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2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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*?॥ श्री तीर्थंकराय नम ॥?*
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*? प्रथमानुयोग*
*? सोलह कारण भावना– 75*
*? 10.अर्हद भक्ति भावना ?*
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जिन्होंने अठारह दोषों का निवारण कर दिया है, पापों को धोकर अति निर्मल हो गये हैं, कर्मों को चूर-चूर कर जो दिव्य अनन्त चतुष्टय से शोभित हैं, मिथ्यात्व रूप अंधकार को दूर कर दिया है, ऐसे अरिहन्त देव का भजन करो अर्थात ऐसे जिनराज की आराधना करो और निरन्तर उनके गुणों की पूजा करो।
*जो अरिहन्त भक्ति मन आने, सो जन विषय कषाय न माने।*
जो अरिहन्त की भक्ति मन से करता है उसके अन्दर से विषय कषाय निकल जाती है। विषय कषायों के न रहने पर अथवा मन्द पड़ने पर ही भावों में विशुद्धता आती है और भावों की विशुद्धि बढ़ते-बढ़ते शुद्धता में परिणत हो जाती है। भावों की शुद्धता ही वीतरागता है और वीतरागी जीव ही अपनी आत्मा का कल्याण कर सकता है।
जिन्होंने कर्म रूपी शत्रुओं का हनन कर दिया हो, जो इंद्रों द्वारा वंदित हो, जिन्होंने कर्म रूपी बीज नष्ट कर दिया हो, जिसके कारण जन्म, जरा, मृत्यु रूपी रोगों से मुक्ति हो गई हो उनको अरहंत कहते हैं। वितरागी ,सर्वज्ञ और हितोपदेशी अठारह दोषों से मुक्त वह 46 गुणों से युक्त आत्मा की आराधना करना ही अर्हद भक्ति भावना कहलाती है।
*जिनदत्त सेठ की कथा*
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आर्यखंड के मगध देश में राजगृह नाम का सुन्दर नगर है। जिसमें धर्म वात्सल्य राजा श्रेणिक राज्य करता था। इसी राजगृह नगर में धर्म वात्सल्य नागदत्त नाम के एक सेठ रहते थे, उनकी भवदत्ता नाम की महा शीलवान और गुणवान सुन्दर स्त्री थी। दोनों दम्पति अपने घर का कार्य के साथ-साथ सामायिक, स्वाध्याय पूर्वक अपना जीवन व्यतीत करते थे। *“मोह जाल में फँसे हुए हैं कर्मों ने आ घेरा।”* नागदत्त अन्तिम श्वास में पत्नी को छोड़कर कैसे जाऊँ आर्त ध्यान करते हुए, दुर्ध्यान में मरण कर तिर्यंच गति में घर के पीछे रहने वाले उन्ही की वापिका में मेंढक होकर जन्म लिया।
इधर सेठ के मरण से सेठानी शोकाकुल रहने लगी, दैनिक कार्यों में भी उसका मन नहीं लगता, वह अनेक प्रकार से मन बहलाने लगी, कभी सखियों के साथ उपवन में घूमने चली जाती कभी धर्म कार्यों में चित्त लगाती पति के असीम स्नेह और धर्मपरायणता की उसे बार-बार याद आती उसका चित्त कहीं न रमता। वह सोचती अरे ! संसार की लीला विचित्र है। कभी संयोग, कभी वियोग में हर्ष अभी वियोग में शोक। वास्तव में संयोग नहीं, संयोगाधीन बुद्धि दुःख का कारण है। देखो, परिणामों की विचित्रता !
एक दिन सेठानी उसी वापिका में पानी भरने गई तो मेंढक ने उसे देख लिया देखते ही उसे पूर्व पर्याय का स्मरण हो आया। अरे ! मैं अभागा स्त्री के मोह से आर्त परिणाम करके मरा। अरे ! कहाँ सेठ, और कहाँ पानी का मेंढक !!! धिक्कार ! इस दुःखमय विचित्र संसार को, ये क्या हो गया ? किसे सुनाऊँ दुःखमय व्यथा ! यहाँ कौन मेरी पुकार सुनेगा ? कौन मेरी भाषा समझेगा ?
अहो ! कैसे समझाऊँ इस अपनी पत्नी को कि मैं ही तेरा अभागा पति हूँ। ऐसे विचार करते-करते मेंढक की आँखों में आँसू धार बह गई। पूर्व पर्याय का सारा वृत्तान्त उसे स्पष्ट दिख रहा था। वह पत्नी के प्रति असीम स्नेह को याद करके शब्द करता हुआ उछल-उछलकर उसके वस्त्रों पर चढ़ने लगा। पत्नी को क्या खबर थी कि वह कौन है ? और भय से उस मेंढक को पानी में ही ढकेलकर घर चली गई। इस प्रकार सेठानी जब-जब पानी भरने जाती, तब-तब मेंढक उछल-उछल कर सेठानी की ओर दौड़ता, सेठानी उसे पानी में धकेल कर घर चली आती। यही क्रम बहुत दिनों तक चलता रहा।
एक दिन सेठानी अपनी सहेलियों के साथ उपवन में गई थी, वहाँ अचानक उसकी दृष्टि एक शिला पर विराजमान सुव्रत नाम का अवधिज्ञानी वीतरागी मुनिराज पर पड़ी। मुनिराज सामायिक में ध्यानस्थ थे। उनको ध्यानस्थ अवस्था में देख सेठानी को अपनी पति की याद हो गई। उसकी आँखों में आँसू धार बह चली। वह पति के विरह का दुःख भुलाने सखियों के साथ मुनिराज के पास गई। सामायिक पूर्ण होने के बाद मुनिराज ने सबको धर्मबुद्धि का मंगल आशीर्वाद दिया। सेठानी ने मुनिराज को अपनी संपूर्ण व्यथा कह डाली और बोली—
“हे करुणानिधि ! मैं जब-जब अपनी वापिका में पानी भरने जाती हूँ तो एक मेंढक शब्द करता हुआ उछल-उछल कर मेरे ऊपर आता है, मुझे भी उस पर अपार स्नेह उमड़ता है, क्या कारण है ? कृपया इसको बताइये।” अवधिज्ञानी मुनिराज श्री करुणा पूर्वक समझाते हुए बोले— “पुत्री ! वह तुम्हारा पति का जीव है, आर्त परिणाम पूर्वक मरण से निकृष्ट बंध हो गया, उसे पूर्व पर्याय का जातिस्मरण हो गया है, अल्पकाल में अपने परिणामों को सुधारकर उत्तम गति को प्राप्त होगा।”
सेठानी ने जब यह जाना तो उसे संसार की दशा का विचार आया और मेंढक को पति का जीव जानकर अपने स्नेह भरे नेत्रों से उसे सम्मानपूर्वक अपने घर ले आई तथा पतिव्रत स्नेह से उसका पालन करने लगी।
जब भव्य जीवों का भाग्य पकता है तो सहजकाल योग से महापुरुषों का गमन उस ओर हो जाता।है। राजगृह के पवित्र स्थान विपुलाचल पर्वत पर भगवान महावीर का समवसरण सहित आगमन हुआ। समवसरण के आते ही दूर-दूर तक सुकाल हो गया, समस्त ऋतुओं के फल-फूल एक साथ आ गये, अन्धों को दिखने लगा, बहरे सुनने लगे, गूंगे बोलने लगे और लंगड़े चलने लगे, रोगी रोग मुक्त हो गये, तीर्थंकर के पुण्य परमाणु कण-कण में फैल गये, वनमाली ने समवसरण के आगमन का समाचार राज दरबार में जाकर राजा श्रेणिक को दिया तो श्रेणिक का रोम-रोम पुलकित हो गये और उसने राज सिंहासन से नीचे उतर कर भगवान को स्मरण कर अष्टांग नमस्कार किया।
भव्य जीवों के हृदय कमल को आनन्दित करने वाले भगवान महावीर के आगमन की सूचना रूप आनन्द भेरी सारे नगर में श्रेणिक ने बजवा दिया। भगवान के आगमन का समाचार सुन प्रजाजन आनन्द विभोर हो गये। श्रेणिक जब धर्मध्यान की उमंगों से भरकर विपुलाचल की ओर चले तो अपार जन समूह आनन्द नृत्यगान करता हुआ उनके पीछे-पीछे चलने लगा। सारा नगर पूजन की सामग्री हाथों में लिये भगवान की जय-जयकार का शब्द करता हुआ समवसरण की ओर जाने लगा।
मनुष्य, तिर्यंच, देव, नर-नारी, पशु-पक्षी, सिंह, बाघ, गाय, कुत्ते, बिल्ली आदि समस्त प्राणी परस्पर वैरभाव को भूलकर समवसरण की ओर जा रहे थे। वीतरागी का द्वार (दरबार) तो सदा सबके लिये खुला रहता है। धन्य है, वह दरबार ! धन्य थे वह भव्य जन ! धन्य था वह पावन दृश्य !
मेंढक ने जब आनन्द भेरी सुनी और जय-जयकार करते-करते हुए लोगों को जाते देखा तो पूर्वस्मरण ज्ञान से उसके भी धर्म संस्कार पुनः जागृत हो गये। उसका मन भी जिनदर्शन के लिये तड़पने लगा, भगवान भक्ति और पूजन का अपार उत्साह उसके हृदय में उमड़ने लगा, पर वह मूर्ख था….. असमर्थ था….. कैसे भगवान के समवसरण में जाऊँगा ऐसा विचार कर पश्चाताप करने लगा ! अरे, रे ! दुर्लभ मनुष्य पर्याय को मैंने वृथा गँवा दिया।
ऐसा सोचकर वह मेंढक भी मुख में एक पुष्प को दबाकर भक्ति के उत्साह में उछलता-कूदता हुआ समवसरण की ओर चल पड़ा। अपार भीड़ और हाथी-घोड़ों के बीच वह बचता निकलता चला जा रहा था। भक्ति की धुन में उसे याद न रहा कि विपुलाचल पर्वत पर बीस हजार सीढ़ियों के ऊपर समवसरण में मैं कैसे पहुँचूँगा। मानो अभी तुरन्त ही भगवान के दर्शन एवं पूजन करूँ—जैसी उमंग मन में लिये चला जा रहा था। पर अरे ! गजराज पर गर्व से चलने वालों को इसकी क्या खबर कि उनके पग तले कितने मूक प्राणी रौंदे चले जा रहे हैं। दुर्भाग्य से श्रेणिक के मदमाते हाथी ने उस मेंढक को पैर से कुचलकर उसका प्राणान्त कर दिया, उसकी जीवन यात्रा वहीं समाप्त हो गई। मगर भक्ति यात्रा समाप्त न हो पायी और उस भक्ति के पवित्र परिणाम से क्षण में ही स्वर्ग का महर्द्धिक देव हो गया। सेठ की पर्याय में की गई धर्म विराधना का प्रतिकार मेंढक की पर्याय में कर लिया। तत्काल अवधिज्ञान से भगवान भक्ति के प्रभाव से देव पर्याय में उत्पन्न जानकर अपनी ध्वजा में मेंढक का चिह्न स्थापित कर साक्षात भगवान के दर्शन और जिन ध्वनि श्रवण के लिये चल दिया। अहो ! धन्य है भक्ति की महिमा।
*भव्य आत्मन अरिहंत की भक्ति करना ही अरिहंत भक्ति भावना है परंतु आज के समय में उपास्य अधिक है उपासक कम है कोई तो राग की भक्ति करता है कोई वितरागता की भक्ति करता है । कोई ऋषभदेव,शंकर, राम ,बुद्ध ,हजरत ,गुरु नानक, महावीर, की भक्ति करता है कोई पद्मावती, चक्रेश्वरी,क्षेत्रपाल आदि की भक्ति कर रहा है सभी जैसी जिसकी मानता है भक्ति कर रहे हैं ठीक है किसी का खंडन नहीं है परंतु विचार करना है कि हमें क्या चाहिए?संसार अथवा मोक्ष ।अगर राग की भक्ति करेंगे अथवा विवेकहिन क्रिया करेंगे तो कर्म बंध होंगे और संसार मिलेगा तथा यदि वितरागता की भक्ति करेंगे अथवा विवेक पूर्वक क्रिया करेंगे तो कर्मों की निर्जरा होगी और संसार छूट जाएगा और मोक्ष की प्राप्ति होगी । जिससे जन्म मरण रूपी दुखों से छुटकारा मिल जाएगा ।रूढ़िवादिता अथवा भेड़चाल चलने से कभी भी लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती है । आप जैसी दुकान पर जाएंगे वैसा ही समान मिलेगा जैसे:-किराने की दुकान पर कपड़ा नहीं मिलेगा इसी प्रकार से राग से राग और वितरागता से वितरागता ही मिलेगी ।
मेंढक के समान ही अर्हद भक्ति हमारे अंदर होनी चाहिए । अष्ट द्रव्य से प्रतिदिन जिनेंद्र भगवान की पूजन सर्वप्रथम मंदिर जा सको तो वहीं पर नहीं जा सको तो घर पर भी अतादाकार स्थापना के द्वारा देव शास्त्र गुरु की पूजन करना चाहिए । यह परंपरा से मोक्ष का मार्ग है ।
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*✍️ संकलन*
*?️ पं. मुकेश शास्त्री*
*? सुसनेर*
*? 9425935221*
*? 15.02.2026*
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2026-02-15 06:51:24 |
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