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1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*_।।करणानुयोग।।_*
*!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नमः !!*
_{श्रीमद्-नेमिचंद्र-आचार्यदेव-प्रणीत}_
*॥श्री गोम्मटसार-जीवकांड॥*
मूल प्राकृत गाथा,
_आभार : ब्र०पं०रतनचंद मुख्तार_
_(मङ्गलाचरण )_
*सिद्ध सुद्ध पणमिय जिणिदवरणेमिचंदमकलंकं ।*
*गुणरयण भूसणुदयं जीवस्स परूवणं वोच्छं ।।*
_योनियों के ८४ लाख भेद_
*णिच्चिदरषादुसत्त य तरुदस वियर्लिदियेसु छच्चेव ।*
*सुरणिरयतिरियचउरो चोद्दस मणुएसु सदसहस्सा ।।८९॥*
*गाथार्थ* - नित्यनिगोद, इतर (चतुर्गति) निगोद, धातु अर्थात् पृथ्वीकायिक, अप्कायिक, तेजकायिक, वायुकायिक इस प्रकार इनमें सात-सात शतसहस्र (७ लाख) योनियाँ हैं। तरु अर्थात् वनस्पतिकायिक में दसलाख, विकलेन्द्रियों में ६ लाख, देव-नारकी व तिर्यंचों में चार-चार लाख, मनुष्यों में १४ लाख योनियाँ होती हैं ।।८९।।
*विशेषार्थ* - नित्यनिगोद की सात लाख, इतर (चतुर्गति) निगोद की सात लाख । पृथ्वी-कायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक ये चारों धातु कहलाती हैं। इन चारों में प्रत्येक की सात-सात लाख योनियाँ होती हैं हैं। इस प्रकार इन छहकायिक जीवों में कुल ४२ लाख योनियाँ होती हैं। तरु अर्थात् प्रत्येकवनस्पति की दस लाख योनियां । विकलेन्द्रियों की ६ लाख योनियों में द्वीन्द्रिय की २ लाख, त्रीन्द्रिय की २ लाख और चतुरिन्द्रिय की २ लाख योनियाँ हैं। देवों की चार लाख, नारकियों की चार लाख, पंचेन्द्रिय तियंचों की ४ लाख योनियाँ हैं तथा मनुष्यों की १४ लाख योनियाँ हैं। ये सर्व मिलकर (४२+१०+६+४+४+४+१४) ८४ लाख योनियाँ होतो हैं। इस प्रकार चतुर्गतिज जीवों की कुल
८४ लाख योनियाँ होती हैं।
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2026-02-18 08:04:06 |
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