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गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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*पुण्य का फल सबको चाहिए, पुण्य कर्म किसी को नहीं*
“पुण्यस्य फलमिच्छन्ति पुण्यं नेच्छन्ति मानवाः” — यह छोटा सा संस्कृत वाक्य मानव स्वभाव का बड़ा सत्य उजागर करता है। इसका सीधा अर्थ है कि लोग पुण्य का फल अर्थात सुख, शांति, सम्मान और समृद्धि तो चाहते हैं, लेकिन पुण्य कर्म करने की इच्छा नहीं रखते। आज के समय में यह बात और भी स्पष्ट दिखाई देती है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसका जीवन सुखमय हो, परिवार में शांति बनी रहे, व्यापार उन्नति करे और समाज में मान-सम्मान मिले; परंतु जब बात त्याग, सेवा, संयम, दान और धर्म के मार्ग पर चलने की आती है, तो कदम पीछे हट जाते हैं। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे संस्कारी बनें, लेकिन उन्हें संस्कार देने के लिए समय नहीं निकालते। हम चाहते हैं कि समाज आदर्श बने, लेकिन स्वयं आदर्श बनने का प्रयास नहीं करते। हम चाहते हैं कि हमारे जीवन में ईश्वर की कृपा बनी रहे, परंतु ईश्वर के बताए मार्ग पर चलना कठिन लगने लगता है। यही विरोधाभास इस श्लोक में बताया गया है। वास्तव में पुण्य कोई रहस्यमयी वस्तु नहीं है; यह हमारे दैनिक आचरण से उत्पन्न होता है। सत्य बोलना, किसी जरूरतमंद की सहायता करना, धर्मस्थलों का सम्मान करना, अपने माता-पिता और गुरुओं की सेवा करना, समाज के लिए कुछ अच्छा करना—ये सब साधारण दिखने वाले कार्य ही असली पुण्य हैं। लेकिन मनुष्य तत्काल लाभ की अपेक्षा में इन कार्यों को टाल देता है। उसे तुरंत सुख चाहिए, तुरंत सफलता चाहिए, बिना परिश्रम और बिना त्याग के परिणाम चाहिए। यह संभव नहीं है। जैसे बिना बीज बोए खेत में फसल नहीं उगती, वैसे ही बिना पुण्य कर्म किए सुख और शांति नहीं मिल सकती। यदि हम अपने जीवन में सच्चा आनंद चाहते हैं तो हमें अपने व्यवहार में बदलाव लाना होगा। दिखावे के बजाय सच्चाई अपनानी होगी, स्वार्थ के बजाय सेवा को स्थान देना होगा, और केवल मांगने के बजाय देने की भावना विकसित करनी होगी। जब हम निस्वार्थ भाव से अच्छे कर्म करते हैं, तो उनका फल अवश्य मिलता है, भले ही वह तुरंत दिखाई न दे। इसलिए आवश्यक है कि हम केवल पुण्य के फल की कामना न करें, बल्कि पुण्य कर्म करने की आदत डालें। यही जीवन का सच्चा धर्म है और यही स्थायी सुख का मार्ग है। |
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2026-02-17 04:29:29 |
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