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9668 40449727 GROUP ??दसा नरसिंहपुरा समाज?? *100 वर्ष प्राचीन मन्दिर का एक पत्थर भी करोड़ो का गुनहगार हैं जो इन्हें मिटा रहे हैं क्या कहां......* ❓❓??❤️??*??️‍?⛳?? *परम पूज्य मुनिराज आचार्य श्री निर्भय सागर जी महामुनिराज गुरुमुख दुर्लभ उदबोधन अदभुत मार्मिक वर्णन गुरुदेव वाणी* ???? *वीडियों देखिए और जानिए ??⛳* श्री सकल दिगम्बर जैन समाज समिति का app आ गया है । सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community कार्ड प्राप्त करे - Powered by Kutumb App <a href="https://primetrace.com/group/12738/post/1179735480?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=DV192&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING" target="_blank">https://primetrace.com/group/12738/post/1179735480?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=DV192&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING</a> 2026-02-19 06:29:07
9667 40449727 GROUP ??दसा नरसिंहपुरा समाज?? ?️‍??️‍??️‍??️‍??️‍??️‍??️‍??️‍??️‍??️‍??️‍??️‍??️?️?️?️?️?️?️?️?️?️?️?️????????????❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️??????????????????????????????????????????????????? ? *प्रवास स्थल* ? *श्री दिगम्बर जैन मन्दिर, गली नम्बर 2 , कैलाशनगर, दिल्ली में विराजमान* ???????? ????????? ????????️?️‍? ???????????? *जैन वीर निर्वाण संवत- 2️⃣5️⃣5️⃣2️⃣* ? *विक्रम संवत-* 2️⃣0️⃣8️⃣1️⃣ ? *दिनाँक*:: 1️⃣9️⃣ /0️⃣2️⃣/ 2️⃣0️⃣2️⃣6️⃣ ⭕⭕⭕⭕⭕⭕⭕⭕ ? *मास कार्तिक शीर्ष - तिथि* *फाल्गुन शुक्ला द्वितीया* ? *वार : गुरुवार* ??????????? ? ???⛳ ??️‍????❤️?? *केवल आज के लिए – नियम व सकंल्प त्याग की सुंदर साधना* _⭐? *आज हम आत्म-शुद्धि और* *संयम की ओर एक छोटा सा कदम बढ़ाएँ* ..._ ???????????? ⭐? *आज का नियम* :: ? *मौसमी*? ????????? ?️⭐? ( *यदि संभव हो, तो भोजन करते समय– मन, वाणी और शरीर में संतुलन बनाये )_* ?️⭐?✨ *संपूर्ण परिवार मिलकर ये संकल्प लें कि तीर्थों के संरक्षण व पवित्रता के लिए णमोकार महामन्त्र एक जाप – एक साथ किया गया त्याग, एक नई ऊर्जा देता है।* ?️⭐? *_आपका यह छोटा-सा प्रयास, आत्मा के उत्थान की दिशा में एक महान यात्रा का आरंभ हो सकता है।_* ????️‍??⛳????❤️? ???????????? ???????????? ?? *मुनिवर श्री, 108 प्रथमानन्दजी मुनि महाराजश्री की दैनिक चर्या* ??? *प्रातः : 09.00 बजे आहार चर्या* *दोपहर: 12.15 बजे सामायिक* ????????????? ????????? ?????????????????? 2026-02-19 06:29:04
9666 40449664 ?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? *कहानी बड़ी सुहानी* (1) *कहानी* *संस्कारी बहु के आने से किस प्रकार घर में खुशहाली छायी* एक धनी सेठ के सात बेटे थे। छः का विवाह हो चुका था। सातवीं बहू आयी, वह सत्संगी माँ-बाप की बेटी थी। बचपन से ही सत्संग में जाने से सत्संग के सुसंस्कार उसमें गहरे उतरे हुए थे। छोटी बहू ने देखा कि घर का सारा काम तो नौकर चाकर करते हैं, जेठानियाँ केवल खाना बनाती हैं उसमें भी खटपट होती रहती है। बहू को सुसंस्कार मिले थे कि अपना काम स्वयं करना चाहिए और प्रेम से मिलजुल कर रहना चाहिए। अपना काम स्वयं करने से स्वास्थ्य बढ़िया रहता है। उसने युक्ति खोज निकाली और सुबह जल्दी स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर पहले ही रसोई में जा बैठी। जेठानियों ने टोका लेकिन फिर भी उसने बड़े प्रेम से रसोई बनायी और सबको प्रेम से भोजन कराया। सभी बड़े तृप्त व प्रसन्न हुए। दिन में सास छोटी बहू के पास जाकर बोलीः "बहू ! तू सबसे छोटी है, तू रसोई क्यों बनाती है ? तेरी छः जेठानियाँ हैं।" बहूः "माँजी ! कोई भूखा अतिथि घर आ जाय तो उसको आप भोजन क्यों कराते हो ?" "बहू ! शास्त्रों में लिखा है कि अतिथि भगवान का स्वरूप होता है। भोजन पाकर वह तृप्त होता है तो भोजन कराने वाले को बड़ा पुण्य मिलता है।" "माँजी ! अतिथि को भोजन कराने से पुण्य होता है तो क्या घरवालों को भोजन कराने से पाप होता है ? अतिथि में भगवान का स्वरूप है तो घर के सभी लोग भी तो भगवान का स्वरूप है क्योंकि भगवान का निवास तो जीवमात्र में है। और माँजी ! अन्न आपका, बर्तन आपके सब चीजें आपकी हैं, मैं जरा सी मेहनत करके सबमें भगवदभाव रखके रसोई बनाकर खिलाने की थोड़ी-सी सेवा कर लूँ तो मुझे पुण्य होगा कि नहीं होगा ? सब प्रेम से भोजन करके तृप्त होंगे, प्रसन्न होंगे तो कितना लाभ होगा ! इसलिए माँजी ! आप रसोई मुझे बनाने दो। कुछ मेहनत करूँगी तो स्वास्थ्य भी बढ़िया रहेगा।" सास ने सोचा कि ʹबहू बात तो ठीक कहती है। हम इसको सबसे छोटी समझते हैं पर इसकी बुद्धि सबसे अच्छी है।ʹ दूसरे दिन सास सुबह जल्दी स्नान करके रसोई बनाने बैठ गयी। बहुओं ने देखा तो बोलीं- "माँजी ! आप परिश्रम क्यों करती हो ?" सास बोलीः "तुम्हारी उम्र से मेरी उम्र ज्यादा है। मैं जल्दी मर जाऊँगी। मैं अभी पुण्य नहीं करूँगी तो फिर कब करूँगी ?" बहुएँ बोलीं- "माँजी ! इसमें पुण्य क्या है ? यह तो घर का काम है।" सास बोलीः "घर का काम करने से पाप होता है क्या ? जब भूखे व्यक्तियों को, साधुओं को भोजन कराने से पुण्य होता है तो क्या घरवालों को भोजन कराने से पाप होता है ? सभी में ईश्वर का वास है।" सास की बातें सुनकर सब बहुओं को लगा कि ʹइस बात का तो हमने कभी ख्याल ही नहीं किया। यह युक्ति बहुत बढ़िया है !ʹ अब जो बहू पहले जग जाय वही रसोई बनाने बैठ जाये। पहले जो भाव था कि ʹतू रसोई बना....ʹ तो छः बारी बँधी थीं लेकिन अब ʹमैं बनाऊँ, मैं बनाऊँ...ʹ यह भाव हुआ तो आठ बारी बँध गयीं। दो और बढ़ गये सास और छोटी बहू। काम करने में ʹतू कर, तू कर....ʹ इससे काम बढ़ जाता है और आदमी कम हो जाते हैं पर ʹमैं करूँ, मैं करूँ....ʹ इससे काम हलका हो जाता है और आदमी बढ़ जाते हैं। छोटी बहू उत्साही थी, सोचा कि ʹअब तो रोटी बनाने में चौथे दिन बारी आती है, फिर क्या किया जाय ?ʹ घर में गेहूँ पीसने की चक्की पड़ी थी, उसने उससे गेहूँ पीसने शुरु कर दिये। मशीन की चक्की का आटा गर्म-गर्म बोरी में भर देने से जल जाता है, उसकी रोटी स्वादिष्ट नहीं होती लेकिन हाथ से पीसा गया आटा ठंडा और अधिक पौष्टिक होता है तथा उसकी रोटी भी स्वादिष्ट होती है। छोटी बहू ने गेहूँ पीसकर उसकी रोटी बनायी तो सब कहने लगे की ʹआज तो रोटी का जायका बड़ा विलक्षण है !ʹ सास बोलीः "बहू ! तू क्यों गेहूँ पीसती है ? अपने पास पैसों की कमी नहीं है।" "माँजी ! हाथ से गेहूँ पीसने से व्यायाम हो जाता है और बीमारी नहीं आती। दूसरा, रसोई बनाने से भी ज्यादा पुण्य गेहूँ पीसने का है।" सास और जेठानियों ने जब सुना तो लगा कि बहू ठीक कहती है। उन्होंने अपने-अपने पतियों से कहाः ʹघर में चक्की ले आओ, हम सब गेहूँ पीसेंगी।ʹ रोजाना सभी जेठानियाँ चक्की में दो ढाई सेर गेहूँ पीसने लगीं। अब छोटी बहू ने देखा कि घर में जूठे बर्तन माँजने के लिए नौकरानी आती है। अपने जूठे बर्तन हमें स्वयं साफ करने चाहिए क्योंकि सबमें ईश्वर है तो कोई दूसरा हमारा जूठा क्यों साफ करे ! अगले दिन उसने सब बर्तन माँज दिये। सास बोलीः "बहू ! विचार तो कर, बर्तन माँजने से तेरा गहना घिस जायेगा, कपड़े खराब हो जायेंगे...।" "माँजी ! काम जितना छोटा, उतना ही उसका माहात्म्य ज्यादा। पांडवों के यज्ञ में भगवान श्रीकृष्ण ने जूठी पत्तलें उठाने का काम किया था।" दूसरे दिन सास बर्तन माँजने बैठ गयी। उसको देख के सब बहुओं ने बर्तन माँजने शुरु कर दिये। घर में झाड़ू लगाने नौकर आता था। अब छोटी बहू ने सुबह जल्दी उठकर झाड़ू लगा दी। सास ने पूछाः "बहू ! झाड़ू तूने लगायी है ?" "माँजी ! आप मत पूछिये। आपको बोलती हूँ तो मेरे हाथ से काम चला जाता है।" "झाड़ू लगाने का काम तो नौकर का है, तू क्यों लगाती है ?" "माँजी ! ʹरामायणʹ में आता है कि वन में बड़े-बड़े ऋषि-मुनि रहते थे लेकिन भगवान उनकी कुटिया में न जाकर पहले शबरी की कुटिया में गये। क्योंकि शबरी रोज चुपके-से झाड़ू लगाती थी, पम्पासर का रास्ता साफ करती थी कि कहीं आते-जाते ऋषि-मुनियों के पैरों में कंकड़ न चुभ जायें।" सास ने देखा कि यह छोटी बहू तो सबको लूट लेगी क्योंकि यह सबका पुण्य अकेले ही ले लेती है। अब सास और सब बहुओं ने मिलके झाड़ू लगानी शुरू कर दी। जिस घर में आपस में प्रेम होता है वहाँ लक्ष्मी बढ़ती है और जहाँ कलह होता है वहाँ निर्धनता आती है। सेठ का तो धन दिनोंदिन बढ़ने लगा। उसने घर की सब स्त्रियों के लिए गहने और कपड़े बनवा दिये। अब छोटी बहू ससुर से मिले गहने लेकर बड़ी जेठानी के पास गयी और बोलीः "आपके बच्चे हैं, उनका विवाह करोगी तो गहने बनवाने पड़ेंगे। मेरे तो अभी कोई बच्चा है नहीं। इसलिए इन गहनों को आप रख लीजिये।" गहने जेठानी को देकर बहू ने कुछ पैसे और कपड़े नौकरों में बाँट दिये। सास ने देखा तो बोलीः "बहू ! यह तुम क्या करती हो ? तेरे ससुर ने सबको गहने बनवाकर दिये हैं और तूने वे जेठानी को दे दिये और पैसे, कपड़े नौकरों में बाँट दिये !" "माँजी ! मैं अकेले इतना संग्रह करके क्या करूँगी ? अपनी वस्तु किसी जरूरतमंद के काम आये तो आत्मिक संतोष मिलता है और दान करने का तो अमिट पुण्य होता ही है !" सास को बहू की बात लग गयी। वह सेठ के पास जाकर बोलीः "मैं नौकरों में धोती-साड़ी बाँटूगी और आसपास में जो गरीब परिवार रहते हैं उनके बच्चों को फीस मैं स्वयं भरूँगी। अपने पास कितना धन है, किसी के काम आये तो अच्छा है। न जाने कब मौत आ जाय और सब यहीं पड़ा रह जाय ! जितना अपने हाथ से पुण्य कर्म हो जाये अच्छा है।" सेठ बहुत प्रसन्न हुआ कि पहले नौकरों को कुछ देते तो लड़ पड़ती थी पर अब कहती है कि ʹमैं खुद दूँगी।ʹ सास दूसरों को वस्तुएँ देने लगी तो यह देख के दूसरी बहुएँ भी देने लगीं। नौकर भी खुश हो के मन लगा के काम करने लगे और आस-पड़ोस में भी खुशहाली छा गयी। छोटी बहू ने जो आचरण किया उससे उसके घर का तो सुधार हुआ ही, साथ में पड़ोस पर भी अच्छा असर पड़ा, उनके घर में भी सुधर गये। देने के भाव से आपस में प्रेम-भाईचारा बढ़ गया। इस तरह बहू को सत्संग से मिली सूझबूझ ने उसके घर के साथ अनेक घरों को खुशहाल कर दिया ! *अगर ये कहानी आपको अच्छी लगे तो अपने दोस्तों और रिश्तेदार तक जरूर शेयर करना!* **************************************** (2) *कहानी* एक आदमी रेगिस्तान से गुजरते वक़्त बुदबुदा रहा था, “कितनी बेकार जगह है ये, बिलकुल भी हरियाली नहीं है…और हो भी कैसे सकती है यहाँ तो पानी का नामो-निशान भी नहीं है.” तपती रेत में वो जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था उसका गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था. अंत में वो आसमान की तरफ देख झल्लाते हुए बोला- क्या भगवान आप यहाँ पानी क्यों नहीं देते? अगर यहाँ पानी होता तो कोई भी यहाँ पेड़-पौधे उगा सकता था, और तब ये जगह भी कितनी खूबसूरत बन जाती! ऐसा बोल कर वह आसमान की तरफ ही देखता रहा…मानो वो भगवान के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हो! तभी एक चमत्कार होता है, नज़र झुकाते ही उसे सामने एक कुंवा नज़र आता है! वह उस इलाके में बरसों से आ-जा रहा था पर आज तक उसे वहां कोई कुँवा नहीं दिखा था… वह आश्चर्य में पड़ गया और दौड़ कर कुंवे के पास गया… कुंवा लाबा-लब पानी से भरा था. उसने एक बार फिर आसमान की तरफ देखा और पानी के लिए धन्यवाद करने की बजाये बोला, “पानी तो ठीक है लेकिन इसे निकालने के लिए कोई उपाय भी तो होना चाहिए.” उसका ऐसा कहना था कि उसे कुँवें के बगल में पड़ी रस्सी और बाल्टी दिख गयी. एक बार फिर उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ! वह कुछ घबराहट के साथ आसमान की ओर देख कर बोला, “लेकिन मैं ये पानी ढोउंगा कैसे?” तभी उसे महसूस होता है कि कोई उसे पीछे से छू रहा है, पलट कर देखा तो एक ऊंट उसके पीछे खड़ा था! अब वह आदमी अब एकदम घबड़ा जाता है, उसे लगता है कि कहीं वो रेगिस्तान में हरियाली लाने के काम में ना फंस जाए और इस बार वो आसमान की तरफ देखे बिना तेज क़दमों से आगे बढ़ने लगता है. अभी उसने दो-चार कदम ही बढ़ाया था कि उड़ता हुआ पेपर का एक टुकड़ा उससे आकर चिपक जाता है. उस टुकड़े पर लिखा होता है – मैंने तुम्हे पानी दिया, बाल्टी और रस्सी दी…पानी ढोने का साधन भी दिया, अब तुम्हारे पास वो हर एक चीज है जो तुम्हे रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने के लिए चाहिए; अब सब कुछ तुम्हारे हाथ में है! आदमी एक क्षण के लिए ठहरा… पर अगले ही पल वह आगे बढ़ गया और रेगिस्तान कभी भी हरा-भरा नहीं बन पाया. मित्रों, कई बार हम चीजों के अपने मन मुताबिक न होने पर दूसरों को दोष देते हैं…कभी हम सरकार को दोषी ठहराते हैं, कभी अपने बुजुर्गों को, कभी कम्पनी को तो कभी भगवान को. पर इस दोषारोपण के चक्कर में हम इस आवश्यक चीज को अनदेखा कर देते हैं कि एक इंसान होने के नाते हममें वो शक्ति है कि हम अपने सभी सपनो को खुद साकार कर सकते हैं. शुरुआत में भले लगे कि ऐसा कैसे संभव है पर जिस तरह इस कहानी में उस इंसान को रेगिस्तान हरा-भरा बनाने के सारे साधन मिल जाते हैं उसी तरह हमें भी प्रयत्न करने पर अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए ज़रूरी सारे उपाय मिल सकते हैं. पर समस्या ये है कि ज्यादातर लोग इन उपायों के होने पर भी उस आदमी की तरह बस शिकायतें करना जानते हैं… अपनी मेहनत से अपनी दुनिया बदलना नहीं! तो चलिए, आज इस कहानी से सीख लेते हुए हम शिकायत करना छोडें और जिम्मेदारी लेकर अपनी दुनिया बदलना शुरू करें क्योंकि सचमुच सबकुछ तुम्हारे हाथ में है! **************************************** (3) *कहानी* *एक सभा में गुरु जी ने प्रवचन के दौरान एक 30 वर्षीय युवक को खडा कर पूछा कि* - आप चल रहे हैं और सामने से एक सुन्दर लडकी आ रही है , तो आप क्या करोगे ? युवक ने कहा - उस पर नजर जायेगी, उसे देखने लगेंगे। गुरु जी ने पूछा - वह लडकी आगे बढ गयी , तो क्या पीछे मुडकर भी देखोगे ? लडके ने कहा - हाँ, गुरु जी ने फिर पूछा - जरा यह बताओ वह सुन्दर चेहरा आपको कब तक याद रहेगा ? युवक ने कहा 5 - 10 मिनट तक, गुरु जी ने उस युवक से कहा - अब जरा कल्पना कीजिये.. आप जयपुर से मुम्बई जा रहे हैं और मैंने आपको एक पुस्तकों का पैकेट देते हुए कहा कि मुम्बई में अमुक महानुभाव के यहाँ यह पैकेट पहुँचा देना... आप पैकेट देने मुम्बई में उनके घर गए। उनका घर देखा तो आपको पता चला कि ये तो बडे अरबपति हैं। घर के बाहर 10 गाडियाँ और 5 चौकीदार खडे हैं। उन्हें आपने पैकेट की सूचना अन्दर भिजवाई , तो वे महानुभाव खुद बाहर आए। आप से पैकेट लिया। आप जाने लगे तो आपको आग्रह करके घर में ले गए। पास में बैठाकर गरम खाना खिलाया। चलते समय आप से पूछा - किसमें आए हो ? आपने कहा- लोकल ट्रेन में। उन्होंने ड्राइवर को बोलकर आपको गंतव्य तक पहुँचाने के लिए कहा और आप जैसे ही अपने स्थान पर पहुँचने वाले थे कि उस अरबपति महानुभाव का फोन आया - भैया, आप आराम से पहुँच गए.. अब आप बताइए कि आपको वे महानुभाव कब तक याद रहेंगे ? *युवक ने कहा - गुरु जी ! जिंदगी में मरते दम तक उस व्यक्ति को हम भूल नहीं सकते।* गुरु जी ने युवक के माध्यम से सभा को संबोधित करते हुए कहा — *"यह है जीवन की हकीकत।"* *"सुन्दर चेहरा थोड़े समय ही याद रहता है, पर सुन्दर व्यवहार जीवन भर याद रहता है।"* बस यही है जीवन का गुरु मंत्र... अपने चेहरे और शरीर की सुंदरता से ज़्यादा अपने व्यवहार की सुंदरता पर ध्यान दें.. **************************************** (4) *अनमोल पंक्ति* बहूत ही सुंदर ( कृपया एक-एक शब्द पढें ) कोई सोना चढाए , कोई चाँदी चढाए ; कोई हीरा चढाए , कोई मोती चढाए ; चढाऊँ क्या तुझे भगवन ; कि ये निर्धन का डेरा है ; अगर मैं फूल चढाता हूँ , तो वो भँवरे का झूठा है ; अगर मैं फल चढाता हूँ , तो वो पक्षी का झूठा है ; अगर मैं जल चढाता हूँ , तो वो मछली का झूठा है ; अगर मैं दूध चढाता हूँ , तो वो बछडे का झूठा है ; चढाऊँ क्या तुझे भगवन ; कि ये निर्धन का डेरा है ; अगर मैं सोना चढ़ाता हूँ , तो वो माटी का झूठा है ; अगर मैं हीरा चढ़ाता हूँ , तो वो कोयले का झूठा है ; अगर मैं मोती चढाता हूँ , तो वो सीपो का झूठा है ; अगर मैं चंदन चढाता हूँ , तो वो सर्पो का झूठा है ; चढाऊँ क्या तुझे भगवन, कि ये निर्धन का डेरा है ; अगर मैं तन चढाता हूँ , तो वो पत्नी का झूठा है ; अगर मैं मन चढाता हूँ , तो वो ममता का झूठा है ; अगर मैं धन चढाता हूँ , तो वो पापो का झूठा है ; अगर मैं धर्म चढाता हूँ , तो वो कर्मों का झूठा है ; चढाऊँ क्या तुझे भगवन , कि ये निर्धन का डेरा है ; तुझे परमात्मा जानू , तू ही तो है - मेरा दर्पण ; तुझे मैं आत्मा जानू , करूँ मैं आत्मा अर्पण. *************************************** 2026-02-19 06:28:27
9665 42709912 विद्या के कुन्थु (Vidya ke Kunthu) <a href="http://youtube.com/post/UgkxjBnYjh3K4PRwrCUQbyB7YE6QhsOwS11y?si=sSJrNYVhrf5Mc5Xw" target="_blank">http://youtube.com/post/UgkxjBnYjh3K4PRwrCUQbyB7YE6QhsOwS11y?si=sSJrNYVhrf5Mc5Xw</a> 2026-02-19 06:26:45
9664 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ 2026-02-19 06:26:40
9663 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म ????????? *॥ श्री तीर्थंकराय नमः ॥* ????????? *? सोलह कारण भावना – 79?* *? 14. आवश्यकापरिहाणि भावना ?* ━━━━━━━━━━━━━━━ *?️ विशेष सूचना* <a href="https://quizzory.in/id/6995278fff1069b7b5c377c8" target="_blank">https://quizzory.in/id/6995278fff1069b7b5c377c8</a> कथा में आए प्रश्नों के उत्तर हेतु दिए गए लिंक द्वारा 24 घंटे में दे सकते हैं। ?????????? *आवश्यकापरिहाणि* साधुओं और गृहस्थों दोनों को छः आवश्यक बातों का पालन करना चाहिए। गृहस्थों के लिए छः आवश्यक बातें हैं। देवपूजा, गुरुपास्ति, स्वाध्याय, संयम, दान और तप इनको षट क्रिया कहते हैं। साधुओं के लिए दौलत राम जी ने छः ढाल की छोटी ढाल में लिखा है— सामायिक, स्तवन, वंदना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायोत्सर्ग ये छः बातें मन से अनावश्यक बातों को विकल्पों को हटाने में सहायक है। पूर्वाचार्यों ने साधु और गृहस्थों के मन, वचन, काय को हमेशा धर्मानुराग रूप परिणामों में लीन रखने के लिए छः–२ क्रियाये बतायी है। उन क्रियाओं में कभी भी हानि न हो जाय ऐसा हमेशा भाव रखने को आवश्यक अपरिहाणि चौदहवीं भावना कहते है। असि, मसि, कृषि, वाणिज्य और पशुपालन इन कार्यों में यह जीव प्रतिदिन दोष उपार्जन करता रहता है। इन दोषों का निवारण षट आवश्यक कर्म पालन करने से होता है। इससे आत्मा की शुद्धि होती है। अपनी गलती को स्वीकार करके उसे फिर न होने देने का उपक्रम करना सबसे बड़ा प्रायश्चित है। हर धर्म में इस पर जोर दिया गया है। शस्त्र तो देश की सीमा को रक्षण करता है और शास्त्र हमारी आत्मा की रक्षा करते हैं। जिस प्रकार शरीर को बिना कष्ट दिए संसार में धन भी नहीं कमाया जा सकता, उसी प्रकार आत्म सुख भी शरीर से ममत्व हटाकर उसको थोड़ा सा कष्ट देने पर ही प्राप्त होता है, इसलिए हर रोज षट क्रिया को ध्यान से करना चाहिए कम बिल्कुल नहीं करना चाहिए। *षट आवश्यक कथा* ?????? एक राज्य में राजा प्रतिदिन षट आवश्यक क्रिया करता था। देव पूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप,दान इन छह में दूसरी क्रिया गुरु उपासना है। गुरु जनों की वंदना, पूजन, आहार दान विधि गुरु उपासना में गर्भित है। राजा रोज की तरह आहार दान विधि के लिये बाहर खड़े थे, मुनि महाराज आ गये। पड़गाया, शुद्धि बतायी, महल में ले जाकर आहार दे दिया। मेरा जीवन सफल हो गया क्योंकि तीन लोक में पूज्य दिगम्बर मुनि, मेरे गुरु मेरे घर में आहार किया। बाहर कास्ठ का सिंहासन लगाया–महाराज को बैठाया और कहा महाराज आपकी वाणी से मन पवित्र बनाओ। ऐसा मौका कहाँ मिलता है। जिन्दगी में कभी-कभी सौभाग्य मिलता है। मुनि महाराज अनपढ़ (लिखना, पढ़ना अक्षर ज्ञान से रहित) थे फिर भी आत्म अनुभव से चमकते थे। बोले राजन! ज्यादा कुछ पढ़ना नहीं आता है, बोलना भी नहीं आता है–परन्तु आगे देखो! पक्षी चोंच से जल लेकर चोंच को घिस रहा है। इसको देखकर मुझे ऐसा भाव आया है– *घिसे घिसाओ ले ले पानी। मेरी आत्मा सब कुछ जानी।* राजा को सुनकर अच्छा लगा फिर बार-बार महाराज से सुनकर याद रखा। महाराज को छोड़ कर वापस आ रहे थे। मार्ग में हो रहे लोगों का नमस्कार और कुशल पूछने से उस उपयोग में इन वचन का श्लोक भूल गया। बार-बार याद करने की कोशिश किया तो भी याद नहीं आया। राज्य का कुट कार्य में रानी मंत्री को प्यारी थी, दोनों का मोह जुड़ गया था। रानी ने राजा को बीच से हटाने के लिये–नाई से बात कर विपुल संपत्ति देकर मारने के लिये, अथवा सिर मुंडाने के लिये कहा। नाई राजा को मारने के उद्देश्य से राजा की दाढ़ी बनाने के लिये गया। दाढ़ी करने के लिये कटोरी में जल लेकर उस्तरे को पत्थर पर घिस रहा था। तब राजा को श्लोक याद आ गया– *घिसे घिसाओ ले ले पानी। मेरी आत्मा सब कुछ जानी।* यह दोहा मुँह से निकलते ही नाई सोचता है कि राजा ने सब कुछ जान लिया! राजा को पता चल गया है ऐसा सोच कर राजा के पैर पकड़ कर माफी माँगने लगा। राजा ने पूछा क्या बात है जल्दी कहो, नाई बोलता है–नहीं महाराज मेरी गलती नहीं है, ये सब कुछ रानी का काम है, नाई के बोलने से राजा को आश्चर्य हुआ। राजा ने पूछा क्या बात है–नाई ने कहा आपका वध अथवा मारने के लिये रानी ने मुझे ऐसा करने को कहा था। इसमें मेरी कुछ भी गलती नहीं। राजा सोचता है– षट आवश्यक क्रियाओं में से गुरु उपासना करने से मेरी जान बच गई! अब ऐसे संसार में रहना अच्छा नहीं। मेरा भला करना मेरे हाथ में है। ऐसा सोच कर निर्ग्रंथ गुरु के पास जाकर जिन दीक्षा ले ली। ━━━━━━━━━━━━━━━ *✍️ संकलन: पं. मुकेश शास्त्री* *? स्थान: सुसनेर* *? संपर्क: 9425935221* *? दिनांक: 19.02.2026* ━━━━━━━━━━━━━━━ 2026-02-19 06:25:29
9662 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-02-19 06:24:35
9661 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ? *सभी को जय जिनेन्द्* ? एवम् परम पूज्य गुरूदेव विभंजन सागर जी मुनिराज का मंगल आशीर्वाद * आपके परिवार में* *सुख , शांति, शक्ति, सम्पति, स्वरुप, संयम, सादगी, सफलता, समृध्दि, साधना, संस्कार और स्वास्थ्य की वृद्धि हो*. ....... आज का दिन मंगलमय हो ।। * शास्त्रों में लिखा है हमे रोज़ एक नियम/त्याग लेना ही चाहिये। * सभी धर्मो में त्याग /नियम को बहुत महत्व दिया गया है । * त्याग / नियम कितना भी छोटा क्यों न हो (सिर्फ 10 मिनिट का भी) बहुत अशुभ कर्म नष्ट होते हैं। * रोज़ कुछ त्याग करने से बुरे कर्मो की निर्ज़रा (क्षय होना) होती है * नरक आयु का बंध अगर हमारा हो चुका है तो हम किसी भी तरह के नियम जीवन में नहीं ले पाते है। 19 फरवरी 2026 दिन: गुरुवार "" आप चाहे तो सिर्फ के लिये त्याग/नियम भी ले सकते हैं या और कोई भी नियम अपने अनुसार ले सकते है। नियम- आज *ढोकला* खाने का त्याग है और **श्री मल्लीनाथ चालीसा* पढ़ने का नियम है..... ?? शहर में विराजित साधू संतो के दर्शन की और निरंतराय आहार की भावना रखे और हो सके तो दर्शन करके आहार भी दें। अगर आप आज 19-02-2026 एक दिन का संकल्प करना चाहते है तो आप "नियम है।! *********************************** *श्री मल्लीनाथ चालीसा* मोहमल्ल मद मर्दन करते, मन्मथ दुर्ध्दर का मद हरते । धैर्य खडग से कर्म निवारे, बाल्यती को नमन हमारे ।। बिहार प्रान्त की मिथिला नगरी, राज्य करे कुम्भ काश्यप गोत्री । प्रभावती महारानी उनकी, वर्षा होती थी रत्नो की ।। अपराजित विमान को तज कर, जननी उदार बसे प्रभु आकर । मंगसिर शुक्ल एकादशी शुभ दिन, जन्मे तीन ज्ञान युक्त श्री जिन ।। पूनम चन्द्र समान हो शोभित, इंद्र न्वहन करते हो मोहित । तांडव नृत्य करे खुश हो कर, निरखे प्रभु को विस्मित हो कर ।। बढे प्यार से मल्लि कुमार, तन की शोभा हुई अपार । पचपन सहस आयु प्रभुवर की, पच्चीस धनु अवगाहन वपु की ।। देख पुत्र की योग्य अवस्था, पिता ब्याह की करें व्यवस्था । मिथिलापूरी को खूब सजाया, कन्या पक्ष सुनकर हर्षाया ।। निज मन में करते प्रभु मंथन, हैं विवाह एक मीठा बंधन । विषय भोग रूपी ये कर्दम, आत्म ज्ञान के करदे दुर्गम ।। नहीं आसक्त हुए विषयन में, हुए विरक्त गये प्रभु वन में । मंगसिर शुक्ल एकादशी पावन, स्वामी दीक्षा करते धारण ।। दो दिन तक धरा उपवास, वन में ही फिर किया निवास । तीसरे दिन प्रभु करे निवास, नन्दिषेण नृप दे आहार ।। पात्रदान से हर्षित हो कर, अचरज पाँच करे सुर आकर । मल्लिनाथ जो लौटे वन में, लीन हुए आतम चिंतन में ।। आत्मशुद्धि का प्रबल प्रमाण, अल्प समय में उपजा ज्ञान । केवलज्ञानी हुए छः दिन में, घंटे बजने लगे स्वर्ग में ।। समोशरण की रचना साजे, अन्तरिक्ष में प्रभु विराजे । विशाक्ष आदि अट्ठाईस गणधर, चालीस सहस थे ज्ञानी मुनिवर।। पथिको को सत्पथ दिखलाया, शिवपुर का सनमार्ग दिखाया । औषधि शाष्त्र अभय आहार, दान बताये चार प्रकार ।। पाँच समिति लब्धि पांच, पांचो पैताले हैं साँच । षट लेश्या जीव षटकाय, षट द्रव्य कहते समझाय ।। सात तत्त्व का वर्णन करते, सात नरक सुन भविमन डरते । सातों ने को मन में धारे, उत्तम जन संदेह निवारे ।। दीर्घ काल तक दिया उपदेश, वाणी में कटुता नहीं लेश । आयु रहने पर एक मास, शिखर सम्मेद पे करते वास ।। योग निरोध का करते पालन, प्रतिमा योग करें प्रभु धारण । कर्म नाश्ता कीने जिनराई, तत्क्षण मुक्ति रमा परणाई ।। फाल्गुन शुक्ल पंचमी न्यारी, सिद्ध हुए जिनवर अविकारी । मोक्ष कल्याणक सुर नर करते, संवल कूट की पूजा करते ।। चिन्ह कलश था मल्लिनाथ का, जीन महापावन था उनका । नरपुंगव थे वे जिनश्रेष्ठ, स्त्री कहे जो सत्य न लेश ।। कोटि उपाय करो तुम सोच, स्त्रीभव से हो नहीं मोक्ष । महाबली थे वे शूरवीर, आत्म शत्रु जीते धार धीर ।। अनुकम्पा से प्रभु मल्लि की, अल्पायु हो भव वल्लि की । अरज त्याही हैं बस अरुणा की, दृष्टि रहे सब पर करुणा की।। ****************************** 2026-02-19 06:23:59
9660 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *कहानी बड़ी सुहानी* (1) *कहानी* *संस्कारी बहु के आने से किस प्रकार घर में खुशहाली छायी* एक धनी सेठ के सात बेटे थे। छः का विवाह हो चुका था। सातवीं बहू आयी, वह सत्संगी माँ-बाप की बेटी थी। बचपन से ही सत्संग में जाने से सत्संग के सुसंस्कार उसमें गहरे उतरे हुए थे। छोटी बहू ने देखा कि घर का सारा काम तो नौकर चाकर करते हैं, जेठानियाँ केवल खाना बनाती हैं उसमें भी खटपट होती रहती है। बहू को सुसंस्कार मिले थे कि अपना काम स्वयं करना चाहिए और प्रेम से मिलजुल कर रहना चाहिए। अपना काम स्वयं करने से स्वास्थ्य बढ़िया रहता है। उसने युक्ति खोज निकाली और सुबह जल्दी स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर पहले ही रसोई में जा बैठी। जेठानियों ने टोका लेकिन फिर भी उसने बड़े प्रेम से रसोई बनायी और सबको प्रेम से भोजन कराया। सभी बड़े तृप्त व प्रसन्न हुए। दिन में सास छोटी बहू के पास जाकर बोलीः "बहू ! तू सबसे छोटी है, तू रसोई क्यों बनाती है ? तेरी छः जेठानियाँ हैं।" बहूः "माँजी ! कोई भूखा अतिथि घर आ जाय तो उसको आप भोजन क्यों कराते हो ?" "बहू ! शास्त्रों में लिखा है कि अतिथि भगवान का स्वरूप होता है। भोजन पाकर वह तृप्त होता है तो भोजन कराने वाले को बड़ा पुण्य मिलता है।" "माँजी ! अतिथि को भोजन कराने से पुण्य होता है तो क्या घरवालों को भोजन कराने से पाप होता है ? अतिथि में भगवान का स्वरूप है तो घर के सभी लोग भी तो भगवान का स्वरूप है क्योंकि भगवान का निवास तो जीवमात्र में है। और माँजी ! अन्न आपका, बर्तन आपके सब चीजें आपकी हैं, मैं जरा सी मेहनत करके सबमें भगवदभाव रखके रसोई बनाकर खिलाने की थोड़ी-सी सेवा कर लूँ तो मुझे पुण्य होगा कि नहीं होगा ? सब प्रेम से भोजन करके तृप्त होंगे, प्रसन्न होंगे तो कितना लाभ होगा ! इसलिए माँजी ! आप रसोई मुझे बनाने दो। कुछ मेहनत करूँगी तो स्वास्थ्य भी बढ़िया रहेगा।" सास ने सोचा कि ʹबहू बात तो ठीक कहती है। हम इसको सबसे छोटी समझते हैं पर इसकी बुद्धि सबसे अच्छी है।ʹ दूसरे दिन सास सुबह जल्दी स्नान करके रसोई बनाने बैठ गयी। बहुओं ने देखा तो बोलीं- "माँजी ! आप परिश्रम क्यों करती हो ?" सास बोलीः "तुम्हारी उम्र से मेरी उम्र ज्यादा है। मैं जल्दी मर जाऊँगी। मैं अभी पुण्य नहीं करूँगी तो फिर कब करूँगी ?" बहुएँ बोलीं- "माँजी ! इसमें पुण्य क्या है ? यह तो घर का काम है।" सास बोलीः "घर का काम करने से पाप होता है क्या ? जब भूखे व्यक्तियों को, साधुओं को भोजन कराने से पुण्य होता है तो क्या घरवालों को भोजन कराने से पाप होता है ? सभी में ईश्वर का वास है।" सास की बातें सुनकर सब बहुओं को लगा कि ʹइस बात का तो हमने कभी ख्याल ही नहीं किया। यह युक्ति बहुत बढ़िया है !ʹ अब जो बहू पहले जग जाय वही रसोई बनाने बैठ जाये। पहले जो भाव था कि ʹतू रसोई बना....ʹ तो छः बारी बँधी थीं लेकिन अब ʹमैं बनाऊँ, मैं बनाऊँ...ʹ यह भाव हुआ तो आठ बारी बँध गयीं। दो और बढ़ गये सास और छोटी बहू। काम करने में ʹतू कर, तू कर....ʹ इससे काम बढ़ जाता है और आदमी कम हो जाते हैं पर ʹमैं करूँ, मैं करूँ....ʹ इससे काम हलका हो जाता है और आदमी बढ़ जाते हैं। छोटी बहू उत्साही थी, सोचा कि ʹअब तो रोटी बनाने में चौथे दिन बारी आती है, फिर क्या किया जाय ?ʹ घर में गेहूँ पीसने की चक्की पड़ी थी, उसने उससे गेहूँ पीसने शुरु कर दिये। मशीन की चक्की का आटा गर्म-गर्म बोरी में भर देने से जल जाता है, उसकी रोटी स्वादिष्ट नहीं होती लेकिन हाथ से पीसा गया आटा ठंडा और अधिक पौष्टिक होता है तथा उसकी रोटी भी स्वादिष्ट होती है। छोटी बहू ने गेहूँ पीसकर उसकी रोटी बनायी तो सब कहने लगे की ʹआज तो रोटी का जायका बड़ा विलक्षण है !ʹ सास बोलीः "बहू ! तू क्यों गेहूँ पीसती है ? अपने पास पैसों की कमी नहीं है।" "माँजी ! हाथ से गेहूँ पीसने से व्यायाम हो जाता है और बीमारी नहीं आती। दूसरा, रसोई बनाने से भी ज्यादा पुण्य गेहूँ पीसने का है।" सास और जेठानियों ने जब सुना तो लगा कि बहू ठीक कहती है। उन्होंने अपने-अपने पतियों से कहाः ʹघर में चक्की ले आओ, हम सब गेहूँ पीसेंगी।ʹ रोजाना सभी जेठानियाँ चक्की में दो ढाई सेर गेहूँ पीसने लगीं। अब छोटी बहू ने देखा कि घर में जूठे बर्तन माँजने के लिए नौकरानी आती है। अपने जूठे बर्तन हमें स्वयं साफ करने चाहिए क्योंकि सबमें ईश्वर है तो कोई दूसरा हमारा जूठा क्यों साफ करे ! अगले दिन उसने सब बर्तन माँज दिये। सास बोलीः "बहू ! विचार तो कर, बर्तन माँजने से तेरा गहना घिस जायेगा, कपड़े खराब हो जायेंगे...।" "माँजी ! काम जितना छोटा, उतना ही उसका माहात्म्य ज्यादा। पांडवों के यज्ञ में भगवान श्रीकृष्ण ने जूठी पत्तलें उठाने का काम किया था।" दूसरे दिन सास बर्तन माँजने बैठ गयी। उसको देख के सब बहुओं ने बर्तन माँजने शुरु कर दिये। घर में झाड़ू लगाने नौकर आता था। अब छोटी बहू ने सुबह जल्दी उठकर झाड़ू लगा दी। सास ने पूछाः "बहू ! झाड़ू तूने लगायी है ?" "माँजी ! आप मत पूछिये। आपको बोलती हूँ तो मेरे हाथ से काम चला जाता है।" "झाड़ू लगाने का काम तो नौकर का है, तू क्यों लगाती है ?" "माँजी ! ʹरामायणʹ में आता है कि वन में बड़े-बड़े ऋषि-मुनि रहते थे लेकिन भगवान उनकी कुटिया में न जाकर पहले शबरी की कुटिया में गये। क्योंकि शबरी रोज चुपके-से झाड़ू लगाती थी, पम्पासर का रास्ता साफ करती थी कि कहीं आते-जाते ऋषि-मुनियों के पैरों में कंकड़ न चुभ जायें।" सास ने देखा कि यह छोटी बहू तो सबको लूट लेगी क्योंकि यह सबका पुण्य अकेले ही ले लेती है। अब सास और सब बहुओं ने मिलके झाड़ू लगानी शुरू कर दी। जिस घर में आपस में प्रेम होता है वहाँ लक्ष्मी बढ़ती है और जहाँ कलह होता है वहाँ निर्धनता आती है। सेठ का तो धन दिनोंदिन बढ़ने लगा। उसने घर की सब स्त्रियों के लिए गहने और कपड़े बनवा दिये। अब छोटी बहू ससुर से मिले गहने लेकर बड़ी जेठानी के पास गयी और बोलीः "आपके बच्चे हैं, उनका विवाह करोगी तो गहने बनवाने पड़ेंगे। मेरे तो अभी कोई बच्चा है नहीं। इसलिए इन गहनों को आप रख लीजिये।" गहने जेठानी को देकर बहू ने कुछ पैसे और कपड़े नौकरों में बाँट दिये। सास ने देखा तो बोलीः "बहू ! यह तुम क्या करती हो ? तेरे ससुर ने सबको गहने बनवाकर दिये हैं और तूने वे जेठानी को दे दिये और पैसे, कपड़े नौकरों में बाँट दिये !" "माँजी ! मैं अकेले इतना संग्रह करके क्या करूँगी ? अपनी वस्तु किसी जरूरतमंद के काम आये तो आत्मिक संतोष मिलता है और दान करने का तो अमिट पुण्य होता ही है !" सास को बहू की बात लग गयी। वह सेठ के पास जाकर बोलीः "मैं नौकरों में धोती-साड़ी बाँटूगी और आसपास में जो गरीब परिवार रहते हैं उनके बच्चों को फीस मैं स्वयं भरूँगी। अपने पास कितना धन है, किसी के काम आये तो अच्छा है। न जाने कब मौत आ जाय और सब यहीं पड़ा रह जाय ! जितना अपने हाथ से पुण्य कर्म हो जाये अच्छा है।" सेठ बहुत प्रसन्न हुआ कि पहले नौकरों को कुछ देते तो लड़ पड़ती थी पर अब कहती है कि ʹमैं खुद दूँगी।ʹ सास दूसरों को वस्तुएँ देने लगी तो यह देख के दूसरी बहुएँ भी देने लगीं। नौकर भी खुश हो के मन लगा के काम करने लगे और आस-पड़ोस में भी खुशहाली छा गयी। छोटी बहू ने जो आचरण किया उससे उसके घर का तो सुधार हुआ ही, साथ में पड़ोस पर भी अच्छा असर पड़ा, उनके घर में भी सुधर गये। देने के भाव से आपस में प्रेम-भाईचारा बढ़ गया। इस तरह बहू को सत्संग से मिली सूझबूझ ने उसके घर के साथ अनेक घरों को खुशहाल कर दिया ! *अगर ये कहानी आपको अच्छी लगे तो अपने दोस्तों और रिश्तेदार तक जरूर शेयर करना!* **************************************** (2) *कहानी* एक आदमी रेगिस्तान से गुजरते वक़्त बुदबुदा रहा था, “कितनी बेकार जगह है ये, बिलकुल भी हरियाली नहीं है…और हो भी कैसे सकती है यहाँ तो पानी का नामो-निशान भी नहीं है.” तपती रेत में वो जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था उसका गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था. अंत में वो आसमान की तरफ देख झल्लाते हुए बोला- क्या भगवान आप यहाँ पानी क्यों नहीं देते? अगर यहाँ पानी होता तो कोई भी यहाँ पेड़-पौधे उगा सकता था, और तब ये जगह भी कितनी खूबसूरत बन जाती! ऐसा बोल कर वह आसमान की तरफ ही देखता रहा…मानो वो भगवान के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हो! तभी एक चमत्कार होता है, नज़र झुकाते ही उसे सामने एक कुंवा नज़र आता है! वह उस इलाके में बरसों से आ-जा रहा था पर आज तक उसे वहां कोई कुँवा नहीं दिखा था… वह आश्चर्य में पड़ गया और दौड़ कर कुंवे के पास गया… कुंवा लाबा-लब पानी से भरा था. उसने एक बार फिर आसमान की तरफ देखा और पानी के लिए धन्यवाद करने की बजाये बोला, “पानी तो ठीक है लेकिन इसे निकालने के लिए कोई उपाय भी तो होना चाहिए.” उसका ऐसा कहना था कि उसे कुँवें के बगल में पड़ी रस्सी और बाल्टी दिख गयी. एक बार फिर उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ! वह कुछ घबराहट के साथ आसमान की ओर देख कर बोला, “लेकिन मैं ये पानी ढोउंगा कैसे?” तभी उसे महसूस होता है कि कोई उसे पीछे से छू रहा है, पलट कर देखा तो एक ऊंट उसके पीछे खड़ा था! अब वह आदमी अब एकदम घबड़ा जाता है, उसे लगता है कि कहीं वो रेगिस्तान में हरियाली लाने के काम में ना फंस जाए और इस बार वो आसमान की तरफ देखे बिना तेज क़दमों से आगे बढ़ने लगता है. अभी उसने दो-चार कदम ही बढ़ाया था कि उड़ता हुआ पेपर का एक टुकड़ा उससे आकर चिपक जाता है. उस टुकड़े पर लिखा होता है – मैंने तुम्हे पानी दिया, बाल्टी और रस्सी दी…पानी ढोने का साधन भी दिया, अब तुम्हारे पास वो हर एक चीज है जो तुम्हे रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने के लिए चाहिए; अब सब कुछ तुम्हारे हाथ में है! आदमी एक क्षण के लिए ठहरा… पर अगले ही पल वह आगे बढ़ गया और रेगिस्तान कभी भी हरा-भरा नहीं बन पाया. मित्रों, कई बार हम चीजों के अपने मन मुताबिक न होने पर दूसरों को दोष देते हैं…कभी हम सरकार को दोषी ठहराते हैं, कभी अपने बुजुर्गों को, कभी कम्पनी को तो कभी भगवान को. पर इस दोषारोपण के चक्कर में हम इस आवश्यक चीज को अनदेखा कर देते हैं कि एक इंसान होने के नाते हममें वो शक्ति है कि हम अपने सभी सपनो को खुद साकार कर सकते हैं. शुरुआत में भले लगे कि ऐसा कैसे संभव है पर जिस तरह इस कहानी में उस इंसान को रेगिस्तान हरा-भरा बनाने के सारे साधन मिल जाते हैं उसी तरह हमें भी प्रयत्न करने पर अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए ज़रूरी सारे उपाय मिल सकते हैं. पर समस्या ये है कि ज्यादातर लोग इन उपायों के होने पर भी उस आदमी की तरह बस शिकायतें करना जानते हैं… अपनी मेहनत से अपनी दुनिया बदलना नहीं! तो चलिए, आज इस कहानी से सीख लेते हुए हम शिकायत करना छोडें और जिम्मेदारी लेकर अपनी दुनिया बदलना शुरू करें क्योंकि सचमुच सबकुछ तुम्हारे हाथ में है! **************************************** (3) *कहानी* *एक सभा में गुरु जी ने प्रवचन के दौरान एक 30 वर्षीय युवक को खडा कर पूछा कि* - आप चल रहे हैं और सामने से एक सुन्दर लडकी आ रही है , तो आप क्या करोगे ? युवक ने कहा - उस पर नजर जायेगी, उसे देखने लगेंगे। गुरु जी ने पूछा - वह लडकी आगे बढ गयी , तो क्या पीछे मुडकर भी देखोगे ? लडके ने कहा - हाँ, गुरु जी ने फिर पूछा - जरा यह बताओ वह सुन्दर चेहरा आपको कब तक याद रहेगा ? युवक ने कहा 5 - 10 मिनट तक, गुरु जी ने उस युवक से कहा - अब जरा कल्पना कीजिये.. आप जयपुर से मुम्बई जा रहे हैं और मैंने आपको एक पुस्तकों का पैकेट देते हुए कहा कि मुम्बई में अमुक महानुभाव के यहाँ यह पैकेट पहुँचा देना... आप पैकेट देने मुम्बई में उनके घर गए। उनका घर देखा तो आपको पता चला कि ये तो बडे अरबपति हैं। घर के बाहर 10 गाडियाँ और 5 चौकीदार खडे हैं। उन्हें आपने पैकेट की सूचना अन्दर भिजवाई , तो वे महानुभाव खुद बाहर आए। आप से पैकेट लिया। आप जाने लगे तो आपको आग्रह करके घर में ले गए। पास में बैठाकर गरम खाना खिलाया। चलते समय आप से पूछा - किसमें आए हो ? आपने कहा- लोकल ट्रेन में। उन्होंने ड्राइवर को बोलकर आपको गंतव्य तक पहुँचाने के लिए कहा और आप जैसे ही अपने स्थान पर पहुँचने वाले थे कि उस अरबपति महानुभाव का फोन आया - भैया, आप आराम से पहुँच गए.. अब आप बताइए कि आपको वे महानुभाव कब तक याद रहेंगे ? *युवक ने कहा - गुरु जी ! जिंदगी में मरते दम तक उस व्यक्ति को हम भूल नहीं सकते।* गुरु जी ने युवक के माध्यम से सभा को संबोधित करते हुए कहा — *"यह है जीवन की हकीकत।"* *"सुन्दर चेहरा थोड़े समय ही याद रहता है, पर सुन्दर व्यवहार जीवन भर याद रहता है।"* बस यही है जीवन का गुरु मंत्र... अपने चेहरे और शरीर की सुंदरता से ज़्यादा अपने व्यवहार की सुंदरता पर ध्यान दें.. **************************************** (4) *अनमोल पंक्ति* बहूत ही सुंदर ( कृपया एक-एक शब्द पढें ) कोई सोना चढाए , कोई चाँदी चढाए ; कोई हीरा चढाए , कोई मोती चढाए ; चढाऊँ क्या तुझे भगवन ; कि ये निर्धन का डेरा है ; अगर मैं फूल चढाता हूँ , तो वो भँवरे का झूठा है ; अगर मैं फल चढाता हूँ , तो वो पक्षी का झूठा है ; अगर मैं जल चढाता हूँ , तो वो मछली का झूठा है ; अगर मैं दूध चढाता हूँ , तो वो बछडे का झूठा है ; चढाऊँ क्या तुझे भगवन ; कि ये निर्धन का डेरा है ; अगर मैं सोना चढ़ाता हूँ , तो वो माटी का झूठा है ; अगर मैं हीरा चढ़ाता हूँ , तो वो कोयले का झूठा है ; अगर मैं मोती चढाता हूँ , तो वो सीपो का झूठा है ; अगर मैं चंदन चढाता हूँ , तो वो सर्पो का झूठा है ; चढाऊँ क्या तुझे भगवन, कि ये निर्धन का डेरा है ; अगर मैं तन चढाता हूँ , तो वो पत्नी का झूठा है ; अगर मैं मन चढाता हूँ , तो वो ममता का झूठा है ; अगर मैं धन चढाता हूँ , तो वो पापो का झूठा है ; अगर मैं धर्म चढाता हूँ , तो वो कर्मों का झूठा है ; चढाऊँ क्या तुझे भगवन , कि ये निर्धन का डेरा है ; तुझे परमात्मा जानू , तू ही तो है - मेरा दर्पण ; तुझे मैं आत्मा जानू , करूँ मैं आत्मा अर्पण. *************************************** 2026-02-19 06:23:47
9659 40449666 निर्यापक समय सागर जी भक्त ???? मुक्तागिरी मै केशलोंच प्रारंभ???जय हो भविष्य के इतिहास का स्वर्णिम क्षण वंदन वैरागी विद्या पूर्ण धर्म प्रभावना का app आ गया है । सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community कार्ड प्राप्त करे - Powered by Kutumb App <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1179739727?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=JBHJP&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1179739727?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=JBHJP&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING</a> 2026-02-19 06:22:04