WhatsApp Messages Dashboard

Total Records in Table: 14570

Records Matching Filters: 14570

From: To: Global Search:

Messages

ID Chat ID
Chat Name
Sender
Phone
Message
Status
Date View
221299 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-11 08:17:45
221298 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-11 08:17:44
221297 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी श्री सकल दिगम्बर जैन समाज समिति का app आ गया है । सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community कार्ड प्राप्त करे - Powered by Kutumb App <a href="https://primetrace.com/group/12738/home?utm_source=android_quote_share&amp;utm_screen=quote_share&amp;referral_code=A595K&amp;utm_referrer_state=STAR" target="_blank">https://primetrace.com/group/12738/home?utm_source=android_quote_share&amp;utm_screen=quote_share&amp;referral_code=A595K&amp;utm_referrer_state=STAR</a> 2026-06-11 08:17:17
221296 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी श्री सकल दिगम्बर जैन समाज समिति का app आ गया है । सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community कार्ड प्राप्त करे - Powered by Kutumb App <a href="https://primetrace.com/group/12738/home?utm_source=android_quote_share&amp;utm_screen=quote_share&amp;referral_code=A595K&amp;utm_referrer_state=STAR" target="_blank">https://primetrace.com/group/12738/home?utm_source=android_quote_share&amp;utm_screen=quote_share&amp;referral_code=A595K&amp;utm_referrer_state=STAR</a> 2026-06-11 08:17:16
221294 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी हम तो लाऐ थे सनम,, लाखों लुटाने के लिए। बेंच दी तूने जिंदगी,, दो चार आने के लिए।। "नेमि"कयो ऐ कीमती, आंसू बहाते हो यहाँ। दो चार लम्हे तो बचाते,, मुस्करानें के लिए।। ऐ भी जीना खाक है जो दरबदर होकर जिऐ,,, कुछ तो हरियाली सजोते, लहलहाने के लिए,,, थक के झुक के टूट के,,, नहीं बैठ जाना लाजमी,, कुछ खुशी की दवा लेते, चमक जाने के लिए,,, ऐ महक भी कया महक,, जो इत्रों से महकाऐगी. कर्म ऐसे कर गुजर "नेमी" जग में महक जाने के लिए,, -- नेमीचंद विद्यार्थी-- 2026-06-11 08:15:39
221295 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी हम तो लाऐ थे सनम,, लाखों लुटाने के लिए। बेंच दी तूने जिंदगी,, दो चार आने के लिए।। "नेमि"कयो ऐ कीमती, आंसू बहाते हो यहाँ। दो चार लम्हे तो बचाते,, मुस्करानें के लिए।। ऐ भी जीना खाक है जो दरबदर होकर जिऐ,,, कुछ तो हरियाली सजोते, लहलहाने के लिए,,, थक के झुक के टूट के,,, नहीं बैठ जाना लाजमी,, कुछ खुशी की दवा लेते, चमक जाने के लिए,,, ऐ महक भी कया महक,, जो इत्रों से महकाऐगी. कर्म ऐसे कर गुजर "नेमी" जग में महक जाने के लिए,, -- नेमीचंद विद्यार्थी-- 2026-06-11 08:15:39
221293 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी मंदिर, मठ तो खडे़ रह गये, मुनि तन टुकड़े चुप वैठे थे, खिड़की पर्दे चुप बैठे थे, घर के कमरे चुप बैठे थे। पत्थर चीख़ रहे थे मुझमें, शीशे टुकड़े टुकड़े हो गये, काँच के टुकड़े चुप बैठे थे। झुलस रहा था जिस्म धूप में, जिस्म के साए चुप बैठे थे। फटे हुए ज़ख़्मों को ढक कर, साबुत कपड़े चुप बैठे थे। मिथ्या नाले बोल रहे थे, सत्य समंदर चुप बैठे थे, बेच रहे थे सब जमीर को, व्यापारी सब चुप बैठे थे, , ना जाने कब होगा सवेरा भयभीत अंधेरा घुप बैठे थे, इज्जत टुकड़े-टुकड़े हो गई, धर्म के रक्षक चुप बैठे थे, आँखे सबकी बोल रही थी, लेकिन चेहरे चुप बैठे थे। मान मदों का सेहरा ढककर भवन के रक्षक चुप वैठे थे चीख़ रहे थे कई उजाले, कई अँधेरे चुप बैठे थे। चीख़ रही थी रात अंधेरी, सुखद सबेरे चुप वैठे थे,, मोह नींद को तोड़ने वाले, तेरे सपने चुप बैठे थे। रतनत्रय की प्रभा छट रही काम चितेरे चुप वैठे थे,, मंदिर सूने सूने हो गये, वहाँ के भगवन चुप वैठे थे, "नेमीचंद "कुछ करना पाया "चार लाइन लिख चुप बैठे थे, --------पं.नेमीचंद विद्यार्थी--- राष्ट्रीय अध्यक्ष भारतवर्षीय दिगंबर जैन विद्वत महासंघ महासभा दिल्ली-9313062282 2026-06-11 08:15:34
221292 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी मंदिर, मठ तो खडे़ रह गये, मुनि तन टुकड़े चुप वैठे थे, खिड़की पर्दे चुप बैठे थे, घर के कमरे चुप बैठे थे। पत्थर चीख़ रहे थे मुझमें, शीशे टुकड़े टुकड़े हो गये, काँच के टुकड़े चुप बैठे थे। झुलस रहा था जिस्म धूप में, जिस्म के साए चुप बैठे थे। फटे हुए ज़ख़्मों को ढक कर, साबुत कपड़े चुप बैठे थे। मिथ्या नाले बोल रहे थे, सत्य समंदर चुप बैठे थे, बेच रहे थे सब जमीर को, व्यापारी सब चुप बैठे थे, , ना जाने कब होगा सवेरा भयभीत अंधेरा घुप बैठे थे, इज्जत टुकड़े-टुकड़े हो गई, धर्म के रक्षक चुप बैठे थे, आँखे सबकी बोल रही थी, लेकिन चेहरे चुप बैठे थे। मान मदों का सेहरा ढककर भवन के रक्षक चुप वैठे थे चीख़ रहे थे कई उजाले, कई अँधेरे चुप बैठे थे। चीख़ रही थी रात अंधेरी, सुखद सबेरे चुप वैठे थे,, मोह नींद को तोड़ने वाले, तेरे सपने चुप बैठे थे। रतनत्रय की प्रभा छट रही काम चितेरे चुप वैठे थे,, मंदिर सूने सूने हो गये, वहाँ के भगवन चुप वैठे थे, "नेमीचंद "कुछ करना पाया "चार लाइन लिख चुप बैठे थे, --------पं.नेमीचंद विद्यार्थी--- राष्ट्रीय अध्यक्ष भारतवर्षीय दिगंबर जैन विद्वत महासंघ महासभा दिल्ली-9313062282 2026-06-11 08:15:33
221291 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी निज मे रहो,, न पर गहो,,, न पर में निज,, खोकर रहो,, नयन निज, अंतर लखो, नेमी स्वातम रस चखो,, निज कषायो को कसो पाप रूपी पंक को,, भव भवांतर वंश को,, और कर्म रूपी कंश को, पर मे ही मै रम रहा,, जम रहा पर सम रहा, जड़?? चेतना के मेल मे खेल में और मेल क्षणिक रस रंग रेल मे चतुर्गति की जेल में,, महादुख में रूल रहा,, गया स्वर्णिम काल,,, तो फिर नेमी" कर द्वय मल रहा सत्यार्थ और परर्माथ तज मन को मलिन कर रह रहा,, ?जड़ बुद्धि जड़? नेमीचंद विद्यार्थी ।। 9313062282 2026-06-11 08:15:32
221290 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी निज मे रहो,, न पर गहो,,, न पर में निज,, खोकर रहो,, नयन निज, अंतर लखो, नेमी स्वातम रस चखो,, निज कषायो को कसो पाप रूपी पंक को,, भव भवांतर वंश को,, और कर्म रूपी कंश को, पर मे ही मै रम रहा,, जम रहा पर सम रहा, जड़?? चेतना के मेल मे खेल में और मेल क्षणिक रस रंग रेल मे चतुर्गति की जेल में,, महादुख में रूल रहा,, गया स्वर्णिम काल,,, तो फिर नेमी" कर द्वय मल रहा सत्यार्थ और परर्माथ तज मन को मलिन कर रह रहा,, ?जड़ बुद्धि जड़? नेमीचंद विद्यार्थी ।। 9313062282 2026-06-11 08:15:31