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Message
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40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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<a href="https://www.youtube.com/live/XeJmxtEOOgA?si=iazeybpFQ93sgBMU" target="_blank">https://www.youtube.com/live/XeJmxtEOOgA?si=iazeybpFQ93sgBMU</a> |
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2026-02-18 14:06:39 |
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40449660 |
Acharya PulakSagarji 07 |
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*धर्म का मुखौटा और भीतर का पाखंड*
पहन मुखौटा धरम का, करते दिन भर पाप!
भंडारे करते फिरें, घर में भूखा बाप!!
आज समाज में एक विचित्र प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है। लोग धर्म का चोला पहनकर घूमते हैं, माथे पर तिलक, हाथ में माला और वाणी में मीठे शब्द—लेकिन आचरण में करुणा, दया और सत्य का अभाव। बाहर दिखावे के लिए बड़े-बड़े भंडारे, आयोजन, मंच, फोटो और प्रचार; परंतु घर के भीतर अपने ही माता-पिता उपेक्षित, असहाय और भूखे रह जाएँ तो यह कैसी धार्मिकता है? धर्म का सार दिखावा नहीं, बल्कि कर्तव्य है। जो व्यक्ति अपने ही पिता की सेवा नहीं कर सकता, वह समाज सेवा का ढोल पीटकर स्वयं को धर्मात्मा कैसे सिद्ध कर सकता है? शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि प्रथम पूज्य माता-पिता हैं। उनकी सेवा से बढ़कर कोई यज्ञ, कोई दान, कोई तीर्थ नहीं। लेकिन आज कुछ लोग समाज में प्रतिष्ठा पाने के लिए धर्म का उपयोग साधन की तरह कर रहे हैं। वे भंडारे इसलिए नहीं करते कि किसी की भूख मिटे, बल्कि इसलिए करते हैं कि उनका नाम छपे, फोटो आए, प्रशंसा हो। यह धर्म नहीं, अहंकार का पोषण है। सच्चा धर्म भीतर से शुरू होता है—घर से, परिवार से, अपने कर्तव्यों से। यदि घर का वृद्ध पिता उपेक्षित है, माँ की आँखों में आँसू हैं, और बेटा मंच पर दानवीर बन रहा है, तो यह सबसे बड़ा पाखंड है। धर्म का अर्थ है दया, सेवा, संयम और सत्य। जो धर्म हमें अपने कर्तव्यों से दूर ले जाए, वह धर्म नहीं, केवल आडंबर है। समाज को जागना होगा। दिखावे की चमक से बाहर निकलकर मूल प्रश्न पूछना होगा—क्या हमारा आचरण हमारे शब्दों से मेल खाता है? क्या हम पहले अपने घर के प्रति ईमानदार हैं? यदि नहीं, तो फिर किसी भी धार्मिक आयोजन का कोई वास्तविक अर्थ नहीं। पहले घर के भूखे पिता का पेट भरे, पहले माँ के चरणों में सेवा अर्पित हो, उसके बाद ही समाज सेवा की बात शोभा देती है। वरना धर्म का मुखौटा पहनकर पाप करना अंततः आत्मा को ही खोखला कर देता है। सच्ची श्रद्धा वही है जो भीतर विनम्रता और बाहर सेवा में प्रकट हो, न कि केवल मंच और माइक पर।
नितिन जैन,
संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा), जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल, मोबाइल: 9215635871 |
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2026-02-18 14:06:05 |
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40449749 |
जिनोदय?JINODAYA |
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*धर्म का मुखौटा और भीतर का पाखंड*
पहन मुखौटा धरम का, करते दिन भर पाप!
भंडारे करते फिरें, घर में भूखा बाप!!
आज समाज में एक विचित्र प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है। लोग धर्म का चोला पहनकर घूमते हैं, माथे पर तिलक, हाथ में माला और वाणी में मीठे शब्द—लेकिन आचरण में करुणा, दया और सत्य का अभाव। बाहर दिखावे के लिए बड़े-बड़े भंडारे, आयोजन, मंच, फोटो और प्रचार; परंतु घर के भीतर अपने ही माता-पिता उपेक्षित, असहाय और भूखे रह जाएँ तो यह कैसी धार्मिकता है? धर्म का सार दिखावा नहीं, बल्कि कर्तव्य है। जो व्यक्ति अपने ही पिता की सेवा नहीं कर सकता, वह समाज सेवा का ढोल पीटकर स्वयं को धर्मात्मा कैसे सिद्ध कर सकता है? शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि प्रथम पूज्य माता-पिता हैं। उनकी सेवा से बढ़कर कोई यज्ञ, कोई दान, कोई तीर्थ नहीं। लेकिन आज कुछ लोग समाज में प्रतिष्ठा पाने के लिए धर्म का उपयोग साधन की तरह कर रहे हैं। वे भंडारे इसलिए नहीं करते कि किसी की भूख मिटे, बल्कि इसलिए करते हैं कि उनका नाम छपे, फोटो आए, प्रशंसा हो। यह धर्म नहीं, अहंकार का पोषण है। सच्चा धर्म भीतर से शुरू होता है—घर से, परिवार से, अपने कर्तव्यों से। यदि घर का वृद्ध पिता उपेक्षित है, माँ की आँखों में आँसू हैं, और बेटा मंच पर दानवीर बन रहा है, तो यह सबसे बड़ा पाखंड है। धर्म का अर्थ है दया, सेवा, संयम और सत्य। जो धर्म हमें अपने कर्तव्यों से दूर ले जाए, वह धर्म नहीं, केवल आडंबर है। समाज को जागना होगा। दिखावे की चमक से बाहर निकलकर मूल प्रश्न पूछना होगा—क्या हमारा आचरण हमारे शब्दों से मेल खाता है? क्या हम पहले अपने घर के प्रति ईमानदार हैं? यदि नहीं, तो फिर किसी भी धार्मिक आयोजन का कोई वास्तविक अर्थ नहीं। पहले घर के भूखे पिता का पेट भरे, पहले माँ के चरणों में सेवा अर्पित हो, उसके बाद ही समाज सेवा की बात शोभा देती है। वरना धर्म का मुखौटा पहनकर पाप करना अंततः आत्मा को ही खोखला कर देता है। सच्ची श्रद्धा वही है जो भीतर विनम्रता और बाहर सेवा में प्रकट हो, न कि केवल मंच और माइक पर।
नितिन जैन,
संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा), जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल, मोबाइल: 9215635871 |
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2026-02-18 14:05:55 |
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40449657 |
?️?SARVARTHASIDDHI ??️ |
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*।। द्रव्यानुयोग।।*
*_!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नमः !!_*
श्रीमद्-भगवत्पूज्यपाद-आचार्य-प्रणीत
_॥श्री इष्टोपदेश॥_
मूल संस्कृत गाथा
( *पंडित आशाधरजी* )
_मंगलाचरण_
*परमात्मानमानम्य, मुमुक्षुः स्वात्मसंविदे ।*
*इष्टोपदेशमाचष्टे, स्वशक्त्याशाधरः स्फुटम् ॥*
_मूलग्रन्थकर्ता का मंगलाचरण ।_
*यस्य स्वयं स्वाभावाप्ति, रभावे कृत्स्नकर्मणः*
*तस्मै संज्ञान-रूपाय नमोऽस्तु परमात्मने ॥1॥*
_व्रत से स्वर्ग-मोक्ष की प्राप्ति -_
*यत्र भावः शिवं दत्ते, द्यौः कियद्दूरवर्तिनी*
*यो नयत्याशु गव्यूतिं क्रोशार्धे किं स सीदति ॥4॥*
_आत्मभाव यदि मोक्षप्रद, स्वर्ग है कितनी दूर_
_दोय कोस जो ले चले, आध कोस सुख दूर ॥४॥_
*अन्वयार्थ* : आत्मा में लगा हुआ जो परिणाम भव्य प्राणियों को मोक्ष प्रदान करता है, उस मोक्ष देने में समर्थ आत्म-परिणाम के लिये स्वर्ग कितना दूर है?
*आशाधरजी* : आत्मा में लगा हुआ जो परिणाम भव्य प्राणियों को मोक्ष प्रदान करता है, उस मोक्ष देने में समर्थ आत्म-परिणाम के लिये स्वर्ग कितना दूर है? न कुछ। वह तो उनके निकट ही समझो । अर्थात् स्वर्ग तो स्वात्यध्यान से पैदा किये पुण्य का एक फलमात्र है। ऐसा ही कथन अन्य ग्रन्थों में भी पाया जाता है। तत्वानुशासन में कहा है 'गुरू के उपदेश को प्राप्त कर सावधान हुए प्राणियों के द्वारा चिन्तवन किया गया यह अनंत शक्तिवाला आत्मा चिंतवन करनेवाले को भुक्ति और मुक्ति प्रदान करता है। इस आत्मा को अरहंत और सिद्ध के रूप में चिंतवन किया जाय तो यह चरमशरीरी को मुक्ति प्रदान करता है और यदि चरमशरीरी न हो तो उसे वह आत्म-ध्यान से उपार्जित पुण्य की सहायता से भुक्ति (सवर्ग चक्रवर्त्यादि के भोगों) को प्रदान करनेवाला होता है।'
श्लोक की नीचे की पंक्ति में उपरिलिखित भाव को दृष्टान्त द्वारा समझाते हैं -
देखो, जो भार को ढोनेवाला अपने भार को दो कोस तक आसानी और शीघ्रता के साथ ले जा सकता है, तो क्या वह अपने भार को आधा कोस ले जाते हुए खिन्न होगा? नहीं। भार को ले जाते हुए खिन्न न होगा। बड़ी शक्ति के रहने या पाये जाने पर अल्प शक्ति का पाया जाना तो सहज (स्वाभाविक) ही है ॥४॥
इस प्रकार आत्म-भक्ति को जब कि स्वर्ग-सुखों का कारण बतला दिया गया, तब शिष्य पुनः कुतूहल की निवृत्ति के लिये पूछता है कि 'स्वर्ग में जानेवालों को क्या फल मिलता है ?' आचार्य इसका स्पष्ट रीति से उत्तर देते हुए लिखते हैं -- |
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2026-02-18 14:04:24 |
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40449675 |
?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? |
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<a href="https://www.instagram.com/p/DU5GZO5EvR6/?igsh=MWVuOTIyazl2c2xrag==" target="_blank">https://www.instagram.com/p/DU5GZO5EvR6/?igsh=MWVuOTIyazl2c2xrag==</a> |
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2026-02-18 14:03:46 |
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Acharya PulakSagarji 07 |
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<a href="https://www.instagram.com/p/DU5GZO5EvR6/?igsh=MWVuOTIyazl2c2xrag==" target="_blank">https://www.instagram.com/p/DU5GZO5EvR6/?igsh=MWVuOTIyazl2c2xrag==</a> |
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2026-02-18 14:03:19 |
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40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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? YOUTUBE
आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के द्वितीय समाधि दिवस पर श्री चरणों में त्रि-बार नमोस्तु
<a href="https://youtube.com/shorts/nycr2RhVHXw?si=LUoKqK7DjRxQTk6V" target="_blank">https://youtube.com/shorts/nycr2RhVHXw?si=LUoKqK7DjRxQTk6V</a>
?Instagram :
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? Facebook :
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2026-02-18 14:02:12 |
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49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*दादा गुरुदेव जिनदत्त सूरिजी का प्रेरणादायक जीवन की कहानी*
(एनिमेटेड कहानी) *New Publishes*
*दादा का चादर महोत्सव के पहले अवश्य जाने उनका पवित्र और चमत्कारिक जीवन चरित्र*
*जैन धर्म के तेजस्वी आचार्य श्री जिनदत्तसूरिजी गुरुदेव ने अपनी कठोर साधना, अद्भुत चमत्कारों और अटूट संयम से अनगिनत श्रद्धालुओं के जीवन को धर्ममय बना दिया।*
वे दादागुरु, बड़े दादा और युगप्रधान जैसे अनेक पवित्र नामों से भी जगत में विख्यात हुए।
आइए, इस कहानी के माध्यम से ऐसे युगप्रधान महापुरुष के दिव्य जीवन को और उसके चमत्कारों को जानते हे।
*कहानी हिंदी में*
<a href="https://youtu.be/awv4WtSdFBw" target="_blank">https://youtu.be/awv4WtSdFBw</a>
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*Jain Library Whatsapp Group*
+91 8128994987 |
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2026-02-18 14:01:53 |
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40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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2026-02-18 13:59:08 |
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40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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*जय-जिनेन्द्र ।*
दि.१८/२/२०२६ (बुधवार)
*सूत्र (सुत्त)*
*सुई जहा स-सुत्ता*
*ण णस्सदि पमाद-दोसेण ।*
*एवं स-सुत्त-पुरिसो*
*ण णस्सदि तहा पमाद-दोसेण ।।*
जहा = जिस प्रकार
स-सुत्ता = सूत्र/धागे से सहित
सुई = सुई
पमाय-दोसेण = प्रमाद दोष से
ण णस्सदि = खोती नहीं है
एवं = इस प्रकार
ससुत्त-पुरिसो = सूत्र के ज्ञान से सहित पुरुष
पमाददोसेण = प्रमाद दोष से
ण णस्सदि = नष्ट नहीं होता
जैसे सूत्र (धागे) से जुड़ी सुई प्रमाददोष के बावजूद खोती नहीं है, वैसे ही ससूत्र पुरुष (शास्त्रज्ञ पुरुष) प्रमाददोष के बावजूद भी नष्ट नहीं होता (संसार में नहीं खोता)।
A threaded needle is not lost despite negligence. Similarly, a man of the scriptures is not lost in this world, despite his indolence.
मूलाचार 973
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2026-02-18 13:58:47 |
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