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221904 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *?दूध के जले - छाछ में सतर्क ?* 11-6-2026 गुरुवार ________________________ *मैं धरती की सबसे पुण्यशाली माँ होने का गौरव प्राप्त कर चुकी थी, मेरा मन सारी दुनिया को विद्यासमय की गाथा को सुनाने का है, यह सब एक कालचक्र द्वारा रचित वह जीवंत अद्भुत संस्मरण हैं जहाँ हम कदम कदम पर नियति के नियोजन के दर्शन कर रहे थे,* _चलिए मैं आपको पुनः पचपन वर्ष पीछे ले चलती हूँ, विद्या के सागर तो विद्या के सागर थे ही अब उसमें समय का भी विलय हो गया था, विद्या एवं समय का एक लघु संघ अद्भुत था, भारत वर्ष नें केवल युवा मुनियों की कहानियाँ सुनी थी, पहली बार दो नवयुवक अपनी इन्द्रियों को जीत विजेता बन दिगंबर स्वरूप में भ्रमण करके सभी को आश्चर्य एवं श्रद्धा से भर रहे थे, द्रोणगिरी के जंगलो में ज़ब आप दोनों खड़े होकर घंटो ध्यान लगाते थे तब आपमें भगवान बाहुबली का व्यक्तित्व झलक आता था!_ _मैं देख रही थी विद्या अनुगामी मुनि श्री समयसागर जी के रूप में आने वाला समय स्वर्णिम होने वाला था, जैन धर्म का यह विशाल आकाश कभी बिना सूर्य के रह न पाए, नियति का यह प्रयोजन समय दीक्षा से आज पूर्ण हो गया था!_ _उस वक़्त गुरु का अवलम्बन पाकर तुम नितांत अशरण होकर भी शरण पा गए थे, मानो तुम खुद को खोकर खुद को पा गए थे, आज देखती हूँ तुम आध्यत्मिक आकाश में इतने ऊँचे पहुंच गए हो की मैं चाहकर भी अब तुम्हारी समीपता नहीं पा सकती_ _*मैं देखकर विस्मित हूँ की दूध का जला छाछ को फूँक - फूँक कर पीता है, यह कहावत कभी समयसागर जी पर चरितार्थ नहीं हुई, क्युकी वो कभी दूध से जले ही नहीं, कोई गलती उन्होंने की ही नहीं, अपितु दूसरों को दूध से जला देखकर स्वयं छाछ फूँककर पीने की कला तुममें बचपन से आ चुकी थी, तुम्हारे जेष्ठ भ्राता नें तुम्हें यह घर में ही समझा दिया था की अपनी गलतियों से सीखने के लिए जीवन लम्बा नहीं है, समझदार वही है जो दूसरों की गलतियों से सीख ले लें!*_ _मुनि समयसागर जी उन्ही समझदारों में से थे, जिन्होंने कभी गुरु आदेश की प्रतीक्षा नहीं की अपितु उनके उपदेश को ही आदेश मानकर स्वयं को चर्यारत कर लिया, मुझे ध्यान है तुमने घर में भी वह कार्य कभी नहीं किया जिससे तुम्हारे माता -पिता -भाई को क्षोभ हो, पीड़ा हो, और मैं साक्षी हूँ की तुमने मुनिपद में कभी गुरु को रंच मात्र भी विकल्प नहीं दिए_ _मैंने देखा ज़ब 1981 में स्वाध्याय की कक्षा में किसी शिष्य नें आचार्य श्री जी से जिज्ञासा प्रकट की तब गुरु नें कहा *"चिंतन करो" बस तुमने अन्य साधक के लिए कहे गए गुरु वचन अपने लिए सूत्र बना लिए, उसके बाद तुमने भी कभी कोई जिज्ञासा गुरु से प्रकट नहीं की, ज़ब भी कोई प्रश्न तुम्हारे मन में आते और "चिंतन करो" का सूत्र तुम्हें मार्गदर्शन स्वयं देता रहा। तुम ज्ञान का पूरा सागर पी जाना चाहते थे मगर कैसे पिलाना है ये तुम्हारे गुरु जानते थे, आचार्य श्री जी से महान ग्रंथो को पढ़कर तुम अमृत ज्ञान को पीने का प्रयास करते और ज़ब कठिन विषय तुम्हें समझ नहीं आता तब भी तुम मौन रहते केवल पुस्तक की ओर ढल जाते थे, तुम्हारी मुख मुद्रा का संकेत पाकर स्वयं गुरु पूंछते की नहीं समझे?* तब काँपकर पुनः पन्ने पलटने लगना तुम्हारा हमें आज भी हर्ष से भर देता है, किसी चर्चा के समय ज़ब पूरा संघ एवं गुरु मुस्कुराते थे तब भी तुम्हारा मुस्काराना दुर्लभ था, क्यूंकि तुम गुरु को साक्षात अरिहंत मानते थे, और अरिंहतों के समक्ष हँसना भी तुम्हारे लिए कठिन परीक्षा थी_ _सदैव एक दम शांत चित्त, निर्विकल्प, नत -नेत्र, गहरे मौन में डूबे तुम सदा गुरु चरणों में बैठे रहते, कभी नजर उठाकर गुरु को देखने का साहस भी तुम जुटा नहीं पाए,_ _*गुरु से दो शब्द "चिंतन करो!" सुनकर कभी कुछ पूंछा नहीं, "जो आज्ञा गुरु जी" के अतिरिक्त कभी कुछ बोला नहीं, इन चार शब्दों में ही गुरु के निकट रहकर जिनकी साधना निखर निखर कर खिली, इन चार शब्दों से ही जिन्होंने जीवन को समयसार बना लिया, ऐंसे महान तपस्वी वीतरागी साधक आचार्य समयसिंधु को यह माँ, यह लेखनी और यह वसुंधरा प्रणाम करती है.....*_ _____________________ ✍️आशीष श्री जी 11-6-2026 (आप भी पढ़कर सभी को भेज सकते हैं ) 2026-06-11 12:48:02
221905 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *?दूध के जले - छाछ में सतर्क ?* 11-6-2026 गुरुवार ________________________ *मैं धरती की सबसे पुण्यशाली माँ होने का गौरव प्राप्त कर चुकी थी, मेरा मन सारी दुनिया को विद्यासमय की गाथा को सुनाने का है, यह सब एक कालचक्र द्वारा रचित वह जीवंत अद्भुत संस्मरण हैं जहाँ हम कदम कदम पर नियति के नियोजन के दर्शन कर रहे थे,* _चलिए मैं आपको पुनः पचपन वर्ष पीछे ले चलती हूँ, विद्या के सागर तो विद्या के सागर थे ही अब उसमें समय का भी विलय हो गया था, विद्या एवं समय का एक लघु संघ अद्भुत था, भारत वर्ष नें केवल युवा मुनियों की कहानियाँ सुनी थी, पहली बार दो नवयुवक अपनी इन्द्रियों को जीत विजेता बन दिगंबर स्वरूप में भ्रमण करके सभी को आश्चर्य एवं श्रद्धा से भर रहे थे, द्रोणगिरी के जंगलो में ज़ब आप दोनों खड़े होकर घंटो ध्यान लगाते थे तब आपमें भगवान बाहुबली का व्यक्तित्व झलक आता था!_ _मैं देख रही थी विद्या अनुगामी मुनि श्री समयसागर जी के रूप में आने वाला समय स्वर्णिम होने वाला था, जैन धर्म का यह विशाल आकाश कभी बिना सूर्य के रह न पाए, नियति का यह प्रयोजन समय दीक्षा से आज पूर्ण हो गया था!_ _उस वक़्त गुरु का अवलम्बन पाकर तुम नितांत अशरण होकर भी शरण पा गए थे, मानो तुम खुद को खोकर खुद को पा गए थे, आज देखती हूँ तुम आध्यत्मिक आकाश में इतने ऊँचे पहुंच गए हो की मैं चाहकर भी अब तुम्हारी समीपता नहीं पा सकती_ _*मैं देखकर विस्मित हूँ की दूध का जला छाछ को फूँक - फूँक कर पीता है, यह कहावत कभी समयसागर जी पर चरितार्थ नहीं हुई, क्युकी वो कभी दूध से जले ही नहीं, कोई गलती उन्होंने की ही नहीं, अपितु दूसरों को दूध से जला देखकर स्वयं छाछ फूँककर पीने की कला तुममें बचपन से आ चुकी थी, तुम्हारे जेष्ठ भ्राता नें तुम्हें यह घर में ही समझा दिया था की अपनी गलतियों से सीखने के लिए जीवन लम्बा नहीं है, समझदार वही है जो दूसरों की गलतियों से सीख ले लें!*_ _मुनि समयसागर जी उन्ही समझदारों में से थे, जिन्होंने कभी गुरु आदेश की प्रतीक्षा नहीं की अपितु उनके उपदेश को ही आदेश मानकर स्वयं को चर्यारत कर लिया, मुझे ध्यान है तुमने घर में भी वह कार्य कभी नहीं किया जिससे तुम्हारे माता -पिता -भाई को क्षोभ हो, पीड़ा हो, और मैं साक्षी हूँ की तुमने मुनिपद में कभी गुरु को रंच मात्र भी विकल्प नहीं दिए_ _मैंने देखा ज़ब 1981 में स्वाध्याय की कक्षा में किसी शिष्य नें आचार्य श्री जी से जिज्ञासा प्रकट की तब गुरु नें कहा *"चिंतन करो" बस तुमने अन्य साधक के लिए कहे गए गुरु वचन अपने लिए सूत्र बना लिए, उसके बाद तुमने भी कभी कोई जिज्ञासा गुरु से प्रकट नहीं की, ज़ब भी कोई प्रश्न तुम्हारे मन में आते और "चिंतन करो" का सूत्र तुम्हें मार्गदर्शन स्वयं देता रहा। तुम ज्ञान का पूरा सागर पी जाना चाहते थे मगर कैसे पिलाना है ये तुम्हारे गुरु जानते थे, आचार्य श्री जी से महान ग्रंथो को पढ़कर तुम अमृत ज्ञान को पीने का प्रयास करते और ज़ब कठिन विषय तुम्हें समझ नहीं आता तब भी तुम मौन रहते केवल पुस्तक की ओर ढल जाते थे, तुम्हारी मुख मुद्रा का संकेत पाकर स्वयं गुरु पूंछते की नहीं समझे?* तब काँपकर पुनः पन्ने पलटने लगना तुम्हारा हमें आज भी हर्ष से भर देता है, किसी चर्चा के समय ज़ब पूरा संघ एवं गुरु मुस्कुराते थे तब भी तुम्हारा मुस्काराना दुर्लभ था, क्यूंकि तुम गुरु को साक्षात अरिहंत मानते थे, और अरिंहतों के समक्ष हँसना भी तुम्हारे लिए कठिन परीक्षा थी_ _सदैव एक दम शांत चित्त, निर्विकल्प, नत -नेत्र, गहरे मौन में डूबे तुम सदा गुरु चरणों में बैठे रहते, कभी नजर उठाकर गुरु को देखने का साहस भी तुम जुटा नहीं पाए,_ _*गुरु से दो शब्द "चिंतन करो!" सुनकर कभी कुछ पूंछा नहीं, "जो आज्ञा गुरु जी" के अतिरिक्त कभी कुछ बोला नहीं, इन चार शब्दों में ही गुरु के निकट रहकर जिनकी साधना निखर निखर कर खिली, इन चार शब्दों से ही जिन्होंने जीवन को समयसार बना लिया, ऐंसे महान तपस्वी वीतरागी साधक आचार्य समयसिंधु को यह माँ, यह लेखनी और यह वसुंधरा प्रणाम करती है.....*_ _____________________ ✍️आशीष श्री जी 11-6-2026 (आप भी पढ़कर सभी को भेज सकते हैं ) 2026-06-11 12:48:02
221902 40449696 ?? श्री सम्मेद शिखर जी ?? <a href="https://www.instagram.com/reel/DZU3BwvJZpt/?igsh=aDgzcW9scnExNzdw" target="_blank">https://www.instagram.com/reel/DZU3BwvJZpt/?igsh=aDgzcW9scnExNzdw</a> _*कठोर परिणाम से पाप नहीं करना*_ ❌❌❌❌❌❌ @.. Acharya Shri *RatanSunder Surishwar Ji* M.S..@ ♥️♥️♥️♥️♥️♥️ 2026-06-11 12:47:53
221903 40449696 ?? श्री सम्मेद शिखर जी ?? <a href="https://www.instagram.com/reel/DZU3BwvJZpt/?igsh=aDgzcW9scnExNzdw" target="_blank">https://www.instagram.com/reel/DZU3BwvJZpt/?igsh=aDgzcW9scnExNzdw</a> _*कठोर परिणाम से पाप नहीं करना*_ ❌❌❌❌❌❌ @.. Acharya Shri *RatanSunder Surishwar Ji* M.S..@ ♥️♥️♥️♥️♥️♥️ 2026-06-11 12:47:53
221901 40449660 Acharya PulakSagarji 07 धर्म की धारा, ज्ञान की गंगा - आइए ,जीवन को बनाए पावन, सुंदर और सफल । 2026-06-11 12:46:43
221900 40449660 Acharya PulakSagarji 07 धर्म की धारा, ज्ञान की गंगा - आइए ,जीवन को बनाए पावन, सुंदर और सफल । 2026-06-11 12:46:42
221899 48925761 आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज.3 *?दूध के जले - छाछ में सतर्क ?* 11-6-2026 गुरुवार ________________________ *मैं धरती की सबसे पुण्यशाली माँ होने का गौरव प्राप्त कर चुकी थी, मेरा मन सारी दुनिया को विद्यासमय की गाथा को सुनाने का है, यह सब एक कालचक्र द्वारा रचित वह जीवंत अद्भुत संस्मरण हैं जहाँ हम कदम कदम पर नियति के नियोजन के दर्शन कर रहे थे,* _चलिए मैं आपको पुनः पचपन वर्ष पीछे ले चलती हूँ, विद्या के सागर तो विद्या के सागर थे ही अब उसमें समय का भी विलय हो गया था, विद्या एवं समय का एक लघु संघ अद्भुत था, भारत वर्ष नें केवल युवा मुनियों की कहानियाँ सुनी थी, पहली बार दो नवयुवक अपनी इन्द्रियों को जीत विजेता बन दिगंबर स्वरूप में भ्रमण करके सभी को आश्चर्य एवं श्रद्धा से भर रहे थे, द्रोणगिरी के जंगलो में ज़ब आप दोनों खड़े होकर घंटो ध्यान लगाते थे तब आपमें भगवान बाहुबली का व्यक्तित्व झलक आता था!_ _मैं देख रही थी विद्या अनुगामी मुनि श्री समयसागर जी के रूप में आने वाला समय स्वर्णिम होने वाला था, जैन धर्म का यह विशाल आकाश कभी बिना सूर्य के रह न पाए, नियति का यह प्रयोजन समय दीक्षा से आज पूर्ण हो गया था!_ _उस वक़्त गुरु का अवलम्बन पाकर तुम नितांत अशरण होकर भी शरण पा गए थे, मानो तुम खुद को खोकर खुद को पा गए थे, आज देखती हूँ तुम आध्यत्मिक आकाश में इतने ऊँचे पहुंच गए हो की मैं चाहकर भी अब तुम्हारी समीपता नहीं पा सकती_ _*मैं देखकर विस्मित हूँ की दूध का जला छाछ को फूँक - फूँक कर पीता है, यह कहावत कभी समयसागर जी पर चरितार्थ नहीं हुई, क्युकी वो कभी दूध से जले ही नहीं, कोई गलती उन्होंने की ही नहीं, अपितु दूसरों को दूध से जला देखकर स्वयं छाछ फूँककर पीने की कला तुममें बचपन से आ चुकी थी, तुम्हारे जेष्ठ भ्राता नें तुम्हें यह घर में ही समझा दिया था की अपनी गलतियों से सीखने के लिए जीवन लम्बा नहीं है, समझदार वही है जो दूसरों की गलतियों से सीख ले लें!*_ _मुनि समयसागर जी उन्ही समझदारों में से थे, जिन्होंने कभी गुरु आदेश की प्रतीक्षा नहीं की अपितु उनके उपदेश को ही आदेश मानकर स्वयं को चर्यारत कर लिया, मुझे ध्यान है तुमने घर में भी वह कार्य कभी नहीं किया जिससे तुम्हारे माता -पिता -भाई को क्षोभ हो, पीड़ा हो, और मैं साक्षी हूँ की तुमने मुनिपद में कभी गुरु को रंच मात्र भी विकल्प नहीं दिए_ _मैंने देखा ज़ब 1981 में स्वाध्याय की कक्षा में किसी शिष्य नें आचार्य श्री जी से जिज्ञासा प्रकट की तब गुरु नें कहा *"चिंतन करो" बस तुमने अन्य साधक के लिए कहे गए गुरु वचन अपने लिए सूत्र बना लिए, उसके बाद तुमने भी कभी कोई जिज्ञासा गुरु से प्रकट नहीं की, ज़ब भी कोई प्रश्न तुम्हारे मन में आते और "चिंतन करो" का सूत्र तुम्हें मार्गदर्शन स्वयं देता रहा। तुम ज्ञान का पूरा सागर पी जाना चाहते थे मगर कैसे पिलाना है ये तुम्हारे गुरु जानते थे, आचार्य श्री जी से महान ग्रंथो को पढ़कर तुम अमृत ज्ञान को पीने का प्रयास करते और ज़ब कठिन विषय तुम्हें समझ नहीं आता तब भी तुम मौन रहते केवल पुस्तक की ओर ढल जाते थे, तुम्हारी मुख मुद्रा का संकेत पाकर स्वयं गुरु पूंछते की नहीं समझे?* तब काँपकर पुनः पन्ने पलटने लगना तुम्हारा हमें आज भी हर्ष से भर देता है, किसी चर्चा के समय ज़ब पूरा संघ एवं गुरु मुस्कुराते थे तब भी तुम्हारा मुस्काराना दुर्लभ था, क्यूंकि तुम गुरु को साक्षात अरिहंत मानते थे, और अरिंहतों के समक्ष हँसना भी तुम्हारे लिए कठिन परीक्षा थी_ _सदैव एक दम शांत चित्त, निर्विकल्प, नत -नेत्र, गहरे मौन में डूबे तुम सदा गुरु चरणों में बैठे रहते, कभी नजर उठाकर गुरु को देखने का साहस भी तुम जुटा नहीं पाए,_ _*गुरु से दो शब्द "चिंतन करो!" सुनकर कभी कुछ पूंछा नहीं, "जो आज्ञा गुरु जी" के अतिरिक्त कभी कुछ बोला नहीं, इन चार शब्दों में ही गुरु के निकट रहकर जिनकी साधना निखर निखर कर खिली, इन चार शब्दों से ही जिन्होंने जीवन को समयसार बना लिया, ऐंसे महान तपस्वी वीतरागी साधक आचार्य समयसिंधु को यह माँ, यह लेखनी और यह वसुंधरा प्रणाम करती है.....*_ _____________________ ✍️आशीष श्री जी 11-6-2026 (आप भी पढ़कर सभी को भेज सकते हैं ) 2026-06-11 12:44:56
221898 48925761 आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज.3 *?दूध के जले - छाछ में सतर्क ?* 11-6-2026 गुरुवार ________________________ *मैं धरती की सबसे पुण्यशाली माँ होने का गौरव प्राप्त कर चुकी थी, मेरा मन सारी दुनिया को विद्यासमय की गाथा को सुनाने का है, यह सब एक कालचक्र द्वारा रचित वह जीवंत अद्भुत संस्मरण हैं जहाँ हम कदम कदम पर नियति के नियोजन के दर्शन कर रहे थे,* _चलिए मैं आपको पुनः पचपन वर्ष पीछे ले चलती हूँ, विद्या के सागर तो विद्या के सागर थे ही अब उसमें समय का भी विलय हो गया था, विद्या एवं समय का एक लघु संघ अद्भुत था, भारत वर्ष नें केवल युवा मुनियों की कहानियाँ सुनी थी, पहली बार दो नवयुवक अपनी इन्द्रियों को जीत विजेता बन दिगंबर स्वरूप में भ्रमण करके सभी को आश्चर्य एवं श्रद्धा से भर रहे थे, द्रोणगिरी के जंगलो में ज़ब आप दोनों खड़े होकर घंटो ध्यान लगाते थे तब आपमें भगवान बाहुबली का व्यक्तित्व झलक आता था!_ _मैं देख रही थी विद्या अनुगामी मुनि श्री समयसागर जी के रूप में आने वाला समय स्वर्णिम होने वाला था, जैन धर्म का यह विशाल आकाश कभी बिना सूर्य के रह न पाए, नियति का यह प्रयोजन समय दीक्षा से आज पूर्ण हो गया था!_ _उस वक़्त गुरु का अवलम्बन पाकर तुम नितांत अशरण होकर भी शरण पा गए थे, मानो तुम खुद को खोकर खुद को पा गए थे, आज देखती हूँ तुम आध्यत्मिक आकाश में इतने ऊँचे पहुंच गए हो की मैं चाहकर भी अब तुम्हारी समीपता नहीं पा सकती_ _*मैं देखकर विस्मित हूँ की दूध का जला छाछ को फूँक - फूँक कर पीता है, यह कहावत कभी समयसागर जी पर चरितार्थ नहीं हुई, क्युकी वो कभी दूध से जले ही नहीं, कोई गलती उन्होंने की ही नहीं, अपितु दूसरों को दूध से जला देखकर स्वयं छाछ फूँककर पीने की कला तुममें बचपन से आ चुकी थी, तुम्हारे जेष्ठ भ्राता नें तुम्हें यह घर में ही समझा दिया था की अपनी गलतियों से सीखने के लिए जीवन लम्बा नहीं है, समझदार वही है जो दूसरों की गलतियों से सीख ले लें!*_ _मुनि समयसागर जी उन्ही समझदारों में से थे, जिन्होंने कभी गुरु आदेश की प्रतीक्षा नहीं की अपितु उनके उपदेश को ही आदेश मानकर स्वयं को चर्यारत कर लिया, मुझे ध्यान है तुमने घर में भी वह कार्य कभी नहीं किया जिससे तुम्हारे माता -पिता -भाई को क्षोभ हो, पीड़ा हो, और मैं साक्षी हूँ की तुमने मुनिपद में कभी गुरु को रंच मात्र भी विकल्प नहीं दिए_ _मैंने देखा ज़ब 1981 में स्वाध्याय की कक्षा में किसी शिष्य नें आचार्य श्री जी से जिज्ञासा प्रकट की तब गुरु नें कहा *"चिंतन करो" बस तुमने अन्य साधक के लिए कहे गए गुरु वचन अपने लिए सूत्र बना लिए, उसके बाद तुमने भी कभी कोई जिज्ञासा गुरु से प्रकट नहीं की, ज़ब भी कोई प्रश्न तुम्हारे मन में आते और "चिंतन करो" का सूत्र तुम्हें मार्गदर्शन स्वयं देता रहा। तुम ज्ञान का पूरा सागर पी जाना चाहते थे मगर कैसे पिलाना है ये तुम्हारे गुरु जानते थे, आचार्य श्री जी से महान ग्रंथो को पढ़कर तुम अमृत ज्ञान को पीने का प्रयास करते और ज़ब कठिन विषय तुम्हें समझ नहीं आता तब भी तुम मौन रहते केवल पुस्तक की ओर ढल जाते थे, तुम्हारी मुख मुद्रा का संकेत पाकर स्वयं गुरु पूंछते की नहीं समझे?* तब काँपकर पुनः पन्ने पलटने लगना तुम्हारा हमें आज भी हर्ष से भर देता है, किसी चर्चा के समय ज़ब पूरा संघ एवं गुरु मुस्कुराते थे तब भी तुम्हारा मुस्काराना दुर्लभ था, क्यूंकि तुम गुरु को साक्षात अरिहंत मानते थे, और अरिंहतों के समक्ष हँसना भी तुम्हारे लिए कठिन परीक्षा थी_ _सदैव एक दम शांत चित्त, निर्विकल्प, नत -नेत्र, गहरे मौन में डूबे तुम सदा गुरु चरणों में बैठे रहते, कभी नजर उठाकर गुरु को देखने का साहस भी तुम जुटा नहीं पाए,_ _*गुरु से दो शब्द "चिंतन करो!" सुनकर कभी कुछ पूंछा नहीं, "जो आज्ञा गुरु जी" के अतिरिक्त कभी कुछ बोला नहीं, इन चार शब्दों में ही गुरु के निकट रहकर जिनकी साधना निखर निखर कर खिली, इन चार शब्दों से ही जिन्होंने जीवन को समयसार बना लिया, ऐंसे महान तपस्वी वीतरागी साधक आचार्य समयसिंधु को यह माँ, यह लेखनी और यह वसुंधरा प्रणाम करती है.....*_ _____________________ ✍️आशीष श्री जी 11-6-2026 (आप भी पढ़कर सभी को भेज सकते हैं ) 2026-06-11 12:44:55
221897 40449690 गुरु आर्जव वाणी New 1️⃣ *आचार्य भगवन् श्री आर्जवसागर जी महामुनिराज ससंघ धामनिया में विराजमान हैं।* *? भगवन् श्री आर्जवसागर जी महामुनिराज ?* ✨ संघ एवं गुरुदेव के नवीन अपडेट ? आज ही जुड़ें — Aarjav Vani से ?????????????? ? WhatsApp Channel Aarjav Vani WhatsApp Channel <a href="https://whatsapp.com/channel/0029VbBeFgP2UPBJUIcY4H1h" target="_blank">https://whatsapp.com/channel/0029VbBeFgP2UPBJUIcY4H1h</a> ? संपर्क सूत्र: ? 9174843674 ? गुरु आर्जव वाणी 2026-06-11 12:43:58
221896 40449690 गुरु आर्जव वाणी New 1️⃣ *आचार्य भगवन् श्री आर्जवसागर जी महामुनिराज ससंघ धामनिया में विराजमान हैं।* *? भगवन् श्री आर्जवसागर जी महामुनिराज ?* ✨ संघ एवं गुरुदेव के नवीन अपडेट ? आज ही जुड़ें — Aarjav Vani से ?????????????? ? WhatsApp Channel Aarjav Vani WhatsApp Channel <a href="https://whatsapp.com/channel/0029VbBeFgP2UPBJUIcY4H1h" target="_blank">https://whatsapp.com/channel/0029VbBeFgP2UPBJUIcY4H1h</a> ? संपर्क सूत्र: ? 9174843674 ? गुरु आर्जव वाणी 2026-06-11 12:43:57