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71235 40449749 जिनोदय?JINODAYA *स्वामी पद की महिमा — सर्वोच्च वैभव का सच्चा स्वरूप* स्वामी पद महिमा बड़ी, धन सबका सिरमौर। रूप अपूरब जो मिलय, नहिं चाहत कछु और।। यह दोहा हमें जीवन के उस परम सत्य की ओर संकेत करता है, जहाँ सांसारिक धन, वैभव और भोग-विलास सब फीके पड़ जाते हैं। स्वामी पद अर्थात् प्रभु के चरणों में अनुराग और समर्पण—यह ऐसा अमूल्य धन है जो किसी भी भौतिक संपत्ति से कहीं अधिक श्रेष्ठ और स्थायी है। मनुष्य जीवन भर धन, प्रतिष्ठा और सुख-सुविधाओं के पीछे भागता है, लेकिन अंततः उसे संतोष नहीं मिलता। कारण स्पष्ट है—बाहरी साधनों से मिलने वाला सुख क्षणिक होता है, जबकि स्वामी पद में जो आनंद है, वह आत्मा को तृप्त करने वाला और चिरस्थायी होता है। जब साधक को प्रभु के चरणों की सच्ची प्रीति मिल जाती है, तो उसका दृष्टिकोण ही बदल जाता है। वह समझ जाता है कि संसार का सारा आकर्षण माया मात्र है। उस समय न उसे धन की लालसा रहती है, न यश की इच्छा और न ही भोगों का आकर्षण। उसका मन केवल प्रभु भक्ति में रमता है और वहीं उसे सच्चा सुख और शांति प्राप्त होती है। यही कारण है कि सच्चे संत-महात्मा संसार के समस्त वैभव को त्यागकर इस परम पद की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयास करते हैं। किन्तु आज के समय में यह भी एक कटु सत्य है कि जैन समाज में कुछ ऐसे तथाकथित साधु भी दिखाई देते हैं, जो बाहरी रूप से त्याग का आडंबर तो धारण करते हैं, परन्तु भीतर से धन संग्रह और प्रतिष्ठा की लालसा में उलझे रहते हैं। त्याग का मार्ग अत्यंत कठिन और पवित्र है, लेकिन जब उसी मार्ग पर आडंबर, प्रदर्शन और स्वार्थ का प्रवेश हो जाता है, तो वह साधना नहीं, बल्कि एक प्रकार का भ्रम और प्रपंच बन जाता है। ऐसे आचरण न केवल साधु पद की गरिमा को आहत करते हैं, बल्कि समाज के श्रद्धालु लोगों की आस्था को भी कमजोर करते हैं। स्वामी पद का वास्तविक अर्थ केवल बाहरी वेश या दिखावे में नहीं, बल्कि भीतर की निर्मलता, वैराग्य और आत्मसंयम में निहित है। यदि त्याग के नाम पर संग्रह बढ़े, यदि सादगी के स्थान पर प्रदर्शन हो, तो वह मार्ग हमें सत्य से दूर ले जाता है। इसलिए समाज को भी सजग रहना होगा—सच्चे और आडंबरकारी में भेद करना होगा, और केवल उसी साधना को स्वीकार करना होगा जो शास्त्रसम्मत, निष्कपट और आत्मकल्याणकारी हो। स्वामी पद का यह अपूर्व रूप इतना अद्वितीय और मनमोहक है कि एक बार इसकी अनुभूति हो जाए तो फिर मनुष्य को किसी अन्य वस्तु की इच्छा ही नहीं रहती। वह आत्मिक आनंद में लीन होकर जीवन के हर दुख और कष्ट को सहजता से सहन कर लेता है। यही सच्चा वैराग्य है और यही जीवन का परम उद्देश्य भी है। अतः हमें इस दोहे के मर्म को समझते हुए अपने जीवन में प्रभु भक्ति, संयम और आत्मचिंतन को स्थान देना चाहिए और साथ ही धर्म के नाम पर फैल रहे आडंबरों से सावधान रहना चाहिए। यही मार्ग हमें सच्चे सुख, शांति और मोक्ष की ओर ले जाता है। नितिन जैन संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा) जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल मोबाइल: 9215635871 2026-04-09 08:16:19
71236 40449749 जिनोदय?JINODAYA *स्वामी पद की महिमा — सर्वोच्च वैभव का सच्चा स्वरूप* स्वामी पद महिमा बड़ी, धन सबका सिरमौर। रूप अपूरब जो मिलय, नहिं चाहत कछु और।। यह दोहा हमें जीवन के उस परम सत्य की ओर संकेत करता है, जहाँ सांसारिक धन, वैभव और भोग-विलास सब फीके पड़ जाते हैं। स्वामी पद अर्थात् प्रभु के चरणों में अनुराग और समर्पण—यह ऐसा अमूल्य धन है जो किसी भी भौतिक संपत्ति से कहीं अधिक श्रेष्ठ और स्थायी है। मनुष्य जीवन भर धन, प्रतिष्ठा और सुख-सुविधाओं के पीछे भागता है, लेकिन अंततः उसे संतोष नहीं मिलता। कारण स्पष्ट है—बाहरी साधनों से मिलने वाला सुख क्षणिक होता है, जबकि स्वामी पद में जो आनंद है, वह आत्मा को तृप्त करने वाला और चिरस्थायी होता है। जब साधक को प्रभु के चरणों की सच्ची प्रीति मिल जाती है, तो उसका दृष्टिकोण ही बदल जाता है। वह समझ जाता है कि संसार का सारा आकर्षण माया मात्र है। उस समय न उसे धन की लालसा रहती है, न यश की इच्छा और न ही भोगों का आकर्षण। उसका मन केवल प्रभु भक्ति में रमता है और वहीं उसे सच्चा सुख और शांति प्राप्त होती है। यही कारण है कि सच्चे संत-महात्मा संसार के समस्त वैभव को त्यागकर इस परम पद की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयास करते हैं। किन्तु आज के समय में यह भी एक कटु सत्य है कि जैन समाज में कुछ ऐसे तथाकथित साधु भी दिखाई देते हैं, जो बाहरी रूप से त्याग का आडंबर तो धारण करते हैं, परन्तु भीतर से धन संग्रह और प्रतिष्ठा की लालसा में उलझे रहते हैं। त्याग का मार्ग अत्यंत कठिन और पवित्र है, लेकिन जब उसी मार्ग पर आडंबर, प्रदर्शन और स्वार्थ का प्रवेश हो जाता है, तो वह साधना नहीं, बल्कि एक प्रकार का भ्रम और प्रपंच बन जाता है। ऐसे आचरण न केवल साधु पद की गरिमा को आहत करते हैं, बल्कि समाज के श्रद्धालु लोगों की आस्था को भी कमजोर करते हैं। स्वामी पद का वास्तविक अर्थ केवल बाहरी वेश या दिखावे में नहीं, बल्कि भीतर की निर्मलता, वैराग्य और आत्मसंयम में निहित है। यदि त्याग के नाम पर संग्रह बढ़े, यदि सादगी के स्थान पर प्रदर्शन हो, तो वह मार्ग हमें सत्य से दूर ले जाता है। इसलिए समाज को भी सजग रहना होगा—सच्चे और आडंबरकारी में भेद करना होगा, और केवल उसी साधना को स्वीकार करना होगा जो शास्त्रसम्मत, निष्कपट और आत्मकल्याणकारी हो। स्वामी पद का यह अपूर्व रूप इतना अद्वितीय और मनमोहक है कि एक बार इसकी अनुभूति हो जाए तो फिर मनुष्य को किसी अन्य वस्तु की इच्छा ही नहीं रहती। वह आत्मिक आनंद में लीन होकर जीवन के हर दुख और कष्ट को सहजता से सहन कर लेता है। यही सच्चा वैराग्य है और यही जीवन का परम उद्देश्य भी है। अतः हमें इस दोहे के मर्म को समझते हुए अपने जीवन में प्रभु भक्ति, संयम और आत्मचिंतन को स्थान देना चाहिए और साथ ही धर्म के नाम पर फैल रहे आडंबरों से सावधान रहना चाहिए। यही मार्ग हमें सच्चे सुख, शांति और मोक्ष की ओर ले जाता है। नितिन जैन संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा) जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल मोबाइल: 9215635871 2026-04-09 08:16:19
71233 40449660 Acharya PulakSagarji 07 2026-04-09 08:15:49
71234 40449660 Acharya PulakSagarji 07 2026-04-09 08:15:49
71231 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म 2026-04-09 08:15:34
71232 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म 2026-04-09 08:15:34
71230 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म 2026-04-09 08:15:33
71229 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म 2026-04-09 08:15:32
71227 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म 2026-04-09 08:15:30
71228 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म 2026-04-09 08:15:30