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Chat ID
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Chat Name
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Message
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Date |
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| 68231 |
48925761 |
आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज.3 |
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*दो व्यक्ति कहकर के आप दो सौ व्यक्ति को पाद प्रक्षालन के लिए बुलाते हो ये ठीक नहीं......*
युगश्रेष्ठ संतशिरोमणी
आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज
???✨✨???
संसार के जलधि से कब तैरना हो,
ऐसी त्वदीय यदि हार्दिक भावना से।
आस्वाद ले जिनप-पाद पयोज का तू,
ना नाम ले अब कभी उस काम का तू
॥५३॥
? *श्रमण शतक* ?
आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज |
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2026-04-06 07:38:45 |
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| 68232 |
48925761 |
आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज.3 |
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*दो व्यक्ति कहकर के आप दो सौ व्यक्ति को पाद प्रक्षालन के लिए बुलाते हो ये ठीक नहीं......*
युगश्रेष्ठ संतशिरोमणी
आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज
???✨✨???
संसार के जलधि से कब तैरना हो,
ऐसी त्वदीय यदि हार्दिक भावना से।
आस्वाद ले जिनप-पाद पयोज का तू,
ना नाम ले अब कभी उस काम का तू
॥५३॥
? *श्रमण शतक* ?
आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज |
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2026-04-06 07:38:45 |
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| 68229 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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*? ॥ श्री वृषभनाथाय नमः ॥ ?*
??????????
? *प्रथमानुयोग कथा*
━━━━━━━━━━━━━━━━━━
*? 125.भक्तामर ?*
. *? 37. दिव्या विभूति प्रभु आपकी?*
???????????
<a href="https://quizzory.in/id/69d269afc030dc21844fbb15" target="_blank">https://quizzory.in/id/69d269afc030dc21844fbb15</a>
*इस लिंक के द्वारा कथा में आए प्रश्नों को 24 घंटे में हल किया जा सकता है*
???????????
*इत्थं यथा तव विभूतिर भूज्जिनेंद्र !,*
*धर्मोपदेशन विधौ न तथा परस्य ।*
*याद्रक्प्रभा दिनकृत: प्रहतान्धकारा,*
*तादृक् कुतो ग्रह गणस्य विकासिनोऽपि॥37॥*
अन्वयार्थ– (जिनेंद्र!) हे जिनेन्द्र!, (तव) आपके, (धर्मोपदेशविधौ) धर्मोपदेश देने के समय, (इत्यर्थ) इस प्रकार, (यथा) जैसी आठ प्रतिहार्य रूप, (विभूति:) विभूति, (अभूत) उत्पन्न हुई, (तथा) वैसी, (परस्य) अन्य किसी देव की, (न) नहीं हुई, (प्रभातन्धकारा) अंधकार को नाश करने वाली, (यादृक्) जैसी, (प्रभा) प्रभा, (दिनकरः) सूर्य की होती है, (तादृक्) वैसी, (विकासिनः) चमकते हुए, (ग्रहणस्य) तारागणों की, (कुतः) कैसे हो सकती है?
भावार्थ– हे भगवान! धर्मोपदेश के समय समवसरण में आठ महा प्रातिहार्य रूप जैसी दिव्य विभूति आपकी हुई वैसी दूसरे देवों को कभी प्राप्त नहीं हुई। यह ठीक ही है, अंधकार का नाश करने वाली जैसी प्रभा सूर्य की होती है वैसी चमकते हुए तारा, नक्षत्रादि में कहाँ संभव है? अर्थात् कभी संभव नहीं है।
बंधुओं! पूज्य आचार्य श्री मानतुंग महाराज आदि तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान की स्तुति में तल्लीन हैं। वे कह रहे हैं, हे जिनेन्द्र देव! हे जिननायक! हे जिनपति! हे प्रभु! *‘तवधर्मोपदेश विधौ’* अर्थात आपके धर्मोपदेश का जो समय है उस समय *‘इत्यर्थ यथा तव विभूति’* अर्थात छत्र, चमर आदि आठ प्रतिहार्य रूप जो आपकी विभूति है, वह *‘अभूत’* उत्पन्न हुई थी। धर्मोपदेश के समय यह विभूति उत्पन्न हुई थी। इसका तात्पर्य यह है कि समवसरण में ही भगवान के आठ प्रतिहार्य विद्यमान थे, समवसरण की रचना के पूर्व अर्थात मुनि अवस्था में ये प्रतिहार्य नहीं थे। दूसरा विशेषण देते हुए आचार्य महाराज ने कहा – *‘तव विभूति’* अर्थात ये 8 प्रातिहार्य वास्तव में भगवान! आपकी विभूति, आपका ही वैभव है। तब प्रश्न उठता है कि क्या भगवान का वैभव हो सकता है? भगवान का सिंहासन हो सकता है क्या? भगवान का छत्र हो सकता है क्या? अपने साथ में अशोक वृक्ष रख सकते हैं क्या? हम अपनी भाषा में यह कर देते हैं कि यह सब भगवान आपका वैभव है लेकिन वास्तविकता में तो भगवान इन सब पर-पदार्थो से परे होते हैं। यह सब विभूति कुबेर के द्वारा रची गई रचना है और उसका अधिपति इंद्र है।
*यादृकप्रभा दिनकृत:प्रहतान्धकारा,तादृक कुत्तों गृह गणस्य विकासिनोअ्पि*
अर्थात जैसी प्रभा सूर्य में होती है वैसी तारागण में नहीं होती। करोड़ों तारे मिलकर भी एक सूर्य की बराबरी नहीं कर सकते । उसी प्रकार विश्व के कितने भी देवी देवता अपनी अपनी विभूति को एकत्रित क्यों न कर ले फिर भी जेसी विभूति आपकी है वह उसकी बराबरी नहीं कर सकते।
*जिनदास सेठ की कथा*
???????
एक जिनदास नाम के सेठ थे। एक बार अचानक उनके ऊपर दुर्भाग्य के बादल मँडराने लगते हैं। और सेठ के घर से अकस्मात लक्ष्मी जी विदाई ले लेती हैं। और इतनी शीघ्रता से विदाई लेती हैं कि जिसकी कल्पना स्वयं सेठ जी ने न की थी। अपने समय का माना जाने वाला सेठ, जिसकी नगर सेठों में, प्रमुख सेठों में गिनती होती थी । वह आज इतना दरिद्र हो जाएगा, इस बात की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। सेठ जिनदास बहुत दुःखी थे, परेशान थे परंतु उनके पास कोई उपाय, रास्ता नहीं था। वह जो भी कार्य करने को आगे बढ़ते, उसी में घाटा लग जाता था। जिस-जिस दिशा में उन्होंने कदम उठाया, जिन-जिन देशों में उन्होंने व्यापार के लिए प्रयत्न किया, हर दिशा में उनको असफलता ही मिली। तभी उन्हें अपने सहपाठी मित्र की याद आई, जिसका नाम सेठ सुदत्त था। सुदत्त जिनदास के एक ऐसे सहपाठी थे कि जिनके जीवन में पुण्य अपार मात्रा में दिखाई दे रहा था। धन-दौलत की उनके पास कोई गणना नहीं थी, असीम व्यापार था। ऐसा सोचकर जिनदास आगे बढ़ते हैं कि सुदत्त मेरी सहायता अवश्य ही करेंगे। सुदत्त सेठ धार्मिक प्रवृत्ति के थे, करुणा से भरा उनका हृदय था, दयालु चित्त थे। जब सेठ जिनदास अपने मित्र सुदत्त सेठ के पास पहुँचते हैं तो सुदत्त सेठ अपने बचपन के मित्र का बहुत अधिक स्वागत-सम्मान, आदर-सत्कार करते हैं और अपने प्रिय मित्र की दीन दशा, जर्जरता और दरिद्रता का कारण पूछते हैं। सेठ जिनदास कहते हैं, यह सब समय का परिवर्तन है। जब पाप कर्म का उदय आता है तो ऐसे भी दिन देखने पड़ते हैं। सेठ सुदत्त अपने मित्र जिनदास को विश्वास दिलाते हुए कहता है कि हे प्रिय मित्र! तुम किंचित भी चिंता मत करो। बताओ, मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ? मैं तुम्हारा पूर्ण सहयोग करने के लिए तैयार हूँ। यदि तुम्हें धन चाहिए तो मैं तुम्हें दे देता हूँ। तुम उस धन से अपने व्यापार को बढ़ा लेना और जब तुम्हारे पास पर्याप्त मात्रा में धन एकत्रित हो जाए तो मेरा धन वापस कर देना और यदि दुर्भाग्यवश वह पैसा नष्ट भी हो जाए तो भी तुम चिंता मत करना। मैं सोच लूँगा कि यदि लक्ष्मी को जाना ही था तो कम-से-कम किसी के उपकार के साथ तो गई।
लेकिन बंधुओ! जब पाप कर्म का उदय होता है तब हाथ में आया सोना भी मिट्टी बन जाता है। ऐसा ही हुआ, जब सेठ जिनदास पैसों की पोटली लिए जा रहा था तभी उसका पैर केले के छिलके पर पड़ता है जिससे उसका पैर फिसलता है और वह जमीन पर गिर जाता है। उसके सारे पैसे गिरकर बिखर जाते हैं। आस-पास के लोग दौड़-दौड़कर उसके पैसे बटोर ले जाते हैं और जब सेठ खड़े होते हैं तो खाली थैली ही हाथ लगती है। वह क्यों-का-क्यों दरिद्र रह जाता है परंतु एक दिन अचानक उसे निर्ग्रंथ गुरु के दर्शन होते हैं। उन्हें देखकर उसका मन मयूर नाच उठता है। वह श्रद्धा-भक्ति के साथ गुरु चरणों में नमस्कार करता है और अपने दुख व्यक्त करता है। करुणा हृदय गुरुवर उसे भक्तामर महाकाव्य के सैंतीसवें काव्य की आराधना करने को कहते हैं। मुनिराज के वचनों के अनुसार वह सैंतीसवें काव्य की आराधना प्रारंभ कर देता है। उसके श्रद्धा मंत्र का जाप, पाठ, आराधना करता है। विधि-विधान से उसके मंत्र व श्रद्धा का आश्रय लेता है। फलस्वरूप देव प्रकट होता हैं और वह जिनदास से कहता हैं, हे जिनदास! तुम्हारे पाप कर्मों का क्षय हो गया और पुण्योदय आ गया है। तुम्हारी धर्म साधना ने लक्ष्मी को पुनः आमंत्रित कर लिया है। इस प्रकार वह जिनदास पूर्ववत धन-सम्पदा से संयुक्त होकर एक बड़ा नगर सेठ बन जाता है।
बंधुओ! कहने का तात्पर्य यह है कि सच्ची श्रद्धा-भक्ति से जो भगवान को ध्याता है वह सकल मनोरथों को पूर्ण करता है। बाह्य लक्ष्मी तो क्या, भक्ति के प्रभाव से वह एक दिन *अंतरंग लक्ष्मी, मोक्ष लक्ष्मी को भी पा लेता है।* अतः आप सभी उस समीचीन धर्म को धारण कर अपनी आत्मा का कल्याण करें।
*बोलिए – ‘आदिनाथ भगवान की जय’*
*✍? संकलन*
*?️ पं. मुकेश शास्त्री*
*? सुसनेर*
*? 9425935221*
*? 6.अप्रैल2026*
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2026-04-06 07:36:53 |
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| 68230 |
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2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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*? ॥ श्री वृषभनाथाय नमः ॥ ?*
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? *प्रथमानुयोग कथा*
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*? 125.भक्तामर ?*
. *? 37. दिव्या विभूति प्रभु आपकी?*
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<a href="https://quizzory.in/id/69d269afc030dc21844fbb15" target="_blank">https://quizzory.in/id/69d269afc030dc21844fbb15</a>
*इस लिंक के द्वारा कथा में आए प्रश्नों को 24 घंटे में हल किया जा सकता है*
???????????
*इत्थं यथा तव विभूतिर भूज्जिनेंद्र !,*
*धर्मोपदेशन विधौ न तथा परस्य ।*
*याद्रक्प्रभा दिनकृत: प्रहतान्धकारा,*
*तादृक् कुतो ग्रह गणस्य विकासिनोऽपि॥37॥*
अन्वयार्थ– (जिनेंद्र!) हे जिनेन्द्र!, (तव) आपके, (धर्मोपदेशविधौ) धर्मोपदेश देने के समय, (इत्यर्थ) इस प्रकार, (यथा) जैसी आठ प्रतिहार्य रूप, (विभूति:) विभूति, (अभूत) उत्पन्न हुई, (तथा) वैसी, (परस्य) अन्य किसी देव की, (न) नहीं हुई, (प्रभातन्धकारा) अंधकार को नाश करने वाली, (यादृक्) जैसी, (प्रभा) प्रभा, (दिनकरः) सूर्य की होती है, (तादृक्) वैसी, (विकासिनः) चमकते हुए, (ग्रहणस्य) तारागणों की, (कुतः) कैसे हो सकती है?
भावार्थ– हे भगवान! धर्मोपदेश के समय समवसरण में आठ महा प्रातिहार्य रूप जैसी दिव्य विभूति आपकी हुई वैसी दूसरे देवों को कभी प्राप्त नहीं हुई। यह ठीक ही है, अंधकार का नाश करने वाली जैसी प्रभा सूर्य की होती है वैसी चमकते हुए तारा, नक्षत्रादि में कहाँ संभव है? अर्थात् कभी संभव नहीं है।
बंधुओं! पूज्य आचार्य श्री मानतुंग महाराज आदि तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान की स्तुति में तल्लीन हैं। वे कह रहे हैं, हे जिनेन्द्र देव! हे जिननायक! हे जिनपति! हे प्रभु! *‘तवधर्मोपदेश विधौ’* अर्थात आपके धर्मोपदेश का जो समय है उस समय *‘इत्यर्थ यथा तव विभूति’* अर्थात छत्र, चमर आदि आठ प्रतिहार्य रूप जो आपकी विभूति है, वह *‘अभूत’* उत्पन्न हुई थी। धर्मोपदेश के समय यह विभूति उत्पन्न हुई थी। इसका तात्पर्य यह है कि समवसरण में ही भगवान के आठ प्रतिहार्य विद्यमान थे, समवसरण की रचना के पूर्व अर्थात मुनि अवस्था में ये प्रतिहार्य नहीं थे। दूसरा विशेषण देते हुए आचार्य महाराज ने कहा – *‘तव विभूति’* अर्थात ये 8 प्रातिहार्य वास्तव में भगवान! आपकी विभूति, आपका ही वैभव है। तब प्रश्न उठता है कि क्या भगवान का वैभव हो सकता है? भगवान का सिंहासन हो सकता है क्या? भगवान का छत्र हो सकता है क्या? अपने साथ में अशोक वृक्ष रख सकते हैं क्या? हम अपनी भाषा में यह कर देते हैं कि यह सब भगवान आपका वैभव है लेकिन वास्तविकता में तो भगवान इन सब पर-पदार्थो से परे होते हैं। यह सब विभूति कुबेर के द्वारा रची गई रचना है और उसका अधिपति इंद्र है।
*यादृकप्रभा दिनकृत:प्रहतान्धकारा,तादृक कुत्तों गृह गणस्य विकासिनोअ्पि*
अर्थात जैसी प्रभा सूर्य में होती है वैसी तारागण में नहीं होती। करोड़ों तारे मिलकर भी एक सूर्य की बराबरी नहीं कर सकते । उसी प्रकार विश्व के कितने भी देवी देवता अपनी अपनी विभूति को एकत्रित क्यों न कर ले फिर भी जेसी विभूति आपकी है वह उसकी बराबरी नहीं कर सकते।
*जिनदास सेठ की कथा*
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एक जिनदास नाम के सेठ थे। एक बार अचानक उनके ऊपर दुर्भाग्य के बादल मँडराने लगते हैं। और सेठ के घर से अकस्मात लक्ष्मी जी विदाई ले लेती हैं। और इतनी शीघ्रता से विदाई लेती हैं कि जिसकी कल्पना स्वयं सेठ जी ने न की थी। अपने समय का माना जाने वाला सेठ, जिसकी नगर सेठों में, प्रमुख सेठों में गिनती होती थी । वह आज इतना दरिद्र हो जाएगा, इस बात की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। सेठ जिनदास बहुत दुःखी थे, परेशान थे परंतु उनके पास कोई उपाय, रास्ता नहीं था। वह जो भी कार्य करने को आगे बढ़ते, उसी में घाटा लग जाता था। जिस-जिस दिशा में उन्होंने कदम उठाया, जिन-जिन देशों में उन्होंने व्यापार के लिए प्रयत्न किया, हर दिशा में उनको असफलता ही मिली। तभी उन्हें अपने सहपाठी मित्र की याद आई, जिसका नाम सेठ सुदत्त था। सुदत्त जिनदास के एक ऐसे सहपाठी थे कि जिनके जीवन में पुण्य अपार मात्रा में दिखाई दे रहा था। धन-दौलत की उनके पास कोई गणना नहीं थी, असीम व्यापार था। ऐसा सोचकर जिनदास आगे बढ़ते हैं कि सुदत्त मेरी सहायता अवश्य ही करेंगे। सुदत्त सेठ धार्मिक प्रवृत्ति के थे, करुणा से भरा उनका हृदय था, दयालु चित्त थे। जब सेठ जिनदास अपने मित्र सुदत्त सेठ के पास पहुँचते हैं तो सुदत्त सेठ अपने बचपन के मित्र का बहुत अधिक स्वागत-सम्मान, आदर-सत्कार करते हैं और अपने प्रिय मित्र की दीन दशा, जर्जरता और दरिद्रता का कारण पूछते हैं। सेठ जिनदास कहते हैं, यह सब समय का परिवर्तन है। जब पाप कर्म का उदय आता है तो ऐसे भी दिन देखने पड़ते हैं। सेठ सुदत्त अपने मित्र जिनदास को विश्वास दिलाते हुए कहता है कि हे प्रिय मित्र! तुम किंचित भी चिंता मत करो। बताओ, मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ? मैं तुम्हारा पूर्ण सहयोग करने के लिए तैयार हूँ। यदि तुम्हें धन चाहिए तो मैं तुम्हें दे देता हूँ। तुम उस धन से अपने व्यापार को बढ़ा लेना और जब तुम्हारे पास पर्याप्त मात्रा में धन एकत्रित हो जाए तो मेरा धन वापस कर देना और यदि दुर्भाग्यवश वह पैसा नष्ट भी हो जाए तो भी तुम चिंता मत करना। मैं सोच लूँगा कि यदि लक्ष्मी को जाना ही था तो कम-से-कम किसी के उपकार के साथ तो गई।
लेकिन बंधुओ! जब पाप कर्म का उदय होता है तब हाथ में आया सोना भी मिट्टी बन जाता है। ऐसा ही हुआ, जब सेठ जिनदास पैसों की पोटली लिए जा रहा था तभी उसका पैर केले के छिलके पर पड़ता है जिससे उसका पैर फिसलता है और वह जमीन पर गिर जाता है। उसके सारे पैसे गिरकर बिखर जाते हैं। आस-पास के लोग दौड़-दौड़कर उसके पैसे बटोर ले जाते हैं और जब सेठ खड़े होते हैं तो खाली थैली ही हाथ लगती है। वह क्यों-का-क्यों दरिद्र रह जाता है परंतु एक दिन अचानक उसे निर्ग्रंथ गुरु के दर्शन होते हैं। उन्हें देखकर उसका मन मयूर नाच उठता है। वह श्रद्धा-भक्ति के साथ गुरु चरणों में नमस्कार करता है और अपने दुख व्यक्त करता है। करुणा हृदय गुरुवर उसे भक्तामर महाकाव्य के सैंतीसवें काव्य की आराधना करने को कहते हैं। मुनिराज के वचनों के अनुसार वह सैंतीसवें काव्य की आराधना प्रारंभ कर देता है। उसके श्रद्धा मंत्र का जाप, पाठ, आराधना करता है। विधि-विधान से उसके मंत्र व श्रद्धा का आश्रय लेता है। फलस्वरूप देव प्रकट होता हैं और वह जिनदास से कहता हैं, हे जिनदास! तुम्हारे पाप कर्मों का क्षय हो गया और पुण्योदय आ गया है। तुम्हारी धर्म साधना ने लक्ष्मी को पुनः आमंत्रित कर लिया है। इस प्रकार वह जिनदास पूर्ववत धन-सम्पदा से संयुक्त होकर एक बड़ा नगर सेठ बन जाता है।
बंधुओ! कहने का तात्पर्य यह है कि सच्ची श्रद्धा-भक्ति से जो भगवान को ध्याता है वह सकल मनोरथों को पूर्ण करता है। बाह्य लक्ष्मी तो क्या, भक्ति के प्रभाव से वह एक दिन *अंतरंग लक्ष्मी, मोक्ष लक्ष्मी को भी पा लेता है।* अतः आप सभी उस समीचीन धर्म को धारण कर अपनी आत्मा का कल्याण करें।
*बोलिए – ‘आदिनाथ भगवान की जय’*
*✍? संकलन*
*?️ पं. मुकेश शास्त्री*
*? सुसनेर*
*? 9425935221*
*? 6.अप्रैल2026*
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2026-04-06 07:36:53 |
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| 68227 |
40449699 |
3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) |
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2026-04-06 07:36:18 |
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| 68228 |
40449699 |
3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) |
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2026-04-06 07:36:18 |
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| 68225 |
40449699 |
3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) |
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2026-04-06 07:36:16 |
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| 68226 |
40449699 |
3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) |
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2026-04-06 07:36:16 |
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| 68224 |
40449699 |
3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) |
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2026-04-06 07:36:15 |
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40449699 |
3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) |
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2026-04-06 07:36:14 |
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