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80156 48340398 ???गुरु भगवान??? ? पुष्पमाला-अरिहंत और आचार्यकी पूजा का उपकरण हैं । ?सर्वार्थ सिद्धि - (तत्त्वार्थसूत्र) अध्याय -७, सुत्र-३४ अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादानसंस्तरोपक्रमणा नादरस्मृत्यनुप-स्थानानि।।३४।। टीका - आचार्य पुज्यपाद- अप्रत्यवेक्षिताप्रमाजितस्यार्हदाचार्यपूजोपकरणस्य गंधमाल्यधूपारात्मपरिधानाद्यर्थस्य चवस्त्रादेरादानमप्रत्यवेक्षिताप्रमाजितादानम् । ?अर्थ - अरहंत और आचार्यकी पूजाके उपकरण, गन्ध, पूष्पमाला और धूप आदिको तथा अपने ओढ़नेआदिके वस्त्रादि पदार्थोंको बिना देखे और बिना परिमार्जन किये हुए ले लेना अप्रत्यवेक्षिता- प्रमार्जितादान है। ???????????? ? भगवान के चरणों पर पुष्पमाला:- ? शास्त्र :- षट्खण्डागम ( धवला ) आचार्य :- पुष्पदंत/भूतबली पुस्तक -16 मोक्षानुयोगव्दार ( मंगलाचरण ) अर्थ:- मधु को करने वाले भ्रमरों से व्याकुल ऐसे विकसित धवल और सुगन्धित पुष्पमालाओं के व्दारा मल्लि जिनेन्द्रकी पूजा करके मोक्ष अनुयोगव्दार की प्ररुपणा करते हैं । ???????????? ? शास्त्र-उत्तरपुराण ?आचार्य :- भगवदगुणभद्रार्य पद्य :-जयसेनापि सध्दर्म्म तत्रादायंकदा मुदा । पर्वोवासपरिम्लानतनुरभ्यर्च्य साअर्हतः । तत्पादपड्कजाश्लेष पवित्रां पापहां स्त्रजम । चित्रां पिचेअदित व्दाभ्यां हस्ताभ्यां विनयानता ।। ➡ अर्थ :- किसी समय पवित्र धर्म को स्वीकार करके, अष्टान्हिका पर्व सम्बन्धी उपवासों से खेद खिन्न शरीर को धारण करने वाली जयसेना जिन भगवान की पूजन करके भगवान के चरण कमलों पर चढणे से पवित्र और पापों के नाश करने वाली पुष्पमाला को विनय पूर्वक अपने दोनों हाथों से पिता के लिये देती है l ???????????? ?तिलोय पण्णत्ति /५/१०७, ?आचार्य श्री यति वृषभाचार्य सयवंतगा य चंपयमाला पुण्णायणायपहुदीहिं। अच्चंति ताओ देवा सुरहीहिं कुसुममालाहिं। १०७। ?अर्थ:- वे देव सेवन्ती, चम्पकमाला, पुंनाग और नाग प्रभृति सुगन्धित पुष्पमालाओं से उन प्रतिमाओं की पूजा करते हैं। १०७। ???????????? ?राजवार्तिक./६/२/१/५३१/३३ ?आचार्य :-भट्ट अकलकं देवतानिवेद्यानिवेद्यग्रहण (अन्तरायस्यास्रवः)। ?अर्थ:-मन्दिर के गन्ध माल्य धूपादि का चुराना, अशुभ नामकर्म के आस्रव का कारण है।देवता के लिए निवेदित किये या अनिवेदित किये गये द्रव्य का ग्रहण अन्तराय कर्म के आस्रव का कारण है। (त.सा./४/५६)। ???????????? ? शास्त्र:- त्रिवर्णाचार ?आचार्य सोमदेव जिनाड्घि स्पर्शितां मालां निर्मले कंठदेशके । ➡ अर्थ:- जिन भगवान के चरणों पर चढी हुई पुष्पमाला को अपने कंठ में धारण करना चाहिये । ???????????? ? शास्त्र:- मूलाचार भाग-1 ?आचार्य :- श्रीमद् वट्टकेर गाथा नं-578; पेज नं- 429 ?पूजा कर्म- जिन अक्षर आदिकों के व्दारा अरिहंत देव आदि पूजे जाते हैं - अर्चेजाते है ऐसा बहुवचन से उच्चारण कर उनको जो पुष्पमाला चंदन आदि चढाये जाते हैं वह पूजा कर्म कहलाता है । ???????????? ? आदिपुराण ?आचार्य:- जिनसेन यथाहिकुलपुत्राणां माल्यं गुरुशिरोघृतम् । मान्यमिव जिनेन्द्राड्घि स्पर्शान्माल्यादिभूषतम् । ? अर्थ:- जिस तरह पवित्र कुल के बालकों को अपने बडे जनों के मस्तक पर की पुष्पमाला स्वीकार करने योग्य है उसी तरह जिन भगवान के चरणों पर चढे हुए पुष्पमाल्य तथा चन्दनादि तुम्हे स्वीकार करने योग्य है । ???????????? ?शास्त्र:-उमास्वामी श्रावकाचार ?आचार्य :-उमास्वामी माल्यगंधप्रधूपाद्यै:, सचित्तै: कोऽर्चयेज्जिनम्। सावद्यसंभवं वक्ति य:, स एवं प्रबोध्यते।।१४०।। जिनार्चानेकजन्मोत्थं, किल्विषं हंति यत्कृतम्। सा किंचिद् यजनाचारभवं सावद्यमंगिनाम्।।१४१।। ?अर्थ-कोई कोई लोग यह कहते हैं कि पुष्पमाला आदि सचित्त पदार्थों से भगवान की पूजा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि सचित्त पदार्थों से पूजा करने में सावद्य जन्य पाप (सचित्त के आरंभ से उत्पन्न हुआ पाप) उत्पन्न होता है। उनके लिए आचार्य समझाते हैं कि भगवान की पूजा करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं फिर क्या उसी पूजा से उसी पूजा में होने वाला आंरभ जनित वा सचित्तजन्य थोड़ा सा पाप नष्ट नहीं होगा ? अवश्य होगा। ‌ ✋शुभाशीर्वाद आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति 2026-04-12 14:32:15
80155 48340398 ???गुरु भगवान??? ? पुष्पमाला-अरिहंत और आचार्यकी पूजा का उपकरण हैं । ?सर्वार्थ सिद्धि - (तत्त्वार्थसूत्र) अध्याय -७, सुत्र-३४ अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादानसंस्तरोपक्रमणा नादरस्मृत्यनुप-स्थानानि।।३४।। टीका - आचार्य पुज्यपाद- अप्रत्यवेक्षिताप्रमाजितस्यार्हदाचार्यपूजोपकरणस्य गंधमाल्यधूपारात्मपरिधानाद्यर्थस्य चवस्त्रादेरादानमप्रत्यवेक्षिताप्रमाजितादानम् । ?अर्थ - अरहंत और आचार्यकी पूजाके उपकरण, गन्ध, पूष्पमाला और धूप आदिको तथा अपने ओढ़नेआदिके वस्त्रादि पदार्थोंको बिना देखे और बिना परिमार्जन किये हुए ले लेना अप्रत्यवेक्षिता- प्रमार्जितादान है। ???????????? ? भगवान के चरणों पर पुष्पमाला:- ? शास्त्र :- षट्खण्डागम ( धवला ) आचार्य :- पुष्पदंत/भूतबली पुस्तक -16 मोक्षानुयोगव्दार ( मंगलाचरण ) अर्थ:- मधु को करने वाले भ्रमरों से व्याकुल ऐसे विकसित धवल और सुगन्धित पुष्पमालाओं के व्दारा मल्लि जिनेन्द्रकी पूजा करके मोक्ष अनुयोगव्दार की प्ररुपणा करते हैं । ???????????? ? शास्त्र-उत्तरपुराण ?आचार्य :- भगवदगुणभद्रार्य पद्य :-जयसेनापि सध्दर्म्म तत्रादायंकदा मुदा । पर्वोवासपरिम्लानतनुरभ्यर्च्य साअर्हतः । तत्पादपड्कजाश्लेष पवित्रां पापहां स्त्रजम । चित्रां पिचेअदित व्दाभ्यां हस्ताभ्यां विनयानता ।। ➡ अर्थ :- किसी समय पवित्र धर्म को स्वीकार करके, अष्टान्हिका पर्व सम्बन्धी उपवासों से खेद खिन्न शरीर को धारण करने वाली जयसेना जिन भगवान की पूजन करके भगवान के चरण कमलों पर चढणे से पवित्र और पापों के नाश करने वाली पुष्पमाला को विनय पूर्वक अपने दोनों हाथों से पिता के लिये देती है l ???????????? ?तिलोय पण्णत्ति /५/१०७, ?आचार्य श्री यति वृषभाचार्य सयवंतगा य चंपयमाला पुण्णायणायपहुदीहिं। अच्चंति ताओ देवा सुरहीहिं कुसुममालाहिं। १०७। ?अर्थ:- वे देव सेवन्ती, चम्पकमाला, पुंनाग और नाग प्रभृति सुगन्धित पुष्पमालाओं से उन प्रतिमाओं की पूजा करते हैं। १०७। ???????????? ?राजवार्तिक./६/२/१/५३१/३३ ?आचार्य :-भट्ट अकलकं देवतानिवेद्यानिवेद्यग्रहण (अन्तरायस्यास्रवः)। ?अर्थ:-मन्दिर के गन्ध माल्य धूपादि का चुराना, अशुभ नामकर्म के आस्रव का कारण है।देवता के लिए निवेदित किये या अनिवेदित किये गये द्रव्य का ग्रहण अन्तराय कर्म के आस्रव का कारण है। (त.सा./४/५६)। ???????????? ? शास्त्र:- त्रिवर्णाचार ?आचार्य सोमदेव जिनाड्घि स्पर्शितां मालां निर्मले कंठदेशके । ➡ अर्थ:- जिन भगवान के चरणों पर चढी हुई पुष्पमाला को अपने कंठ में धारण करना चाहिये । ???????????? ? शास्त्र:- मूलाचार भाग-1 ?आचार्य :- श्रीमद् वट्टकेर गाथा नं-578; पेज नं- 429 ?पूजा कर्म- जिन अक्षर आदिकों के व्दारा अरिहंत देव आदि पूजे जाते हैं - अर्चेजाते है ऐसा बहुवचन से उच्चारण कर उनको जो पुष्पमाला चंदन आदि चढाये जाते हैं वह पूजा कर्म कहलाता है । ???????????? ? आदिपुराण ?आचार्य:- जिनसेन यथाहिकुलपुत्राणां माल्यं गुरुशिरोघृतम् । मान्यमिव जिनेन्द्राड्घि स्पर्शान्माल्यादिभूषतम् । ? अर्थ:- जिस तरह पवित्र कुल के बालकों को अपने बडे जनों के मस्तक पर की पुष्पमाला स्वीकार करने योग्य है उसी तरह जिन भगवान के चरणों पर चढे हुए पुष्पमाल्य तथा चन्दनादि तुम्हे स्वीकार करने योग्य है । ???????????? ?शास्त्र:-उमास्वामी श्रावकाचार ?आचार्य :-उमास्वामी माल्यगंधप्रधूपाद्यै:, सचित्तै: कोऽर्चयेज्जिनम्। सावद्यसंभवं वक्ति य:, स एवं प्रबोध्यते।।१४०।। जिनार्चानेकजन्मोत्थं, किल्विषं हंति यत्कृतम्। सा किंचिद् यजनाचारभवं सावद्यमंगिनाम्।।१४१।। ?अर्थ-कोई कोई लोग यह कहते हैं कि पुष्पमाला आदि सचित्त पदार्थों से भगवान की पूजा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि सचित्त पदार्थों से पूजा करने में सावद्य जन्य पाप (सचित्त के आरंभ से उत्पन्न हुआ पाप) उत्पन्न होता है। उनके लिए आचार्य समझाते हैं कि भगवान की पूजा करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं फिर क्या उसी पूजा से उसी पूजा में होने वाला आंरभ जनित वा सचित्तजन्य थोड़ा सा पाप नष्ट नहीं होगा ? अवश्य होगा। ‌ ✋शुभाशीर्वाद आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति 2026-04-12 14:32:14
80154 40449749 जिनोदय?JINODAYA *♟️प्रणाम सादर जय जिनेन्द्र♟️* *?जागो जैनों जागो?* *?सूरत शहर में समाविष्ट* *श्री गोपीपुरा / nanavat/rander तीर्थ को लेके खास सूचना।* *?यह तीर्थ क्षेत्र में 60 से अधिक 100 से 800 साल प्राचीन श्वेतांबर जैन मंदिर एवम 50 से अधिक उपाश्रय, भोजनशाला,लाइब्रेरी, इत्यादि है।बहुत छोटा सा भूमि क्षेत्र है।* *50 साल पहले कई श्रेष्ठी ऑ ने कई सारे बहुमंजिल इमारत बनवाकर सूरत में बिजनेस के लिए आनेवाले लोगो को बसाए थे। आज इश्मेसे अधिकतम परिवार करोड़पति है।और सूरत के पाल, वेसु,athwalince क्षेत्र में निवास करते है।* *सन 2005 से कई परिवारों ने अपने इस पवित्र मकान मुस्लिम समुदाय के लोगो को बेचना शुरू किया l तीर्थ भूमि jokham में आ गई। चातुर्मास और अन्य कार्यक्रम में कमी आ गई। आज ये स्तिथि है की बहुत मुस्किल से एक chaturmas का लाभ मिलता है।हमे 2012 से संघर्ष करके इस क्षेत्र को अशांत घोषित करवाकर खास नियम में लाना पड़ा। नियम यह है की कोई भी प्रॉपर्टी बिकने से पहले कलेक्टर की मंजूरी लेनी होगी। आज परिस्थिति यह हे की कई जैन एवम हिंदू बिना परमिशन अपनी प्रॉपर्टी मुस्लिम लोगो को धन लालच में आ कर बेच रहे है।हमारे कई सारे फ्लेट में कायमी निवासित वृद्ध साध्वी जी को निर्वासित होना पड़ा है।* *प्रशासन को इसे मकान खाली करवाने आवेदन दिए है। प्रशासन कार्य निभा सकती नही है क्योंकि वो कुछ जैन लोग ही प्रशासन का इस कार्य का पॉलिटिकल दबाव लेके विरोध करती है।* *इस में अधिकतर नामी श्रेष्ठी है।* *?आज तक हम लोग खूब दुखी होकर इस नामी लोगो के सामने तीर्थ भूमि बचने हाईकोर्ट तक आपने निजी द्रव्य से लड़े है।अधिकतम बचाया है।* *आज आपके माध्यम से हम ये मेसेज उन नामी लोगो को देना चाहते ही की ,आप अपनी संपत्ति मुसलमान नो को धन की लालच में बेचना बंद करे।कई परिवार सूरत में बिजनेस करने आ रहे है। उनको बेचे।या भाड़े पर दे। या बंद रखे,।या समाज के हेतु दान करे। तीर्थ के विकास में दान करे। पर अपने बूचड़खाना न बनाए।10 से 25 लाख की संपति दान से आपकी कारोडो की संपति से कुछ कम नहीं होगा।* *?अभी तक हमने खूब सयम रखकर समाज के सामने आप के नाम जाहिर किए नही है। करना चाहते भी नहीं है।कृपया आप मुसलमान को अपनी संपत्ति के मकान बेचना बंद करे। मध्यम वर्गीय हिंदू और जैन को sanri से रहने दे।आज जो 800 जैन परिवार इस तीर्थ क्षेत्र में रहते है उनको रहने दे।* *?अगर आप अभी नहीं समझे तो पूरे भारत वर्ष से आपका सामाजिक ,आर्थिक ,धार्मिक बहिष्कार होगा।* *सिर्फ दो दिन में आपका सूरत कलेक्टर को हिंदू जैन तीर्थ में मुस्लिम बसने का ज्ञापन वापस ले। सभी अर्जी वापस ले।हमारे लिए त्राहित शब्द प्रयोग बंद करे।कुछ अज्ञात जैन ट्रस्टीज जो मुंबई में है वो अपने पितृ ओ से मिली ट्रस्ट की भूमि बेचना बंद करे।जैन* *स्कूल ,उपाश्रय,सेनेटोरियम बेचना बंद करे।आपके पास इस ट्रस्ट से मिला धन को तीर्थ के विकास में और अपनी प्रॉपर्टी के नवीनीकरण हेतु समर्पित करे।* *?धन्यवाद* *♦️गोपीपुरा/ नानावत क्षेत्र संवर्धन समिति सूरत के सभी जैन हिंदू द्वारा विनती है।* *?सिर्फ जैन समाज ग्रुप में भेजे?* ????????? 2026-04-12 14:30:54
80153 40449749 जिनोदय?JINODAYA *♟️प्रणाम सादर जय जिनेन्द्र♟️* *?जागो जैनों जागो?* *?सूरत शहर में समाविष्ट* *श्री गोपीपुरा / nanavat/rander तीर्थ को लेके खास सूचना।* *?यह तीर्थ क्षेत्र में 60 से अधिक 100 से 800 साल प्राचीन श्वेतांबर जैन मंदिर एवम 50 से अधिक उपाश्रय, भोजनशाला,लाइब्रेरी, इत्यादि है।बहुत छोटा सा भूमि क्षेत्र है।* *50 साल पहले कई श्रेष्ठी ऑ ने कई सारे बहुमंजिल इमारत बनवाकर सूरत में बिजनेस के लिए आनेवाले लोगो को बसाए थे। आज इश्मेसे अधिकतम परिवार करोड़पति है।और सूरत के पाल, वेसु,athwalince क्षेत्र में निवास करते है।* *सन 2005 से कई परिवारों ने अपने इस पवित्र मकान मुस्लिम समुदाय के लोगो को बेचना शुरू किया l तीर्थ भूमि jokham में आ गई। चातुर्मास और अन्य कार्यक्रम में कमी आ गई। आज ये स्तिथि है की बहुत मुस्किल से एक chaturmas का लाभ मिलता है।हमे 2012 से संघर्ष करके इस क्षेत्र को अशांत घोषित करवाकर खास नियम में लाना पड़ा। नियम यह है की कोई भी प्रॉपर्टी बिकने से पहले कलेक्टर की मंजूरी लेनी होगी। आज परिस्थिति यह हे की कई जैन एवम हिंदू बिना परमिशन अपनी प्रॉपर्टी मुस्लिम लोगो को धन लालच में आ कर बेच रहे है।हमारे कई सारे फ्लेट में कायमी निवासित वृद्ध साध्वी जी को निर्वासित होना पड़ा है।* *प्रशासन को इसे मकान खाली करवाने आवेदन दिए है। प्रशासन कार्य निभा सकती नही है क्योंकि वो कुछ जैन लोग ही प्रशासन का इस कार्य का पॉलिटिकल दबाव लेके विरोध करती है।* *इस में अधिकतर नामी श्रेष्ठी है।* *?आज तक हम लोग खूब दुखी होकर इस नामी लोगो के सामने तीर्थ भूमि बचने हाईकोर्ट तक आपने निजी द्रव्य से लड़े है।अधिकतम बचाया है।* *आज आपके माध्यम से हम ये मेसेज उन नामी लोगो को देना चाहते ही की ,आप अपनी संपत्ति मुसलमान नो को धन की लालच में बेचना बंद करे।कई परिवार सूरत में बिजनेस करने आ रहे है। उनको बेचे।या भाड़े पर दे। या बंद रखे,।या समाज के हेतु दान करे। तीर्थ के विकास में दान करे। पर अपने बूचड़खाना न बनाए।10 से 25 लाख की संपति दान से आपकी कारोडो की संपति से कुछ कम नहीं होगा।* *?अभी तक हमने खूब सयम रखकर समाज के सामने आप के नाम जाहिर किए नही है। करना चाहते भी नहीं है।कृपया आप मुसलमान को अपनी संपत्ति के मकान बेचना बंद करे। मध्यम वर्गीय हिंदू और जैन को sanri से रहने दे।आज जो 800 जैन परिवार इस तीर्थ क्षेत्र में रहते है उनको रहने दे।* *?अगर आप अभी नहीं समझे तो पूरे भारत वर्ष से आपका सामाजिक ,आर्थिक ,धार्मिक बहिष्कार होगा।* *सिर्फ दो दिन में आपका सूरत कलेक्टर को हिंदू जैन तीर्थ में मुस्लिम बसने का ज्ञापन वापस ले। सभी अर्जी वापस ले।हमारे लिए त्राहित शब्द प्रयोग बंद करे।कुछ अज्ञात जैन ट्रस्टीज जो मुंबई में है वो अपने पितृ ओ से मिली ट्रस्ट की भूमि बेचना बंद करे।जैन* *स्कूल ,उपाश्रय,सेनेटोरियम बेचना बंद करे।आपके पास इस ट्रस्ट से मिला धन को तीर्थ के विकास में और अपनी प्रॉपर्टी के नवीनीकरण हेतु समर्पित करे।* *?धन्यवाद* *♦️गोपीपुरा/ नानावत क्षेत्र संवर्धन समिति सूरत के सभी जैन हिंदू द्वारा विनती है।* *?सिर्फ जैन समाज ग्रुप में भेजे?* ????????? 2026-04-12 14:30:53
80152 40449749 जिनोदय?JINODAYA *?प्रणाम सादर जय जिनेन्द्र?* *?जागो जैनों जागो?* *♟️आजकल उपाधियां* *दी नहीं ली जा रही है!* ????????? ✍️ *जे. के. संघवी (थाने-आहोर)* ????????? *?वैसे सदियों से गुणवानों का गौरव होता ही रहा है। विशिष्ट गुणों के कारण साधु संतों को भी विशिष्ट उपाधियों से अलंकृत किया गया है। व्यक्ति के गुणों से उपाधि का गौरव बढ़ता हो तो ठीक है किन्तु आजकल तो उपाधि की चमक से व्यक्ति को जबरदस्ती चमकाया जा रहा है। क्या साधु, संत महात्मा या मुनि अपने आप में कम उपाधि है? शास्त्रानुसार एक मुनि बनने के लिये भी कितना त्यागमय जीवन जीना होता है एवं कितने गुणों को जीवन में उतारना पड़ता है। जैन शास्त्रों के अनुसार पंच परमेष्ठी में प्रथम साधु (मुनि) के बाद क्रमशः आध्यात्मिक विकास करते हुए व्यक्ति उपाध्याय और आचार्य बनता है। गुणों के क्रमिक विकास के साथ ही गुरु द्वारा ये उपाधियाँ (पदवियाँ) प्रदान की जाती रही है। किन्तु वर्तमान में यह देखा जा रहा है कि अधिकांश पदवियाँ शिक्षा या गुणों के आधार पर नहीं बल्कि जोड-तोड कर जबरन हासिल की जा रही है। आजकल आचार्य बनने की होड लगी हुयी है। तीन साधुओं में दो आचार्य व एक मुनि भी कई बार देखे गये हैं। यह तो अच्छा है कि इस काल में शास्त्रानुसार चौवीस तीर्थंकर हो चुके हैं व केवलज्ञान की प्राप्ति के बिना सिद्ध या अरिंहत होते नहीं, नहीं तो सिद्ध व अरिहंत की उपाधियाँ भी ले ली जाती। आचार्य पद की जोड़-तोड द्वारा सहज प्राप्ति के कारण मात्र श्वेताम्बर मू.पू. सम्प्रदाय में ही देखिये कि कितने आचार्य बन गये हैं। उसमें भी एक-एक गच्छ में भी कई आचार्य हैं। थोड़े दिन पहले पालीताणा में दो मुनियों को उपाध्याय पद दिया गया। मजे की बात तो यह है कि उसमें से एक मुनि ने तो उसके पूर्व ही अपनी जेबी संस्था के नाम से पद ग्रहण करने का विज्ञापन पत्रों में छपवा भी दिया था। जब आचार्य श्री से इस विषय में बात हुयी तो वे कहने लगे कि क्या करूं? मेरा तो कोई मानता ही नहीं हैं। जब वे मुनि अपने आप ही पदवी ले रहे हैं, तो अच्छा है कि मैं ही दे दूं। इस प्रकार उनको रोका जाकर फिर पदवी दी गयी। एक आचार्य के सामर्थ्य की जगह उनकी लाचारी देखकर दिल को बड़ा दुःख हुआ। साधुओं द्वारा पदवीयाँ लेकर अपनी दुकानदारी अलग जमाने में तथाकथित श्रावकों का योगदान भी कम नहीं है। समाज में अपना रुतबा रखने के लिये वे उनकी गिरावट को पत्रिकाओं की सजावट द्वारा नजर नहीं आने देते अर्थात् उनके नाम के आगे दुनिया भर के शब्दकोषों से विशेषण लाकर एक अम्बार खडा कर देते हैं और आम जनता जो सारी बातों से बेखबर है, उनकी फिराक में आ जाती है। पिछले दिनों मुम्बई में ऐसे ही एक आचार्य को चुपके से एक विशेष विशेषण प्रदान किया गया चलते कार्यक्रम में एक नेता द्वारा उन्हें अभिनंदन पत्र दिलाया गया। न तो वो नेता उन साधु से परिचित और न ही कार्यक्रम में कोई घोषणा की गयी कि उनके द्वारा क्या करवाया जा रहा है, किन्तु सभी पत्र-पत्रिकाओं में जोरे-शोर से जाहिरात कर दी गयी कि अमुक नेता द्वारा आचार्य श्री को उपाधि प्रदानकी गयी।* *यदि पदवी प्राप्त करने से ही गुण आ जाते तो जज की कुर्सी पर बिना पढ़ा लिखा व्यक्ति भी बैठकर जज बन जाता। पढ़ाई की जरुरत भी नहीं रहती। उसी प्रकार अपने नाम के आगे डिग्रियाँ लगाकर हर कोई व्यक्ति डॉक्टर या इंजीनियर बन जाता । यदि ज्ञान या गुण है तो बिना पदवी के भी व्यक्ति पूज्य बन जाता है। फिर भी गुणों के विकास की दृष्टि से एक व्यवस्था के रुप में पद रखे गये हैं। पद आत्मार्थी का अंतिम लक्ष्य नहीं हैं, बिना पद के भी कई आत्माओं ने मुक्ति की प्राप्ति की है। एक मुनि, जो पिछले वर्ष कम उम्र में ही कालधर्म को प्राप्त हो चुके हैं अपने नाम के आगे करीबन 28 पदवियाँ विशेषण लगाते थे।* *समाज व संघ के संचालक शासन के शणगार अनेकानेक पदवियों के धारक स्वयं भी आज फूट, कलह व कदाग्रह के जाल में फंसे पड़े हैं एवं समाज को भी गुमराह कर फंसाते जा रहे हैं। अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग के कारण समाज अनेक टुकड़ों में बंट गया है। राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक एवं नैतिकता सभी में जैन समाज बहुत पीछे रह गया है। हमारा युवा वर्ग सही मार्गदर्शन के अभाव में भटक गया है। आने वाली पीढी हॉटेल के खान-पान, शराब के दौर एवं अनैतिक कायों में लिप्त होती चली जा रही है। जैन समाज के सोलह हजार साधु-साध्वियों का कर्तव्य है कि वे स्वयं धर्म पथ पर चले, समाचारी (नियमों) को पाले, अनुशासन में रहे और सारे समाज को अनुशासन में रखें। जैन शासन ने कभी भी व्यक्ति को महत्व नहीं दिया, उसने हमेशा गुण व चारित्र को पूजनीय कहा है। कर्तव्य के पालनकर्ता ही वंदनीय है।* *अंधाधुंध पदवियों का सिलसिला जैन शासन के लिये भविष्य में बहुत घातक सिद्ध होगा । यद्यपि सभी मुनियों या आचार्यों के लिए यह बात नहीं हैं। आज भी कई गुणवान चारित्रवान मुनि मौजूद है, जो योग्यता होते हुए भी पदवियों से दूर है। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि आजकल अधिकांश पदवियाँ गुणों के विकास के आधार पर न देते हुए अपने गुरुओं पर दवाब डालकर या जेबी संस्थाओं अथवा संघों को अंधेरे में रखकर या अपनी हाँ में हाँ मिलाने वाले श्रावकों से ली जा रही है। ऐसे तथाकथित संत (मुनि) श्रावकों व संघों को गलतफहमी में डालने से पीछे नहीं रहते हुए जागृत श्रावकों व श्री संघों को विवेक से काम लेकर योग्य कार्यवाही करनी चाहिये।* *?सिर्फ जैन समाज ग्रुप में भेजे?* ????????? 2026-04-12 14:30:52
80151 40449749 जिनोदय?JINODAYA *?प्रणाम सादर जय जिनेन्द्र?* *?जागो जैनों जागो?* *♟️आजकल उपाधियां* *दी नहीं ली जा रही है!* ????????? ✍️ *जे. के. संघवी (थाने-आहोर)* ????????? *?वैसे सदियों से गुणवानों का गौरव होता ही रहा है। विशिष्ट गुणों के कारण साधु संतों को भी विशिष्ट उपाधियों से अलंकृत किया गया है। व्यक्ति के गुणों से उपाधि का गौरव बढ़ता हो तो ठीक है किन्तु आजकल तो उपाधि की चमक से व्यक्ति को जबरदस्ती चमकाया जा रहा है। क्या साधु, संत महात्मा या मुनि अपने आप में कम उपाधि है? शास्त्रानुसार एक मुनि बनने के लिये भी कितना त्यागमय जीवन जीना होता है एवं कितने गुणों को जीवन में उतारना पड़ता है। जैन शास्त्रों के अनुसार पंच परमेष्ठी में प्रथम साधु (मुनि) के बाद क्रमशः आध्यात्मिक विकास करते हुए व्यक्ति उपाध्याय और आचार्य बनता है। गुणों के क्रमिक विकास के साथ ही गुरु द्वारा ये उपाधियाँ (पदवियाँ) प्रदान की जाती रही है। किन्तु वर्तमान में यह देखा जा रहा है कि अधिकांश पदवियाँ शिक्षा या गुणों के आधार पर नहीं बल्कि जोड-तोड कर जबरन हासिल की जा रही है। आजकल आचार्य बनने की होड लगी हुयी है। तीन साधुओं में दो आचार्य व एक मुनि भी कई बार देखे गये हैं। यह तो अच्छा है कि इस काल में शास्त्रानुसार चौवीस तीर्थंकर हो चुके हैं व केवलज्ञान की प्राप्ति के बिना सिद्ध या अरिंहत होते नहीं, नहीं तो सिद्ध व अरिहंत की उपाधियाँ भी ले ली जाती। आचार्य पद की जोड़-तोड द्वारा सहज प्राप्ति के कारण मात्र श्वेताम्बर मू.पू. सम्प्रदाय में ही देखिये कि कितने आचार्य बन गये हैं। उसमें भी एक-एक गच्छ में भी कई आचार्य हैं। थोड़े दिन पहले पालीताणा में दो मुनियों को उपाध्याय पद दिया गया। मजे की बात तो यह है कि उसमें से एक मुनि ने तो उसके पूर्व ही अपनी जेबी संस्था के नाम से पद ग्रहण करने का विज्ञापन पत्रों में छपवा भी दिया था। जब आचार्य श्री से इस विषय में बात हुयी तो वे कहने लगे कि क्या करूं? मेरा तो कोई मानता ही नहीं हैं। जब वे मुनि अपने आप ही पदवी ले रहे हैं, तो अच्छा है कि मैं ही दे दूं। इस प्रकार उनको रोका जाकर फिर पदवी दी गयी। एक आचार्य के सामर्थ्य की जगह उनकी लाचारी देखकर दिल को बड़ा दुःख हुआ। साधुओं द्वारा पदवीयाँ लेकर अपनी दुकानदारी अलग जमाने में तथाकथित श्रावकों का योगदान भी कम नहीं है। समाज में अपना रुतबा रखने के लिये वे उनकी गिरावट को पत्रिकाओं की सजावट द्वारा नजर नहीं आने देते अर्थात् उनके नाम के आगे दुनिया भर के शब्दकोषों से विशेषण लाकर एक अम्बार खडा कर देते हैं और आम जनता जो सारी बातों से बेखबर है, उनकी फिराक में आ जाती है। पिछले दिनों मुम्बई में ऐसे ही एक आचार्य को चुपके से एक विशेष विशेषण प्रदान किया गया चलते कार्यक्रम में एक नेता द्वारा उन्हें अभिनंदन पत्र दिलाया गया। न तो वो नेता उन साधु से परिचित और न ही कार्यक्रम में कोई घोषणा की गयी कि उनके द्वारा क्या करवाया जा रहा है, किन्तु सभी पत्र-पत्रिकाओं में जोरे-शोर से जाहिरात कर दी गयी कि अमुक नेता द्वारा आचार्य श्री को उपाधि प्रदानकी गयी।* *यदि पदवी प्राप्त करने से ही गुण आ जाते तो जज की कुर्सी पर बिना पढ़ा लिखा व्यक्ति भी बैठकर जज बन जाता। पढ़ाई की जरुरत भी नहीं रहती। उसी प्रकार अपने नाम के आगे डिग्रियाँ लगाकर हर कोई व्यक्ति डॉक्टर या इंजीनियर बन जाता । यदि ज्ञान या गुण है तो बिना पदवी के भी व्यक्ति पूज्य बन जाता है। फिर भी गुणों के विकास की दृष्टि से एक व्यवस्था के रुप में पद रखे गये हैं। पद आत्मार्थी का अंतिम लक्ष्य नहीं हैं, बिना पद के भी कई आत्माओं ने मुक्ति की प्राप्ति की है। एक मुनि, जो पिछले वर्ष कम उम्र में ही कालधर्म को प्राप्त हो चुके हैं अपने नाम के आगे करीबन 28 पदवियाँ विशेषण लगाते थे।* *समाज व संघ के संचालक शासन के शणगार अनेकानेक पदवियों के धारक स्वयं भी आज फूट, कलह व कदाग्रह के जाल में फंसे पड़े हैं एवं समाज को भी गुमराह कर फंसाते जा रहे हैं। अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग के कारण समाज अनेक टुकड़ों में बंट गया है। राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक एवं नैतिकता सभी में जैन समाज बहुत पीछे रह गया है। हमारा युवा वर्ग सही मार्गदर्शन के अभाव में भटक गया है। आने वाली पीढी हॉटेल के खान-पान, शराब के दौर एवं अनैतिक कायों में लिप्त होती चली जा रही है। जैन समाज के सोलह हजार साधु-साध्वियों का कर्तव्य है कि वे स्वयं धर्म पथ पर चले, समाचारी (नियमों) को पाले, अनुशासन में रहे और सारे समाज को अनुशासन में रखें। जैन शासन ने कभी भी व्यक्ति को महत्व नहीं दिया, उसने हमेशा गुण व चारित्र को पूजनीय कहा है। कर्तव्य के पालनकर्ता ही वंदनीय है।* *अंधाधुंध पदवियों का सिलसिला जैन शासन के लिये भविष्य में बहुत घातक सिद्ध होगा । यद्यपि सभी मुनियों या आचार्यों के लिए यह बात नहीं हैं। आज भी कई गुणवान चारित्रवान मुनि मौजूद है, जो योग्यता होते हुए भी पदवियों से दूर है। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि आजकल अधिकांश पदवियाँ गुणों के विकास के आधार पर न देते हुए अपने गुरुओं पर दवाब डालकर या जेबी संस्थाओं अथवा संघों को अंधेरे में रखकर या अपनी हाँ में हाँ मिलाने वाले श्रावकों से ली जा रही है। ऐसे तथाकथित संत (मुनि) श्रावकों व संघों को गलतफहमी में डालने से पीछे नहीं रहते हुए जागृत श्रावकों व श्री संघों को विवेक से काम लेकर योग्य कार्यवाही करनी चाहिये।* *?सिर्फ जैन समाज ग्रुप में भेजे?* ????????? 2026-04-12 14:30:51
80150 50892187 श्री जिनेन्द्र भक्तमण्डल ग्वालियर <a href="https://www.instagram.com/reel/DWq1TLICZae/?igsh=MXY1eWl5Njl3MmZuMw==" target="_blank">https://www.instagram.com/reel/DWq1TLICZae/?igsh=MXY1eWl5Njl3MmZuMw==</a> 2026-04-12 14:29:37
80149 50892187 श्री जिनेन्द्र भक्तमण्डल ग्वालियर <a href="https://www.instagram.com/reel/DWq1TLICZae/?igsh=MXY1eWl5Njl3MmZuMw==" target="_blank">https://www.instagram.com/reel/DWq1TLICZae/?igsh=MXY1eWl5Njl3MmZuMw==</a> 2026-04-12 14:29:36
80147 50892187 श्री जिनेन्द्र भक्तमण्डल ग्वालियर <a href="https://www.instagram.com/reel/DWq1TLICZae/?igsh=MXY1eWl5Njl3MmZuMw==" target="_blank">https://www.instagram.com/reel/DWq1TLICZae/?igsh=MXY1eWl5Njl3MmZuMw==</a> 2026-04-12 14:29:17
80148 50892187 श्री जिनेन्द्र भक्तमण्डल ग्वालियर <a href="https://www.instagram.com/reel/DWq1TLICZae/?igsh=MXY1eWl5Njl3MmZuMw==" target="_blank">https://www.instagram.com/reel/DWq1TLICZae/?igsh=MXY1eWl5Njl3MmZuMw==</a> 2026-04-12 14:29:17