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226626 50892187 श्री जिनेन्द्र भक्तमण्डल ग्वालियर 2026-06-13 09:18:09
226624 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ ? श्रावक संहिता भाग-32 ?दान-6 अब आचार्य दान का उपदेश देते हैं— कान्तात्मजद्रविणमुख्यपदार्थसार्थप्रोत्थातिघोरघनमोहमहासमुद्रे। पोतायते गृहिणि सर्वगुणाधिकत्वाद्दानं परं परमसात्विक भावयुक्तम् ।।५।। ?अर्थ —स्त्री पुत्र धन आदिक जो मुख्य पदार्थों का समूह उससे उठा हुवा जो अत्यंत घोर तथा प्रचुर मोह उसके विशाल समुद्रस्वरूप इस ग्रहस्थाश्रम से पार होने के लिये परम सात्विक भाव से दिया हुवा तथा सर्वगुणों में अधिक ऐसा उत्कृष्ट दान ही जहाज स्वरूप है। ?भावार्थ — गृहस्थावस्था में धन कुटुम्बादिक से अधिक मोह रहता है इसलिये गृहस्थपना केवल संसार में डुबाने वाला है परन्तु उस गृहस्थपने में दान दिया जावे तो वह दिया हुआ दान मनुष्यों को संसाररूपी समुद्र में नहीं डूबने देता है इसलिये भव्यजीवों को सर्वगुणा में उत्कृष्ट दान देकर गृहस्थाश्रम को अवश्य सफल करना चाहिये।।५।। यह श्लोक गृहस्थाश्रम की सबसे बड़ी चुनौती और उसके समाधान का बहुत ही सटीक चित्रण करता है। आचार्य ने यहाँ 'मोह' को एक विशाल समुद्र और 'दान' को उसमें तैरते हुए एक सुदृढ़ जहाज (नाव) की उपमा दी है। इस श्लोक के गूढ़ उपदेशों को हम इन बिंदुओं में समझ सकते हैं: १. मोह का महासमुद्र (घोर मोह महासमुद्र)- गृहस्थ जीवन में व्यक्ति चारों ओर से आकर्षणों से घिरा रहता है: कान्ता (स्त्री), आत्मज (पुत्र) और द्रविण (धन): ये केवल रिश्ते या वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि ये मोह उत्पन्न करने वाले मुख्य केंद्र हैं। आचार्य इसे 'अतिघोर' और 'घन' (घना) कहते हैं, क्योंकि यह मोह इतना गहरा होता है कि व्यक्ति को मोक्ष या आत्म-कल्याण का मार्ग दिखाई ही नहीं देता। जैसे समुद्र में दिशा का ज्ञान नहीं रहता, वैसे ही मोही जीव संसार में भटकता रहता है। २. दान: पार लगाने वाला जहाज (पोतायते)- जैसे एक विशाल और भयानक समुद्र को बिना जहाज के पार करना असंभव है, वैसे ही गृहस्थाश्रम के मोह को बिना त्याग या दान के पार नहीं किया जा सकता। सार्थकता: धन और परिवार का होना आपको डुबा सकता है, लेकिन उसी धन का सदुपयोग (दान) आपको तैरना सिखा देता है। दान वह माध्यम है जो 'परिग्रह' (पकड़ने की वृत्ति) को 'विग्रह' (छोड़ने की वृत्ति) में बदल देता है। ३. दान की शर्त: परम सात्विक भाव- आचार्य स्पष्ट करते हैं कि हर प्रकार का दान जहाज नहीं बनता। केवल वही दान 'पोत' (जहाज) के समान है जो: परम सात्विक भावयुक्तम्: जो दान यश, नाम, प्रतिष्ठा या किसी सांसारिक बदले की भावना से न दिया गया हो। जिसमें केवल दया, करुणा और पात्र के प्रति भक्ति का भाव हो, वही सात्विक दान है। दिखावे के लिए दिया गया दान नाव की तरह भारी होकर खुद भी डूब सकता है। ४. सर्वगुणाधिकत्वात् (सभी गुणों में श्रेष्ठ)- गृहस्थ के अनेक धर्म हैं—स्वाध्याय, पूजन, संयम आदि। लेकिन गृहस्थाश्रम में दान को 'सर्वगुणों में अधिक' (श्रेष्ठ) माना गया है क्योंकि: यह सीधे तौर पर लोभ कषाय पर प्रहार करता है। यह परोपकार और स्व-कल्याण दोनों को एक साथ सिद्ध करता है। यह साधु संस्था और धर्म के अस्तित्व को बचाए रखने का आधार है। ५. भावार्थ का संदेश: गृहस्थपना सफल करना- भावार्थ में बहुत मार्मिक बात कही गई है कि "गृहस्थपना केवल संसार में डुबाने वाला है।" यह एक कड़वा सच है क्योंकि घर का अर्थ ही है मोह की सीमाओं में बंधना। किंतु, यदि कोई गृहस्थ दानशील है, तो वह घर में रहकर भी निर्लिप्त रह सकता है। निष्कर्ष: जैसे जल में नाव रहती तो है, पर वह जल को अपने भीतर नहीं आने देती, वैसे ही दानशील गृहस्थ संसार में रहता तो है, पर संसार (मोह) उसके भीतर नहीं समा पाता। प्रेरणा:- यह उपदेश हमें सिखाता है कि धन को केवल संचय करना उसे 'बोझ' बनाना है, और धन का दान करना उसे 'जहाज' बनाना है। अपने दुर्लभ जीवन को सफल करने के लिए सात्विक भाव से दान देना ही सबसे बुद्धिमानी का मार्ग है। ✋शुभाशीर्वाद आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति 2026-06-13 09:17:57
226623 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ ? श्रावक संहिता भाग-32 ?दान-6 अब आचार्य दान का उपदेश देते हैं— कान्तात्मजद्रविणमुख्यपदार्थसार्थप्रोत्थातिघोरघनमोहमहासमुद्रे। पोतायते गृहिणि सर्वगुणाधिकत्वाद्दानं परं परमसात्विक भावयुक्तम् ।।५।। ?अर्थ —स्त्री पुत्र धन आदिक जो मुख्य पदार्थों का समूह उससे उठा हुवा जो अत्यंत घोर तथा प्रचुर मोह उसके विशाल समुद्रस्वरूप इस ग्रहस्थाश्रम से पार होने के लिये परम सात्विक भाव से दिया हुवा तथा सर्वगुणों में अधिक ऐसा उत्कृष्ट दान ही जहाज स्वरूप है। ?भावार्थ — गृहस्थावस्था में धन कुटुम्बादिक से अधिक मोह रहता है इसलिये गृहस्थपना केवल संसार में डुबाने वाला है परन्तु उस गृहस्थपने में दान दिया जावे तो वह दिया हुआ दान मनुष्यों को संसाररूपी समुद्र में नहीं डूबने देता है इसलिये भव्यजीवों को सर्वगुणा में उत्कृष्ट दान देकर गृहस्थाश्रम को अवश्य सफल करना चाहिये।।५।। यह श्लोक गृहस्थाश्रम की सबसे बड़ी चुनौती और उसके समाधान का बहुत ही सटीक चित्रण करता है। आचार्य ने यहाँ 'मोह' को एक विशाल समुद्र और 'दान' को उसमें तैरते हुए एक सुदृढ़ जहाज (नाव) की उपमा दी है। इस श्लोक के गूढ़ उपदेशों को हम इन बिंदुओं में समझ सकते हैं: १. मोह का महासमुद्र (घोर मोह महासमुद्र)- गृहस्थ जीवन में व्यक्ति चारों ओर से आकर्षणों से घिरा रहता है: कान्ता (स्त्री), आत्मज (पुत्र) और द्रविण (धन): ये केवल रिश्ते या वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि ये मोह उत्पन्न करने वाले मुख्य केंद्र हैं। आचार्य इसे 'अतिघोर' और 'घन' (घना) कहते हैं, क्योंकि यह मोह इतना गहरा होता है कि व्यक्ति को मोक्ष या आत्म-कल्याण का मार्ग दिखाई ही नहीं देता। जैसे समुद्र में दिशा का ज्ञान नहीं रहता, वैसे ही मोही जीव संसार में भटकता रहता है। २. दान: पार लगाने वाला जहाज (पोतायते)- जैसे एक विशाल और भयानक समुद्र को बिना जहाज के पार करना असंभव है, वैसे ही गृहस्थाश्रम के मोह को बिना त्याग या दान के पार नहीं किया जा सकता। सार्थकता: धन और परिवार का होना आपको डुबा सकता है, लेकिन उसी धन का सदुपयोग (दान) आपको तैरना सिखा देता है। दान वह माध्यम है जो 'परिग्रह' (पकड़ने की वृत्ति) को 'विग्रह' (छोड़ने की वृत्ति) में बदल देता है। ३. दान की शर्त: परम सात्विक भाव- आचार्य स्पष्ट करते हैं कि हर प्रकार का दान जहाज नहीं बनता। केवल वही दान 'पोत' (जहाज) के समान है जो: परम सात्विक भावयुक्तम्: जो दान यश, नाम, प्रतिष्ठा या किसी सांसारिक बदले की भावना से न दिया गया हो। जिसमें केवल दया, करुणा और पात्र के प्रति भक्ति का भाव हो, वही सात्विक दान है। दिखावे के लिए दिया गया दान नाव की तरह भारी होकर खुद भी डूब सकता है। ४. सर्वगुणाधिकत्वात् (सभी गुणों में श्रेष्ठ)- गृहस्थ के अनेक धर्म हैं—स्वाध्याय, पूजन, संयम आदि। लेकिन गृहस्थाश्रम में दान को 'सर्वगुणों में अधिक' (श्रेष्ठ) माना गया है क्योंकि: यह सीधे तौर पर लोभ कषाय पर प्रहार करता है। यह परोपकार और स्व-कल्याण दोनों को एक साथ सिद्ध करता है। यह साधु संस्था और धर्म के अस्तित्व को बचाए रखने का आधार है। ५. भावार्थ का संदेश: गृहस्थपना सफल करना- भावार्थ में बहुत मार्मिक बात कही गई है कि "गृहस्थपना केवल संसार में डुबाने वाला है।" यह एक कड़वा सच है क्योंकि घर का अर्थ ही है मोह की सीमाओं में बंधना। किंतु, यदि कोई गृहस्थ दानशील है, तो वह घर में रहकर भी निर्लिप्त रह सकता है। निष्कर्ष: जैसे जल में नाव रहती तो है, पर वह जल को अपने भीतर नहीं आने देती, वैसे ही दानशील गृहस्थ संसार में रहता तो है, पर संसार (मोह) उसके भीतर नहीं समा पाता। प्रेरणा:- यह उपदेश हमें सिखाता है कि धन को केवल संचय करना उसे 'बोझ' बनाना है, और धन का दान करना उसे 'जहाज' बनाना है। अपने दुर्लभ जीवन को सफल करने के लिए सात्विक भाव से दान देना ही सबसे बुद्धिमानी का मार्ग है। ✋शुभाशीर्वाद आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति 2026-06-13 09:17:56
226622 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ ?(22 ) महिलाओं के द्वारा भगवान का पंचामृत अभिषेक भाग-22 श्रुत-परम्पराः 'कुन्दकुन्द' गुरु 'अंचलिका' में, लिखते देव, 'सपरिवारा*", [णंदीसर-भति-अंचलिका"] 'देवा देवी-सहिदा' जानो, 'तिलोय-पण्णत्ती' द्वारा । [ति.प. ८.५८१-५८३] मूल-संघ में न्हवन नारियाँ, 'प्रभावती', 'श्रीमती**' करे, (आ.पु. ४६.१६८-१६९, १७.२७१-२७७] 'पद्म' और 'हरिवंश' कथा में, 'शची" आदि भी न्हवन करे ॥ ॥ [प.पु.३.१८४-१८७*ह.पु.८.१७१-१८४,३८.५४] इन पंक्तियों ने श्रुत-परम्परा (Aagam Tradition) के उन ठोस आधारों को प्रस्तुत किया है, जिन्हें चाहकर भी झुठलाया नहीं जा सकता। आचार्य कुन्दकुन्द, आचार्य यतिवृषभ (तिलोय-पण्णत्ती) और आचार्य जिनसेन (आदिपुराण) जैसे महानतम आचार्यों के ग्रंथों का उद्धरण देकर यह सिद्ध कर दिया है कि दिगंबर जैन परंपरा में महिलाओं का अभिषेक करना पूर्णतः शास्त्र-सम्मत है। यहाँ उद्धृत शास्त्रों का विस्तृत और तार्किक विश्लेषण है: 1. आचार्य कुन्दकुन्द और 'सपरिवारा' (णंदीसर-भत्ति) 'कुन्दकुन्द' गुरु 'अंचलिका' में, लिखते देव, 'सपरिवारा' [णंदीसर-भत्ति-अंचलिका] जैन धर्म के प्राण कहे जाने वाले आचार्य कुन्दकुन्द ने अपनी भक्ति रचनाओं में स्पष्ट किया है कि जब देव नंदीश्वर द्वीप में भगवान की वंदना और अभिषेक के लिए जाते हैं, तो वे 'सपरिवारा' (अपने पूरे परिवार और देवांगनाओं सहित) जाते हैं। तर्क: यदि देवांगनाओं के साथ अभिषेक करना अशुद्ध या पाप होता, तो आचार्य कुन्दकुन्द जैसे महान दिगंबर मुनि इसका उल्लेख 'भक्ति' में कभी नहीं करते। 2. तिलोय-पण्णत्ती: 'देवा देवी-सहिदा' 'देवा देवी-सहिदा' जानो, 'तिलोय-पण्णत्ती' द्वारा। [ति.प. ८.५८१-५८३] आचार्य यतिवृषभ द्वारा रचित 'तिलोय-पण्णत्ती' जैन भूगोल और व्यवस्था का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि देव और देवियाँ मिलकर भगवान का अभिषेक करते हैं। तर्क: सुमेरु पर्वत पर जब जन्माभिषेक होता है, तब भी इंद्र के साथ इंद्राणी की मुख्य भूमिका होती है। यदि स्वर्ग की स्त्रियाँ (देवियाँ) अभिषेक कर सकती हैं, तो इस पृथ्वी की श्राविकाएं (जो संयम और व्रत पालती हैं) अयोग्य कैसे हो सकती हैं? 3. मूल-संघ और महापुराण के प्रमाण- मूल-संघ में न्हवन नारियाँ, 'प्रभावती', 'श्रीमती' करे, आचार्य जिनसेन द्वारा रचित आदिपुराण (महापुराण) दिगंबर जैन समाज का आधारभूत ग्रंथ है। प्रभावती और श्रीमती: इसमें स्पष्ट वर्णन है कि सम्राट भरत की रानियों और राजा वज्रजंघ की रानी श्रीमती ने भगवान का अभिषेक (न्हवन) किया। आगम की मुहर: आदिपुराण के ४६वें और १७वें पर्व के श्लोक संख्या १६८-१६९ और २७१-२७७ इस सत्य के साक्षात गवाह हैं। जब 'मूल-संघ' के आचार्य इन प्रसंगों को गौरव के साथ लिखते हैं, तो वर्तमान में इसे 'अशुद्ध' कहना शास्त्रों की अवहेलना है। 4. पद्म और हरिवंश पुराण: 'शची' (इन्द्राणी) का अभिषेक 'पद्म' और 'हरिवंश' कथा में, 'शची' आदि भी न्हवन करे ॥ शची (इन्द्राणी): इन्द्र की पत्नी शची का अभिषेक में शामिल होना हर बड़े धार्मिक उत्सव का हिस्सा है। पद्मपुराण और हरिवंशपुराण: इन ग्रंथों के उद्धरण (प.पु. ३.१८४-१८७ और ह.पु. ८.१७१-१८४) यह बताते हैं कि अभिषेक की क्रिया में महिलाओं की भागीदारी केवल 'दर्शन' तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे 'न्हवन' (स्नान/अभिषेक) की क्रिया में भी सक्रिय थीं। निष्कर्ष और वर्तमान परिप्रेक्ष्य- ये पंक्तियाँ दिगंबर जैन समाज के सामने चार महास्तंभ (Four Pillars) खड़ी करती हैं: आचार्य परम्परा: कुन्दकुन्द स्वामी का समर्थन। प्राचीन भूगोल: तिलोय-पण्णत्ती के प्रमाण। पुराण साहित्य: आदिपुराण और पद्मपुराण के प्रसंग। ऐतिहासिक निरंतरता: प्रभावती और श्रीमती जैसी महान नारियों के उदाहरण। संवैधानिक और तार्किक संगम:- जैसा कि पहले भारतीय संविधान के अनुच्छेद २५ और २६ का उल्लेख किया था, ये शास्त्र इस बात का "न्यायिक साक्ष्य" हैं कि महिलाओं का अभिषेक करना जैन धर्म की "Essential Religious Practice" (अनिवार्य धार्मिक प्रथा) का हिस्सा है। यह श्रंखला सिद्ध करती है कि "महिला अभिषेक" कोई आधुनिक आंदोलन नहीं है, बल्कि यह उस मूल दिगंबर परंपरा की पुनर्स्थापना है जिसे कालांतर में सामाजिक रूढ़ियों ने ढक दिया था। जो अधिकार 'इन्द्राणी' को सुमेरु पर्वत पर है, और जो अधिकार 'प्रभावती' को आदिपुराण में है, वही अधिकार आज की हर उस श्राविका को है जो 'शुचिता' और 'भक्ति' के साथ भगवान के चरणों में समर्पित है। ✋शुभाशीर्वाद आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति 2026-06-13 09:17:54
226621 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ ?(22 ) महिलाओं के द्वारा भगवान का पंचामृत अभिषेक भाग-22 श्रुत-परम्पराः 'कुन्दकुन्द' गुरु 'अंचलिका' में, लिखते देव, 'सपरिवारा*", [णंदीसर-भति-अंचलिका"] 'देवा देवी-सहिदा' जानो, 'तिलोय-पण्णत्ती' द्वारा । [ति.प. ८.५८१-५८३] मूल-संघ में न्हवन नारियाँ, 'प्रभावती', 'श्रीमती**' करे, (आ.पु. ४६.१६८-१६९, १७.२७१-२७७] 'पद्म' और 'हरिवंश' कथा में, 'शची" आदि भी न्हवन करे ॥ ॥ [प.पु.३.१८४-१८७*ह.पु.८.१७१-१८४,३८.५४] इन पंक्तियों ने श्रुत-परम्परा (Aagam Tradition) के उन ठोस आधारों को प्रस्तुत किया है, जिन्हें चाहकर भी झुठलाया नहीं जा सकता। आचार्य कुन्दकुन्द, आचार्य यतिवृषभ (तिलोय-पण्णत्ती) और आचार्य जिनसेन (आदिपुराण) जैसे महानतम आचार्यों के ग्रंथों का उद्धरण देकर यह सिद्ध कर दिया है कि दिगंबर जैन परंपरा में महिलाओं का अभिषेक करना पूर्णतः शास्त्र-सम्मत है। यहाँ उद्धृत शास्त्रों का विस्तृत और तार्किक विश्लेषण है: 1. आचार्य कुन्दकुन्द और 'सपरिवारा' (णंदीसर-भत्ति) 'कुन्दकुन्द' गुरु 'अंचलिका' में, लिखते देव, 'सपरिवारा' [णंदीसर-भत्ति-अंचलिका] जैन धर्म के प्राण कहे जाने वाले आचार्य कुन्दकुन्द ने अपनी भक्ति रचनाओं में स्पष्ट किया है कि जब देव नंदीश्वर द्वीप में भगवान की वंदना और अभिषेक के लिए जाते हैं, तो वे 'सपरिवारा' (अपने पूरे परिवार और देवांगनाओं सहित) जाते हैं। तर्क: यदि देवांगनाओं के साथ अभिषेक करना अशुद्ध या पाप होता, तो आचार्य कुन्दकुन्द जैसे महान दिगंबर मुनि इसका उल्लेख 'भक्ति' में कभी नहीं करते। 2. तिलोय-पण्णत्ती: 'देवा देवी-सहिदा' 'देवा देवी-सहिदा' जानो, 'तिलोय-पण्णत्ती' द्वारा। [ति.प. ८.५८१-५८३] आचार्य यतिवृषभ द्वारा रचित 'तिलोय-पण्णत्ती' जैन भूगोल और व्यवस्था का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि देव और देवियाँ मिलकर भगवान का अभिषेक करते हैं। तर्क: सुमेरु पर्वत पर जब जन्माभिषेक होता है, तब भी इंद्र के साथ इंद्राणी की मुख्य भूमिका होती है। यदि स्वर्ग की स्त्रियाँ (देवियाँ) अभिषेक कर सकती हैं, तो इस पृथ्वी की श्राविकाएं (जो संयम और व्रत पालती हैं) अयोग्य कैसे हो सकती हैं? 3. मूल-संघ और महापुराण के प्रमाण- मूल-संघ में न्हवन नारियाँ, 'प्रभावती', 'श्रीमती' करे, आचार्य जिनसेन द्वारा रचित आदिपुराण (महापुराण) दिगंबर जैन समाज का आधारभूत ग्रंथ है। प्रभावती और श्रीमती: इसमें स्पष्ट वर्णन है कि सम्राट भरत की रानियों और राजा वज्रजंघ की रानी श्रीमती ने भगवान का अभिषेक (न्हवन) किया। आगम की मुहर: आदिपुराण के ४६वें और १७वें पर्व के श्लोक संख्या १६८-१६९ और २७१-२७७ इस सत्य के साक्षात गवाह हैं। जब 'मूल-संघ' के आचार्य इन प्रसंगों को गौरव के साथ लिखते हैं, तो वर्तमान में इसे 'अशुद्ध' कहना शास्त्रों की अवहेलना है। 4. पद्म और हरिवंश पुराण: 'शची' (इन्द्राणी) का अभिषेक 'पद्म' और 'हरिवंश' कथा में, 'शची' आदि भी न्हवन करे ॥ शची (इन्द्राणी): इन्द्र की पत्नी शची का अभिषेक में शामिल होना हर बड़े धार्मिक उत्सव का हिस्सा है। पद्मपुराण और हरिवंशपुराण: इन ग्रंथों के उद्धरण (प.पु. ३.१८४-१८७ और ह.पु. ८.१७१-१८४) यह बताते हैं कि अभिषेक की क्रिया में महिलाओं की भागीदारी केवल 'दर्शन' तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे 'न्हवन' (स्नान/अभिषेक) की क्रिया में भी सक्रिय थीं। निष्कर्ष और वर्तमान परिप्रेक्ष्य- ये पंक्तियाँ दिगंबर जैन समाज के सामने चार महास्तंभ (Four Pillars) खड़ी करती हैं: आचार्य परम्परा: कुन्दकुन्द स्वामी का समर्थन। प्राचीन भूगोल: तिलोय-पण्णत्ती के प्रमाण। पुराण साहित्य: आदिपुराण और पद्मपुराण के प्रसंग। ऐतिहासिक निरंतरता: प्रभावती और श्रीमती जैसी महान नारियों के उदाहरण। संवैधानिक और तार्किक संगम:- जैसा कि पहले भारतीय संविधान के अनुच्छेद २५ और २६ का उल्लेख किया था, ये शास्त्र इस बात का "न्यायिक साक्ष्य" हैं कि महिलाओं का अभिषेक करना जैन धर्म की "Essential Religious Practice" (अनिवार्य धार्मिक प्रथा) का हिस्सा है। यह श्रंखला सिद्ध करती है कि "महिला अभिषेक" कोई आधुनिक आंदोलन नहीं है, बल्कि यह उस मूल दिगंबर परंपरा की पुनर्स्थापना है जिसे कालांतर में सामाजिक रूढ़ियों ने ढक दिया था। जो अधिकार 'इन्द्राणी' को सुमेरु पर्वत पर है, और जो अधिकार 'प्रभावती' को आदिपुराण में है, वही अधिकार आज की हर उस श्राविका को है जो 'शुचिता' और 'भक्ति' के साथ भगवान के चरणों में समर्पित है। ✋शुभाशीर्वाद आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति 2026-06-13 09:17:53
226619 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ 2026-06-13 09:17:00
226620 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ 2026-06-13 09:17:00
226617 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ 2026-06-13 09:16:58
226618 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ 2026-06-13 09:16:58
226616 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ ?Wandami Mataji ? 2026-06-13 09:16:56