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8336 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म ╔══════════════════════════════╗ *?✨ ॥ श्री तीर्थंकराय नम ॥ ✨?* ╚══════════════════════════════╝ ?️? *प्रथमानुयोग* ??️ ╭────────────────────────────╮ *?? सोलह कारण भावना – 78 ??* *?? 13 .प्रवचन भक्ति भावना ??* ╰────────────────────────────╯ ✨ *? स्वर्णिम लिंक ?* <a href="https://quizzory.in/id/69951e092aabb6d2b9a65eff" target="_blank">https://quizzory.in/id/69951e092aabb6d2b9a65eff</a> *? विशेष घोषणा ?* कथा में आए सभी प्रश्नों का समाधान ? दिए गए लिंक के माध्यम से ⏳ केवल 24 घंटे में प्राप्त करें। ✨━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━✨ *प्रवचन भक्ती* हमें बारह अंग और उपांगो वाले सच्चे आगम की निरंतर भक्ति करना चाहिए । चार अनुयोग का भली प्रकार स्वाध्याय करना चाहिए । जो प्रवचन भक्ति करता है वह ज्ञान के परम अलौकिक आनंद को प्राप्त करता है आप्त कथित आगम का जो स्वाध्याय करता है उसको सम्यक ज्ञान की प्राप्ति होती है । वचन और प्रवचन में बड़ा ही अंतर है वचन सामान्य बोलने वाले शब्द हैं और प्रवचन आत्मिक ज्ञान है आत्मा से है । आगम अध्ययन बिना मनुष्य इसी जन्म में पशु के समान है । मेरा शास्त्र के अभ्यास में जो दिन जाता है वह धन्य है परमागम के अभ्यास बिना हमारा जो समय जाता है वह वृथा है । स्वाध्याय बिना शुभ ध्यान नहीं होता है शास्त्र के अभ्यास के बिना पाप से नहीं छूटता है कषायों की मंदता नहीं होती है शास्त्र सेवन के बिना संसार शरीर और भोगों से वैराग्य उत्पन्न नहीं होता है ।इसलिए शास्त्र के अर्थ का ही सेवन करो । बंधुओ अपनी आत्मा को प्रतिदिन,नित्य ज्ञान दान प्रदान करो ,अपनी संतान और शिष्यों को ज्ञान दान ही करो क्योंकि ज्ञान दान देने के समान अन्य कोई दान नहीं है यह दान जितना दोगे उतना बढ़ेगा । *चार सूरदास* ???? एक गाँव में चार अंधे बड़े ही गुणवान और परस्पर में मित्र थे। चारों मित्र काम की तलाश में घूमते हुए एक राज्य में पहुँच गये। राजा ने पूछा तुम लोग क्या काम कर सकते हो? तब उन्होंने कहा कि महाराज! हम चारों में एक अश्व परीक्षक, दूसरा रत्न परीक्षक, तीसरा स्त्री परीक्षक और चौथा पुरुष परीक्षक है। तब राजा ने उनके गुणों को जानकर प्रत्येक को एक सेर आटा, एक छटांक दाल, एक तोला घी और एक तोला मसाला प्रतिदिन देने की आज्ञा दे दी और राज्य की सेवा में रख लिया। अब चारों सूरदास आनन्द मनाते उस देश में रहने लगे। संयोग से एक जौहरी बहुमूल्य रत्न बेचने आया तब राजा ने रत्न परीक्षक से रत्नों की परीक्षा करने को कहा। रत्न परीक्षक ने मूल्यांकन के आधार पर रत्नों का बंटवारा कर दिया। राजा ने उससे पूछा कि सत्यता कैसे आँकी तब उसने कहा जो असली रत्न है वे चोट पड़ने पर नहीं टूटेंगे तथा नकली रत्न टूट जायेंगे। परीक्षण किया गया तो सत्य पाने पर राजा ने उस रत्न परीक्षक सूरदास की घी की मात्रा बढ़ा दी। इसी प्रकार एक घोड़ों का व्यापारी घोड़े बेचने आया तब राजा ने अश्व परीक्षक से घोड़े पहचानने के लिए कहा। परीक्षक ने एक घोड़ा अलग किया और कहा कि यह घोड़ा पानी में प्रवेश करते ही बैठ जायेगा तब उस घोड़े को जल में प्रवेश कराया तो घोड़ा जल में प्रवेश करते ही बैठ गया। राजा ने पूछा तुमने कैसे अनुमान लगाया तो परीक्षक बोला मैंने घोड़े की नाड़ियाँ और अंगों को टटोलकर देखा तो मुझे इसके पेट की एक नस ऐसी मिली जो सामान्य से अधिक मोटी थी तब मैंने अनुमान लगाया कि इतनी मोटी नस तो भैंस की पायी जाती है। इस प्रकार अनुमान लगाया कि इस घोड़े की माँ ने भैंस का दूध पिया है जिसकी गर्मी का अंश इस घोड़े में भी आ गया है। इस प्रकार राजा ने प्रसन्न होकर इस सूरदास को भी घी की मात्रा बढ़ा दी। कुछ समय बाद राजा ने स्त्री परीक्षक से रानी की परीक्षा करवाई। तब वह बोला हे राजन्! तुम्हारी रानी क्षत्राणी नहीं है अर्थात् रानी की माता पिता एक वर्ण के नहीं है अथवा यदि पिता क्षत्रिय है तो माता कोई और है। तब राजा ने कहा तुमने कैसे जाना? तब सूरदास बोला मैंने उसके चलने, उठने, बैठने की आवाज सुनकर अनुमान लगाया कि इसकी क्रियाएं क्षत्राणी से मेल नहीं खाती। तब राजा रानी के पास पहुँचा और प्रश्न किया कि तुम अपनी वास्तविकता सही-सही बयान कर दो इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं तुम्हें मैं कोई दण्ड नहीं दूँगा। तब रानी ने कहा कि मैंने बांदी की कोख से जन्म लिया है। जिस कन्या से आपका विवाह होना था वह ठीक विवाह के समय मृत्यु को प्राप्त हो गयी। तब उसकी मृत्यु की बात छिपाकर आपका विवाह मेरे साथ कर दिया गया। तब राजा ने सारी बात शान्तिपूर्वक सुनी और दरबार में जाकर उस सूरदास के घी की मात्रा भी बढ़ा दी। अन्त में पुरुष परीक्षक से अपने बारे में पूछा तब वह बोला हे राजन्! आप परीक्षा न करवायें तो अच्छा है। अगर आप नहीं मानते तो जितना मैं बताऊँ उसी पर संतोष कर लेना। वैसे तो मैंने आपका परीक्षण पहले ही कर लिया था।इसके बाद परीक्षक ने परीक्षण करके कहा कि आपके अन्दर बनियों जैसा स्वभाव है।यह मैंने इस प्रकार जाना की आप हर बार इनाम में हल्का सा घी बढ़ा देते हो यह बनियों का गुण है यदि आप राजा होते तो इनाम में हीरे मोती आदि देते ।इतना सुनकर राजा के मन में उथल-पुथल मचने लगी। राजा अपने मन में विचार करने लगा कि सच है अग्नि, जल, नदी, सर्प, सिंह और स्त्री, जुआरी, चोर और जार (पर स्त्रीगामी) आदि कुटिल स्वभाव वालों का क्या विश्वास? यह विचारता राजा राजमाता के पास पहुँचा और बड़ी नम्रता से पूछा कि माता भविष्य बड़ा बलवान है। समय की चपेट में बड़े-बड़े बलवान, देव, चक्रवर्ती आदि भी आ जाते हैं। यदि इसी प्रकार आप भी किसी चपेट में आ गई हों तो कोई असम्भव नहीं। सच-सच बयान करना कि मेरे स्वभाव में क्षत्रियोचित गुण क्यों नहीं है? राजमाता ने कहा कि हे पुत्र! एक दिन मैं छत पर बैठी श्रृंगार कर रही थी उसी समय कल्याणराय सेठ अपनी छत पर बैठा हुआ सुन्दर रागिनी गा रहा था। अचानक उससे मेरी नजर टकरा गई। समय पाकर दुर्भावना ने जन्म लिया और उसी रात्रि तू मेरे गर्भ में आया हो सकता है। इस प्रकार आई दुर्भावना का असर तेरे ऊपर पड़ गया हो। मुझ पर विश्वास करो इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इस प्रकार राजा सभी बातों की जानकारी हासिल कर दरबार में आया और इस पुरुष परीक्षक सूरदास का वेतन भी बढ़ा दिया और चारों सूरदास आनन्द से राजा के दरबार में रहने लगे। उन चारों ने भली भांति अपनी विद्या ग्रहण की थी, यही कारण रहा कि राजा के परीक्षा करने पर वे खरे उतरे। हमें भी शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए, अधूरा नहीं। *बन्धुओ, इस प्रकार मात्र छोटी-छोटी घटनाएं अगर जीवन में परिवर्तन ला सकती हैं तो जिन वाणी माता की भक्ति हमें अवश्य जन्म-मरण रूपी दुःख से हमेशा-हमेशा के लिए छुटकारा दिला सकती है और जिनवाणी माता की भक्ति ही प्रवचन भक्ति भावना कहलाती है। इसलिए यदि जन्म-जरा-मृत्यु रूपी रोगों से छुटकारा पाना चाहते हो तो जिनवाणी माता की विनयपूर्वक भक्ति करके अपना नर जीवन सफल बनावें।* ?══════════════════════? ? *संकलन एवं प्रस्तुति* ? *✍? पं. मुकेश शास्त्री* *? सुसनेर* *? 9425935221* *? 18 फरवरी 2026* ╔══════════════════════════════╗ ?? धर्म लाभ का अवसर ?? ╚══════════════════════════════╝ 2026-02-18 07:38:37
8335 40449675 ?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? भाव शुभाशुभ का भी कर्ता, बनता जो दीवाना है ज्ञायक भाव शुभाशुभ से भी, भिन्न न उसने जाना है अपने से अनजान तुझे, भगवान कहें जिनदेव यहां ?✨?✨?✨? वीतरागी देव तुम्हारे जैसा जग में देव कहां मार्ग बताया है जो जग को, कह न सके कोई और यहां नमोस्तुभगवन, नमोस्तुभगवन, नमोस्तुभगवन ??????? 2026-02-18 07:38:04
8334 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ Wandami matajii ????????? 2026-02-18 07:37:11
8333 40449676 राष्ट्रीय मुनी सेवा संघ Jai jinendra?? 2026-02-18 07:37:00
8331 40449733 •परम गुरू ज्ञान संघ• भाव शुभाशुभ का भी कर्ता, बनता जो दीवाना है ज्ञायक भाव शुभाशुभ से भी, भिन्न न उसने जाना है अपने से अनजान तुझे, भगवान कहें जिनदेव यहां ?✨?✨?✨? वीतरागी देव तुम्हारे जैसा जग में देव कहां मार्ग बताया है जो जग को, कह न सके कोई और यहां नमोस्तुभगवन, नमोस्तुभगवन, नमोस्तुभगवन!! ??????? 2026-02-18 07:36:55
8332 40449734 3 अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर 2026-02-18 07:36:55
8330 40449687 अध्यात्मयोगी <a href="https://youtu.be/yLVej4hp3YY" target="_blank">https://youtu.be/yLVej4hp3YY</a> 2026-02-18 07:36:53
8329 40449664 ?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? 2026-02-18 07:34:36
8328 40449679 ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಜೈನಧರ್ಮ 2 ???? 2026-02-18 07:33:07
8327 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ वंदामी माताजी ?? 2026-02-18 07:32:32