| ID |
Chat ID
|
Chat Name
|
Sender
|
Phone
|
Message
|
Status
|
Date |
View |
| 232510 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
|
|
सफेद पट्टी भारत-पाकिस्तान की बॉर्डर है क्या?
आज सोशल मीडिया के इस दौर में व्यूज़ की भूख और वायरल होने की सनक ने एक नई जमात को जन्म दिया है—कथित 'इन्फ्लुएंसर्स' की जमात। इस जमात में कुछ लोग यकीनन काबिल-ए-तारीफ काम कर रहे हैं, लेकिन एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जिसका समाज, सच, या सांप्रदायिक सौहार्द से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। उनका एकमात्र धर्म, ईमान और मकसद सिर्फ एक है, किसी भी तरह विवाद खड़ा करना और वायरल हो जाना। मुंबई के घाटकोपर की एक सोसायटी में हाल ही में जो हुआ, वह इसी बीमार मानसिकता का जीता-जागता और शर्मनाक उदाहरण है।
जैन मुनियों के आगमन के लिए सोसायटी के परिसर में एक साधारण सी सफेद पट्टी बनाई गई थी। इसके पीछे की वजह पूरी तरह मानवीय और वैज्ञानिक थी ताकि चिलचिलाती धूप में ज़मीन कम तपे, बरसात के मौसम में नंगे पैर चलने वाले साधु-संतों का पैर न फिसले, उन्हें कंकड़-पत्थर न चुभें और रास्ते के सूक्ष्म जीवों की रक्षा हो सके। लेकिन अफ़सोस! रील के भूखे कुछ गिद्धों ने इस सामान्य, मानवीय और सेवा भाव से किए गए कार्य को धर्म और क्षेत्रवाद का रंग दे दिया।
मैं सीधा और तीखा सवाल पूछता हूँ, क्या उस सफेद पट्टी से किसी का रत्ती भर भी नुकसान हुआ? क्या किसी को उस पर चलने से रोका गया? क्या किसी की ज़मीन हड़प ली गई? क्या सोसायटी के अन्य निवासियों को उससे कोई तकलीफ थी? अगर इन सभी सवालों का जवाब "नहीं" है, तो फिर यह ज़हरीला विवाद किस बात का?
भारत वो देश है जहाँ सदियों से राहगीरों के लिए प्याऊ लगाना, मंदिरों के बाहर छांव की व्यवस्था करना, गुरुद्वारों में बिना भेदभाव के चौबीसों घंटे लंगर चलाना और छतों पर पक्षियों के लिए दाना-पानी रखना हमारी रगों में बसा है। यह हमारी साझी संस्कृति है। जैन मुनि तो वो हैं जो किसी जीव को तकलीफ न पहुंचे, इसके लिए अपना पूरा जीवन नंगे पैर चलकर और अहिंसा के मार्ग पर बिता देते हैं। अगर किसी श्रद्धालु ने उनके पैरों की सहूलियत के लिए एक चूने या पेंट की पट्टी बना दी, तो इसमें पहाड़ टूट पड़ने जैसी क्या बात थी? अगर आज हम इस सफेद पट्टी पर विवाद स्वीकार कर लेते हैं, तो कल ये लोग पूछेंगे कि पक्षियों के लिए पानी क्यों रखा? परसों सवाल उठाएंगे कि गरीबों को मुफ्त भोजन क्यों कराया? फिर किसी बीमार की मदद करने पर भी ये धर्म का चश्मा लगा देंगे! अगर समाज के हर अच्छे और सेवा कार्य में हम नफरत और विवाद का कीड़ा ढूंढने लगेंगे, तो एक इंसानी समाज के रूप में हम आगे बढ़ेंगे या आदिम युग में लौट जाएंगे?
कड़वा सच तो यह है कि इन नफरत के सौदागरों को बहुत अच्छे से पता है कि प्रेम, भाईचारे और सद्भाव की बातों से रील्स पर 'लाइक' और 'व्यूज' की बरसात नहीं होती। सुर्खियां बटोरने के लिए विवाद का तड़का लगाना पड़ता है। इसलिए ये लोग तिल का ताड़ बनाते हैं और भाई को भाई से लड़ाने की स्क्रिप्ट लिखते हैं। इन्हें समाज के बिखरने का कोई गम नहीं है, इन्हें बस अपने फॉलोअर्स की संख्या बढ़ने की खुशी होती है। ये घटनाएं स्क्रीन पर छोटी दिखती हैं, लेकिन समाज के भीतर अविश्वास और दूरी का ऐसा धीमा ज़हर घोलती हैं जिसे मिटाना नामुमकिन हो जाता है। हमें जागना होगा। किसी भी रील या पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देने या उसे शेयर करने से पहले खुद से पूछिए "कहीं मैं किसी की सस्ती लोकप्रियता और टीआरपी का मोहरा तो नहीं बन रहा?"
याद रखिए, किसी शीशे या समाज को तोड़ना बेहद आसान है, लेकिन उसके टुकड़ों को जोड़कर पहले जैसा बनाना सबसे मुश्किल काम है। नफरत फैलाने वाले आपको हर मोड़ पर हज़ारों मिल जाएंगे, लेकिन इस देश के ताने-बाने को, इसके प्रेम और सद्भाव को बचाकर रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है। साफ़ लफ़्ज़ों में समझ लीजिए, वह सफेद पट्टी कोई भारत-पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर नहीं थी, जिसे देखकर छाती पीटी जाए या हंगामा खड़ा किया जाए। वह सिर्फ सेवा, सम्मान और सुविधा के लिए की गई एक अस्थाई व्यवस्था थी। खतरा उस निर्जीव सफेद पट्टी से कभी था ही नहीं; असली खतरा उस बीमार और संकीर्ण सोच से है जो हर पवित्र और मानवीय कार्य में भी नफरत का एजेंडा खोज लेती है। समाज को जोड़ने का जरिया बनिए, उसे तोड़ने का औजार मत बनिए। क्योंकि याद रखिए, ज़हर की एक छोटी सी बूंद भी पूरे घड़े के अमृत जैसे पानी को बर्बाद करने के लिए काफी होती है। |
|
2026-06-15 16:15:27 |
|
| 232508 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
|
|
अब वाइट पट्टा लगाने से भी दिक्कत होने लगी है जब की वाइट पट्टे से पेर नही जलते है ठंडा रहता है गुरु महाराज नंगे पाओ चलते है तो उनके लिए लगाया जाता है इस पट्टे से ना कोई रास्ता रुकता है ना किसी को ठेस पहुंचती है ना किसी धर्म का अपमान होता है तो फिर इस पट्टे से एक आदमी को इतनी दिक्कत क्यों ये कहता है हर जैन ???? |
|
2026-06-15 16:15:25 |
|
| 232507 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
|
|
अब वाइट पट्टा लगाने से भी दिक्कत होने लगी है जब की वाइट पट्टे से पेर नही जलते है ठंडा रहता है गुरु महाराज नंगे पाओ चलते है तो उनके लिए लगाया जाता है इस पट्टे से ना कोई रास्ता रुकता है ना किसी को ठेस पहुंचती है ना किसी धर्म का अपमान होता है तो फिर इस पट्टे से एक आदमी को इतनी दिक्कत क्यों ये कहता है हर जैन ???? |
|
2026-06-15 16:15:24 |
|
| 232506 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
|
|
*?राजनीति से जिनका मुंह काला हो चुका है, वह मुंह काला करने की बात कर रहे हैं।।*
*?राजनीति में जब विचार समाप्त होने लगते हैं, तब भाषा की मर्यादा भी टूटने लगती है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सबको है, किंतु विरोध की अभिव्यक्ति यदि धमकी, अपमान और सामाजिक वैमनस्य में बदल जाए, तो वह केवल राजनीतिक दिवालियापन का परिचायक बन जाता है।दूसरों का मुंह काला करने की बात करने वालों महाराष्ट्र की राजनीति में आपका मुंह पहले ही काला हो चुका है.......*
*मुंबई के घाटकोपर-विद्याविहार क्षेत्र में जैन साधु-साध्वियों के लिए सड़क पर सफेद पट्टी बनाए जाने का मामला इन दिनों राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेताओं ने जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया, उसने केवल जैन समाज ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं को मानने वाले हर नागरिक को चिंतित किया है।*
*जैन साधु-साध्वियों की परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। वे नंगे पैर चलकर संयम, तप और अहिंसा का संदेश देते हैं। तपती सड़क पर उनके चरण झुलस न जाएं, इसके लिए यदि स्थानीय श्रद्धालुओं ने सफेद पट्टी बनवा दी, तो यह किसी प्रकार का अपराध नहीं कहा जा सकता। यह न तो सरकारी धन का दुरुपयोग था और न ही किसी समुदाय पर थोपी गई व्यवस्था। यह केवल श्रद्धा और संवेदना का एक छोटा-सा प्रतीक था।*
*परंतु दुर्भाग्य यह है कि आज की राजनीति में संवेदनाएं नहीं, केवल अवसरवाद बचा है। मनसे नेता संदीप देशपांडे ने इसे “सांस्कृतिक आतंकवाद” बताते हुए संबंधित लोगों का “मुंह काला” करने की चेतावनी दी। यह बयान न केवल अमर्यादित है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए भी घातक है। जिन नेताओं का राजनीतिक अस्तित्व जनता ने लगातार नकार दिया हो, जिनका राजनीतिक चेहरा स्वयं जनता के बीच काला पड़* *चुका हो, वे यदि दूसरों का मुंह* *काला करने की बात करें, तो यह हास्यास्पद भी है और दुखद भी।*
*यह वही राजनीति है जो वास्तविक जनसमस्याओं पर मौन रहती है। मुंबई की टूटी सड़कें, जलभराव, बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई और मराठी युवाओं के भविष्य पर कभी इतनी आक्रामकता दिखाई नहीं देती। लेकिन जब किसी शांतिप्रिय समाज की धार्मिक परंपरा सामने आती है, तब अचानक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जाग उठता है। यह विरोध नहीं, बल्कि सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने का प्रयास अधिक प्रतीत होता है।*
*♦️जैन समाज देश का सबसे शांतिप्रिय और अनुशासित समाज माना जाता है। उसने कभी हिंसा, उग्र आंदोलन या सामाजिक विद्वेष का रास्ता नहीं चुना। भगवान महावीर की अहिंसा और अपरिग्रह की शिक्षा आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा है। ऐसे समाज की साधु-साध्वियों के प्रति* *अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना केवल एक समुदाय का नहीं, भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा का अपमान है।*
*भारत विविधताओं का देश है। यहां हर धर्म, हर परंपरा और हर जीवन-पद्धति को सम्मान देने की परंपरा रही है। यदि सिखों के लिए लंगर की व्यवस्था सम्माननीय है, यदि कांवड़ यात्रियों के लिए मार्गों पर सुविधाएं उपलब्ध कराना स्वीकार्य है, यदि अमरनाथ यात्रियों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं, तो जैन साधुओं के लिए श्रद्धावश बनाई गई सफेद पट्टी पर इतना आक्रोश क्यों? क्या सहिष्णुता केवल राजनीति की सुविधा तक सीमित रह गई है?*
*असल समस्या यह नहीं कि सड़क पर सफेद पट्टी बनाई गई। समस्या यह है कि कुछ राजनीतिक दल समाज को भावनात्मक मुद्दों में उलझाकर अपनी प्रासंगिकता बचाना चाहते हैं। जिनके पास विकास का एजेंडा नहीं बचता, वे विवादों की राजनीति करते हैं। जिनका राजनीतिक चेहरा जनता बार-बार नकार चुकी हो, वे समाज में तनाव पैदा कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं।*
*लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, किंतु धमकी का नहीं। यदि किसी व्यवस्था पर आपत्ति थी, तो प्रशासन से संवाद किया जा सकता था। न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जा सकती थी। लेकिन “मुंह काला करने” जैसी भाषा यह दर्शाती है कि राजनीतिक संस्कार किस स्तर तक गिर चुके हैं।*
*आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति समाज को जोड़ने का माध्यम बने, तोड़ने का नहीं। धर्म और परंपराओं के सम्मान को राजनीतिक नफरत का विषय न बनाया जाए। जैन साधुओं के चरणों की रक्षा के लिए बनाई गई सफेद पट्टी को यदि कुछ लोग अपनी राजनीति चमकाने का माध्यम बना रहे हैं, तो यह उनके राजनीतिक और वैचारिक दिवालियेपन का प्रमाण है।*
*वास्तव में जिनका राजनीति में चेहरा जनता के बीच पहले ही काला हो चुका है, वही आज दूसरों का मुंह काला करने की बातें कर रहे हैं। जनता सब देख रही है, और समय आने पर लोकतंत्र में जवाब* *भी वही देती है।...?* |
|
2026-06-15 16:15:22 |
|
| 232505 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
|
|
*?राजनीति से जिनका मुंह काला हो चुका है, वह मुंह काला करने की बात कर रहे हैं।।*
*?राजनीति में जब विचार समाप्त होने लगते हैं, तब भाषा की मर्यादा भी टूटने लगती है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सबको है, किंतु विरोध की अभिव्यक्ति यदि धमकी, अपमान और सामाजिक वैमनस्य में बदल जाए, तो वह केवल राजनीतिक दिवालियापन का परिचायक बन जाता है।दूसरों का मुंह काला करने की बात करने वालों महाराष्ट्र की राजनीति में आपका मुंह पहले ही काला हो चुका है.......*
*मुंबई के घाटकोपर-विद्याविहार क्षेत्र में जैन साधु-साध्वियों के लिए सड़क पर सफेद पट्टी बनाए जाने का मामला इन दिनों राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेताओं ने जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया, उसने केवल जैन समाज ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं को मानने वाले हर नागरिक को चिंतित किया है।*
*जैन साधु-साध्वियों की परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। वे नंगे पैर चलकर संयम, तप और अहिंसा का संदेश देते हैं। तपती सड़क पर उनके चरण झुलस न जाएं, इसके लिए यदि स्थानीय श्रद्धालुओं ने सफेद पट्टी बनवा दी, तो यह किसी प्रकार का अपराध नहीं कहा जा सकता। यह न तो सरकारी धन का दुरुपयोग था और न ही किसी समुदाय पर थोपी गई व्यवस्था। यह केवल श्रद्धा और संवेदना का एक छोटा-सा प्रतीक था।*
*परंतु दुर्भाग्य यह है कि आज की राजनीति में संवेदनाएं नहीं, केवल अवसरवाद बचा है। मनसे नेता संदीप देशपांडे ने इसे “सांस्कृतिक आतंकवाद” बताते हुए संबंधित लोगों का “मुंह काला” करने की चेतावनी दी। यह बयान न केवल अमर्यादित है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए भी घातक है। जिन नेताओं का राजनीतिक अस्तित्व जनता ने लगातार नकार दिया हो, जिनका राजनीतिक चेहरा स्वयं जनता के बीच काला पड़* *चुका हो, वे यदि दूसरों का मुंह* *काला करने की बात करें, तो यह हास्यास्पद भी है और दुखद भी।*
*यह वही राजनीति है जो वास्तविक जनसमस्याओं पर मौन रहती है। मुंबई की टूटी सड़कें, जलभराव, बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई और मराठी युवाओं के भविष्य पर कभी इतनी आक्रामकता दिखाई नहीं देती। लेकिन जब किसी शांतिप्रिय समाज की धार्मिक परंपरा सामने आती है, तब अचानक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जाग उठता है। यह विरोध नहीं, बल्कि सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने का प्रयास अधिक प्रतीत होता है।*
*♦️जैन समाज देश का सबसे शांतिप्रिय और अनुशासित समाज माना जाता है। उसने कभी हिंसा, उग्र आंदोलन या सामाजिक विद्वेष का रास्ता नहीं चुना। भगवान महावीर की अहिंसा और अपरिग्रह की शिक्षा आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा है। ऐसे समाज की साधु-साध्वियों के प्रति* *अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना केवल एक समुदाय का नहीं, भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा का अपमान है।*
*भारत विविधताओं का देश है। यहां हर धर्म, हर परंपरा और हर जीवन-पद्धति को सम्मान देने की परंपरा रही है। यदि सिखों के लिए लंगर की व्यवस्था सम्माननीय है, यदि कांवड़ यात्रियों के लिए मार्गों पर सुविधाएं उपलब्ध कराना स्वीकार्य है, यदि अमरनाथ यात्रियों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं, तो जैन साधुओं के लिए श्रद्धावश बनाई गई सफेद पट्टी पर इतना आक्रोश क्यों? क्या सहिष्णुता केवल राजनीति की सुविधा तक सीमित रह गई है?*
*असल समस्या यह नहीं कि सड़क पर सफेद पट्टी बनाई गई। समस्या यह है कि कुछ राजनीतिक दल समाज को भावनात्मक मुद्दों में उलझाकर अपनी प्रासंगिकता बचाना चाहते हैं। जिनके पास विकास का एजेंडा नहीं बचता, वे विवादों की राजनीति करते हैं। जिनका राजनीतिक चेहरा जनता बार-बार नकार चुकी हो, वे समाज में तनाव पैदा कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं।*
*लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, किंतु धमकी का नहीं। यदि किसी व्यवस्था पर आपत्ति थी, तो प्रशासन से संवाद किया जा सकता था। न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जा सकती थी। लेकिन “मुंह काला करने” जैसी भाषा यह दर्शाती है कि राजनीतिक संस्कार किस स्तर तक गिर चुके हैं।*
*आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति समाज को जोड़ने का माध्यम बने, तोड़ने का नहीं। धर्म और परंपराओं के सम्मान को राजनीतिक नफरत का विषय न बनाया जाए। जैन साधुओं के चरणों की रक्षा के लिए बनाई गई सफेद पट्टी को यदि कुछ लोग अपनी राजनीति चमकाने का माध्यम बना रहे हैं, तो यह उनके राजनीतिक और वैचारिक दिवालियेपन का प्रमाण है।*
*वास्तव में जिनका राजनीति में चेहरा जनता के बीच पहले ही काला हो चुका है, वही आज दूसरों का मुंह काला करने की बातें कर रहे हैं। जनता सब देख रही है, और समय आने पर लोकतंत्र में जवाब* *भी वही देती है।...?* |
|
2026-06-15 16:15:21 |
|
| 232503 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
|
|
<a href="https://swarajvani.com/jain-samaj-jagran-hardik-hundiya-appeal/" target="_blank">https://swarajvani.com/jain-samaj-jagran-hardik-hundiya-appeal/</a>
जैन समाज जागरण: हार्दिक हुंडिया की बड़ी अपील, करोड़ों के धार्मिक खर्च पर रोक लगाकर साधर्मिकों को करें मजबूत |
|
2026-06-15 16:14:10 |
|
| 232504 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
|
|
<a href="https://swarajvani.com/jain-samaj-jagran-hardik-hundiya-appeal/" target="_blank">https://swarajvani.com/jain-samaj-jagran-hardik-hundiya-appeal/</a>
जैन समाज जागरण: हार्दिक हुंडिया की बड़ी अपील, करोड़ों के धार्मिक खर्च पर रोक लगाकर साधर्मिकों को करें मजबूत |
|
2026-06-15 16:14:10 |
|
| 232502 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
|
|
?♀️??♂️?♂️?♀️
*सौगंध देने वाले*
*जैन साधु साध्वियां !!*
*अब आप स्वयं भी*
*सौगंध ले लेवें*
?♂️?♀️???♀️?♂️
*वीडियो ⏰2:19*
*इसे भी सुन लेवें*
?♀️??♂️?♂️??♀️
*जैन धर्मावलंबियों !!!*
*सादर जय जिनेन्द्र*
जुलाई महीने में हमारे
जैन साधु साध्वियों के
चातुर्मासिक अथवा
वर्षाकालीन प्रवेश
पहले से ही सुनिश्चित
किसी गांव, नगर या
किसी स्थल पर लगभग
आन-बान-शान और
धूम लड़कों के साथ हो
जाएंगे।
पिछले कुछ वर्षों से
जिनशासन प्रभावना
के नाम से निजशासन
प्रभावना धड़ल्ले से हो
रही हैं। यश,नाम,किर्ति
के प्यासे और भूखे
कुछ महात्माओं में तो
अघोषित प्रतिस्पर्धाएं
भी होती हैं और उनको
सहयोग देने वाले होते
हैं उनके परम भक्त
कुछ धनाढ्य लोग जो
स्वयं भी यश,नाम, किर्ति
के प्यासे और भूखे
ऐसे अघोषित सौदागर
होते हैं।
मेरी जाहिर विनम्र
अपील है सभी ट्रस्ट
मंडलों और अग्रगण्य
श्रावकों से कि वे
महात्माओं के चातुर्मास
प्रवेश सादगी पूर्वक
तरीकों से करावें।
चातुर्मास दरम्यान
तमाम धर्म आराधनाएं
भी सादगी पूर्वक हों।
कोई शोर-शराबा न हो।
श्रावक श्राविकाओं को
पच्चक्खाण देने वाले
महात्मा स्वयं श्रीसंघ
के समक्ष जाहिर में
पच्चक्खाण लें कि हम
1️⃣
हम धार्मिक क्रियाओं
की अनावश्यक वैसी
नीलामी करके धन
संग्रह करने के लिए
प्रोत्साहन नहीं देंगे।
2️⃣
दीक्षा,भोजन, चातुर्मास
संघ यात्रा में ठेकेदारी
कमिशन नहीं लेंगे।
3️⃣
श्रीसंघ या ट्रस्ट मंडल
की उपेक्षा कर स्वयं के
प्रभुत्व की वर्षा वास
समिति बनाकर धन
एकत्रित नहीं करेंगे।
4️⃣
नेताओं,अफसरों और
संगीतकारों/उद्घोषकों
से सांठ-गांठ कर
अपनी प्रशंसाओं की
पताका नहीं फहराएंगे।
5️⃣
श्रीसंघ की पहले से जो
भी व्यवस्था है उसी में
धर्म क्रियाएं करायेंगे
बड़े बड़े सुसज्जित
विशाल पंडाल बनाने
का आग्रह नहीं करेंगे।
6️⃣
प्रवेश सादगीपूर्ण होगा।
कईं तरह के बैंड बाजे,
हाथी, घोड़े, ऊंट, और
झांकियों के लिए हम
आग्रह नहीं करेंगे।
7️⃣
चातुर्मास दरम्यान सभी
तरह की अनिवार्य
धार्मिक क्रियाएं तो
होंगी ही लेकिन हम
साधर्मिक उत्कर्ष और
आत्मनिर्भरता विषय
पर विशेष ध्यान देते
हुए योजनाओं का
कार्यान्वयन कराएंगे।
8️⃣
*आखिरी बात :::---*
चाहे किसी भी संप्रदाय
समुदाय, पंथ या गच्छ
के क्यों ना हो, मैं उन
सभी साधु-संतों और
साध्वियों को अपने
अंतर्मन से कोटि-कोटि
भाव वंदन करता हूं
जो अपनी आत्मा के
कल्याण के लिए
आराधना, साधना और
उपासनाएं स्वयं तो
करते ही हैं, श्रावक,
श्राविकाओं से भी वे
कराते हैं - बिना किसी
एडवरटाइजमेंट और
पब्लिसिटी के। उनके
तप-जप को मैं नमन
करता हूं।
पांच महाव्रतों का वे
बखूबी पालन करते हैं।
जिनके चारित्र पालन
में सुस्तता नहीं बल्कि
गजब की चुस्तता
स्पष्ट दृष्टिगोचर होती
हैं। ज्ञानी, ध्यानी और
चारित्रनिष्ठ ऐसे तमाम
सदाचारी अणगारों की
बदौलत हम सभी जैनी
गौरवान्वित होते हैं।
??♂️?♀️?♀️?♂️?
*१४ जून का महत्व ::--*
? ?
1️⃣
World Blood
Donor Day
विश्व रक्तदाता दिवस।
इसका मुख्य उद्देश्य
सुरक्षित रक्त की
आवश्यकता और
जीवन बचाने वाले
स्वेच्छिक रक्तदाताओं
के प्रति आभार व्यक्त
करना है।
2️⃣
नोबेल पुरस्कार विजेता
महान् वैज्ञानिक कार्ल
लैंडस्टाइनर (जिन्होंने
ब्लड ग्रुप प्रणाली
ABO की खोज की)
के जन्मदिन की याद में
मनाया जाता है।
3️⃣
१९७७ में इसी दिन
अमेरिका की कांग्रेस ने
अपने राष्ट्रीय ध्वज के
रुप में 'स्टार्स एंड
स्ट्राइप्स' को अपनाया था।
4️⃣
इस दिन अमेरिका के
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प
और अर्जेंटीना के
क्रांतिकारी चे ग्वेरा का
जन्म हुआ था।
*मेरी विनम्र अपील ::-*
जो लोग स्वस्थ हैं वे
रक्तदान अवश्य करें।
जो लोग निःस्वार्थ भाव
से रक्तदान कर किसी
की जिंदगी बचाने में
सहयोग देते हैं वे सभी
अभिनंदनीय हैं।
??♂️?♀️?♀️?♂️?
_*सज्जनों !!!*_
_*यदि आपको उचित*_
_*लगें तो इस सामग्री*_
_*को अपने परिचितों*_
_*को भी जरुर भेजिएगा*_
??♀️?♂️?♂️?♀️?
*सादगी सहिष्णुता अनुरागी*
_*>> मोहनलाल यु.जैन <<*_
*[कवि, लेखक, गीतकार]*
*?9820004611*
*14 June'26/Sunday*
?♀️?♂️???♂️?♀️ |
|
2026-06-15 16:14:09 |
|
| 232501 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
|
|
?♀️??♂️?♂️?♀️
*सौगंध देने वाले*
*जैन साधु साध्वियां !!*
*अब आप स्वयं भी*
*सौगंध ले लेवें*
?♂️?♀️???♀️?♂️
*वीडियो ⏰2:19*
*इसे भी सुन लेवें*
?♀️??♂️?♂️??♀️
*जैन धर्मावलंबियों !!!*
*सादर जय जिनेन्द्र*
जुलाई महीने में हमारे
जैन साधु साध्वियों के
चातुर्मासिक अथवा
वर्षाकालीन प्रवेश
पहले से ही सुनिश्चित
किसी गांव, नगर या
किसी स्थल पर लगभग
आन-बान-शान और
धूम लड़कों के साथ हो
जाएंगे।
पिछले कुछ वर्षों से
जिनशासन प्रभावना
के नाम से निजशासन
प्रभावना धड़ल्ले से हो
रही हैं। यश,नाम,किर्ति
के प्यासे और भूखे
कुछ महात्माओं में तो
अघोषित प्रतिस्पर्धाएं
भी होती हैं और उनको
सहयोग देने वाले होते
हैं उनके परम भक्त
कुछ धनाढ्य लोग जो
स्वयं भी यश,नाम, किर्ति
के प्यासे और भूखे
ऐसे अघोषित सौदागर
होते हैं।
मेरी जाहिर विनम्र
अपील है सभी ट्रस्ट
मंडलों और अग्रगण्य
श्रावकों से कि वे
महात्माओं के चातुर्मास
प्रवेश सादगी पूर्वक
तरीकों से करावें।
चातुर्मास दरम्यान
तमाम धर्म आराधनाएं
भी सादगी पूर्वक हों।
कोई शोर-शराबा न हो।
श्रावक श्राविकाओं को
पच्चक्खाण देने वाले
महात्मा स्वयं श्रीसंघ
के समक्ष जाहिर में
पच्चक्खाण लें कि हम
1️⃣
हम धार्मिक क्रियाओं
की अनावश्यक वैसी
नीलामी करके धन
संग्रह करने के लिए
प्रोत्साहन नहीं देंगे।
2️⃣
दीक्षा,भोजन, चातुर्मास
संघ यात्रा में ठेकेदारी
कमिशन नहीं लेंगे।
3️⃣
श्रीसंघ या ट्रस्ट मंडल
की उपेक्षा कर स्वयं के
प्रभुत्व की वर्षा वास
समिति बनाकर धन
एकत्रित नहीं करेंगे।
4️⃣
नेताओं,अफसरों और
संगीतकारों/उद्घोषकों
से सांठ-गांठ कर
अपनी प्रशंसाओं की
पताका नहीं फहराएंगे।
5️⃣
श्रीसंघ की पहले से जो
भी व्यवस्था है उसी में
धर्म क्रियाएं करायेंगे
बड़े बड़े सुसज्जित
विशाल पंडाल बनाने
का आग्रह नहीं करेंगे।
6️⃣
प्रवेश सादगीपूर्ण होगा।
कईं तरह के बैंड बाजे,
हाथी, घोड़े, ऊंट, और
झांकियों के लिए हम
आग्रह नहीं करेंगे।
7️⃣
चातुर्मास दरम्यान सभी
तरह की अनिवार्य
धार्मिक क्रियाएं तो
होंगी ही लेकिन हम
साधर्मिक उत्कर्ष और
आत्मनिर्भरता विषय
पर विशेष ध्यान देते
हुए योजनाओं का
कार्यान्वयन कराएंगे।
8️⃣
*आखिरी बात :::---*
चाहे किसी भी संप्रदाय
समुदाय, पंथ या गच्छ
के क्यों ना हो, मैं उन
सभी साधु-संतों और
साध्वियों को अपने
अंतर्मन से कोटि-कोटि
भाव वंदन करता हूं
जो अपनी आत्मा के
कल्याण के लिए
आराधना, साधना और
उपासनाएं स्वयं तो
करते ही हैं, श्रावक,
श्राविकाओं से भी वे
कराते हैं - बिना किसी
एडवरटाइजमेंट और
पब्लिसिटी के। उनके
तप-जप को मैं नमन
करता हूं।
पांच महाव्रतों का वे
बखूबी पालन करते हैं।
जिनके चारित्र पालन
में सुस्तता नहीं बल्कि
गजब की चुस्तता
स्पष्ट दृष्टिगोचर होती
हैं। ज्ञानी, ध्यानी और
चारित्रनिष्ठ ऐसे तमाम
सदाचारी अणगारों की
बदौलत हम सभी जैनी
गौरवान्वित होते हैं।
??♂️?♀️?♀️?♂️?
*१४ जून का महत्व ::--*
? ?
1️⃣
World Blood
Donor Day
विश्व रक्तदाता दिवस।
इसका मुख्य उद्देश्य
सुरक्षित रक्त की
आवश्यकता और
जीवन बचाने वाले
स्वेच्छिक रक्तदाताओं
के प्रति आभार व्यक्त
करना है।
2️⃣
नोबेल पुरस्कार विजेता
महान् वैज्ञानिक कार्ल
लैंडस्टाइनर (जिन्होंने
ब्लड ग्रुप प्रणाली
ABO की खोज की)
के जन्मदिन की याद में
मनाया जाता है।
3️⃣
१९७७ में इसी दिन
अमेरिका की कांग्रेस ने
अपने राष्ट्रीय ध्वज के
रुप में 'स्टार्स एंड
स्ट्राइप्स' को अपनाया था।
4️⃣
इस दिन अमेरिका के
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प
और अर्जेंटीना के
क्रांतिकारी चे ग्वेरा का
जन्म हुआ था।
*मेरी विनम्र अपील ::-*
जो लोग स्वस्थ हैं वे
रक्तदान अवश्य करें।
जो लोग निःस्वार्थ भाव
से रक्तदान कर किसी
की जिंदगी बचाने में
सहयोग देते हैं वे सभी
अभिनंदनीय हैं।
??♂️?♀️?♀️?♂️?
_*सज्जनों !!!*_
_*यदि आपको उचित*_
_*लगें तो इस सामग्री*_
_*को अपने परिचितों*_
_*को भी जरुर भेजिएगा*_
??♀️?♂️?♂️?♀️?
*सादगी सहिष्णुता अनुरागी*
_*>> मोहनलाल यु.जैन <<*_
*[कवि, लेखक, गीतकार]*
*?9820004611*
*14 June'26/Sunday*
?♀️?♂️???♂️?♀️ |
|
2026-06-15 16:14:08 |
|
| 232499 |
40449678 |
1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा |
|
|
*?प्रणाम सादर जय जिनेन्द्र?*
*?करोड़ों अरबो रूपिया धर्म के पीछे खर्चा करने वाले ओ जैनो , एक वाइट पट्टी हम नहीं बचा पाये ? जरा सोचो, कल मंदिरो , उपाश्रय, भोजनशाला पर कोई क़ब्ज़ा कर लेगा ? तब हमारे पास कोई विकल्प है ? : हार्दिक हुंडिया...?*
*?देश में अरबो रूपिया का दान देने वाला जैन समाज अब सोचे ? समजे ? और कुछ परिवर्तन जीवन में लाये । दान सुपात्र को करे । रोड पे खिचड़ी घर द्वारा हज़ारो लोगो को खिचड़ी खिलाने वाले भाईओ अब सोचो हमारी खिचड़ी सुपात्र के पेट में जाती है या कुपात्र ? *दारू पी के , ड्रग का नसा करने वाले या काम धंधा ना करने वाले को खिचड़ी खिलाके कई पुण्य की जगह पाप तो नहीं कर रहे है ? ख़ुद अपने आप को सवाल करना ? यदि जवाब मिले की कुपात्र को जा रहा है तो खिचड़ी घर अभी से बंद कर देना और अब समय आ गया है हमे साधर्मिक भाइयो को मजबूत करने का ? *हार्दिक हुंडिया की चतुर्विध संघ से दो हाथ जोड़ के बिनती है की हम करोड़ो , अरबों रुपया धर्म के नाम मंदिरों , उपाश्रयों, धर्म शाला , भोजन शाला पे लगाने वाले अब थोड़ा रुक जाओ और सोचो हम करोड़ो रुपया जहाँ लगा रहे है वो क्या सही है ? बाद में इनको कौन सम्भालेगा ? जहाँ जरूरत हो वहाँ जरूर करे , लेकिन जहाँ जैनो की बस्ती नहीं है , वहाँ 108 देरी वाला मंदिर बना के करोड़ो का खर्चा कराने वाले साधु और खर्चा करने वाले श्रावक भी सोचे की एक वाइट पट्टी तो हम मुंबई में ना घाट कॉपर की सोसायटी में बचा सके , ना दादर आराधना भवन के बाहर की ! जो सफेद कलर की पट्टी पंच महाव्रत धारी महात्माओ , जो भयंकर गर्मी में नंगे पाव चलने वाले संतों की सुविधाओं के लिये भक्तों द्वारा बनाई गई । लेकिन कुछ लोगो को ये पसंद नहीं आया , वो आक्रमकता के साथ आकर उनके पर काली पट्टी लगा दी । अब उनको कोई प्रॉबलम नहीं है ? हार्दिक हुंडिया ने कहा है कि आज की परिस्थिति में हमे बहुत सोचना है , अब हमे कोई भी धर्म के प्रोजेक्ट या चातुर्मास के करोड़ो अरबो रूपिया खर्चा करने की जगह साधार्मिक भाईओ को मजबूत करना है ! आक्रामक बनाना है , धर्म के प्रति खुमारी भरनी है वरना आज सिर्फ वाइट पट्टी ना बचाने वाले कल सोचो कुछ और हो गया तो क्या करेंगे ? हार्दिक हुंडिया ने कहा *देश के श्रावकों जागो , ऐसे काम बंद करो जो हमारा खाये और हमारा ही खोदे ? एक मराठी परिवार में जन्मे लेकिन आज मराठी परिवार के जैन संत के वेश में संत निलेश चंद्र विजय जी की खुमारी को कोटि कोटि वंदन है । मराठी कुल में जन्मे साथ साथ जैनो धर्म के अनुआईओ गुजराती और मारवाड़ियो की बात महाराष्ट्र में बड़े गौरव के साथ रखने वाले संतों की अब जरूरत है। देश का वो जैन धर्म जिसने विश्व में एक अलग पहचान देश को दी है वो पवित्र जैन धर्म को जैन जिहाद कहने वाले पे कानूनी कार्यवाही करने वाले प्रवीण भाई छेड़ा जैसे राजनेताओं को जरूरत है देश के धर्मप्रेमीओ पहले हमे जागना है और फिर धर्म प्रेमियो को जगाना भी है , परमात्मा के साधु वेश में बैठकर सिर्फ धर्म के नाम धंधा करते है उनको संसार में भेजना है , अभी अभी 2 कुसाधुओ को संसार में भेज दिया है । दूसरा वो जो राज नेता ख़ुद के स्वार्थ के लिये जैन धर्म का शब्द का उपयोग करते है , लेकिन जैन धर्म के ख़िलाफ़ प्रचार करते है उनके सामने बोलने की जिनकी ताक़त नहीं है वो राज नेताओ को अब उनके घर बैठाने का समय आ गया है* *। जब जैन नेताओ ख़ुद जैनों के साथ खड़े नहीं है तो हम दूसरो से क्यों आशा रखें । सफेद पट्टी का विरोध करने वाले को सिर्फ़ सफेद कलर से तकलीफ़ है , उनको वहाँ लाल , पीला या काला कलर से तकलीफ़ नहीं है ? लेकिन उनको ये भी नहीं समझना है की सफेद कलर क्यों किया था ? लाल , पिला , काला कलर लगाने से भाई भाई का विरोध करके कौनसी बहादुरी कर ली ? हार्दिक हुंडिया ने कहा है की ये चातुर्मास में खर्चा कम करना , दिखावा बिलकुल मत करना यदि *प्रभु महावीर का क्षत्रियों का धर्म मजबूत करना है तो जैन शासन के प्रति खुमारी वाले शासन भक्तों को समाज के सामने लाना है ! साधर्मिक भाइयों को मजबूत करना है ये ही उच्च भावनाओ के साथ*
*✒️लेखक हार्दिक हुंडिया*
*आप का कल्याणी मित्र ।*
*?सिर्फ जैन समाज ग्रुप में भेजे?*
????????? |
|
2026-06-15 16:14:05 |
|