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73804 40476112 +120363390826692662 ---छठवीं ढाल---- षट्काय जीव न हनन तैं, सब विधि दरब-हिंसा टरी। रागादि भाव निवारतैं, हिंसा न भावित अवतरी॥ जिनके न लेश मृषा न जल मृण हू बिना दीयो गहैं। अठदशसहस विधि शीलधर, चिद्ब्रह्म में नित रमि रहैं ॥(1) अन्तर चतुर्दश भेद बाहिर, संग दशधा तैं टलैं। परमाद तजि चउ कर मही लखि, समिति ईर्या तैं चलैं॥ जग सुहितकर सब अहितहर, श्रुतिसुखद सब संशय हरैं। भ्रम-रोग-हर जिनके वचन, मुखचन्द्र तैं अमृत झरैं॥(2) छ्यालीस दोष बिना सुकुल, श्रावक तनैं घर अशन को। लैं तप बढ़ावन हेतु, नहिं तन पोषते तजि रसन को। शुचि ज्ञान संयम उपकरण, लखिकैं गहैं लखिकैं धरैं। निर्जन्तु थान विलोक तन-मल, मूत्र श्लेषम परिहरैं ॥(3) सम्यक् प्रकार निरोध मन-वच-काय आतम ध्यावते। तिन सुथिर-मुद्रा देखि मृग-गण, उपल खाज खुजावते॥ रस रूप गन्ध तथा फरस, अरु शब्द शुभ असुहावने। तिनमें न राग विरोध, पंचेन्द्रिय-जयन पद पावने ॥(4) समता सम्हारैं थुति उचारैं, वन्दना जिनदेव को। नित करैं श्रुतरति करै प्रतिक्रम, तजैं तन अहमेव को॥ जिनके न न्हौंन न दन्त-धोवन, लेश अम्बर आवरन। भूमाहिं पिछली रयनि में कछु, शयन एकासन करन ॥(5) इक बार दिन में लैं अहार, खड़े अलप निज पान में। कचलोंच करत न डरत परीषह, सों लगे निज ध्यान में॥ अरि मित्र महल मसान कंचन-काँच निन्दन-थुति करन। अर्घावतारन असि-प्रहारन, में सदा समता धरन ॥(6) तप तपैं द्वादश धरैं वृष दश, रत्न-त्रय सेवैं सदा। मुनि-साथ में वा एक विचरैं चहैं नहिं भव-सुख कदा॥ यों है सकलसंयमचरित, सुनिये स्वरूपाचरन अब। जिस होत प्रगटै आपनी निधि, मिटै पर की प्रवृत्ति सब॥(7) जिन परमपैनी सुबुधि - छैनी, डारि अन्तर भेदिया। वरणादि अरु रागादि तैं, निज-भाव को न्यारा किया।। निजमाहिं निज के हेतु निज कर, आपको आपै गह्यो। गुण गुणी ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय, मंझार कछु भेद न रह्यो॥(8) जहँ ध्यान ध्याता ध्येय को न, विकल्प वच भेद न जहाँ। चिद्भाव कर्म चिदेश कर्ता, चेतना किरिया तहाँ॥ तीनों अभिन्न अखिन्न शुध उपयोग की निश्चल दसा। प्रगटी जहाँ दृग-ज्ञान-व्रत ये तीनधा एकै लसा ॥(9) परमाण नय निक्षेप को न उद्योत अनुभव में दिखैं। दृग-ज्ञान-सुख-बलमय सदा, नहिं आन भाव जु मो विखैं। मैं साध्य साधक मैं अबाधक, कर्म अरु तसु फलनितैं। चित् पिण्ड चण्ड अखण्ड सुगुणकरण्ड च्युत पुनि कलनितैं॥(10) यों चिन्त्य निज में थिर भये, तिन अकथ जो आनन्द लह्यो। सो इन्द्र नाग नरेन्द्र वा, अहमिन्द्र के नाहीं कह्यो॥ तब ही शुकलध्यानाग्नि करि, चउ-घातिविधि कानन दह्यो। सब लख्यो केवलज्ञान करि, भविलोक को शिवमग कह्यो॥(11) पुनि घाति शेष अघातिविधि, छिन माहिं अष्टम-भू बसैं। वसुकर्म विनसै सुगुण वसु, सम्यक्त्व आदिक सब लसैं॥ संसार खार अपार पारावार, तरि तीरहिं गये। अविकार अकल अरूप शुचि,चिद्रूप अविनाशी भये ॥(12) निजमाँहि लोक अलोक गुण, परजाय प्रतिबिम्बित भये। रहि हैं अनन्तानन्तकाल, यथा तथा शिव परिणये॥ धनि धन्य हैं जे जीव, नर-भव पाय, यह कारज किया। तिनही अनादि भ्रमण पञ्च प्रकार तजि वर सुख लिया॥(13) मुख्योपचार दुभेद यों बड़भागि रत्नत्रय धरैं। अरु धरैंगे ते शिव लहैं तिन, सुयश-जल-जग-मल हरैं॥ इमि जानि आलस हानि, साहस ठानि यह सिख आदरो। जबलौं न रोग जरा गहै तबलौं झटिति निज हित करो॥(14) यह राग आग दहै सदा, तातैं समामृत सेइये। चिर भजे विषय कषाय अब तो त्याग निजपद बेइये॥ कहा रच्यो पर-पद में न तेरो पद यहै क्यों दु:ख सहै। अब ‘दौल’ होउ सुखी स्व-पद रचि, दाव मत चूकौ यहै ।।(15) (दोहा) इक नव वसु इक वर्ष की, तीज शुकल वैशाख। कर्यो तत्त्व उपदेश यह, लखि ‘बुधजन’ की भाख॥(1) लघु-धी तथा प्रमादतैं, शब्द - अर्थ की भूल। सुधी सुधार पढ़ो सदा, जो पावो भव-कूल॥(2) 2026-04-10 07:18:13
73803 40476112 +120363390826692662 ---छठवीं ढाल---- षट्काय जीव न हनन तैं, सब विधि दरब-हिंसा टरी। रागादि भाव निवारतैं, हिंसा न भावित अवतरी॥ जिनके न लेश मृषा न जल मृण हू बिना दीयो गहैं। अठदशसहस विधि शीलधर, चिद्ब्रह्म में नित रमि रहैं ॥(1) अन्तर चतुर्दश भेद बाहिर, संग दशधा तैं टलैं। परमाद तजि चउ कर मही लखि, समिति ईर्या तैं चलैं॥ जग सुहितकर सब अहितहर, श्रुतिसुखद सब संशय हरैं। भ्रम-रोग-हर जिनके वचन, मुखचन्द्र तैं अमृत झरैं॥(2) छ्यालीस दोष बिना सुकुल, श्रावक तनैं घर अशन को। लैं तप बढ़ावन हेतु, नहिं तन पोषते तजि रसन को। शुचि ज्ञान संयम उपकरण, लखिकैं गहैं लखिकैं धरैं। निर्जन्तु थान विलोक तन-मल, मूत्र श्लेषम परिहरैं ॥(3) सम्यक् प्रकार निरोध मन-वच-काय आतम ध्यावते। तिन सुथिर-मुद्रा देखि मृग-गण, उपल खाज खुजावते॥ रस रूप गन्ध तथा फरस, अरु शब्द शुभ असुहावने। तिनमें न राग विरोध, पंचेन्द्रिय-जयन पद पावने ॥(4) समता सम्हारैं थुति उचारैं, वन्दना जिनदेव को। नित करैं श्रुतरति करै प्रतिक्रम, तजैं तन अहमेव को॥ जिनके न न्हौंन न दन्त-धोवन, लेश अम्बर आवरन। भूमाहिं पिछली रयनि में कछु, शयन एकासन करन ॥(5) इक बार दिन में लैं अहार, खड़े अलप निज पान में। कचलोंच करत न डरत परीषह, सों लगे निज ध्यान में॥ अरि मित्र महल मसान कंचन-काँच निन्दन-थुति करन। अर्घावतारन असि-प्रहारन, में सदा समता धरन ॥(6) तप तपैं द्वादश धरैं वृष दश, रत्न-त्रय सेवैं सदा। मुनि-साथ में वा एक विचरैं चहैं नहिं भव-सुख कदा॥ यों है सकलसंयमचरित, सुनिये स्वरूपाचरन अब। जिस होत प्रगटै आपनी निधि, मिटै पर की प्रवृत्ति सब॥(7) जिन परमपैनी सुबुधि - छैनी, डारि अन्तर भेदिया। वरणादि अरु रागादि तैं, निज-भाव को न्यारा किया।। निजमाहिं निज के हेतु निज कर, आपको आपै गह्यो। गुण गुणी ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय, मंझार कछु भेद न रह्यो॥(8) जहँ ध्यान ध्याता ध्येय को न, विकल्प वच भेद न जहाँ। चिद्भाव कर्म चिदेश कर्ता, चेतना किरिया तहाँ॥ तीनों अभिन्न अखिन्न शुध उपयोग की निश्चल दसा। प्रगटी जहाँ दृग-ज्ञान-व्रत ये तीनधा एकै लसा ॥(9) परमाण नय निक्षेप को न उद्योत अनुभव में दिखैं। दृग-ज्ञान-सुख-बलमय सदा, नहिं आन भाव जु मो विखैं। मैं साध्य साधक मैं अबाधक, कर्म अरु तसु फलनितैं। चित् पिण्ड चण्ड अखण्ड सुगुणकरण्ड च्युत पुनि कलनितैं॥(10) यों चिन्त्य निज में थिर भये, तिन अकथ जो आनन्द लह्यो। सो इन्द्र नाग नरेन्द्र वा, अहमिन्द्र के नाहीं कह्यो॥ तब ही शुकलध्यानाग्नि करि, चउ-घातिविधि कानन दह्यो। सब लख्यो केवलज्ञान करि, भविलोक को शिवमग कह्यो॥(11) पुनि घाति शेष अघातिविधि, छिन माहिं अष्टम-भू बसैं। वसुकर्म विनसै सुगुण वसु, सम्यक्त्व आदिक सब लसैं॥ संसार खार अपार पारावार, तरि तीरहिं गये। अविकार अकल अरूप शुचि,चिद्रूप अविनाशी भये ॥(12) निजमाँहि लोक अलोक गुण, परजाय प्रतिबिम्बित भये। रहि हैं अनन्तानन्तकाल, यथा तथा शिव परिणये॥ धनि धन्य हैं जे जीव, नर-भव पाय, यह कारज किया। तिनही अनादि भ्रमण पञ्च प्रकार तजि वर सुख लिया॥(13) मुख्योपचार दुभेद यों बड़भागि रत्नत्रय धरैं। अरु धरैंगे ते शिव लहैं तिन, सुयश-जल-जग-मल हरैं॥ इमि जानि आलस हानि, साहस ठानि यह सिख आदरो। जबलौं न रोग जरा गहै तबलौं झटिति निज हित करो॥(14) यह राग आग दहै सदा, तातैं समामृत सेइये। चिर भजे विषय कषाय अब तो त्याग निजपद बेइये॥ कहा रच्यो पर-पद में न तेरो पद यहै क्यों दु:ख सहै। अब ‘दौल’ होउ सुखी स्व-पद रचि, दाव मत चूकौ यहै ।।(15) (दोहा) इक नव वसु इक वर्ष की, तीज शुकल वैशाख। कर्यो तत्त्व उपदेश यह, लखि ‘बुधजन’ की भाख॥(1) लघु-धी तथा प्रमादतैं, शब्द - अर्थ की भूल। सुधी सुधार पढ़ो सदा, जो पावो भव-कूल॥(2) 2026-04-10 07:18:12
73802 40476112 +120363390826692662 जय जिनेन्द्र जी!! दिनाँक: १०/०४/२०२६ तिथि : वैशाख कृष्ण अष्टमी, २५५२ दिन : शुक्रवार कल्याणक: आज *दाल-मखनी, नान खाने का त्याग और छहढाला की छठी ढाल पढ़ने का नियम* रखें। कल का संभावित नियम- छोले-भठूरे खाने का त्याग अगर आप - आज १ दिन का नियम करना चाहते हैं तो देव-शास्त्र-गुरु का स्मरण करते हुए संकल्प करें कि मै आज उपरोक्त नियम का पालन करुँगा/करूँगी। ?? *मेरे दोनों नियम हैं।*?? 2026-04-10 07:17:26
73801 40476112 +120363390826692662 जय जिनेन्द्र जी!! दिनाँक: १०/०४/२०२६ तिथि : वैशाख कृष्ण अष्टमी, २५५२ दिन : शुक्रवार कल्याणक: आज *दाल-मखनी, नान खाने का त्याग और छहढाला की छठी ढाल पढ़ने का नियम* रखें। कल का संभावित नियम- छोले-भठूरे खाने का त्याग अगर आप - आज १ दिन का नियम करना चाहते हैं तो देव-शास्त्र-गुरु का स्मरण करते हुए संकल्प करें कि मै आज उपरोक्त नियम का पालन करुँगा/करूँगी। ?? *मेरे दोनों नियम हैं।*?? 2026-04-10 07:17:25
73800 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन 2026-04-10 07:17:10
73799 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन 2026-04-10 07:17:09
73797 40449702 Mahaveer Ki Pathshala Main आज रात्रि 8:30 से क्षत्र चूड़ामणि की क्लास रहेगी और शनिवार को द्रव संग्रह का रिजल्ट घोषित होगा जिन लोगों ने रिटर्न पेपर सबमिट किया है उनका पेपर ग्रुप में प्रेषित कर दिया है सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं आभार । 2026-04-10 07:16:54
73798 40449702 Mahaveer Ki Pathshala Main आज रात्रि 8:30 से क्षत्र चूड़ामणि की क्लास रहेगी और शनिवार को द्रव संग्रह का रिजल्ट घोषित होगा जिन लोगों ने रिटर्न पेपर सबमिट किया है उनका पेपर ग्रुप में प्रेषित कर दिया है सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं आभार । 2026-04-10 07:16:54
73796 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ????????? *पहेली सुलझाइए*__⁉️⁉️ ????????? ? *गगन में देखो जिनका यान*_ ? *चमक से होती है पहचान*__ ? *देव कौन से वे कहलाते*_ ? *कभी-कभी वे यहां भी आते*_⁉️⁉️ ????????? *प्रेषक? श्रीमती छाया जैन मंडीदीप*?? 2026-04-10 07:16:48
73795 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ????????? *पहेली सुलझाइए*__⁉️⁉️ ????????? ? *गगन में देखो जिनका यान*_ ? *चमक से होती है पहचान*__ ? *देव कौन से वे कहलाते*_ ? *कभी-कभी वे यहां भी आते*_⁉️⁉️ ????????? *प्रेषक? श्रीमती छाया जैन मंडीदीप*?? 2026-04-10 07:16:47