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2896 40449699 3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) ????????????? ಜೈ ಜಿನೇಂದ್ರ ಎಲ್ಲರಿಗೂ ಶುಭ ದಿನದ ಶುಭೋದಯ ?? 2026-02-14 06:30:53
2895 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ????????????? ಜೈ ಜಿನೇಂದ್ರ ಎಲ್ಲರಿಗೂ ಶುಭ ದಿನದ ಶುಭೋದಯ ?? 2026-02-14 06:30:19
2894 40449676 राष्ट्रीय मुनी सेवा संघ 2026-02-14 06:30:18
2893 40449676 राष्ट्रीय मुनी सेवा संघ 2026-02-14 06:30:17
2892 40449676 राष्ट्रीय मुनी सेवा संघ 2026-02-14 06:30:15
2891 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म ??????????? *?॥ श्री तीर्थंकराय नम ॥?* ??????????? *? प्रथमानुयोग* *? सोलह कारण भावना– 74* *? 9.वैयावृत्यकरण भावना ?* ========================== <a href="https://quizzory.in/id/698a942b2aabb6d2b94d8d81" target="_blank">https://quizzory.in/id/698a942b2aabb6d2b94d8d81</a> *इस लिंक के द्वारा कथा में आए प्रश्नों को 24 घंटे मैं हल किया जा सकता है* ⭕⭕⭕⭕⭕⭕⭕⭕⭕⭕⭕ कर्म के उदय से पीड़ित मुनि आदि की सेवा, सुरक्षा, दवाई आदि रोग के प्रतिकार स्वरूप दीजिए। पीत, कफ आदि पीड़ित मुनि आदि की शुद्धि करने के लिए पथ्य और अपथ्य का भलीभाँति विचार कर औषधि को बनाकर भोजन के साथ दीजिए। ज्ञानी जन कहते हैं कि जो इस प्रकार की वैयावृत्ति करता है वह देवगति में उत्पन्न होता है। *हर्षवर्धन की कथा* अंग देश में राजा हर्षवर्धन राज्य करते थे। उनके चार रानियां थीं। पहली का नाम अंगसेना, दूसरी का विजयसेना, तीसरी का इन्द्रसेना और चौथी रानी का नाम विजयलक्ष्मी था। एक दिन एक चोर को चोरी करते हुए पकड़ लिया और राज दरबार में लाया गया। राजा ने उसको फाँसी की सजा देने की आज्ञा दे दी। यह सुनकर अंगसेना बोली कि हे राजन्! यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं इस पुरुष का आदर सत्कार करूँ। यह सुनकर राजा ने बड़ी रानी को आज्ञा दे दी। रानी दूसरे दिन स्वर्ण के आभूषण बनवाये, नाना प्रकार के मिष्ठान बनवाये और उसको बुलाकर भोजन कराया तो वह विचार करता है कि प्रभात होते ही मेरा मरण अवश्य ही होगा, मुझे इस भोजन से क्या प्रयोजन और इन आभूषणों से क्या प्रयोजन, मेरी तो मृत्यु कल हो ही जायेगी। वह भोजन करता है तो ग्रास मुख से बाहर निकल आता है। दूसरे दिन राजा से दूसरी रानी विजयसेना ने भी आज्ञा माँगी कि हे देव! यदि आपकी आज्ञा होवे तो मैं भी इस मनुष्य का कुछ आदर सत्कार करूँ। राजा ने उसको भी सत्कार करने का आदेश दे दिया। दूसरे दिन दूसरी रानी के यहाँ भोजन करने गया। रानी ने सोने के पाटे पर उसको बैठाया। सोने के थाल में भोजन परोसा गया, और उसको आज्ञा दी गई कि भोजन करो। भोजन करने को ग्रास मुख में देता है तो ग्रास बाहर को वापस आ जाता है। मरण सामने था। भोजन सुन्दर और स्वादिष्ट था फिर भी रुचिकर नहीं लगा। तीसरे दिन तीसरी रानी ने भी उसका आदर सत्कार करने की इच्छा प्रकट की। राजा ने उस तीसरी रानी को भी आज्ञा दे दी। आज्ञा प्राप्त करके रानी ने नाना प्रकार के सुन्दर से सुन्दर वस्त्र बनवाये और रत्नों से जड़ित आभूषण बनवाकर उसको दिये, तथा भोजन भी अनेक प्रकार का उसको दिया, परन्तु उसको तो अपना मरण ही मरण दिखाई देता था। ऐसी अवस्था में आभूषण भोजन आदि कैसे मनुष्य को अच्छा लग सकता है? नहीं। चौथे दिन छोटी रानी राजा से कहने लगी कि हे पति देव! इस मनुष्य को तो फाँसी की सजा होगी ही, पर मेरी कुछ इच्छा है कि इसका मुझसे बन सके उतना उपकार करूँ। यह सुनकर राजा ने कहा कि तुम क्या चाहती हो सो कहो। रानी बोली करुणा के धारक! जन प्रतिपालक! इस पुरुष को मुझे दे दीजिये। बस, इतना ही चाहती हूँ। राजा ने सोचा नहीं दिया तो रानी बिगड़ जायेगी, अस्तु, जो भी हो वह सब ठीक। राजा ने उस अपराधी को छोटी रानी को दे दिया। रानी उसको अपने महल में ले गई और उसको भोजन बासी रोटी परोस दी। उन बासी रोटियों को भी वह बड़े सम्मान व सुखपूर्वक खाने लगा। अब उसको मरण का भय नहीं रहा। तत्पश्चात चारों रानियों में विवाद खड़ा हो गया। बड़ी रानी कहने लगी मैंने इतना उपकार किया। दूसरी कहने लगी कि उससे भी मैंने अधिक किया है। तीसरी बोली तुम से अच्छा सत्कार मैंने किया है। चौथी बोली मैंने तो कुछ भी नहीं किया। इस प्रकार आपस में वार्तालाप होते-होते राजा के पास चर्चा आ गई। राजा विचार करने लगा कि किसको अच्छा या बुरा कहूँ। यदि एक को अच्छा कहूँ तो दूसरी नाराज हो जायेगी। अन्त में उसने निर्णय लिया कि इसका फैसला तो वही दे सकता है जिसके साथ उपकार किया गया है। तब उसको बुलवा कर राजा ने सबके सामने उस पुरुष से पूछा कि भाई! तुम सच कहो कि तुम्हारा उपकार सत्कार कौन सी रानी ने किया है? यह सुनकर वह पुरुष बोला कि हे स्वामिन! मेरा उपकार किया है तो एक छोटी महारानी ने ही किया है। क्योंकि उन्होंने ही मुझे जीवन-दान दिया है। यदि वह जीवन-दान नहीं देती तो इनके द्वारा दिया गया स्वर्ण वस्त्र किसके काम आते। इसलिए सबसे बड़ा दान है तो अभयदान ही है। इस प्रकार अभयदान की महिमा महान है। जहाँ अभयदान है—वहाँ जीव दान है। जहाँ जीव दान है वहाँ आहारदान। जहाँ आहार दान है वह ज्ञान दान है। जहाँ ज्ञान दान है वहाँ संयम, तप, शील व्रतादिक दान है। इसके बिना संयम, तप, ध्यान, अध्ययन कर नहीं पाते। इसके बिना परिणाम विशुद्धि नहीं होता। परिणाम के विशुद्धि बिना कर्म क्षय नहीं होती, इसलिए दान देने वाले दाताओं के हाथ ऊपर और लेने वालों के हाथ नीचे रहते हैं। आश्चर्य की बात है। २४ घंटे में दिगम्बर मुनि का हाथ सभी को आशीर्वाद देने ऊपर होता है और नमस्कार करने वाले श्रावकों का हाथ नीचे रहता है। परन्तु जब आहार क्रिया चलती है तब दान देने वाले श्रावकों का हाथ ऊपर और आहार लेने वाले मुनि का हाथ नीचे रहते हैं। वैय्यावृत का महत्व बहुत बड़ा है। वैय्यावृत से श्रीकृष्ण ने तीर्थंकर प्रकृति बंध किया है। ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖ *✍️ संकलन* *?️ पं. मुकेश शास्त्री* *? सुसनेर* *? 9425935221* *? 14.02.2026* ??????????? 2026-02-14 06:30:13
2890 40449676 राष्ट्रीय मुनी सेवा संघ Jai jinendra?? 2026-02-14 06:29:52
2889 40449663 ? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? ?????? भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के सामने प्रदर्शित की गई श्वेतपिच्छाचार्य श्री 108 विद्यानंद मुनिराज की 100वी जन्म शताब्दी महोत्सव के उद्घाटन समारोह में प्रसारित अद्वितीय जीवन चरित्र को आप सभी जरूर देखिये ओर आगे भी ज्यादा ज्यादा शेयर करे ताकि गुरुदेव का व्यक्तित्व जन जन को पता लग सके। <a href="https://youtu.be/c6G7PkouH90?si=BRecc9ByJhFeNsiS" target="_blank">https://youtu.be/c6G7PkouH90?si=BRecc9ByJhFeNsiS</a> 2026-02-14 06:29:27
2888 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ?????? भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के सामने प्रदर्शित की गई श्वेतपिच्छाचार्य श्री 108 विद्यानंद मुनिराज की 100वी जन्म शताब्दी महोत्सव के उद्घाटन समारोह में प्रसारित अद्वितीय जीवन चरित्र को आप सभी जरूर देखिये ओर आगे भी ज्यादा ज्यादा शेयर करे ताकि गुरुदेव का व्यक्तित्व जन जन को पता लग सके। <a href="https://youtu.be/c6G7PkouH90?si=BRecc9ByJhFeNsiS" target="_blank">https://youtu.be/c6G7PkouH90?si=BRecc9ByJhFeNsiS</a> 2026-02-14 06:29:19
2887 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ 2026-02-14 06:28:41