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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Phone
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Message
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Status
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Date |
View |
| 225942 |
40649233 |
Mumukshu mandal?♂️ |
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2026-06-13 05:34:24 |
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| 225940 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*कहानी बड़ी सुहानी*
(1) *कहानी*
*भक्त और भगवान*
*एक बार एक भक्त मंदिर आता है और भगवान से कहता है*
*भगवान-आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे ?*
*एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता हूं, आप मेरा रूप धारण कर घूम आओl*
*भगवान मान जाते हैं*,
*लेकिन एक शर्त रखते हैं कि जो भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना कुछ बोलना नहीं।*
*मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है, सेवक मान जाता हैl*
सबसे पहले *मंदिर में बिजनेस मैन आता है* और कहता है, भगवान मैंने एक नयी फैक्ट्री डाली है, उसे *खूब सफल करना।*
वह *माथा टेकता है*, तो उसका *पर्स नीचे गिर* जाता है l *वह बिना पर्स लिये ही चला जाता हैl*
*सेवक बेचैन हो जाता है*, वह सोचता है कि रोक कर उसे बताये कि *पर्स गिर* गया,
*लेकिन शर्त की वजह से वह नहीं कह पाताl*
*इसके बाद एक गरीब आदमी आता है और भगवान को कहता है कि घर में खाने को कुछ नहीं. भगवान मदद करो।*
तभी उसकी *नजर पर्स* पर पड़ती है, वह *भगवान का शुक्रिया अदा करता* है और पर्स लेकर चला जाता हैl
अब *तीसरा व्यक्ति* आता है, वह *नाविक* होता
है l वह *भगवान* से कहता है कि *मैं 15 दिनों के लिए जहाज लेकर समुद्र की यात्रा पर जा रहा हूं,यात्रा में कोई अड़चन न आये भगवान दया दृष्टि बनाये रखना..*
तभी पीछे से *बिजनेस मैन पुलिस के साथ आता* है और कहता है कि मेरे बाद ये *नाविक* आया हैl
इसी ने *मेरा पर्स चुरा* लिया है, *पुलिस नाविक को ले जा रही होती है तभी सेवक बोल पड़ता है नही इसने पर्स नही चुराया।*
*फिर किसने चुराया*
*वो जो इस नाविक से पहले एक गरीब आया था*
अब पुलिस सेवक के कहने पर उस *गरीब आदमी* को पकड़ कर जेल में बंद कर देती है।
*रात को भगवान आते हैं, तो सेवक खुशी खुशी पूरा किस्सा बताता हैl*
*भगवान कहते हैं, तुमने किसी का काम बनाया नहीं, बल्कि बिगाड़ा हैl*
*वो कैसे भगवन में तो बिल्कुल सही सही बोला*
सुन वह *व्यापारी गलत धंधे* करता है,अगर उसका *पर्स गिर भी गया, तो उसे फर्क नहीं पड़ता था।*
इससे उसके *पाप ही कम होते*, क्योंकि वह *पर्स गरीब इंसान को मिला था*. पर्स मिलने पर उसका भला होता *उसके बच्चे भूखों नहीं मरते !*
रही बात *नाविक* की, तो वह जिस *यात्रा* पर जा रहा था, वहां *तूफान आनेवाला है*, अगर वह जेल में रहता, तो उसकी जान बच जाती, और उसकी पत्नी विधवा होने से बच जाती, *तुमने सब गड़बड़ कर दीl*
*कई बार हमारी लाइफ में भी ऐसी परेशानी आती है, जब हमें लगता है कि ये मेरे साथ ही क्यों हुआl*
*लेकिन इसके पीछे कर्मो के हिसाब से भगवान या यूं कहो कि नियती की सब प्लानिंग होती हैl*
*शिक्षा: जब भी कोई परेशानी आये. उदास मत होना l इस कहानी को याद करना और सोचना कि जो भी होता है,अच्छे के लिए होता है..!!*
****************************************
(2) *कहानी*
*सोच में परिवर्तन*
*ट्रेन में दो बच्चे यहाँ-वहाँ दौड़ रहे थे, कभी आपस में झगड़ जाते तो कभी किसी सीट के उपर कूदते। पास ही बैठा पिता किन्हीं विचारों में खोया था। बीच-बीच में जब बच्चे उसकी ओर देखते तो वह एक स्नेहिल मुस्कान बच्चों पर डालता और फिर बच्चे उसी प्रकार अपनी शरारतों में व्यस्त हो जाते और पिता फिर उन्हें निहारने लगता।*
*ट्रेन के सहयात्री बच्चों की चंचलता से परेशान हो गए थे और पिता के रवैये से नाराज़। चूँकि रात्रि का समय था अतः सभी आराम करना चाहते थे। बच्चों की भागदौड़ को देखते हुए एक यात्री से रहा न गया और लगभग झल्लाते हुए बच्चों के पिता से बोल उठा - "कैसे पिता हैं आप ? बच्चे इतनी शैतानियां कर रहे हैं और आप उन्हें रोकते-टोकते नहीं, बल्कि मुस्कुराकर प्रोत्साहन दे रहे हैं। क्या आपका दायित्त्व नहीं कि आप इन्हें समझाएं ???*
*उस सज्जन की शिकायत से अन्य यात्रियों ने राहत की साँस ली कि अब यह व्यक्ति लज्जित होगा और बच्चों को रोकेगा परन्तु उस पिता ने कुछ क्षण रुक कर कहा कि - "कैसे समझाऊं बस यही सोच रहा हूं भाईसाहब"।*
*यात्री बोला - "मैं कुछ समझ नहीं"*
*व्यक्ति बोला - "मेरी पत्नी अपने मायके गई थी वहाँ एक दुर्घटना के चलते कल उसकी मौत हो गई। मैं बच्चों को उसके अंतिम दर्शनों के लिए ले जा रहा हूँ और इसी उलझन में हूँ कि कैसे समझाऊं इन्हें कि अब ये अपनी मां को कभी देख नहीं पाएंगे।"*
*उसकी यह बात सुनकर जैसे सभी लोगों को साँप सूंघ गया। बोलना तो दूर सोचने तक का सामर्थ्य जाता रहा सभी का।*
*बच्चे यथावत शैतानियां कर रहे थे। अभी भी वे कंपार्टमेंट में दौड़ लगा रहे थे। वह व्यक्ति फिर मौन हो गया। वातावरण में कोई परिवर्तन न हुआ पर वे बच्चे अब उन यात्रियों को शैतान, अशिष्ट नहीं लग रहे थे बल्कि ऐसे नन्हें कोमल पुष्प लग रहे थे जिन पर सभी अपनी ममता उड़ेलना चाह रहे थे।*
*उनका पिता अब उन लोगों को लापरवाह इंसान नहीं वरन अपने जीवन साथी के विछोह से दुखी दो बच्चों का अकेला पिता और माता भी दिखाई दे रहा था।*
*ऐसे ही एक बार मेरे आगे वाली कार कछुए की तरह चल रही थी और मेरे बार-बार हॉर्न देने पर भी रास्ता नहीं दे रही थी। मैं अपना आपा खो कर चिल्लाने ही वाला था कि मैंने कार के पीछे लगा एक छोटा सा स्टिकर देखा जिस पर लिखा था _"शारीरिक विकलांग; कृपया धैर्य रखें"!_ और यह पढ़ते ही जैसे सब-कुछ बदल गया!!*
*मैं तुरंत ही शांत हो गया और कार को धीमा कर लिया। यहाँ तक की मैं उस कार और उसके ड्राईवर का विशेष खयाल रखते हुए चलने लगा कि कहीं उसे कोई तक़लीफ न हो। मैं ऑफिस कुछ मिनट देर से ज़रुर पहुँचा मगर मन में एक संतोष था।*
*कहने को तो यह एक कहानी है सत्य या असत्य। पर एक मूल बात यह एक अनुभूति/एहसास/सोच से व्यवहार में बदलाव आता है, क्षण भर में ही जिंदगी जीने का, किसी के प्रति सोच का दृष्टिकोण बदल जाता है।*
*हम सभी इसलिए उलझनों में हैं, क्योंकि हमने अपनी धारणाओं रूपी उलझनों का संसार अपने इर्द-गिर्द स्वयं रच लिया है। मैं यह नहीं कहता कि किसी को परेशानी या तकलीफ नहीं है... पर क्या निराशा या नकारात्मक विचारों से हम उन परिस्थितियों को बदल सकते हैं?*
*आवश्यकता है एक आशा, एक उत्साह से भरी सकारात्मक सोच की, फिर परिवर्तन तत्क्षण आपके भीतर आपको अनुभव होगा। उस लहर में हताशा की मरुभूमि भी नंदन वन की भांति सुरभित हो उठेगी। बस यही सकरात्मक सोच/एहसास/दृष्टिकोण देने का प्रयास मैं इन दैनिक कहानियों से करता आ रहा हूँ। आप सभी का इन कहानियों/सोच/विचारों को आगे साँझा करने लिए अग्रिम धन्यवाद!*
*एक सुंदर कहानी सुनने हैं पढ़ने के लिए समूह में सम्मिलित हो जाइए।*
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(3) *कहानी*
एक गरीब आदमी था।
वो हर रोज नजदीक के मंदिर में जाकर वहां साफ-सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था। अक्सर वो अपने प्रभू से कहता कि मुझे आशीर्वाद दीजिए तो मेरे पास ढेर सारा धन-दौलत आ जाए।
एक दिन ठाकुर जी ने बाल रूप में प्रगट हो उस आदमी से पूछ ही लिया कि क्या तुम मन्दिर में केवल इसीलिए, काम करने आते हो।
उस आदमी ने पूरी ईमानदारी से कहा कि हां, मेरा उद्देश्य तो यही है कि मेरे पास ढेर सारा धन आ जाए, इसीलिए तो आपके दर्शन करने आता हूं। पटरी पर सामान लगाकर बेचता हूं। पता नहीं, मेरे सुख के दिन कब आएंगे।
बाल रूप ठाकुर जी ने कहा कि -- तुम चिंता मत करो। जब तुम्हारे सामने अवसर आएगा तब ऊपर वाला तुम्हें आवाज थोड़ी लगाएगा। बस, चुपचाप तुम्हारे सामने अवसर खोलता जाएगा।*
युवक चला गया।
समय ने पलटा खाया, वो अधिक धन कमाने लगा। इतना व्यस्त हो गया कि मन्दिर में जाना ही छूट गया।
कई वर्षों बाद वह एक दिन सुबह ही मन्दिर पहुंचा और साफ-सफाई करने लगा।
ठाकुर जी फिर प्रगट हुए और उस व्यक्ति से बड़े ही आश्चर्य से पूछा--क्या बात है, इतने बरसों बाद आए हो, सुना है बहुत बड़े सेठ बन गए हो। वो व्यक्ति बोला--बहुत धन कमाया।
अच्छे घरों में बच्चों की शादियां की, पैसे की कोई कमी नहीं है पर दिल में चैन नहीं है। ऐसा लगता था रोज सेवा करने आता रहूं पर आ ना सका।
व्यक्ति बोला,हे प्रभू, आपने मुझे सब कुछ दिया पर जिंदगी का चैन नहीं दिया ?
प्रभू जी ने कहा कि तुमने वह मांगा ही कब था?
जो तुमने मांगा वो तो तुम्हें मिल गया ना।
फिर आज यहां क्या करने आए हो?
उसकी आंखों में आंसू भर आए, ठाकुर जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला --अब कुछ मांगने के लिए सेवा नहीं करूंगा। बस दिल को शान्ति मिल जाए। ठाकुर जी ने कहा--पहले तय कर लो कि अब कुछ मागने के लिए मन्दिर की सेवा नहीं करोगे, बस मन की शांति के लिए ही आओगे।
ठाकुर जी ने समझाया कि चाहे मांगने से कुछ भी मिल जाए पर दिल का चैन कभी नहीं मिलता इसलिए सेवा के बदले कुछ मांगना नहीं है। वो व्यक्ति बड़ा ही उदास होकर ठाकुर जी को देखता रहा और बोला--मुझे कुछ नहीं चाहिए।
आप बस, मुझे सेवा करने दीजिए। सच में, मन की शांति सबसे अनमोल है।।और श्री हरि की किरपा जब बरसती है तो वो बरसती ही जाती है।
जब भी मैं बुरे हालातों से घबराती हूँ..!
तब मेरे प्रभु जी कि आवाज़ आती है "रुक .................. मैं आता हूँ"..!!
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(4) *कहानी*
*रोटी,*
*चार प्रकार की होती है।"*
*पहली "सबसे स्वादिष्ट" रोटी "माँ की "ममता" और "वात्सल्य" से भरी हुई। जिससे पेट तो भर जाता है, पर मन कभी नहीं भरता।*
*एक दोस्त ने कहा, सोलह आने सच, पर शादी के बाद माँ की रोटी कम ही मिलती है।" उन्होंने आगे कहा "हाँ, वही तो बात है।*
*दूसरी रोटी पत्नी की होती है जिसमें अपनापन और "समर्पण" भाव होता है जिससे "पेट" और "मन" दोनों भर जाते हैं।", क्या बात कही है यार ?" ऐसा तो हमने कभी सोचा ही नहीं।*
*फिर तीसरी रोटी किस की होती है?" एक दोस्त ने सवाल किया।*
*"तीसरी रोटी बहू की होती है जिसमें सिर्फ "कर्तव्य" का भाव होता है जो कुछ कुछ स्वाद भी देती है और पेट भी भर देती है और वृद्धाश्रम की परेशानियों से भी बचाती है", थोड़ी देर के लिए वहाँ चुप्पी छा गई।*
*"लेकिन ये चौथी रोटी कौन सी होती है ?" मौन तोड़ते हुए एक दोस्त ने पूछा-*
*"चौथी रोटी नौकरानी की होती है। जिससे ना तो इन्सान का "पेट" भरता है न ही "मन" तृप्त होता है और "स्वाद" की तो कोई गारँटी ही नहीं है", तो फिर हमें क्या करना चाहिये यार?*
*माँ की हमेशा पूजा करो, पत्नी को सबसे अच्छा दोस्त बना कर जीवन जिओ, बहू को अपनी बेटी समझो और छोटी मोटी ग़लतियाँ नज़रन्दाज़ कर दो बहू खुश रहेगी तो बेटा भी आपका ध्यान रखेगा।*
*यदि हालात चौथी रोटी तक ले ही आयें तो भगवान का शुकर करो कि उसने हमें ज़िन्दा रखा हुआ है, अब स्वाद पर ध्यान मत दो केवल जीने के लिये बहुत कम खाओ ताकि आराम से बुढ़ापा कट जाये, और सोचो कि वाकई, हम कितने खुशकिस्मत हैं..!!*
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(5) *कहानी*
*रिश्तों में बदलाव*
आज सुबह से ही मानो घर में त्यौहार-सा माहौल लग रहा है। मम्मी जी के चेहरे की चमक और रसोई से आती पकवानों की महक दोनों की वजह एक ही है, 'आज दोपहर को खाने ( लंच ) पर उनकी एक सहेली आने वाली हैं; आज घर को पूरी तरह से सजाया जा रहा है।
कल शाम को बातों-बातों में उन्होंने बताया कि कल मेरी सहेली खाने पर आ रही है। तो उन्हीं के लिए उपहार खरीदने हम बाज़ार निकल गए, उन्होंने बाज़ार से बड़ी महंगी-सी साड़ी खरीदी अपनी सहेली के लिए।
आज तो हद ही हो गई, मम्मी जी खुशी के मारे सुबह को जल्दी उठकर मुझसे भी पहले रसोई में घुस गई और बड़े प्यार और जतन के साथ खुद से तैयार की हुई पकवानों की लिस्ट में से एक के बाद एक पकवान बनाना भी शुरू कर दिया।
मम्मी जी तो 'खूब खुश नजर आ रही हैं पर मैं... बेमन, बनावटी मुस्कान चेहरे पर सजाए काम में उनका हाथ बटा रही हूँ।
मायके में मेरी माँ का आज जन्मदिन है। शादी के बाद यह माँ का पहला ऐसा जन्मदिन होगा जब कोई भी उनके साथ नहीं होगा, अब मैं यहाँ, पापा ऑफिस टूर पर और भाई तो है ही परदेस में।
कल मन को बड़ा मजबूत करके मायके जाने के लिए तैयार किया था, मम्मी जी से बोलने ही वाली थी कि उन्होंने मेरे बोलने से पहले ही अपनी सहेली के आने वाली बात सामने रख दी। दोपहर में लंच और शाम को हम सभी का उनके साथ फन सिटी जाने का प्रोग्राम तय हो चुका था।
क्या कहती मन मार कर रह गई, घर को सजाया और खुद भी बेमन-सी सँवर गई। कुछ ही देर में डोर बेल बजी उनका स्वागत करने के लिए मम्मी जी ने मुझे ही आगे कर दिया।
गेट खोला, बड़े से घने गुलदस्ते के पीछे छिपा चेहरा जब नजर आया तो मेरी आँखें फटी की फटी और मुँह खुला का खुला रह गया। आपको पता है, सामने कौन था ? सामने मेरी माँ खड़ी थी! माँ मुझे गुलदस्ता पकड़ाते हुए बोली,
" सरप्राइज !"
हैरान और खुश खड़ी मैं, अपनी माँ को निहार रही थी। "बर्थडे विश नहीं करोगी हमारी सहेली को?" पीछे खड़ी मम्मी जी बोली।
"माँ...आपकी सहेली?" मैंने बड़े ही ताज्ज़ुब से पूछा।
"अरे भाई झूठ थोड़ी ना कहा था और ऐसा किसने कह दिया की समधिन-समधिन दोस्त नहीं हो सकती।" मम्मी जी ने कहा।
*"बिल्कुल हो सकती है जो अपनी बहू को बेटी जैसा लाड़ दुलार करें, सिर्फ वही समधिन को दोस्त बना सकती है।"* कहते हुए माँ ने आगे बढ़कर मम्मी जी को गले लगा लिया।
खुशी के मेरे मुँह से एक शब्द भी ना निकल पाया, बस आँखों से आँसू छलकने लगे। मैंने मम्मी जी की हथेलियों को अपनी आँखों से स्पर्श करके होठों से चूम लिया और उनको गले लगा लिया। माँ हम दोनों को देखकर भीगी पलकों के साथ मुस्कुरा पड़ीं।
रिश्तो का उत्सव बड़े प्यार से मनाते हुए, एक तरफ मेरी माँ खड़ी थी जिन्होंने मुझे रिश्तों की अहमियत बताई और दूसरी तरफ मम्मी जी जिनसे मैंने सीखा रिश्तों को दिल से निभाना। दोनों मुझे देखकर जहाँ मुस्कुरा रही थी, वही मैं दोनों के बीच खड़ी अपनी किस्मत पर इतरा रही थी। आँखों में नमी और होठों पर मुस्कुराहट थी।
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2026-06-13 05:34:14 |
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40449659 |
सकल जैन महिला मंडळ फलटण |
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??????????
आज का नियम है नमकीन सेव नही खाना |
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2026-06-13 05:34:13 |
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सकल जैन महिला मंडळ फलटण |
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??????????
आज का नियम है नमकीन सेव नही खाना |
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2026-06-13 05:34:13 |
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1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*कहानी बड़ी सुहानी*
(1) *कहानी*
*भक्त और भगवान*
*एक बार एक भक्त मंदिर आता है और भगवान से कहता है*
*भगवान-आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे ?*
*एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता हूं, आप मेरा रूप धारण कर घूम आओl*
*भगवान मान जाते हैं*,
*लेकिन एक शर्त रखते हैं कि जो भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना कुछ बोलना नहीं।*
*मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है, सेवक मान जाता हैl*
सबसे पहले *मंदिर में बिजनेस मैन आता है* और कहता है, भगवान मैंने एक नयी फैक्ट्री डाली है, उसे *खूब सफल करना।*
वह *माथा टेकता है*, तो उसका *पर्स नीचे गिर* जाता है l *वह बिना पर्स लिये ही चला जाता हैl*
*सेवक बेचैन हो जाता है*, वह सोचता है कि रोक कर उसे बताये कि *पर्स गिर* गया,
*लेकिन शर्त की वजह से वह नहीं कह पाताl*
*इसके बाद एक गरीब आदमी आता है और भगवान को कहता है कि घर में खाने को कुछ नहीं. भगवान मदद करो।*
तभी उसकी *नजर पर्स* पर पड़ती है, वह *भगवान का शुक्रिया अदा करता* है और पर्स लेकर चला जाता हैl
अब *तीसरा व्यक्ति* आता है, वह *नाविक* होता
है l वह *भगवान* से कहता है कि *मैं 15 दिनों के लिए जहाज लेकर समुद्र की यात्रा पर जा रहा हूं,यात्रा में कोई अड़चन न आये भगवान दया दृष्टि बनाये रखना..*
तभी पीछे से *बिजनेस मैन पुलिस के साथ आता* है और कहता है कि मेरे बाद ये *नाविक* आया हैl
इसी ने *मेरा पर्स चुरा* लिया है, *पुलिस नाविक को ले जा रही होती है तभी सेवक बोल पड़ता है नही इसने पर्स नही चुराया।*
*फिर किसने चुराया*
*वो जो इस नाविक से पहले एक गरीब आया था*
अब पुलिस सेवक के कहने पर उस *गरीब आदमी* को पकड़ कर जेल में बंद कर देती है।
*रात को भगवान आते हैं, तो सेवक खुशी खुशी पूरा किस्सा बताता हैl*
*भगवान कहते हैं, तुमने किसी का काम बनाया नहीं, बल्कि बिगाड़ा हैl*
*वो कैसे भगवन में तो बिल्कुल सही सही बोला*
सुन वह *व्यापारी गलत धंधे* करता है,अगर उसका *पर्स गिर भी गया, तो उसे फर्क नहीं पड़ता था।*
इससे उसके *पाप ही कम होते*, क्योंकि वह *पर्स गरीब इंसान को मिला था*. पर्स मिलने पर उसका भला होता *उसके बच्चे भूखों नहीं मरते !*
रही बात *नाविक* की, तो वह जिस *यात्रा* पर जा रहा था, वहां *तूफान आनेवाला है*, अगर वह जेल में रहता, तो उसकी जान बच जाती, और उसकी पत्नी विधवा होने से बच जाती, *तुमने सब गड़बड़ कर दीl*
*कई बार हमारी लाइफ में भी ऐसी परेशानी आती है, जब हमें लगता है कि ये मेरे साथ ही क्यों हुआl*
*लेकिन इसके पीछे कर्मो के हिसाब से भगवान या यूं कहो कि नियती की सब प्लानिंग होती हैl*
*शिक्षा: जब भी कोई परेशानी आये. उदास मत होना l इस कहानी को याद करना और सोचना कि जो भी होता है,अच्छे के लिए होता है..!!*
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(2) *कहानी*
*सोच में परिवर्तन*
*ट्रेन में दो बच्चे यहाँ-वहाँ दौड़ रहे थे, कभी आपस में झगड़ जाते तो कभी किसी सीट के उपर कूदते। पास ही बैठा पिता किन्हीं विचारों में खोया था। बीच-बीच में जब बच्चे उसकी ओर देखते तो वह एक स्नेहिल मुस्कान बच्चों पर डालता और फिर बच्चे उसी प्रकार अपनी शरारतों में व्यस्त हो जाते और पिता फिर उन्हें निहारने लगता।*
*ट्रेन के सहयात्री बच्चों की चंचलता से परेशान हो गए थे और पिता के रवैये से नाराज़। चूँकि रात्रि का समय था अतः सभी आराम करना चाहते थे। बच्चों की भागदौड़ को देखते हुए एक यात्री से रहा न गया और लगभग झल्लाते हुए बच्चों के पिता से बोल उठा - "कैसे पिता हैं आप ? बच्चे इतनी शैतानियां कर रहे हैं और आप उन्हें रोकते-टोकते नहीं, बल्कि मुस्कुराकर प्रोत्साहन दे रहे हैं। क्या आपका दायित्त्व नहीं कि आप इन्हें समझाएं ???*
*उस सज्जन की शिकायत से अन्य यात्रियों ने राहत की साँस ली कि अब यह व्यक्ति लज्जित होगा और बच्चों को रोकेगा परन्तु उस पिता ने कुछ क्षण रुक कर कहा कि - "कैसे समझाऊं बस यही सोच रहा हूं भाईसाहब"।*
*यात्री बोला - "मैं कुछ समझ नहीं"*
*व्यक्ति बोला - "मेरी पत्नी अपने मायके गई थी वहाँ एक दुर्घटना के चलते कल उसकी मौत हो गई। मैं बच्चों को उसके अंतिम दर्शनों के लिए ले जा रहा हूँ और इसी उलझन में हूँ कि कैसे समझाऊं इन्हें कि अब ये अपनी मां को कभी देख नहीं पाएंगे।"*
*उसकी यह बात सुनकर जैसे सभी लोगों को साँप सूंघ गया। बोलना तो दूर सोचने तक का सामर्थ्य जाता रहा सभी का।*
*बच्चे यथावत शैतानियां कर रहे थे। अभी भी वे कंपार्टमेंट में दौड़ लगा रहे थे। वह व्यक्ति फिर मौन हो गया। वातावरण में कोई परिवर्तन न हुआ पर वे बच्चे अब उन यात्रियों को शैतान, अशिष्ट नहीं लग रहे थे बल्कि ऐसे नन्हें कोमल पुष्प लग रहे थे जिन पर सभी अपनी ममता उड़ेलना चाह रहे थे।*
*उनका पिता अब उन लोगों को लापरवाह इंसान नहीं वरन अपने जीवन साथी के विछोह से दुखी दो बच्चों का अकेला पिता और माता भी दिखाई दे रहा था।*
*ऐसे ही एक बार मेरे आगे वाली कार कछुए की तरह चल रही थी और मेरे बार-बार हॉर्न देने पर भी रास्ता नहीं दे रही थी। मैं अपना आपा खो कर चिल्लाने ही वाला था कि मैंने कार के पीछे लगा एक छोटा सा स्टिकर देखा जिस पर लिखा था _"शारीरिक विकलांग; कृपया धैर्य रखें"!_ और यह पढ़ते ही जैसे सब-कुछ बदल गया!!*
*मैं तुरंत ही शांत हो गया और कार को धीमा कर लिया। यहाँ तक की मैं उस कार और उसके ड्राईवर का विशेष खयाल रखते हुए चलने लगा कि कहीं उसे कोई तक़लीफ न हो। मैं ऑफिस कुछ मिनट देर से ज़रुर पहुँचा मगर मन में एक संतोष था।*
*कहने को तो यह एक कहानी है सत्य या असत्य। पर एक मूल बात यह एक अनुभूति/एहसास/सोच से व्यवहार में बदलाव आता है, क्षण भर में ही जिंदगी जीने का, किसी के प्रति सोच का दृष्टिकोण बदल जाता है।*
*हम सभी इसलिए उलझनों में हैं, क्योंकि हमने अपनी धारणाओं रूपी उलझनों का संसार अपने इर्द-गिर्द स्वयं रच लिया है। मैं यह नहीं कहता कि किसी को परेशानी या तकलीफ नहीं है... पर क्या निराशा या नकारात्मक विचारों से हम उन परिस्थितियों को बदल सकते हैं?*
*आवश्यकता है एक आशा, एक उत्साह से भरी सकारात्मक सोच की, फिर परिवर्तन तत्क्षण आपके भीतर आपको अनुभव होगा। उस लहर में हताशा की मरुभूमि भी नंदन वन की भांति सुरभित हो उठेगी। बस यही सकरात्मक सोच/एहसास/दृष्टिकोण देने का प्रयास मैं इन दैनिक कहानियों से करता आ रहा हूँ। आप सभी का इन कहानियों/सोच/विचारों को आगे साँझा करने लिए अग्रिम धन्यवाद!*
*एक सुंदर कहानी सुनने हैं पढ़ने के लिए समूह में सम्मिलित हो जाइए।*
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(3) *कहानी*
एक गरीब आदमी था।
वो हर रोज नजदीक के मंदिर में जाकर वहां साफ-सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था। अक्सर वो अपने प्रभू से कहता कि मुझे आशीर्वाद दीजिए तो मेरे पास ढेर सारा धन-दौलत आ जाए।
एक दिन ठाकुर जी ने बाल रूप में प्रगट हो उस आदमी से पूछ ही लिया कि क्या तुम मन्दिर में केवल इसीलिए, काम करने आते हो।
उस आदमी ने पूरी ईमानदारी से कहा कि हां, मेरा उद्देश्य तो यही है कि मेरे पास ढेर सारा धन आ जाए, इसीलिए तो आपके दर्शन करने आता हूं। पटरी पर सामान लगाकर बेचता हूं। पता नहीं, मेरे सुख के दिन कब आएंगे।
बाल रूप ठाकुर जी ने कहा कि -- तुम चिंता मत करो। जब तुम्हारे सामने अवसर आएगा तब ऊपर वाला तुम्हें आवाज थोड़ी लगाएगा। बस, चुपचाप तुम्हारे सामने अवसर खोलता जाएगा।*
युवक चला गया।
समय ने पलटा खाया, वो अधिक धन कमाने लगा। इतना व्यस्त हो गया कि मन्दिर में जाना ही छूट गया।
कई वर्षों बाद वह एक दिन सुबह ही मन्दिर पहुंचा और साफ-सफाई करने लगा।
ठाकुर जी फिर प्रगट हुए और उस व्यक्ति से बड़े ही आश्चर्य से पूछा--क्या बात है, इतने बरसों बाद आए हो, सुना है बहुत बड़े सेठ बन गए हो। वो व्यक्ति बोला--बहुत धन कमाया।
अच्छे घरों में बच्चों की शादियां की, पैसे की कोई कमी नहीं है पर दिल में चैन नहीं है। ऐसा लगता था रोज सेवा करने आता रहूं पर आ ना सका।
व्यक्ति बोला,हे प्रभू, आपने मुझे सब कुछ दिया पर जिंदगी का चैन नहीं दिया ?
प्रभू जी ने कहा कि तुमने वह मांगा ही कब था?
जो तुमने मांगा वो तो तुम्हें मिल गया ना।
फिर आज यहां क्या करने आए हो?
उसकी आंखों में आंसू भर आए, ठाकुर जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला --अब कुछ मांगने के लिए सेवा नहीं करूंगा। बस दिल को शान्ति मिल जाए। ठाकुर जी ने कहा--पहले तय कर लो कि अब कुछ मागने के लिए मन्दिर की सेवा नहीं करोगे, बस मन की शांति के लिए ही आओगे।
ठाकुर जी ने समझाया कि चाहे मांगने से कुछ भी मिल जाए पर दिल का चैन कभी नहीं मिलता इसलिए सेवा के बदले कुछ मांगना नहीं है। वो व्यक्ति बड़ा ही उदास होकर ठाकुर जी को देखता रहा और बोला--मुझे कुछ नहीं चाहिए।
आप बस, मुझे सेवा करने दीजिए। सच में, मन की शांति सबसे अनमोल है।।और श्री हरि की किरपा जब बरसती है तो वो बरसती ही जाती है।
जब भी मैं बुरे हालातों से घबराती हूँ..!
तब मेरे प्रभु जी कि आवाज़ आती है "रुक .................. मैं आता हूँ"..!!
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(4) *कहानी*
*रोटी,*
*चार प्रकार की होती है।"*
*पहली "सबसे स्वादिष्ट" रोटी "माँ की "ममता" और "वात्सल्य" से भरी हुई। जिससे पेट तो भर जाता है, पर मन कभी नहीं भरता।*
*एक दोस्त ने कहा, सोलह आने सच, पर शादी के बाद माँ की रोटी कम ही मिलती है।" उन्होंने आगे कहा "हाँ, वही तो बात है।*
*दूसरी रोटी पत्नी की होती है जिसमें अपनापन और "समर्पण" भाव होता है जिससे "पेट" और "मन" दोनों भर जाते हैं।", क्या बात कही है यार ?" ऐसा तो हमने कभी सोचा ही नहीं।*
*फिर तीसरी रोटी किस की होती है?" एक दोस्त ने सवाल किया।*
*"तीसरी रोटी बहू की होती है जिसमें सिर्फ "कर्तव्य" का भाव होता है जो कुछ कुछ स्वाद भी देती है और पेट भी भर देती है और वृद्धाश्रम की परेशानियों से भी बचाती है", थोड़ी देर के लिए वहाँ चुप्पी छा गई।*
*"लेकिन ये चौथी रोटी कौन सी होती है ?" मौन तोड़ते हुए एक दोस्त ने पूछा-*
*"चौथी रोटी नौकरानी की होती है। जिससे ना तो इन्सान का "पेट" भरता है न ही "मन" तृप्त होता है और "स्वाद" की तो कोई गारँटी ही नहीं है", तो फिर हमें क्या करना चाहिये यार?*
*माँ की हमेशा पूजा करो, पत्नी को सबसे अच्छा दोस्त बना कर जीवन जिओ, बहू को अपनी बेटी समझो और छोटी मोटी ग़लतियाँ नज़रन्दाज़ कर दो बहू खुश रहेगी तो बेटा भी आपका ध्यान रखेगा।*
*यदि हालात चौथी रोटी तक ले ही आयें तो भगवान का शुकर करो कि उसने हमें ज़िन्दा रखा हुआ है, अब स्वाद पर ध्यान मत दो केवल जीने के लिये बहुत कम खाओ ताकि आराम से बुढ़ापा कट जाये, और सोचो कि वाकई, हम कितने खुशकिस्मत हैं..!!*
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(5) *कहानी*
*रिश्तों में बदलाव*
आज सुबह से ही मानो घर में त्यौहार-सा माहौल लग रहा है। मम्मी जी के चेहरे की चमक और रसोई से आती पकवानों की महक दोनों की वजह एक ही है, 'आज दोपहर को खाने ( लंच ) पर उनकी एक सहेली आने वाली हैं; आज घर को पूरी तरह से सजाया जा रहा है।
कल शाम को बातों-बातों में उन्होंने बताया कि कल मेरी सहेली खाने पर आ रही है। तो उन्हीं के लिए उपहार खरीदने हम बाज़ार निकल गए, उन्होंने बाज़ार से बड़ी महंगी-सी साड़ी खरीदी अपनी सहेली के लिए।
आज तो हद ही हो गई, मम्मी जी खुशी के मारे सुबह को जल्दी उठकर मुझसे भी पहले रसोई में घुस गई और बड़े प्यार और जतन के साथ खुद से तैयार की हुई पकवानों की लिस्ट में से एक के बाद एक पकवान बनाना भी शुरू कर दिया।
मम्मी जी तो 'खूब खुश नजर आ रही हैं पर मैं... बेमन, बनावटी मुस्कान चेहरे पर सजाए काम में उनका हाथ बटा रही हूँ।
मायके में मेरी माँ का आज जन्मदिन है। शादी के बाद यह माँ का पहला ऐसा जन्मदिन होगा जब कोई भी उनके साथ नहीं होगा, अब मैं यहाँ, पापा ऑफिस टूर पर और भाई तो है ही परदेस में।
कल मन को बड़ा मजबूत करके मायके जाने के लिए तैयार किया था, मम्मी जी से बोलने ही वाली थी कि उन्होंने मेरे बोलने से पहले ही अपनी सहेली के आने वाली बात सामने रख दी। दोपहर में लंच और शाम को हम सभी का उनके साथ फन सिटी जाने का प्रोग्राम तय हो चुका था।
क्या कहती मन मार कर रह गई, घर को सजाया और खुद भी बेमन-सी सँवर गई। कुछ ही देर में डोर बेल बजी उनका स्वागत करने के लिए मम्मी जी ने मुझे ही आगे कर दिया।
गेट खोला, बड़े से घने गुलदस्ते के पीछे छिपा चेहरा जब नजर आया तो मेरी आँखें फटी की फटी और मुँह खुला का खुला रह गया। आपको पता है, सामने कौन था ? सामने मेरी माँ खड़ी थी! माँ मुझे गुलदस्ता पकड़ाते हुए बोली,
" सरप्राइज !"
हैरान और खुश खड़ी मैं, अपनी माँ को निहार रही थी। "बर्थडे विश नहीं करोगी हमारी सहेली को?" पीछे खड़ी मम्मी जी बोली।
"माँ...आपकी सहेली?" मैंने बड़े ही ताज्ज़ुब से पूछा।
"अरे भाई झूठ थोड़ी ना कहा था और ऐसा किसने कह दिया की समधिन-समधिन दोस्त नहीं हो सकती।" मम्मी जी ने कहा।
*"बिल्कुल हो सकती है जो अपनी बहू को बेटी जैसा लाड़ दुलार करें, सिर्फ वही समधिन को दोस्त बना सकती है।"* कहते हुए माँ ने आगे बढ़कर मम्मी जी को गले लगा लिया।
खुशी के मेरे मुँह से एक शब्द भी ना निकल पाया, बस आँखों से आँसू छलकने लगे। मैंने मम्मी जी की हथेलियों को अपनी आँखों से स्पर्श करके होठों से चूम लिया और उनको गले लगा लिया। माँ हम दोनों को देखकर भीगी पलकों के साथ मुस्कुरा पड़ीं।
रिश्तो का उत्सव बड़े प्यार से मनाते हुए, एक तरफ मेरी माँ खड़ी थी जिन्होंने मुझे रिश्तों की अहमियत बताई और दूसरी तरफ मम्मी जी जिनसे मैंने सीखा रिश्तों को दिल से निभाना। दोनों मुझे देखकर जहाँ मुस्कुरा रही थी, वही मैं दोनों के बीच खड़ी अपनी किस्मत पर इतरा रही थी। आँखों में नमी और होठों पर मुस्कुराहट थी।
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1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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जिनोदय?JINODAYA |
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2026-06-13 05:30:29 |
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