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68354 40449679 ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಜೈನಧರ್ಮ 2 Book your seats Soon...Only few seats are left.. 2026-04-06 08:10:15
68353 40449679 ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಜೈನಧರ್ಮ 2 Book your seats Soon...Only few seats are left.. 2026-04-06 08:10:14
68352 40449670 SRI DIGAMBER JN SAMAJ BANGALORE Book your seats Soon...Only few seats are left.. 2026-04-06 08:10:13
68351 40449670 SRI DIGAMBER JN SAMAJ BANGALORE Book your seats Soon...Only few seats are left.. 2026-04-06 08:10:13
68350 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *गुरुजी इन पंक्तियों के माध्यम से बता रहे हैं कि यह अनाज सेहत के लिए सबसे पौष्टिक और शक्तिदायक अनाज है।* *यह न केवल शरीर को ऊर्जा देता है बल्कि स्फूर्ति भी बनाए रखता है।* *? आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज* ?<a href="https://chat.whatsapp.com/IDhMqH9yzHk8VrUhq2eR1A?mode=gi_t" target="_blank">https://chat.whatsapp.com/IDhMqH9yzHk8VrUhq2eR1A?mode=gi_t</a> *?️ भारत: प्रतिभारत: ??* 2026-04-06 08:08:27
68349 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *गुरुजी इन पंक्तियों के माध्यम से बता रहे हैं कि यह अनाज सेहत के लिए सबसे पौष्टिक और शक्तिदायक अनाज है।* *यह न केवल शरीर को ऊर्जा देता है बल्कि स्फूर्ति भी बनाए रखता है।* *? आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज* ?<a href="https://chat.whatsapp.com/IDhMqH9yzHk8VrUhq2eR1A?mode=gi_t" target="_blank">https://chat.whatsapp.com/IDhMqH9yzHk8VrUhq2eR1A?mode=gi_t</a> *?️ भारत: प्रतिभारत: ??* 2026-04-06 08:08:26
68348 40449749 जिनोदय?JINODAYA *“जैन धर्म बिकाऊ है” — कड़वा व्यंग नहीं, एक भयावह सच्चाई की दस्तक* “जैन धर्म बिकाऊ है, उचित बोली लगाओ”—यह वाक्य सुनते ही आत्मा कांप उठती है। लेकिन क्या यह केवल एक अतिशयोक्ति है? या फिर यह हमारे वर्तमान धार्मिक आचरण का नग्न सत्य बन चुका है? अगर हम ईमानदारी से अपने चारों ओर हो रहे धार्मिक आयोजनों, व्यवस्थाओं और व्यवहारों को देखें, तो यह वाक्य अब केवल व्यंग नहीं रहा—यह एक चेतावनी बन गया है। जिस जैन धर्म ने संसार को अहिंसा, अपरिग्रह, संयम और आत्मशुद्धि का सर्वोच्च संदेश दिया, वही धर्म आज कई स्थानों पर दिखावे, प्रतिस्पर्धा और आर्थिक लेन-देन की चकाचौंध में उलझता दिखाई दे रहा है। धर्म, जो आत्मा को मुक्त करने का साधन था, वह धीरे-धीरे प्रतिष्ठा और प्रभाव का माध्यम बनता जा रहा है। आज चातुर्मास की घोषणाएं हों, प्रतिष्ठा महोत्सव हों, या बड़े-बड़े धार्मिक आयोजन—कई जगहों पर यह चर्चा आम हो चुकी है कि कौन सा आयोजन कितना भव्य है, किसने कितना खर्च किया, किसका नाम कितना उभरा। श्रद्धा पीछे छूटती जा रही है और दिखावा आगे बढ़ता जा रहा है। जहां पहले त्याग की महिमा थी, वहां अब “प्रदर्शन” की प्रतिस्पर्धा है। सबसे अधिक चिंताजनक पक्ष यह है कि इस पूरे परिदृश्य में साधु-संतों की छवि भी प्रश्नों के घेरे में आ गई है। जिनका जीवन पूर्ण त्याग, निर्लिप्तता और आत्मसाधना का प्रतीक होना चाहिए, यदि वे कहीं न कहीं ऐसे आयोजनों और व्यवस्थाओं से जुड़े दिखाई देते हैं जहां धन, प्रभाव और सुविधा की भूमिका बढ़ जाती है, तो समाज का विश्वास डगमगाने लगता है। यही कारण है कि आज यह कठोर वाक्य सुनने को मिलता है कि “वर्तमान में ज्यादातर जैन साधु धर्म के व्यापारी बनते जा रहे हैं।” यह आरोप भले ही अत्यंत तीखा और असहज करने वाला हो, लेकिन यह यूं ही पैदा नहीं हुआ है। यह उन अनुभवों, उन घटनाओं और उस पीड़ा का परिणाम है जो समाज के भीतर लगातार जमा होती रही है। हमें यह समझना होगा कि धर्म कभी भी बिकाऊ नहीं होता—परंतु जब धर्म के नाम पर निर्णय, व्यवस्थाएं और प्राथमिकताएं धन और प्रभाव से प्रभावित होने लगती हैं, तो वह “बिकने” का भ्रम पैदा करता है। और यही भ्रम धीरे-धीरे विश्वास को खत्म कर देता है। यह भी उतना ही सत्य है कि आज भी अनेक सच्चे साधु-संत इस परंपरा की मर्यादा को पूर्ण निष्ठा से निभा रहे हैं। वे न किसी लोभ में हैं, न किसी प्रभाव में—वे केवल आत्मकल्याण और लोकमंगल के मार्ग पर अग्रसर हैं। लेकिन कुछ अपवाद, कुछ विचलन, पूरे समाज की छवि को धूमिल कर देते हैं। आज आवश्यकता है एक कठोर आत्ममंथन की। हमें यह तय करना होगा कि हम धर्म को “जीने” आए हैं या “दिखाने”। हमें यह भी साहस जुटाना होगा कि जहां भी धर्म के नाम पर व्यापार, दिखावा या अनुचित प्रभाव दिखे, वहां आवाज उठाई जाए—चाहे वह कितना ही असुविधाजनक क्यों न हो। अगर हम आज भी नहीं चेते, तो वह दिन दूर नहीं जब आने वाली पीढ़ियां धर्म को आस्था नहीं, बल्कि एक “इवेंट” या “प्रदर्शन” के रूप में देखने लगेंगी। और तब “जैन धर्म बिकाऊ है” केवल एक व्यंग नहीं रहेगा, बल्कि हमारी सबसे बड़ी असफलता का प्रमाण बन जाएगा। धर्म की रक्षा शास्त्रों से नहीं, आचरण से होती है। और यदि आचरण गिर गया, तो कोई भी परंपरा अपनी पवित्रता नहीं बचा सकती। अब निर्णय हमें करना है—हम धर्म को ऊंचाई पर ले जाएंगे या उसे बाजार में खड़ा होने देंगे। — नितिन जैन संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा) जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल मोबाइल: 9215635871 2026-04-06 08:07:33
68345 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-04-06 08:07:32
68346 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-04-06 08:07:32
68347 40449749 जिनोदय?JINODAYA *“जैन धर्म बिकाऊ है” — कड़वा व्यंग नहीं, एक भयावह सच्चाई की दस्तक* “जैन धर्म बिकाऊ है, उचित बोली लगाओ”—यह वाक्य सुनते ही आत्मा कांप उठती है। लेकिन क्या यह केवल एक अतिशयोक्ति है? या फिर यह हमारे वर्तमान धार्मिक आचरण का नग्न सत्य बन चुका है? अगर हम ईमानदारी से अपने चारों ओर हो रहे धार्मिक आयोजनों, व्यवस्थाओं और व्यवहारों को देखें, तो यह वाक्य अब केवल व्यंग नहीं रहा—यह एक चेतावनी बन गया है। जिस जैन धर्म ने संसार को अहिंसा, अपरिग्रह, संयम और आत्मशुद्धि का सर्वोच्च संदेश दिया, वही धर्म आज कई स्थानों पर दिखावे, प्रतिस्पर्धा और आर्थिक लेन-देन की चकाचौंध में उलझता दिखाई दे रहा है। धर्म, जो आत्मा को मुक्त करने का साधन था, वह धीरे-धीरे प्रतिष्ठा और प्रभाव का माध्यम बनता जा रहा है। आज चातुर्मास की घोषणाएं हों, प्रतिष्ठा महोत्सव हों, या बड़े-बड़े धार्मिक आयोजन—कई जगहों पर यह चर्चा आम हो चुकी है कि कौन सा आयोजन कितना भव्य है, किसने कितना खर्च किया, किसका नाम कितना उभरा। श्रद्धा पीछे छूटती जा रही है और दिखावा आगे बढ़ता जा रहा है। जहां पहले त्याग की महिमा थी, वहां अब “प्रदर्शन” की प्रतिस्पर्धा है। सबसे अधिक चिंताजनक पक्ष यह है कि इस पूरे परिदृश्य में साधु-संतों की छवि भी प्रश्नों के घेरे में आ गई है। जिनका जीवन पूर्ण त्याग, निर्लिप्तता और आत्मसाधना का प्रतीक होना चाहिए, यदि वे कहीं न कहीं ऐसे आयोजनों और व्यवस्थाओं से जुड़े दिखाई देते हैं जहां धन, प्रभाव और सुविधा की भूमिका बढ़ जाती है, तो समाज का विश्वास डगमगाने लगता है। यही कारण है कि आज यह कठोर वाक्य सुनने को मिलता है कि “वर्तमान में ज्यादातर जैन साधु धर्म के व्यापारी बनते जा रहे हैं।” यह आरोप भले ही अत्यंत तीखा और असहज करने वाला हो, लेकिन यह यूं ही पैदा नहीं हुआ है। यह उन अनुभवों, उन घटनाओं और उस पीड़ा का परिणाम है जो समाज के भीतर लगातार जमा होती रही है। हमें यह समझना होगा कि धर्म कभी भी बिकाऊ नहीं होता—परंतु जब धर्म के नाम पर निर्णय, व्यवस्थाएं और प्राथमिकताएं धन और प्रभाव से प्रभावित होने लगती हैं, तो वह “बिकने” का भ्रम पैदा करता है। और यही भ्रम धीरे-धीरे विश्वास को खत्म कर देता है। यह भी उतना ही सत्य है कि आज भी अनेक सच्चे साधु-संत इस परंपरा की मर्यादा को पूर्ण निष्ठा से निभा रहे हैं। वे न किसी लोभ में हैं, न किसी प्रभाव में—वे केवल आत्मकल्याण और लोकमंगल के मार्ग पर अग्रसर हैं। लेकिन कुछ अपवाद, कुछ विचलन, पूरे समाज की छवि को धूमिल कर देते हैं। आज आवश्यकता है एक कठोर आत्ममंथन की। हमें यह तय करना होगा कि हम धर्म को “जीने” आए हैं या “दिखाने”। हमें यह भी साहस जुटाना होगा कि जहां भी धर्म के नाम पर व्यापार, दिखावा या अनुचित प्रभाव दिखे, वहां आवाज उठाई जाए—चाहे वह कितना ही असुविधाजनक क्यों न हो। अगर हम आज भी नहीं चेते, तो वह दिन दूर नहीं जब आने वाली पीढ़ियां धर्म को आस्था नहीं, बल्कि एक “इवेंट” या “प्रदर्शन” के रूप में देखने लगेंगी। और तब “जैन धर्म बिकाऊ है” केवल एक व्यंग नहीं रहेगा, बल्कि हमारी सबसे बड़ी असफलता का प्रमाण बन जाएगा। धर्म की रक्षा शास्त्रों से नहीं, आचरण से होती है। और यदि आचरण गिर गया, तो कोई भी परंपरा अपनी पवित्रता नहीं बचा सकती। अब निर्णय हमें करना है—हम धर्म को ऊंचाई पर ले जाएंगे या उसे बाजार में खड़ा होने देंगे। — नितिन जैन संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा) जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल मोबाइल: 9215635871 2026-04-06 08:07:32