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232545 40449710 11. वात्सल्य वारिधि हे वात्सल्यवारिधि तुम्हें नमोस्तु। हे समता के स्वामी तुम्हें नमोस्तु। हे पल-पल वर्धित तुम्हें नमोस्तु। हे वर्धमानसागरयति तुम्हें नमोस्तु। 2026-06-15 16:48:16
232544 40449699 3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) 2026-06-15 16:47:15
232543 40449699 3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) 2026-06-15 16:47:14
232541 40449699 3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) जैन धर्म में पंथवाद, संत-केंद्रित संस्कृति और सामाजिक एकात्मता : एक वस्तुनिष्ठ विश्लेषण जैन धर्म विश्व के प्राचीनतम दार्शनिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं में से एक है, जिसकी आधारशिला अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह, आत्मानुशासन और मोक्षमार्ग पर आधारित है। इसका मूल उद्देश्य किसी संप्रदाय का विस्तार नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव को आत्मबोध एवं कर्मबंधन से मुक्ति की दिशा में प्रेरित करना है। किन्तु वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में अनेक विद्वानों, चिंतकों एवं समाज के जागरूक वर्गों द्वारा यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि क्या जैन समाज धीरे-धीरे अपने मूल दार्शनिक स्वरूप से हटकर पंथ-केंद्रित व्यवस्था की ओर अग्रसर हो रहा है? यदि यह प्रवृत्ति निरंतर बढ़ती है, तो इसका प्रभाव भविष्य में जैन समाज की वैचारिक एकता और सांस्कृतिक शक्ति पर पड़ सकता है। 1. तीर्थंकर-केंद्रित दर्शन से संत-केंद्रित व्यवस्था जैन धर्म के सर्वोच्च आराध्य 24 तीर्थंकर हैं। उन्होंने किसी पंथ की स्थापना नहीं की, बल्कि आत्मज्ञान, वीतरागता और मोक्ष का सार्वभौमिक मार्ग बताया। किन्तु व्यवहारिक स्तर पर अनेक धार्मिक आयोजनों में यह देखा जाता है कि केंद्रबिंदु तीर्थंकरों के उपदेशों की अपेक्षा वर्तमान संतों, आचार्यों अथवा गुरु-व्यक्तित्वों पर अधिक केंद्रित हो जाता है। अनेक स्थानों पर— प्रचार सामग्री में संतों की छवियाँ अधिक प्रमुख होती हैं। धार्मिक आयोजनों का प्रचार किसी विशेष संत के नाम से किया जाता है। अनुयायियों की पहचान "जैन" से अधिक किसी विशेष पंथ या गुरु से जुड़ने लगती है। संतों का सम्मान भारतीय एवं जैन परंपरा का अभिन्न अंग है, किन्तु जब गुरु स्वयं साधन न रहकर श्रद्धा का अंतिम केंद्र बन जाएँ, तब मूल दर्शन पीछे छूटने लगता है। 2. पंथ विस्तार और अनुयायी-केंद्रित प्रतिस्पर्धा जैन धर्म मूलतः व्यक्तिगत साधना का मार्ग है, फिर भी आधुनिक सामाजिक संरचना में विभिन्न पंथों के बीच प्रभाव विस्तार की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है। इसके प्रमुख संकेत हैं— अधिकाधिक अनुयायी जोड़ने का प्रयास। बड़े धार्मिक आयोजनों के माध्यम से संगठनात्मक प्रभाव बढ़ाना। चातुर्मास को सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय बनाना। विभिन्न शहरों में अपने-अपने पंथ की संस्थाओं का विस्तार। यह प्रतिस्पर्धा प्रत्यक्ष न होकर भी व्यवहार में अनुभव की जा सकती है। परिणामस्वरूप धार्मिक ऊर्जा का एक बड़ा भाग आत्मसाधना के बजाय संगठन विस्तार में व्यय होने लगता है। 3. आर्थिक संसाधन और धार्मिक प्रभाव जैन समाज अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध रहा है। मंदिर, धर्मशालाएँ, गौशालाएँ, चिकित्सालय एवं शिक्षा संस्थान समाज के योगदान से ही संचालित होते हैं। किन्तु यह भी एक वास्तविकता है कि बड़े धार्मिक आयोजनों में करोड़ों रुपये व्यय किए जाते हैं। यदि इन संसाधनों का उद्देश्य केवल धार्मिक प्रचार न होकर किसी विशेष पंथ की प्रतिष्ठा बढ़ाना बन जाए, तो धर्म और संगठन के बीच संतुलन प्रभावित हो सकता है। प्रश्न धन के उपयोग का नहीं, बल्कि उसकी प्राथमिकता का है। 4. नई पीढ़ी का सीमित वैचारिक परिचय वर्तमान समय में अनेक युवाओं की धार्मिक पहचान "मैं जैन हूँ" से अधिक "मैं अमुक पंथ का हूँ" के रूप में विकसित होती दिखाई देती है। परिणामस्वरूप— जैन दर्शन के मूल ग्रंथों का अध्ययन सीमित रह जाता है। तीर्थंकरों के दर्शन की अपेक्षा गुरु-परंपरा का ज्ञान अधिक होता है। व्यापक जैन साहित्य से परिचय कम हो जाता है। वैचारिक विविधता के स्थान पर पंथीय दृष्टिकोण प्रमुख हो जाता है। यह स्थिति दीर्घकाल में जैन दर्शन की मूल आत्मा को सीमित कर सकती है। 5. सामाजिक एकात्मता पर प्रभाव जब प्रत्येक पंथ स्वयं को अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करता है, तब अनजाने में जैन समाज अनेक छोटे समूहों में विभाजित होने लगता है। इसके परिणामस्वरूप— पारस्परिक सहयोग घटता है। सामाजिक निर्णयों में सामूहिकता कम होती है। विवाह एवं सामाजिक संबंध संकुचित होते हैं। "जैन समाज" की सामूहिक पहचान कमजोर पड़ती है। यह प्रवृत्ति किसी एक पंथ तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक चुनौती के रूप में देखी जानी चाहिए। जैन धर्म मूलतः आत्मा की सार्वभौमिक उन्नति का संदेश देता है। किंतु यदि किसी भी पंथ में सामाजिक, वैवाहिक अथवा धार्मिक व्यवहार को अत्यधिक सीमित दायरे में बांध दिया जाए, तो नई पीढ़ी व्यापक जैन दर्शन के अध्ययन के बजाय केवल अपने संप्रदाय की परंपराओं तक सीमित रह सकती है। ऐसी स्थिति में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र जैसे मूल सिद्धांतों की अपेक्षा पंथगत पहचान अधिक प्रभावी हो जाती है। इससे समाज की समग्र एकात्मता प्रभावित हो सकती है। 6. भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के साथ संबंध जैन परंपरा भारतीय संस्कृति की प्राचीन धारा का महत्वपूर्ण अंग रही है। जैन ग्रंथों में राम, लक्ष्मण, कृष्ण, बलराम आदि को शलाकापुरुषों के रूप में स्थान प्राप्त है। इससे स्पष्ट होता है कि ऐतिहासिक रूप से जैन परंपरा और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के बीच संवाद और पारस्परिक सम्मान विद्यमान रहा है। अतः किसी भी प्रकार का वैचारिक अलगाव या सांस्कृतिक दूरी जैन परंपरा के ऐतिहासिक चरित्र का प्रतिनिधित्व नहीं करती। जैन दर्शन में भगवान की अवधारणा जैन दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक सिद्धांत यह है कि भगवान कोई सृष्टिकर्ता नहीं हैं। भगवान वह आत्मा है जिसने— समस्त कर्मबंधनों का क्षय किया, राग-द्वेष का पूर्ण परित्याग किया, केवलज्ञान प्राप्त किया, और वीतराग अवस्था को प्राप्त हुई। अर्थात् भगवान बनने की संभावना प्रत्येक जीव में विद्यमान है। यही जैन दर्शन की सबसे विशिष्ट और वैज्ञानिक अवधारणा मानी जाती है। ऐतिहासिक शिक्षा विश्व इतिहास यह दर्शाता है कि जब भी कोई सभ्यता अपने मूल सिद्धांतों से अधिक संगठनात्मक विभाजन, व्यक्तिपूजा अथवा आंतरिक प्रतिस्पर्धा में उलझी है, उसकी सामूहिक शक्ति कमजोर हुई है। हालाँकि किसी भी सभ्यता का उत्थान और पतन अनेक राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों से प्रभावित होता है, फिर भी आंतरिक एकता का क्षरण उसके कमजोर होने का एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। इतिहास यह संकेत देता है कि जब कोई भी सभ्यता या धार्मिक परंपरा अपने मूल सिद्धांतों से हटकर अत्यधिक आंतरिक विभाजन, व्यक्तिपूजा या संकीर्णता में उलझती है, तो उसकी सामाजिक शक्ति कमजोर होने लगती है। अक्सर उदाहरण के रूप में कंबोडिया के अंगकोर क्षेत्र का उल्लेख किया जाता है, जहाँ समय, राजनीतिक परिवर्तनों और बाहरी आक्रमणों सहित अनेक कारणों से महान सांस्कृतिक विरासत प्रभावित हुई। इतिहास यह भी सिखाता है कि किसी भी सभ्यता का उत्थान और पतन सामान्यतः अनेक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारणों का संयुक्त परिणाम होता है; इसलिए किसी एक कारण को ही जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। आज भी समाज में विभिन्न प्रकार के नैरेटिव और प्रचार लोगों की धार्मिक समझ को प्रभावित करते हैं। ऐसे समय में विवेकपूर्ण अध्ययन और मूल ग्रंथों की ओर लौटना आवश्यक है। ​"जैन दर्शन भले ही एक हो, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसके अलग-अलग पंथों में देव-शास्त्र-गुरु की वंदना की विधियाँ और पद्धतियाँ भिन्न हैं। यहाँ तक कि संतों के लिए अनिवार्य 'गोचरी' (भिक्षा शुद्धि) के नियम और आचरण में भी पंथीय विविधता देखी जाती है।" यह शिक्षा प्रत्येक धार्मिक समाज के लिए समान रूप से प्रासंगिक है। निष्कर्ष जैन धर्म का भविष्य किसी एक पंथ, एक संस्था अथवा एक संत पर निर्भर नहीं है। उसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि— क्या तीर्थंकर पुनः जैन समाज के केंद्र में स्थापित होंगे? क्या संत स्वयं को मार्गदर्शक तक सीमित रखेंगे, लक्ष्य नहीं बनाएँगे? क्या नई पीढ़ी पंथ से ऊपर उठकर जैन दर्शन को समझेगी? क्या समाज संगठन से पहले सिद्धांतों को महत्व देगा? यदि जैन समाज पुनः अहिंसा, अनेकांतवाद, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और वीतरागता को केंद्र में स्थापित करता है, तो उसकी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक शक्ति आने वाली शताब्दियों तक अक्षुण्ण रह सकती है। धर्म का उद्देश्य अनुयायियों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि आत्मा की गुणवत्ता को ऊँचा उठाना है। जब साधन लक्ष्य बन जाएँ, तब आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है धर्म का उद्देश्य मनुष्य को स्वतंत्र चिंतन, आत्मानुशासन और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाना है, न कि संकीर्ण पहचान में सीमित करना। संतों का सम्मान आवश्यक है, परंतु सम्मान और व्यक्तिपूजा में अंतर बना रहना चाहिए। पंथों का अस्तित्व स्वाभाविक है, परंतु यदि पंथ स्वयं धर्म से बड़ा दिखाई देने लगे तो आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि जैन समाज अपने मूल सिद्धांत—अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह, सम्यक ज्ञान और वीतरागता—को पुनः केंद्र में स्थापित करे। धर्म जोड़ने का माध्यम बने, विभाजन का नहीं; तीर्थंकरों के सिद्धांत सर्वोपरि रहें, और सभी पंथ स्वयं को उसी मूल दर्शन का साधन मानें, लक्ष्य नहीं। जैन होने के नाते आपके क्या विचार है, बताये ? 2026-06-15 16:47:12
232542 40449699 3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) जैन धर्म में पंथवाद, संत-केंद्रित संस्कृति और सामाजिक एकात्मता : एक वस्तुनिष्ठ विश्लेषण जैन धर्म विश्व के प्राचीनतम दार्शनिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं में से एक है, जिसकी आधारशिला अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह, आत्मानुशासन और मोक्षमार्ग पर आधारित है। इसका मूल उद्देश्य किसी संप्रदाय का विस्तार नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव को आत्मबोध एवं कर्मबंधन से मुक्ति की दिशा में प्रेरित करना है। किन्तु वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में अनेक विद्वानों, चिंतकों एवं समाज के जागरूक वर्गों द्वारा यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि क्या जैन समाज धीरे-धीरे अपने मूल दार्शनिक स्वरूप से हटकर पंथ-केंद्रित व्यवस्था की ओर अग्रसर हो रहा है? यदि यह प्रवृत्ति निरंतर बढ़ती है, तो इसका प्रभाव भविष्य में जैन समाज की वैचारिक एकता और सांस्कृतिक शक्ति पर पड़ सकता है। 1. तीर्थंकर-केंद्रित दर्शन से संत-केंद्रित व्यवस्था जैन धर्म के सर्वोच्च आराध्य 24 तीर्थंकर हैं। उन्होंने किसी पंथ की स्थापना नहीं की, बल्कि आत्मज्ञान, वीतरागता और मोक्ष का सार्वभौमिक मार्ग बताया। किन्तु व्यवहारिक स्तर पर अनेक धार्मिक आयोजनों में यह देखा जाता है कि केंद्रबिंदु तीर्थंकरों के उपदेशों की अपेक्षा वर्तमान संतों, आचार्यों अथवा गुरु-व्यक्तित्वों पर अधिक केंद्रित हो जाता है। अनेक स्थानों पर— प्रचार सामग्री में संतों की छवियाँ अधिक प्रमुख होती हैं। धार्मिक आयोजनों का प्रचार किसी विशेष संत के नाम से किया जाता है। अनुयायियों की पहचान "जैन" से अधिक किसी विशेष पंथ या गुरु से जुड़ने लगती है। संतों का सम्मान भारतीय एवं जैन परंपरा का अभिन्न अंग है, किन्तु जब गुरु स्वयं साधन न रहकर श्रद्धा का अंतिम केंद्र बन जाएँ, तब मूल दर्शन पीछे छूटने लगता है। 2. पंथ विस्तार और अनुयायी-केंद्रित प्रतिस्पर्धा जैन धर्म मूलतः व्यक्तिगत साधना का मार्ग है, फिर भी आधुनिक सामाजिक संरचना में विभिन्न पंथों के बीच प्रभाव विस्तार की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है। इसके प्रमुख संकेत हैं— अधिकाधिक अनुयायी जोड़ने का प्रयास। बड़े धार्मिक आयोजनों के माध्यम से संगठनात्मक प्रभाव बढ़ाना। चातुर्मास को सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय बनाना। विभिन्न शहरों में अपने-अपने पंथ की संस्थाओं का विस्तार। यह प्रतिस्पर्धा प्रत्यक्ष न होकर भी व्यवहार में अनुभव की जा सकती है। परिणामस्वरूप धार्मिक ऊर्जा का एक बड़ा भाग आत्मसाधना के बजाय संगठन विस्तार में व्यय होने लगता है। 3. आर्थिक संसाधन और धार्मिक प्रभाव जैन समाज अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध रहा है। मंदिर, धर्मशालाएँ, गौशालाएँ, चिकित्सालय एवं शिक्षा संस्थान समाज के योगदान से ही संचालित होते हैं। किन्तु यह भी एक वास्तविकता है कि बड़े धार्मिक आयोजनों में करोड़ों रुपये व्यय किए जाते हैं। यदि इन संसाधनों का उद्देश्य केवल धार्मिक प्रचार न होकर किसी विशेष पंथ की प्रतिष्ठा बढ़ाना बन जाए, तो धर्म और संगठन के बीच संतुलन प्रभावित हो सकता है। प्रश्न धन के उपयोग का नहीं, बल्कि उसकी प्राथमिकता का है। 4. नई पीढ़ी का सीमित वैचारिक परिचय वर्तमान समय में अनेक युवाओं की धार्मिक पहचान "मैं जैन हूँ" से अधिक "मैं अमुक पंथ का हूँ" के रूप में विकसित होती दिखाई देती है। परिणामस्वरूप— जैन दर्शन के मूल ग्रंथों का अध्ययन सीमित रह जाता है। तीर्थंकरों के दर्शन की अपेक्षा गुरु-परंपरा का ज्ञान अधिक होता है। व्यापक जैन साहित्य से परिचय कम हो जाता है। वैचारिक विविधता के स्थान पर पंथीय दृष्टिकोण प्रमुख हो जाता है। यह स्थिति दीर्घकाल में जैन दर्शन की मूल आत्मा को सीमित कर सकती है। 5. सामाजिक एकात्मता पर प्रभाव जब प्रत्येक पंथ स्वयं को अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करता है, तब अनजाने में जैन समाज अनेक छोटे समूहों में विभाजित होने लगता है। इसके परिणामस्वरूप— पारस्परिक सहयोग घटता है। सामाजिक निर्णयों में सामूहिकता कम होती है। विवाह एवं सामाजिक संबंध संकुचित होते हैं। "जैन समाज" की सामूहिक पहचान कमजोर पड़ती है। यह प्रवृत्ति किसी एक पंथ तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक चुनौती के रूप में देखी जानी चाहिए। जैन धर्म मूलतः आत्मा की सार्वभौमिक उन्नति का संदेश देता है। किंतु यदि किसी भी पंथ में सामाजिक, वैवाहिक अथवा धार्मिक व्यवहार को अत्यधिक सीमित दायरे में बांध दिया जाए, तो नई पीढ़ी व्यापक जैन दर्शन के अध्ययन के बजाय केवल अपने संप्रदाय की परंपराओं तक सीमित रह सकती है। ऐसी स्थिति में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र जैसे मूल सिद्धांतों की अपेक्षा पंथगत पहचान अधिक प्रभावी हो जाती है। इससे समाज की समग्र एकात्मता प्रभावित हो सकती है। 6. भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के साथ संबंध जैन परंपरा भारतीय संस्कृति की प्राचीन धारा का महत्वपूर्ण अंग रही है। जैन ग्रंथों में राम, लक्ष्मण, कृष्ण, बलराम आदि को शलाकापुरुषों के रूप में स्थान प्राप्त है। इससे स्पष्ट होता है कि ऐतिहासिक रूप से जैन परंपरा और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के बीच संवाद और पारस्परिक सम्मान विद्यमान रहा है। अतः किसी भी प्रकार का वैचारिक अलगाव या सांस्कृतिक दूरी जैन परंपरा के ऐतिहासिक चरित्र का प्रतिनिधित्व नहीं करती। जैन दर्शन में भगवान की अवधारणा जैन दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक सिद्धांत यह है कि भगवान कोई सृष्टिकर्ता नहीं हैं। भगवान वह आत्मा है जिसने— समस्त कर्मबंधनों का क्षय किया, राग-द्वेष का पूर्ण परित्याग किया, केवलज्ञान प्राप्त किया, और वीतराग अवस्था को प्राप्त हुई। अर्थात् भगवान बनने की संभावना प्रत्येक जीव में विद्यमान है। यही जैन दर्शन की सबसे विशिष्ट और वैज्ञानिक अवधारणा मानी जाती है। ऐतिहासिक शिक्षा विश्व इतिहास यह दर्शाता है कि जब भी कोई सभ्यता अपने मूल सिद्धांतों से अधिक संगठनात्मक विभाजन, व्यक्तिपूजा अथवा आंतरिक प्रतिस्पर्धा में उलझी है, उसकी सामूहिक शक्ति कमजोर हुई है। हालाँकि किसी भी सभ्यता का उत्थान और पतन अनेक राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों से प्रभावित होता है, फिर भी आंतरिक एकता का क्षरण उसके कमजोर होने का एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। इतिहास यह संकेत देता है कि जब कोई भी सभ्यता या धार्मिक परंपरा अपने मूल सिद्धांतों से हटकर अत्यधिक आंतरिक विभाजन, व्यक्तिपूजा या संकीर्णता में उलझती है, तो उसकी सामाजिक शक्ति कमजोर होने लगती है। अक्सर उदाहरण के रूप में कंबोडिया के अंगकोर क्षेत्र का उल्लेख किया जाता है, जहाँ समय, राजनीतिक परिवर्तनों और बाहरी आक्रमणों सहित अनेक कारणों से महान सांस्कृतिक विरासत प्रभावित हुई। इतिहास यह भी सिखाता है कि किसी भी सभ्यता का उत्थान और पतन सामान्यतः अनेक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारणों का संयुक्त परिणाम होता है; इसलिए किसी एक कारण को ही जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। आज भी समाज में विभिन्न प्रकार के नैरेटिव और प्रचार लोगों की धार्मिक समझ को प्रभावित करते हैं। ऐसे समय में विवेकपूर्ण अध्ययन और मूल ग्रंथों की ओर लौटना आवश्यक है। ​"जैन दर्शन भले ही एक हो, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसके अलग-अलग पंथों में देव-शास्त्र-गुरु की वंदना की विधियाँ और पद्धतियाँ भिन्न हैं। यहाँ तक कि संतों के लिए अनिवार्य 'गोचरी' (भिक्षा शुद्धि) के नियम और आचरण में भी पंथीय विविधता देखी जाती है।" यह शिक्षा प्रत्येक धार्मिक समाज के लिए समान रूप से प्रासंगिक है। निष्कर्ष जैन धर्म का भविष्य किसी एक पंथ, एक संस्था अथवा एक संत पर निर्भर नहीं है। उसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि— क्या तीर्थंकर पुनः जैन समाज के केंद्र में स्थापित होंगे? क्या संत स्वयं को मार्गदर्शक तक सीमित रखेंगे, लक्ष्य नहीं बनाएँगे? क्या नई पीढ़ी पंथ से ऊपर उठकर जैन दर्शन को समझेगी? क्या समाज संगठन से पहले सिद्धांतों को महत्व देगा? यदि जैन समाज पुनः अहिंसा, अनेकांतवाद, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और वीतरागता को केंद्र में स्थापित करता है, तो उसकी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक शक्ति आने वाली शताब्दियों तक अक्षुण्ण रह सकती है। धर्म का उद्देश्य अनुयायियों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि आत्मा की गुणवत्ता को ऊँचा उठाना है। जब साधन लक्ष्य बन जाएँ, तब आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है धर्म का उद्देश्य मनुष्य को स्वतंत्र चिंतन, आत्मानुशासन और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाना है, न कि संकीर्ण पहचान में सीमित करना। 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232539 40449697 हथकरघा शांतिधारा पूर्णायु 1 *बड़े बाबा कुंडलपुर वाले की सुन्दर व आकर्षक तस्वीर 10*8 Size मे गिफ्ट करने के लिए सबसे उत्तम उपलब्ध है, आज ही अपना ऑर्डर बुक करे, साइज customized करवा सकते है, फोटो भी अपने मंदिर जी का, चान्दखेड़ी वाले आदिनाथ भगवान, बिजोलिया वाले पार्श्वनाथ भगवान इत्यादि जों भी आप बनवाना चाहते है सम्पर्क करे ,विद्यासागर इंटरप्राइजेज, कोटा,9893112665* 2026-06-15 16:44:29
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232538 40449664 ?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? *परम् पूज्य राष्ट्रसंत श्वेतपिच्छाचार्य श्री विद्यानंद जी मुनिराज के *अंतेवासी पट्टशिष्य राष्ट्रसंत परंपराचार्य श्री 108 प्रज्ञसागर जी मुनिराज* का ╭━━━━━━━╮ *मंगल–विहार* ╰━━━━━━━╯ *▧ दिवस* ╭━━━━━━━╮ *16 –06–26* ╰━━━━━━━╯ *▧ समय* ╭━━━━━━━╮ * प्रातः 05:00 बजे* ╰━━━━━━━╯ ? *▶︎प्रस्थान स्थान -* श्री दिगम्बर जैन मंदिर लोधी रोड दिल्ली से प्रातः लगभग *05:00बजे* ???*लोकेशन*??? <a href="https://share.google/BR4fHkmOfDiY23N7D" target="_blank">https://share.google/BR4fHkmOfDiY23N7D</a> *➨प्रवास एवं प्रवेश स्थान* धर्मोदय तीर्थ श्री खण्डेलवाल दिगम्बर जैन मंदिर राजा बाजार कनॉट प्लेस नई दिल्ली प्रातः लगभग 06:00 बजे ???*लोकेशन*??? <a href="https://share.google/UKlQmjrVUNTdFLuoP" target="_blank">https://share.google/UKlQmjrVUNTdFLuoP</a> के लिए होगा _सभी गुरुभक्त समय में उपस्थित हो मंगल आशीर्वाद प्राप्त करें।_ *_संघ संचालक एवं संपर्क_* पवन संघस्थ *9582403008* (विहार में चलने हेतु सम्पर्क करें - संत सेवा समिति प्रधान विकास जैन - *98733 56180* ) ━═━இ━═━ *।।प्रज्ञ समर्पण संघ।।* ━═━இ━═━ _गुरुदेव श्री मंगल आशीर्वाद_ *आज आपका दिन मंगलमय हो!* 2026-06-15 16:43:55
232537 40449664 ?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? *परम् पूज्य राष्ट्रसंत श्वेतपिच्छाचार्य श्री विद्यानंद जी मुनिराज के *अंतेवासी पट्टशिष्य राष्ट्रसंत परंपराचार्य श्री 108 प्रज्ञसागर जी मुनिराज* का ╭━━━━━━━╮ *मंगल–विहार* ╰━━━━━━━╯ *▧ दिवस* ╭━━━━━━━╮ *16 –06–26* ╰━━━━━━━╯ *▧ समय* ╭━━━━━━━╮ * प्रातः 05:00 बजे* ╰━━━━━━━╯ ? *▶︎प्रस्थान स्थान -* श्री दिगम्बर जैन मंदिर लोधी रोड दिल्ली से प्रातः लगभग *05:00बजे* ???*लोकेशन*??? <a href="https://share.google/BR4fHkmOfDiY23N7D" target="_blank">https://share.google/BR4fHkmOfDiY23N7D</a> *➨प्रवास एवं प्रवेश स्थान* धर्मोदय तीर्थ श्री खण्डेलवाल दिगम्बर जैन मंदिर राजा बाजार कनॉट प्लेस नई दिल्ली प्रातः लगभग 06:00 बजे ???*लोकेशन*??? <a href="https://share.google/UKlQmjrVUNTdFLuoP" target="_blank">https://share.google/UKlQmjrVUNTdFLuoP</a> के लिए होगा _सभी गुरुभक्त समय में उपस्थित हो मंगल आशीर्वाद प्राप्त करें।_ *_संघ संचालक एवं संपर्क_* पवन संघस्थ *9582403008* (विहार में चलने हेतु सम्पर्क करें - संत सेवा समिति प्रधान विकास जैन - *98733 56180* ) ━═━இ━═━ *।।प्रज्ञ समर्पण संघ।।* ━═━இ━═━ _गुरुदेव श्री मंगल आशीर्वाद_ *आज आपका दिन मंगलमय हो!* 2026-06-15 16:43:54
232535 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-15 16:30:59