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71279 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ?प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर गुरवे नमो नमः? ?आचार्य गुरवे विद्यासागराय नमः? ??जयजिनेंद्रजी? ? *आज का नियम* ? ? *ऊँ ह्रीं अर्हम श्री पुष्पदंतनाथ जिनेंद्राय नमो नमः इस मंत्र की १ माला करें और पनीर ग्रहण करने का त्याग*? ?सपरिवार नियम पालन करने वालों को विशेष धन्यवाद ? ?भूषण जैन? ?छोटे से नियम मुक्ति कीं आशा ? ?मोक्ष जाने कीं तीव्र अभिलाषा ? *?आज का नियम पालन करने वाले कृपया नियम हैं लिखकर ग्रृप में भेजे?* *तिथि-वैशाख कृष्ण सप्तमी (७)* *नोट:?एक नियम भी पालन कर सकते है* 2026-04-09 08:37:32
71280 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ?प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर गुरवे नमो नमः? ?आचार्य गुरवे विद्यासागराय नमः? ??जयजिनेंद्रजी? ? *आज का नियम* ? ? *ऊँ ह्रीं अर्हम श्री पुष्पदंतनाथ जिनेंद्राय नमो नमः इस मंत्र की १ माला करें और पनीर ग्रहण करने का त्याग*? ?सपरिवार नियम पालन करने वालों को विशेष धन्यवाद ? ?भूषण जैन? ?छोटे से नियम मुक्ति कीं आशा ? ?मोक्ष जाने कीं तीव्र अभिलाषा ? *?आज का नियम पालन करने वाले कृपया नियम हैं लिखकर ग्रृप में भेजे?* *तिथि-वैशाख कृष्ण सप्तमी (७)* *नोट:?एक नियम भी पालन कर सकते है* 2026-04-09 08:37:32
71278 40449660 Acharya PulakSagarji 07 आचार्यश्री पावनकीर्तिजी का app आ गया है । सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community कार्ड प्राप्त करे - Powered by Kutumb App <a href="https://kutumb.app/54afc40f0455?ref=JXPJH&amp;screen=settings_share" target="_blank">https://kutumb.app/54afc40f0455?ref=JXPJH&amp;screen=settings_share</a> 2026-04-09 08:36:15
71277 40449660 Acharya PulakSagarji 07 आचार्यश्री पावनकीर्तिजी का app आ गया है । सभी सदस्य नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके तुरंत ही जुड़ें और अपना सदस्य Community कार्ड प्राप्त करे - Powered by Kutumb App <a href="https://kutumb.app/54afc40f0455?ref=JXPJH&amp;screen=settings_share" target="_blank">https://kutumb.app/54afc40f0455?ref=JXPJH&amp;screen=settings_share</a> 2026-04-09 08:36:14
71275 40449660 Acharya PulakSagarji 07 ?स्वाध्याय भाग-१२ ?रत्नत्रय- जो कुशल मनुष्य रसायन के समान सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र इन तीन की सेवा करता है वह अमृत पद मोक्ष स्थान (पक्ष में पूर्ण नीरोग अवस्था) को प्राप्त होता है । जो ज्ञानी पुरुष भक्तिपूर्वक हर्ष से रत्नत्रय की विधि को करते हैं, वे उसके फल से मनुष्य और देवगति के अनुपम सुख प्राप्त कर महान् कठिन तप के द्वारा कर्मसमूह को नष्ट कर श्रीमल्लिनाथ तीर्थकर के समान तीनों लोकों के मनुष्यों से पूजा प्राप्त कर सिद्ध भगवन्तों से पूर्ण सिद्धगति को प्राप्त होते हैं । जो अनुपम गुणों का पिटारा है, त्रिलोकीनाथ तीर्थंकरों के द्वारा वन्दित है और संसाररूपी सर्प के लिए उत्तम मन्त्र है, ऐसा दिव्य रत्नत्रय मेरे समस्त पापों की हानि के लिए हो, पूर्ण रत्नत्रय की प्राप्ति के लिए हो तथा उत्कृष्ट सुबुद्धि के लिए हो। मैं उसकी वन्दना करता हूँ और स्तुति करता हूँ । रत्नत्रय के बिना सत्पुरुषों को कभी भी कहीं भी अनन्त सुख से परिपूर्ण सिद्धि- पद-मोक्ष नहीं प्राप्त होता है । राज्यभार रूप समुद्र में मग्न तथा अनेक चिन्ताओं में प्रवर्तमान गृहस्थों को कभी सारभूत दृढ़ रत्नत्रय नहीं हो सकता । सम्यग्दर्शन से दुर्गति का नाश होता है, निर्दोष ज्ञान से कीर्ति प्राप्त होती है, चारित्र से लोक में पूज्यता मिलती है परन्तु मोक्ष तीनों की एकता से ही प्राप्त होता है । सम्यक्त्व से उत्तम गति कही गयी है, ज्ञान से कीर्ति बतायी गई है, चारित्र से मनुष्य पूजा को प्राप्त होता है और तीनों से मोक्ष को प्राप्त होता है । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र से विभूषित मनुष्य समस्त कर्मों को नष्ट कर निर्वाण को प्राप्त होते हैं । अहा ! धर्म की महिमा कितनी आश्चर्यकारक है ! जो महाभव्यजीव समीचीन रत्नत्रयरूप धर्म का आश्रय लेते हैं उन्हें यहाँ क्या दुर्लभ है ? अर्थात् कुछ भी नहीं । ✋शुभाशीर्वाद आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति 2026-04-09 08:36:12
71276 40449660 Acharya PulakSagarji 07 ?स्वाध्याय भाग-१२ ?रत्नत्रय- जो कुशल मनुष्य रसायन के समान सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र इन तीन की सेवा करता है वह अमृत पद मोक्ष स्थान (पक्ष में पूर्ण नीरोग अवस्था) को प्राप्त होता है । जो ज्ञानी पुरुष भक्तिपूर्वक हर्ष से रत्नत्रय की विधि को करते हैं, वे उसके फल से मनुष्य और देवगति के अनुपम सुख प्राप्त कर महान् कठिन तप के द्वारा कर्मसमूह को नष्ट कर श्रीमल्लिनाथ तीर्थकर के समान तीनों लोकों के मनुष्यों से पूजा प्राप्त कर सिद्ध भगवन्तों से पूर्ण सिद्धगति को प्राप्त होते हैं । जो अनुपम गुणों का पिटारा है, त्रिलोकीनाथ तीर्थंकरों के द्वारा वन्दित है और संसाररूपी सर्प के लिए उत्तम मन्त्र है, ऐसा दिव्य रत्नत्रय मेरे समस्त पापों की हानि के लिए हो, पूर्ण रत्नत्रय की प्राप्ति के लिए हो तथा उत्कृष्ट सुबुद्धि के लिए हो। मैं उसकी वन्दना करता हूँ और स्तुति करता हूँ । रत्नत्रय के बिना सत्पुरुषों को कभी भी कहीं भी अनन्त सुख से परिपूर्ण सिद्धि- पद-मोक्ष नहीं प्राप्त होता है । राज्यभार रूप समुद्र में मग्न तथा अनेक चिन्ताओं में प्रवर्तमान गृहस्थों को कभी सारभूत दृढ़ रत्नत्रय नहीं हो सकता । सम्यग्दर्शन से दुर्गति का नाश होता है, निर्दोष ज्ञान से कीर्ति प्राप्त होती है, चारित्र से लोक में पूज्यता मिलती है परन्तु मोक्ष तीनों की एकता से ही प्राप्त होता है । सम्यक्त्व से उत्तम गति कही गयी है, ज्ञान से कीर्ति बतायी गई है, चारित्र से मनुष्य पूजा को प्राप्त होता है और तीनों से मोक्ष को प्राप्त होता है । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र से विभूषित मनुष्य समस्त कर्मों को नष्ट कर निर्वाण को प्राप्त होते हैं । अहा ! धर्म की महिमा कितनी आश्चर्यकारक है ! जो महाभव्यजीव समीचीन रत्नत्रयरूप धर्म का आश्रय लेते हैं उन्हें यहाँ क्या दुर्लभ है ? अर्थात् कुछ भी नहीं । ✋शुभाशीर्वाद आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति 2026-04-09 08:36:12
71272 40449664 ?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? 2026-04-09 08:33:19
71273 40449664 ?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? 2026-04-09 08:33:19
71274 40449664 ?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? 2026-04-09 08:33:19
71271 40449664 ?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? 2026-04-09 08:33:18