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Message
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| 70619 |
40449684 |
?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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श्री सकल दिगम्बर जैन समाज समिति का app आ गया है ।
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2026-04-09 06:15:21 |
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| 70620 |
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?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर |
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2026-04-09 06:15:21 |
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| 70618 |
40449749 |
जिनोदय?JINODAYA |
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*जैन धर्म में शासन रक्षक देवी-देवताओं की अवहेलना के दुष्परिणाम — एक गहन चिंतन*
जैन धर्म केवल एक पूजा-पद्धति या परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक मार्ग है। इस मार्ग में तीर्थंकर भगवान सर्वोच्च स्थान पर विराजमान होते हैं, जो हमें सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र का पथ दिखाते हैं। किन्तु इस दिव्य धर्म व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने और उसकी रक्षा करने हेतु शासन रक्षक देवी-देवताओं की भी विशेष भूमिका मानी गई है।
प्राचीन आगमों, परंपराओं और आचार्यों के वचनों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि प्रत्येक तीर्थंकर के साथ एक यक्ष-यक्षिणी अथवा शासन देव-देवी जुड़े होते हैं, जो धर्म की मर्यादा की रक्षा करते हैं और सच्चे श्रद्धालुओं के लिए अदृश्य रूप से सहायक बनते हैं। जैसे माँ पद्मावती, चक्रेश्वरी माता, क्षेत्रपाल बाबा आदि—ये केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म-रक्षा की जीवंत शक्तियाँ मानी जाती हैं।
परंतु वर्तमान समय में एक खतरनाक प्रवृत्ति उभर रही है—कुछ लोग तथाकथित “आधुनिकता” और “तर्क” के नाम पर इन शासन रक्षक देवताओं की उपेक्षा या उपहास करने लगे हैं। यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत भूल नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए घातक संकेत है।
१. श्रद्धा के क्षरण से आध्यात्मिक पतन
श्रद्धा जैन धर्म की नींव है। जब व्यक्ति शासन देवताओं की अवहेलना करता है, तो उसकी श्रद्धा धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। यह कमजोरी आगे चलकर तीर्थंकरों और गुरु के प्रति भी अनादर में परिवर्तित हो सकती है, जिससे आत्मा का पतन निश्चित हो जाता है।
२. साधना मार्ग में अदृश्य अवरोध
धर्म साधना केवल बाहरी क्रियाएँ नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि की प्रक्रिया है। जब व्यक्ति शासन देव-देवियों का अनादर करता है, तो उसकी साधना में अनगिनत बाधाएँ उत्पन्न होती हैं—ध्यान में अस्थिरता, मन में संदेह, और बार-बार नकारात्मक विचारों का आना। यह सब आत्मिक उन्नति को रोक देता है।
३. अहंकार का विकराल रूप
“हमें किसी देवी-देवता की आवश्यकता नहीं”—यह सोच धीरे-धीरे अहंकार को जन्म देती है। जैन दर्शन में अहंकार को सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है। शासन देवताओं की अवहेलना इसी अहंकार का परिणाम होती है, जो अंततः व्यक्ति को मिथ्यात्व (गलत आस्था) की ओर धकेल देता है।
४. धर्म की मर्यादाओं का ह्रास
जब समाज में शासन रक्षक शक्तियों के प्रति सम्मान कम होता है, तो धार्मिक अनुशासन भी कमजोर हो जाता है। मंदिरों की पवित्रता घटती है, नियमों का पालन ढीला पड़ता है, और धर्म केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। यह स्थिति धर्म के वास्तविक स्वरूप को विकृत कर देती है।
५. कर्म बंधन और पाप की वृद्धि
जैन शास्त्रों में अविनय (असम्मान) को गंभीर पाप माना गया है। शासन रक्षक देवी-देवताओं का अनादर करना भी इसी श्रेणी में आता है। इससे अशुभ कर्मों का बंधन बढ़ता है, जो भविष्य में दुःख, अशांति और कष्ट का कारण बनता है।
६. मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक विपत्तियाँ
अनेक अनुभवी साधकों और श्रावकों के जीवन में यह देखा गया है कि जब धर्म-रक्षक शक्तियों का अनादर होता है, तो जीवन में अचानक समस्याएँ बढ़ने लगती हैं—बिना कारण तनाव, पारिवारिक कलह, आर्थिक हानि, और मानसिक अस्थिरता। यह केवल संयोग नहीं, बल्कि सूक्ष्म स्तर पर धर्म के नियमों का परिणाम होता है।
७. सच्चे श्रद्धालुओं का आंतरिक द्वंद्व
आज हर जगह “आस्था की बोली” लग रही है और उसका भोंडा प्रदर्शन हो रहा है। इस दिखावे और अवहेलना के बीच एक सच्चा सधर्मी स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है। एक ओर उसे धर्म की गहराई समझ आती है, दूसरी ओर समाज में हो रही अवहेलना उसे भीतर से विचलित करती है। यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक है।
८. आस्था और अंधविश्वास के बीच संतुलन की आवश्यकता
यह भी सत्य है कि जैन धर्म अंधविश्वास को स्वीकार नहीं करता। देवी-देवताओं की पूजा अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह केवल सहायक माध्यम है। परंतु “अंधविश्वास से बचने” के नाम पर “असम्मान” करना भी उतना ही गलत है। हमें संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा—जहाँ श्रद्धा भी हो और विवेक भी।
समाधान और मार्गदर्शन
हमें यह समझना होगा कि शासन रक्षक देवी-देवता कोई अलग सत्ता नहीं, बल्कि धर्म व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं।
• उनके प्रति कृतज्ञता और सम्मान रखें
• दिखावे से दूर रहकर सरल और सच्ची भक्ति करें
• तीर्थंकर भगवान को सर्वोच्च मानते हुए, शासन देवताओं को सहायक शक्ति के रूप में स्वीकार करें
• धर्म के नाम पर हो रहे व्यापार और पाखंड से सावधान रहें
निष्कर्ष — एक जागरूकता का संदेश
शासन रक्षक देवी-देवताओं की अवहेलना केवल एक धार्मिक गलती नहीं, बल्कि यह आत्मा के पतन की शुरुआत है। यह आवश्यक है कि हम अपनी आस्था को पुनः जागृत करें, उसे सही दिशा दें, और धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझें। श्रद्धा और विवेक का संतुलन ही हमें सच्चे अर्थों में जैन धर्म का अनुयायी बना सकता है।
अंततः, यह लेख किसी भय या अंधविश्वास को बढ़ावा देने के लिए नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने के लिए है—ताकि हम अपने धर्म, अपनी आस्था और अपनी आत्मा के प्रति सजग रह सकें।
नितिन जैन
संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा)
जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल
मोबाइल: 9215635871 |
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2026-04-09 06:10:16 |
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| 70617 |
40449749 |
जिनोदय?JINODAYA |
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*जैन धर्म में शासन रक्षक देवी-देवताओं की अवहेलना के दुष्परिणाम — एक गहन चिंतन*
जैन धर्म केवल एक पूजा-पद्धति या परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक मार्ग है। इस मार्ग में तीर्थंकर भगवान सर्वोच्च स्थान पर विराजमान होते हैं, जो हमें सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र का पथ दिखाते हैं। किन्तु इस दिव्य धर्म व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने और उसकी रक्षा करने हेतु शासन रक्षक देवी-देवताओं की भी विशेष भूमिका मानी गई है।
प्राचीन आगमों, परंपराओं और आचार्यों के वचनों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि प्रत्येक तीर्थंकर के साथ एक यक्ष-यक्षिणी अथवा शासन देव-देवी जुड़े होते हैं, जो धर्म की मर्यादा की रक्षा करते हैं और सच्चे श्रद्धालुओं के लिए अदृश्य रूप से सहायक बनते हैं। जैसे माँ पद्मावती, चक्रेश्वरी माता, क्षेत्रपाल बाबा आदि—ये केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म-रक्षा की जीवंत शक्तियाँ मानी जाती हैं।
परंतु वर्तमान समय में एक खतरनाक प्रवृत्ति उभर रही है—कुछ लोग तथाकथित “आधुनिकता” और “तर्क” के नाम पर इन शासन रक्षक देवताओं की उपेक्षा या उपहास करने लगे हैं। यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत भूल नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए घातक संकेत है।
१. श्रद्धा के क्षरण से आध्यात्मिक पतन
श्रद्धा जैन धर्म की नींव है। जब व्यक्ति शासन देवताओं की अवहेलना करता है, तो उसकी श्रद्धा धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। यह कमजोरी आगे चलकर तीर्थंकरों और गुरु के प्रति भी अनादर में परिवर्तित हो सकती है, जिससे आत्मा का पतन निश्चित हो जाता है।
२. साधना मार्ग में अदृश्य अवरोध
धर्म साधना केवल बाहरी क्रियाएँ नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि की प्रक्रिया है। जब व्यक्ति शासन देव-देवियों का अनादर करता है, तो उसकी साधना में अनगिनत बाधाएँ उत्पन्न होती हैं—ध्यान में अस्थिरता, मन में संदेह, और बार-बार नकारात्मक विचारों का आना। यह सब आत्मिक उन्नति को रोक देता है।
३. अहंकार का विकराल रूप
“हमें किसी देवी-देवता की आवश्यकता नहीं”—यह सोच धीरे-धीरे अहंकार को जन्म देती है। जैन दर्शन में अहंकार को सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है। शासन देवताओं की अवहेलना इसी अहंकार का परिणाम होती है, जो अंततः व्यक्ति को मिथ्यात्व (गलत आस्था) की ओर धकेल देता है।
४. धर्म की मर्यादाओं का ह्रास
जब समाज में शासन रक्षक शक्तियों के प्रति सम्मान कम होता है, तो धार्मिक अनुशासन भी कमजोर हो जाता है। मंदिरों की पवित्रता घटती है, नियमों का पालन ढीला पड़ता है, और धर्म केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। यह स्थिति धर्म के वास्तविक स्वरूप को विकृत कर देती है।
५. कर्म बंधन और पाप की वृद्धि
जैन शास्त्रों में अविनय (असम्मान) को गंभीर पाप माना गया है। शासन रक्षक देवी-देवताओं का अनादर करना भी इसी श्रेणी में आता है। इससे अशुभ कर्मों का बंधन बढ़ता है, जो भविष्य में दुःख, अशांति और कष्ट का कारण बनता है।
६. मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक विपत्तियाँ
अनेक अनुभवी साधकों और श्रावकों के जीवन में यह देखा गया है कि जब धर्म-रक्षक शक्तियों का अनादर होता है, तो जीवन में अचानक समस्याएँ बढ़ने लगती हैं—बिना कारण तनाव, पारिवारिक कलह, आर्थिक हानि, और मानसिक अस्थिरता। यह केवल संयोग नहीं, बल्कि सूक्ष्म स्तर पर धर्म के नियमों का परिणाम होता है।
७. सच्चे श्रद्धालुओं का आंतरिक द्वंद्व
आज हर जगह “आस्था की बोली” लग रही है और उसका भोंडा प्रदर्शन हो रहा है। इस दिखावे और अवहेलना के बीच एक सच्चा सधर्मी स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है। एक ओर उसे धर्म की गहराई समझ आती है, दूसरी ओर समाज में हो रही अवहेलना उसे भीतर से विचलित करती है। यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक है।
८. आस्था और अंधविश्वास के बीच संतुलन की आवश्यकता
यह भी सत्य है कि जैन धर्म अंधविश्वास को स्वीकार नहीं करता। देवी-देवताओं की पूजा अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह केवल सहायक माध्यम है। परंतु “अंधविश्वास से बचने” के नाम पर “असम्मान” करना भी उतना ही गलत है। हमें संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा—जहाँ श्रद्धा भी हो और विवेक भी।
समाधान और मार्गदर्शन
हमें यह समझना होगा कि शासन रक्षक देवी-देवता कोई अलग सत्ता नहीं, बल्कि धर्म व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं।
• उनके प्रति कृतज्ञता और सम्मान रखें
• दिखावे से दूर रहकर सरल और सच्ची भक्ति करें
• तीर्थंकर भगवान को सर्वोच्च मानते हुए, शासन देवताओं को सहायक शक्ति के रूप में स्वीकार करें
• धर्म के नाम पर हो रहे व्यापार और पाखंड से सावधान रहें
निष्कर्ष — एक जागरूकता का संदेश
शासन रक्षक देवी-देवताओं की अवहेलना केवल एक धार्मिक गलती नहीं, बल्कि यह आत्मा के पतन की शुरुआत है। यह आवश्यक है कि हम अपनी आस्था को पुनः जागृत करें, उसे सही दिशा दें, और धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझें। श्रद्धा और विवेक का संतुलन ही हमें सच्चे अर्थों में जैन धर्म का अनुयायी बना सकता है।
अंततः, यह लेख किसी भय या अंधविश्वास को बढ़ावा देने के लिए नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने के लिए है—ताकि हम अपने धर्म, अपनी आस्था और अपनी आत्मा के प्रति सजग रह सकें।
नितिन जैन
संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा)
जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल
मोबाइल: 9215635871 |
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2026-04-09 06:10:15 |
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| 70615 |
40449734 |
3 अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर |
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2026-04-09 06:08:57 |
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| 70616 |
40449734 |
3 अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर |
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2026-04-09 06:08:57 |
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| 70613 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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? *सभी को जय जिनेन्द्* ?
एवम् परम पूज्य गुरूदेव विभंजन सागर जी मुनिराज का मंगल आशीर्वाद * आपके परिवार में*
*सुख , शांति, शक्ति, सम्पति, स्वरुप, संयम, सादगी, सफलता, समृध्दि, साधना, संस्कार और स्वास्थ्य की वृद्धि हो*. .......
आज का दिन मंगलमय हो ।।
* शास्त्रों में लिखा है हमे रोज़ एक नियम/त्याग लेना ही चाहिये।
* सभी धर्मो में त्याग /नियम को बहुत महत्व दिया गया है ।
* त्याग / नियम कितना भी छोटा क्यों न हो (सिर्फ 10 मिनिट का भी) बहुत अशुभ कर्म नष्ट होते हैं।
* रोज़ कुछ त्याग करने से बुरे कर्मो की निर्ज़रा (क्षय होना) होती है
* नरक आयु का बंध अगर हमारा हो चुका है तो हम किसी भी तरह के नियम जीवन में नहीं ले पाते है।
09 अप्रैल 2026
दिन: गुरुवार
"" आप चाहे तो सिर्फ के लिये त्याग/नियम भी ले सकते हैं या और कोई भी नियम अपने अनुसार ले सकते है। नियम- आज *भिन्डी* खाने का त्याग है और *श्री पुष्पदंत चालीसा* पढ़ने का नियम है.....
?? शहर में विराजित साधू संतो के दर्शन की और निरंतराय आहार की भावना रखे और हो सके तो दर्शन करके आहार भी दें।
अगर आप आज 09-04-2026 एक दिन का संकल्प करना चाहते है तो आप "नियम है।!
***********************************
*श्री पुष्पदन्त चालीसा*
दुःख से तृप्त मरुस्थल भाव में, सघन वृक्ष सम छायाकार ।
पुष्पदन्त पद छत्र छाव में, हम आश्रय पावें सुखकार ।।
जम्बू द्वीप के भरत क्षेत्र में, काकंदी नामक नगरी में ।
राज्य करें सुग्रीव बलधारी, जयराम रानी थी प्यारी ।।
नवमी फाल्गुन कृष्ण बखानी, षोडश स्वपन देखती रानी ।
सूत तीर्थंकर गर्भ में आये, गर्भ कल्याणक देव मनाये ।।
प्रतिपदा मंगसिर उजियारी, जन्मे पुष्पदंत हितकारी ।
जन्मोत्सव की शोभा न्यारी, स्वर्गपुरी सम नगरी प्यारी ।।
आयु थी दो लक्ष पूर्व की, ऊंचाई शत एक धनुष की ।
थामी जब राज्य बागडोर, क्षेत्र वृद्धि हुई चहुँ और ।।
इच्छाए थी उनकी सिमित, मित्र प्रभु के हुए असीमित ।
एक दिन उल्कापात देख कर, दृष्टिपात किया जीवन पर ।।
स्थिर कोई पदार्थ ना जग में, मिले ना सुख किंचित भवमग में ।
ब्रह्मलोक से सुरगन आये, जिनवर का वैराग्य बढ़ाये ।।
सुमति पुत्र को देकर राज, शिविका में प्रभु गए विराज ।
पुष्पक वन में गए हितकार, दीक्षा ली संग भूप हजार ।।
गए शैलपुर दो दिन बाद, हुआ आहार वह निराबाध ।
पात्रदान से हर्षित हो कर, पंचाश्चार्य करे सुर आकर।।
प्रभुवर गए लौट उपवन को, तत्पर हुए कर्म छेदन को ।
लगी समाधि नाग वृक्ष ताल, केवल ज्ञान उपाया निर्मल ।।
इन्द्राज्ञा से समोशरण की, धनपति ने आकर रचना की ।
दिव्या देशना होती प्रभु की, ज्ञान पिपासा मिति जगत की ।।
अनुप्रेक्षा द्वादश समझाई, धर्म स्वरुप विचारों भाई ।
शुक्ल ध्यान की महिमा गाई, शुक्ल ध्यान से हो शिवराई ।।
चारो भेद सहित धारो मन, मोक्षमहल को पहुचो तत्क्षण ।
मोक्ष मार्ग दिखाया परभू ने, हर्षित हुए सकल जन मन में ।।
इंद्र करे प्रार्थना जोड़ कर, सुखद विहार हुआ श्री जिनवर ।
गए अंत में शिखर सम्मेद, ध्यान में लीन हुए निरखेद ।।
शुक्ल ध्यान से किया कर्म क्षय, संध्या समय पाया पद अक्षय ।
अश्विन अष्टमी शुक्ल महान, मोक्ष कल्याणक करे सुख आन ।।
सुप्रभ कूट की करते पूजा, सुविधि नाथ है नाम दूजा ।
मगरमच्छ हैं लक्षण प्रभु का, मंगलमय था जीवन उनका ।।
शिखर सम्मेद में भारी अतिशय, प्रभु प्रतिमा हैं चमत्कारमय ।
कलियुग में भी आते देव, प्रतिदिन नृत्य करें स्वयमेव ।।
घुंघरू की झंकार गूंजती, सबके मन को मॊहित करती ।
ध्वनि सुनी हमने कानो से, पूजा की बहु उपमानो से ।।
हमको हैं ये दृढ श्रद्धान, भक्ति से पाए शिवथान ।
भक्ति में शक्ति हैं न्यारी, राह दिखाए करुनाधारी ।।
पुष्पदंत गुणगान से, निश्चित हो कल्याण ।
अरुणा अनुक्रम से मिले, अंतिम पद निर्वाण ।।
****************************** |
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2026-04-09 06:08:05 |
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49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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? *सभी को जय जिनेन्द्* ?
एवम् परम पूज्य गुरूदेव विभंजन सागर जी मुनिराज का मंगल आशीर्वाद * आपके परिवार में*
*सुख , शांति, शक्ति, सम्पति, स्वरुप, संयम, सादगी, सफलता, समृध्दि, साधना, संस्कार और स्वास्थ्य की वृद्धि हो*. .......
आज का दिन मंगलमय हो ।।
* शास्त्रों में लिखा है हमे रोज़ एक नियम/त्याग लेना ही चाहिये।
* सभी धर्मो में त्याग /नियम को बहुत महत्व दिया गया है ।
* त्याग / नियम कितना भी छोटा क्यों न हो (सिर्फ 10 मिनिट का भी) बहुत अशुभ कर्म नष्ट होते हैं।
* रोज़ कुछ त्याग करने से बुरे कर्मो की निर्ज़रा (क्षय होना) होती है
* नरक आयु का बंध अगर हमारा हो चुका है तो हम किसी भी तरह के नियम जीवन में नहीं ले पाते है।
09 अप्रैल 2026
दिन: गुरुवार
"" आप चाहे तो सिर्फ के लिये त्याग/नियम भी ले सकते हैं या और कोई भी नियम अपने अनुसार ले सकते है। नियम- आज *भिन्डी* खाने का त्याग है और *श्री पुष्पदंत चालीसा* पढ़ने का नियम है.....
?? शहर में विराजित साधू संतो के दर्शन की और निरंतराय आहार की भावना रखे और हो सके तो दर्शन करके आहार भी दें।
अगर आप आज 09-04-2026 एक दिन का संकल्प करना चाहते है तो आप "नियम है।!
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*श्री पुष्पदन्त चालीसा*
दुःख से तृप्त मरुस्थल भाव में, सघन वृक्ष सम छायाकार ।
पुष्पदन्त पद छत्र छाव में, हम आश्रय पावें सुखकार ।।
जम्बू द्वीप के भरत क्षेत्र में, काकंदी नामक नगरी में ।
राज्य करें सुग्रीव बलधारी, जयराम रानी थी प्यारी ।।
नवमी फाल्गुन कृष्ण बखानी, षोडश स्वपन देखती रानी ।
सूत तीर्थंकर गर्भ में आये, गर्भ कल्याणक देव मनाये ।।
प्रतिपदा मंगसिर उजियारी, जन्मे पुष्पदंत हितकारी ।
जन्मोत्सव की शोभा न्यारी, स्वर्गपुरी सम नगरी प्यारी ।।
आयु थी दो लक्ष पूर्व की, ऊंचाई शत एक धनुष की ।
थामी जब राज्य बागडोर, क्षेत्र वृद्धि हुई चहुँ और ।।
इच्छाए थी उनकी सिमित, मित्र प्रभु के हुए असीमित ।
एक दिन उल्कापात देख कर, दृष्टिपात किया जीवन पर ।।
स्थिर कोई पदार्थ ना जग में, मिले ना सुख किंचित भवमग में ।
ब्रह्मलोक से सुरगन आये, जिनवर का वैराग्य बढ़ाये ।।
सुमति पुत्र को देकर राज, शिविका में प्रभु गए विराज ।
पुष्पक वन में गए हितकार, दीक्षा ली संग भूप हजार ।।
गए शैलपुर दो दिन बाद, हुआ आहार वह निराबाध ।
पात्रदान से हर्षित हो कर, पंचाश्चार्य करे सुर आकर।।
प्रभुवर गए लौट उपवन को, तत्पर हुए कर्म छेदन को ।
लगी समाधि नाग वृक्ष ताल, केवल ज्ञान उपाया निर्मल ।।
इन्द्राज्ञा से समोशरण की, धनपति ने आकर रचना की ।
दिव्या देशना होती प्रभु की, ज्ञान पिपासा मिति जगत की ।।
अनुप्रेक्षा द्वादश समझाई, धर्म स्वरुप विचारों भाई ।
शुक्ल ध्यान की महिमा गाई, शुक्ल ध्यान से हो शिवराई ।।
चारो भेद सहित धारो मन, मोक्षमहल को पहुचो तत्क्षण ।
मोक्ष मार्ग दिखाया परभू ने, हर्षित हुए सकल जन मन में ।।
इंद्र करे प्रार्थना जोड़ कर, सुखद विहार हुआ श्री जिनवर ।
गए अंत में शिखर सम्मेद, ध्यान में लीन हुए निरखेद ।।
शुक्ल ध्यान से किया कर्म क्षय, संध्या समय पाया पद अक्षय ।
अश्विन अष्टमी शुक्ल महान, मोक्ष कल्याणक करे सुख आन ।।
सुप्रभ कूट की करते पूजा, सुविधि नाथ है नाम दूजा ।
मगरमच्छ हैं लक्षण प्रभु का, मंगलमय था जीवन उनका ।।
शिखर सम्मेद में भारी अतिशय, प्रभु प्रतिमा हैं चमत्कारमय ।
कलियुग में भी आते देव, प्रतिदिन नृत्य करें स्वयमेव ।।
घुंघरू की झंकार गूंजती, सबके मन को मॊहित करती ।
ध्वनि सुनी हमने कानो से, पूजा की बहु उपमानो से ।।
हमको हैं ये दृढ श्रद्धान, भक्ति से पाए शिवथान ।
भक्ति में शक्ति हैं न्यारी, राह दिखाए करुनाधारी ।।
पुष्पदंत गुणगान से, निश्चित हो कल्याण ।
अरुणा अनुक्रम से मिले, अंतिम पद निर्वाण ।।
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2026-04-09 06:08:05 |
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| 70611 |
40449675 |
?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? |
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*मुनिश्री विनियोगसागर जी*
*09.04.2026*
*DAILY MOTIVATION*
*Instagram link* :-
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? *नियम निभाए पुण्य बढ़ाएं*~
?*णमोकार चालीसा* |
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2026-04-09 06:07:55 |
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| 70612 |
40449675 |
?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? |
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*मुनिश्री विनियोगसागर जी*
*09.04.2026*
*DAILY MOTIVATION*
*Instagram link* :-
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? *नियम निभाए पुण्य बढ़ाएं*~
?*णमोकार चालीसा* |
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2026-04-09 06:07:55 |
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