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? विद्या शरणम ०१ ? |
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*जय जिनेंद्र! ???*
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2026-02-16 14:37:05 |
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???गुरु भगवान??? |
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? *आदिनाथ जिनेंद्राय नमः* ?
*जिन शासन प्रभावक* ऐसी *संतों में महासंत भगवंत विश्व शांतिदूत*
पुष्पगिरि प्रणेता वात्सल्य दिवाकर
*गणाधिपति परम पूज्य १०८ गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर महाराजजी* गुरुदेव का परम शिष्य दिगम्बर युवासंत धर्म प्रभावना सिंधू *परम पूज्य १०८ ऐलाचार्य श्री प्रसंग सागर महाराज* नें कहाँ
* *रविवार 15-2-2026 को अपने प्रवचन में*
*शिवरात्रि हो या जिनरात्रि हो*
*1. जिनरात्रि का महत्व :* अध्यात्म का विजय उत्सव
जैन धर्म के अनुसार, माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) ने कैलास पर्वत पर निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया।
*जिनरात्रि नाम क्यों पड़ा?*
*‘जिन’ अर्थात जिसने इन्द्रियों को जीत लिया हो।* जिस रात भगवान ने देह त्यागकर सिद्ध पद प्राप्त किया, वह रात्रि संसार के लिए ज्ञान का प्रकाश लेकर आई।
ऐसा कहा जाता है कि भरत चक्रवर्ती ने उस रात्रि भर जागरण कर भक्ति और पूजन किया। इसी कारण वह पवित्र रात्रि *“जिनरात्रि”* कहलायी।
कालांतर में यही दिन भगवान शिव की आराधना के रूप में *“महाशिवरात्रि”* के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जैन परंपरा में आदिनाथ भगवान को ही आदिब्रह्मा, शिव या शंकर भी कहा जाता है।
*2. अष्टापद पर्वत और 72 जिन प्रतिमाएँ*
कैलास पर्वत को “अष्टापद” नाम भरत चक्रवर्ती के निर्माण के कारण प्राप्त हुआ।
अष्टापद का अर्थ
भरत चक्रवर्ती ने अपने पिता की स्मृति में पर्वत के चारों ओर आठ (अष्ट) विशाल सीढ़ियाँ (पद) बनवाईं। प्रत्येक सीढ़ी इतनी ऊँची थी कि सामान्य मनुष्य के लिए चढ़ना असंभव था।
सिंहनिषध्या जिनालय
पर्वत के शिखर पर भरत ने बहुमूल्य रत्नों से अलंकृत भव्य जिनालय का निर्माण कराया।
72 प्रतिमाएँ
यहाँ तीन कालों के 24-24 तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ स्थापित की गईं—
भूतकाल के 24 तीर्थंकर
वर्तमान काल के 24 तीर्थंकर
भविष्यकाल के 24 तीर्थंकर
इन प्रतिमाओं का वर्ण प्रत्येक तीर्थंकर के शरीर वर्ण के अनुसार था—स्वर्ण, पन्ना, माणिक्य आदि रत्नों से निर्मित और तेजस्वी।
*3. सगर चक्रवर्ती के पुत्रों* की कथा और संरक्षण का रहस्य
भरत चक्रवर्ती के बाद दूसरे चक्रवर्ती के रूप में सगर चक्रवर्ती राज्यसिंहासन पर आसीन हुए। उनके 60,000 पुत्र थे।
रक्षा का संकल्प
अष्टापद पर्वत पर स्थित रत्नमयी प्रतिमाओं की रक्षा के लिए सगर के पुत्रों ने संकल्प लिया।
दण्डरत्न का प्रयोग
उन्होंने अपने दण्डरत्न की शक्ति से पर्वत के चारों ओर अत्यंत गहरी खाई (कंदक) खोदी।
गंगा का प्रवाह मोड़ा
उस खाई को जल से भरने हेतु गंगा नदी का प्रवाह अष्टापद की ओर मोड़ दिया गया।
इस प्रक्रिया से नागलोक के देवताओं को कष्ट पहुँचा और नागराज के क्रोध से सगर के 60,000 पुत्र भस्म हो गए—ऐसी पुराणों में प्रसिद्ध कथा है।
इस गहरी खाई और गंगा के वेग के कारण अष्टापद पर्वत का मार्ग मनुष्यों के लिए पूर्णतः बंद हो गया।
*4. जिनालय आज अदृश्य क्यों है?*
यह दिव्य जिनालय आज दिखाई क्यों नहीं देता? इसके तीन प्रमुख कारण बताए जाते हैं—
*1. यांत्रिक सुरक्षा*
भरत चक्रवर्ती ने चक्ररत्न की शक्ति से पर्वत के आधार पर लौह-निर्मित यंत्रपुरुष स्थापित किए थे। जो कोई भी चढ़ने का प्रयास करता, वे उसे रोक देते।
*2. सगर पुत्रों* की खाई
उनके द्वारा बनाई गई गहरी खाई ने पर्वत को एक द्वीप जैसा बना दिया, जिससे सामान्य प्रवेश असंभव हो गया।
*3. काल का प्रभाव (पंचम काल)*
जैन धर्म के अनुसार हम वर्तमान में ‘दुष्षम काल’ में हैं। इस काल में मनुष्य की भक्ति और आध्यात्मिक शक्ति क्षीण हो चुकी है। अतः पवित्र क्षेत्र हिम और बादलों के आवरण में गुप्त हो गए हैं। कहा जाता है कि केवल ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त महा-मुनि ही आज भी वहाँ जाकर वंदना कर सकते हैं।
*5. भरत और बाहुबली की अंतिम भावना*
जिनरात्रि के दिन भरत चक्रवर्ती ने अपना अहंकार त्याग दिया और बाहुबली स्वामी के मार्गदर्शन में पिता की निर्वाण भूमि पर अद्वितीय भक्ति प्रकट की।
जहाँ भरत ने भव्य पूजा की, वहीं बाहुबली स्वामी शांतचित्त होकर ध्यान में स्थित रहे।
यह दिव्य प्रसंग हमें सिखाता है कि भोग (भरत) और त्याग (बाहुबली) दोनों जब धर्म के अधीन हो जाएँ, तभी जीवन पूर्णता प्राप्त करता है।
*सारांश*
भरत चक्रवर्ती की भक्ति से निर्मित, सगर पुत्रों द्वारा संरक्षित और काल के प्रभाव से गुप्त हुआ अष्टापद क्षेत्र आज भी जिनरात्रि के दिन दिव्य प्रकाश से आलोकित होता है—ऐसा श्रद्धालुओं का विश्वास है।
यह रात्रि हमें स्मरण कराती है—
इन्द्रियों पर विजय ही सच्ची शिवता है, और आत्मज्ञान ही वास्तविक ज्योति है।
*परम पूज्य १०८ ऐलाचार्य श्री प्रसंग सागर महाराज*
? जय जिनेन्द्र ? |
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2026-02-16 14:36:39 |
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40449699 |
3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) |
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2026-02-16 14:36:29 |
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3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) |
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2026-02-16 14:36:27 |
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3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) |
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????????????? ಜೈ ಜಿನೇಂದ್ರ ಎಲ್ಲರಿಗೂ ಶುಭ ದಿನದ ಶುಭೋದಯ ?? |
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2026-02-16 14:36:26 |
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3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) |
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2026-02-16 14:36:24 |
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3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) |
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2026-02-16 14:36:23 |
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1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-02-16 14:35:07 |
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निर्यापक समय सागर जी भक्त |
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2026-02-16 14:32:24 |
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40449657 |
?️?SARVARTHASIDDHI ??️ |
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संस्कारवान संतान कैसे हो |
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2026-02-16 14:31:49 |
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