - ढूढते शेर पहुंचा शेरनी के पास भूखी अतड़ियों में खुशी की लहर दौड़ी झपट्टा मारकर बच्चे की तरफ दौड़ा शेर मुंह में बच्चा दबाकर शेरनी गर्दन मोड़ी शेर को धमकाते हुए शेरनी गुर्राई ये भी है किसी दुखियारी मां का लाल इसके मर जाने से इसकी मां कितना रोएगी कभी -कभी पशु भी दिखलाते मानवता बेमिसाल जंगल का राजा भी हो गया चुपचाप ममतमामयी शेरनी अपने स्वामी से लड़ गई तीन दिन की भूखी प्यासी ये प्रेमी जोड़ी पापी पेट हार गया मां की ममता जीत गई भूखी शेरनी का भी दिल पसीज गया हम तो पढ़े - लिखे मानव कहलाते मां - मां शब्द की आवाज से ही कहे हमारे बच्चे क्यों दानव बन जाते **************************************** (3) *कहानी* *आज का अमृत* *जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी* *हृदय परिवर्तन* 〰️〰️?〰️〰️ *"अबे देख------* चिड़ियाघर में, अपने तीन साल के बच्चे के साथ घूम रही एक गांव की खूबसूरत नवयुवती को दिखा, वो पांच-सात कॉलेज के लड़के यही बातें कर रहे थे। वो उस खूबसूरत, अकेली देहाती युवती के पीछे हो लिए। युवती अपने बच्चे को कभी गोद में तो कभी उंगली पकड़े उसे बारी बारी से जानवरों को दिखा रही थी। पीछे लगे आवारा लड़कों से बिल्कुल बेखबर... "चलती है क्या नौ से बारह" फिल्मी गाने गाते वो उसे कट मारकर अट्टहास करते आगे निकल गए। युवती ने उनपर ध्यान नहीं दिया। वो हिरन के बाड़े के पास अपने बच्चे को उन्हें दिखा रही थी। बच्चा चहकता हुआ उन्हें देख रहा था। आवारा लड़के उस युवती को घुर रहे थे। वो लड़के बगल में ही शेर के बाड़े के पास जोर से उसे देख फब्तियां कस रहे थे। उनमें से एक लड़का पूरे जोश में था। बाड़े के ऊपर लगे ग्रिल पर बैठ भद्दे गाने गा रहा था। युवती बच्चे को लिए शेर को दिखाने बढ़ चली थी। युवती को देख ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उसे उन लड़कों से तनिक भी भय नहीं या वो उन्हें अनदेखा अनसुना कर रही है,युवक अतिउत्साहित हो उठा। सभी ठहाके लगा रहे थे। युवती बाड़े के पास पहुंच चुकी थी। तभी बाड़े के ऊपर चढ़ा लड़का,लड़खड़ाते हुए, बाड़े के अंदर गिर पड़ा। लोगों के होश फाख्ता हो गए। बाड़े से दूर बैठा शेर उठ चुका था। उसने गुर्राते हुए कदम धीरे धीरे लड़के की तरफ बढ़ा दिया। उसके दोस्त असहाय होकर खड़े थे और सिर्फ चिल्ला रहे थे। भागता हुआ एक गार्ड आकर शेर को आवाज देकर जाने को कह रहा था। एक मिनट के भीतर अफरा तफरी मच चुकी थी। शेर को आता देख गिरा हुआ लड़का डर से कांप रहा था। उसके जोश के साथ शायद होश भी ठंढे पड़ चुके थे ।" माँ.. माँ.. बचाओ..बचाओ" की आवाज लगातार तेज हो रही थी और शेर की चाल भी। तभी उस देहाती युवती ने, अपने बदन से साढ़े पांच मीटर लंबी साड़ी उतार बाड़े में लटका दिया। बाड़े में गिरे लड़के ने तुरंत उस साडी का सिरा मजबूती से पकड़ लिया फिर लोगों की मदद से उसे निकाल लिया गया। गार्ड युवक को संभालता हुआ बोल पड़ा..."पहले तुम्हारी माँ ने जन्म दिया था, आज इस युवती ने तुम्हें दुबारा जन्म दिया है" सिर्फ ब्लाउज और पेटिकोट में खड़ी वो अर्ध-नग्न युवती अब उन लड़कों को उनकी माँ नज़र आ रही थी.. !! हमें युवा पीढ़ी को बताना होगा । यह कहानी उन्हें सुनाने या पढ़ाने की जरूरत है। जैसी सोच वैसी दुनिया दिखेगी । **************************************** (4) *कहानी* समस्या - *"बेटा, मेरी बहुएं मेरा कहना नहीं सुनती। सलवार सूट और जीन्स पहन के घूमती हैं। सर पर पल्ला/चुनरी नहीं रखती और मार्किट चली जाती हैं। मार्गदर्शन करो कि कैसे इन्हें वश में करूँ..."* *समाधान* - आंटी जी चरण स्पर्श, पहले एक कहानी सुनते हैं, फिर समस्या का समाधान सुनाते हैं। "एक अंधे दम्पत्ति को बड़ी परेशानी होती, जब अंधी खाना बनाती तो कुत्ता आकर खा जाता। रोटियां कम पड़ जाती। तब अंधे को एक समझदार व्यक्ति ने आइडिया दिया कि तुम डंडा लेकर दरवाजे पर थोड़ी थोड़ी देर में फटकते रहना, जब तक अंधी रोटी बनाये। अब कुत्ता *तुम्हारे हाथ मे डंडा देखेगा और डंडे की खटखट सुनेगा तो स्वतः डर के भाग जाएगा रोटियां सुरक्षित रहेंगी*। युक्ति काम कर गयी, अंधे दम्पत्ति खुश हो गए। कुछ वर्षों बाद दोनों के घर मे सुंदर पुत्र हुआ, जिसके आंखे थी और स्वस्थ था। उसे पढ़ा लिखाकर बड़ा किया। उसकी शादी हुई और बहू आयी। बहु जैसे ही रोटियां बनाने लगी तो लड़के ने डंडा लेकर दरवाजे पर खटखट करने लगा। बहु ने पूँछा ये क्या कर रहे हो और क्यों? तो लड़के ने बताया ये हमारे घर की परम्परा है, मेरी माता जब भी रोटी बनाती तो पापा ऐसे ही करते थे। कुछ दिन बाद उनके घर मे एक गुणीजन आये, तो माज़रा देख समझ गए। बोले बेटा तुम्हारे माता-पिता अंधे थे, अक्षम थे तो उन्होंने ने डंडे की खटखट के सहारे रोटियां बचाई। लेकिन तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों की आंखे है, तुम्हे इस खटखट की जरूरत नहीं। *बेटे परम्पराओं के पालन में विवेक को महत्तव दो*। आंटीजी, *इसी तरह हिंदू स्त्रियों में पर्दा प्रथा मुगल आततायियों के कारण आयी थी*, क्योंकि वो सुंदर स्त्रियों को उठा ले जाते थे। इसलिए स्त्रियों को मुंह ढककर रखने की आवश्यकता पड़ती थी। सर पर हमेशा पल्लू होता था यदि घोड़े के पदचाप की आवाज़ आये तो मुंह पर पल्ला तुरन्त खींच सकें।" अब हम स्वतन्त्र देश के स्वतन्त्र नागरिक है, राजा का शासन और सामंतवाद खत्म हो गया है। अब स्त्रियों को सर पर अनावश्यक पल्ला और पर्दा प्रथा पालन की आवश्यकता नहीं है। घर के बड़ो का सम्मान आंखों में होना चाहिए, बोलने में अदब होना चाहिए और व्यवहार में विनम्रता छोटो के अंदर होनी चाहिए। सर पर पल्ला रखे और वृद्धावस्था में सास-ससुर को कष्ट दे तो क्या ऐसी बहु ठीक रहेगी? आंटीजी पहले हम सब लकड़ियों से चूल्हे में खाना बनाते थे, लेकिन अब गैस में बनाते है। पहले बैलगाड़ी थी और अब लेटेस्ट डीज़ल/पेट्रोल गाड़िया है। टीवी/मोबाइल/लैपटॉप/AC इत्यादि नई टेक्नोलॉजी उपयोग जब बिना झिझक के कर रहे हैं, तो फिर बहुओं को पुराने जमाने के हिसाब से क्यों रखना चाहती है? नए परिधान यदि सभ्य है, सलवार कुर्ती, जीन्स कुर्ती तो उसमें किसी को समस्या नहीं होनी चाहिए। जब बेटियाँ उन्ही वस्त्रों में स्वीकार्य है तो फिर बहु के लिए समस्या क्यों? आंटी जी, "परिवर्तन संसार का नियम है"। यदि आप अच्छे संस्कार घर में बनाये रखना चाहते हो तो उस सँस्कार के पीछे का लॉजिक प्यार से बहु- बेटी को समझाओ। उन्हें थोड़ी प्राइवेसी दो और खुले दिल से उनका पॉइंट ऑफ व्यू भी समझो। बहु भी किसी की बेटी है, आपकी बेटी भी किसी की बहू है। अतः घर में सुख-शांति और आनन्दमय वातावरण के लिए *जिस तरह आपने मोबाइल जैसी टेक्नोलॉजी को स्वीकार किया है वैसे ही बहु के नए परिधान को स्वीकार लीजिये। बहु को एक मां की नज़र से बेटी रूप में देखिए, और उससे मित्रवत रहिये।* *"सबसे बड़ा रोग- क्या कहेंगे लोग"*, इससे बचिए, क्योंकि जब आपको सेवा की जरूरत होगी तो लोग कभी उपलब्ध न होंगे। आपको *'बेटे-बहु'* ही चाहिए होंगे। *************************** 2026-02-13 05:07:40