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225041 40449658 ?शांतिधारा-पुणे? *FEEDBACK शांतिधारा गिर गौशाला एवं पंचगव्य अनुसंधान केंद्र में निर्मित* *आयुर्वेदिक मुखवास* *पवित्र मुख*?? *प्रमुख फायदे:* *?मुंह की दुर्गंध, पाचन, गैस, कब्ज,* *?सिर दर्द, आंखों के लिए लाभकारी।* *?खांसी, गले की खराश के लिए लाभकारी।* *?पेट फूलना, सूजन, जलन में* *आराम देता है, उल्टी रोकता है।* *?दांतों और मसूड़ों को स्वस्थ रखें।* *?ब्लड सर्कुलेशन, हीमोग्लोबिन बडाए।* *?कैंसर के खतरे को कम करे।* *मात्रा: 16gm/ 40gm* *मूल्य: 40/95/-* *हमसे जुड़े:* *<a href="https://linktr.ee/shantidhara*" target="_blank">https://linktr.ee/shantidhara*</a> *ऑर्डर हेतु संपर्क:-* *हमारी वेबसाइट* *www.shantidhara.in* *6266486223,8770637723* 2026-06-12 17:52:52
225039 40449679 ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಜೈನಧರ್ಮ 2 ನಿಯಮ ಸಾಗರ‌ ಮಹಾರಾಜರ ದರ್ಶನ‌‌ ಮಾಡಿ ಚರ್ಚೆ ಮಾಡಿ ನೋಡಿ 2026-06-12 17:52:13
225040 40449679 ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಜೈನಧರ್ಮ 2 ನಿಯಮ ಸಾಗರ‌ ಮಹಾರಾಜರ ದರ್ಶನ‌‌ ಮಾಡಿ ಚರ್ಚೆ ಮಾಡಿ ನೋಡಿ 2026-06-12 17:52:13
225037 40449667 संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी *?️‍? आचार्य श्री के अनमोल विचार ?️‍?*। *?️‍??️‍?भेदविज्ञान जैसे गूढ़ विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के बहुत ही सरल शब्दों में अनमोल विचार ???* “ आत्मा में रमण करने के लिए पोथी का ज्ञान आवश्यक नहीं मात्र भेद विज्ञान की आवश्यकता है ।।” इस शरीर का क्या स्वरूप है ? यह जानना ही भेद-विज्ञान है। चतुर्थ गुणस्थान वाला भेदविज्ञान श्रद्धात्मक होता है और सप्तम गुणस्थान वाला भेदविज्ञान अनुभूति परक होता है। जैसे एक स्कूल में है और एक प्रयोगशाला में है। मैं काया में अवश्य हूँ लेकिन काया के बिना भी रह सकता हूँ यह श्रद्धान ही भेदविज्ञान कहलाता है। भेदविज्ञान की शुरुआत ही सही जीवन की शुरुआत है, यह केवलज्ञान तक ले जाने वाला है, जो कभी अंत को प्राप्त नहीं होता है। अनेक बार शरीर को पाया पर यह बोध नहीं आया कि मैं कौन हूँ? मैं एक आत्म तत्व हूँ और शरीर से पृथक् हूँ, इस प्रकार का ज्ञान भेदविज्ञान माना जाता है। शरीर की वेदना को पड़ोसी की वेदना समझना सम्यक ज्ञान है, भेदविज्ञान है। भेदविज्ञानियों के पास जाकर सतचित में आनंद की प्राप्ति का प्रयास करो, फिर स्वयं सच्चिदानंद बन जाओगे। भेदविज्ञान का परिणाम है फूल सा मुस्कराना। शरीर अलग है, आत्मा अलग है, इस प्रकार का ज्ञान होना भेदविज्ञान कहलाता है। भेदविज्ञान से ध्यान की भूमिका बन जाती है। हम रात-दिन निमित्त को दोष देते रहते हैं, यह सब भेदविज्ञान के अभाव के कारण होता है। भेद-भाव से व्यक्ति राग-द्वेष करता रहता है और भेदविज्ञान प्राप्त कर ले तो राग-द्वेष समाप्त हो जाता है। भेदविज्ञान के बल पर ही धर्म में लीन हुआ जाता है। आत्मा में रमण करने के लिए पोथी का ज्ञान आवश्यक नहीं, मात्र भेदविज्ञान की आवश्यकता है। ?आपका मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो ?।* *?आपका जीवन मंगलमय हो ?* *?️‍? विद्या पूर्ण धर्म प्रभावना का ऐप है ?️‍?*। <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1188623173?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=N29CX&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=BROADCASTER" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1188623173?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=N29CX&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=BROADCASTER</a> 2026-06-12 17:51:50
225038 40449667 संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी *?️‍? आचार्य श्री के अनमोल विचार ?️‍?*। *?️‍??️‍?भेदविज्ञान जैसे गूढ़ विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के बहुत ही सरल शब्दों में अनमोल विचार ???* “ आत्मा में रमण करने के लिए पोथी का ज्ञान आवश्यक नहीं मात्र भेद विज्ञान की आवश्यकता है ।।” इस शरीर का क्या स्वरूप है ? यह जानना ही भेद-विज्ञान है। चतुर्थ गुणस्थान वाला भेदविज्ञान श्रद्धात्मक होता है और सप्तम गुणस्थान वाला भेदविज्ञान अनुभूति परक होता है। जैसे एक स्कूल में है और एक प्रयोगशाला में है। मैं काया में अवश्य हूँ लेकिन काया के बिना भी रह सकता हूँ यह श्रद्धान ही भेदविज्ञान कहलाता है। भेदविज्ञान की शुरुआत ही सही जीवन की शुरुआत है, यह केवलज्ञान तक ले जाने वाला है, जो कभी अंत को प्राप्त नहीं होता है। अनेक बार शरीर को पाया पर यह बोध नहीं आया कि मैं कौन हूँ? मैं एक आत्म तत्व हूँ और शरीर से पृथक् हूँ, इस प्रकार का ज्ञान भेदविज्ञान माना जाता है। शरीर की वेदना को पड़ोसी की वेदना समझना सम्यक ज्ञान है, भेदविज्ञान है। भेदविज्ञानियों के पास जाकर सतचित में आनंद की प्राप्ति का प्रयास करो, फिर स्वयं सच्चिदानंद बन जाओगे। भेदविज्ञान का परिणाम है फूल सा मुस्कराना। शरीर अलग है, आत्मा अलग है, इस प्रकार का ज्ञान होना भेदविज्ञान कहलाता है। भेदविज्ञान से ध्यान की भूमिका बन जाती है। हम रात-दिन निमित्त को दोष देते रहते हैं, यह सब भेदविज्ञान के अभाव के कारण होता है। भेद-भाव से व्यक्ति राग-द्वेष करता रहता है और भेदविज्ञान प्राप्त कर ले तो राग-द्वेष समाप्त हो जाता है। भेदविज्ञान के बल पर ही धर्म में लीन हुआ जाता है। आत्मा में रमण करने के लिए पोथी का ज्ञान आवश्यक नहीं, मात्र भेदविज्ञान की आवश्यकता है। ?आपका मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो ?।* *?आपका जीवन मंगलमय हो ?* *?️‍? विद्या पूर्ण धर्म प्रभावना का ऐप है ?️‍?*। <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1188623173?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=N29CX&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=BROADCASTER" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1188623173?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=N29CX&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=BROADCASTER</a> 2026-06-12 17:51:50
225035 40449666 नव आचार्य समय सागर जी भक्त *?️‍? आचार्य श्री के अनमोल विचार ?️‍?*। *?️‍??️‍?भेदविज्ञान जैसे गूढ़ विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के बहुत ही सरल शब्दों में अनमोल विचार ???* “ आत्मा में रमण करने के लिए पोथी का ज्ञान आवश्यक नहीं मात्र भेद विज्ञान की आवश्यकता है ।।” इस शरीर का क्या स्वरूप है ? यह जानना ही भेद-विज्ञान है। चतुर्थ गुणस्थान वाला भेदविज्ञान श्रद्धात्मक होता है और सप्तम गुणस्थान वाला भेदविज्ञान अनुभूति परक होता है। जैसे एक स्कूल में है और एक प्रयोगशाला में है। मैं काया में अवश्य हूँ लेकिन काया के बिना भी रह सकता हूँ यह श्रद्धान ही भेदविज्ञान कहलाता है। भेदविज्ञान की शुरुआत ही सही जीवन की शुरुआत है, यह केवलज्ञान तक ले जाने वाला है, जो कभी अंत को प्राप्त नहीं होता है। अनेक बार शरीर को पाया पर यह बोध नहीं आया कि मैं कौन हूँ? मैं एक आत्म तत्व हूँ और शरीर से पृथक् हूँ, इस प्रकार का ज्ञान भेदविज्ञान माना जाता है। शरीर की वेदना को पड़ोसी की वेदना समझना सम्यक ज्ञान है, भेदविज्ञान है। भेदविज्ञानियों के पास जाकर सतचित में आनंद की प्राप्ति का प्रयास करो, फिर स्वयं सच्चिदानंद बन जाओगे। भेदविज्ञान का परिणाम है फूल सा मुस्कराना। शरीर अलग है, आत्मा अलग है, इस प्रकार का ज्ञान होना भेदविज्ञान कहलाता है। भेदविज्ञान से ध्यान की भूमिका बन जाती है। हम रात-दिन निमित्त को दोष देते रहते हैं, यह सब भेदविज्ञान के अभाव के कारण होता है। भेद-भाव से व्यक्ति राग-द्वेष करता रहता है और भेदविज्ञान प्राप्त कर ले तो राग-द्वेष समाप्त हो जाता है। भेदविज्ञान के बल पर ही धर्म में लीन हुआ जाता है। आत्मा में रमण करने के लिए पोथी का ज्ञान आवश्यक नहीं, मात्र भेदविज्ञान की आवश्यकता है। ?आपका मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो ?।* *?आपका जीवन मंगलमय हो ?* *?️‍? विद्या पूर्ण धर्म प्रभावना का ऐप है ?️‍?*। <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1188623173?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=N29CX&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=BROADCASTER" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1188623173?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=N29CX&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=BROADCASTER</a> 2026-06-12 17:51:33
225036 40449666 नव आचार्य समय सागर जी भक्त *?️‍? आचार्य श्री के अनमोल विचार ?️‍?*। *?️‍??️‍?भेदविज्ञान जैसे गूढ़ विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी के बहुत ही सरल शब्दों में अनमोल विचार ???* “ आत्मा में रमण करने के लिए पोथी का ज्ञान आवश्यक नहीं मात्र भेद विज्ञान की आवश्यकता है ।।” इस शरीर का क्या स्वरूप है ? यह जानना ही भेद-विज्ञान है। चतुर्थ गुणस्थान वाला भेदविज्ञान श्रद्धात्मक होता है और सप्तम गुणस्थान वाला भेदविज्ञान अनुभूति परक होता है। जैसे एक स्कूल में है और एक प्रयोगशाला में है। मैं काया में अवश्य हूँ लेकिन काया के बिना भी रह सकता हूँ यह श्रद्धान ही भेदविज्ञान कहलाता है। भेदविज्ञान की शुरुआत ही सही जीवन की शुरुआत है, यह केवलज्ञान तक ले जाने वाला है, जो कभी अंत को प्राप्त नहीं होता है। अनेक बार शरीर को पाया पर यह बोध नहीं आया कि मैं कौन हूँ? मैं एक आत्म तत्व हूँ और शरीर से पृथक् हूँ, इस प्रकार का ज्ञान भेदविज्ञान माना जाता है। शरीर की वेदना को पड़ोसी की वेदना समझना सम्यक ज्ञान है, भेदविज्ञान है। भेदविज्ञानियों के पास जाकर सतचित में आनंद की प्राप्ति का प्रयास करो, फिर स्वयं सच्चिदानंद बन जाओगे। भेदविज्ञान का परिणाम है फूल सा मुस्कराना। शरीर अलग है, आत्मा अलग है, इस प्रकार का ज्ञान होना भेदविज्ञान कहलाता है। भेदविज्ञान से ध्यान की भूमिका बन जाती है। हम रात-दिन निमित्त को दोष देते रहते हैं, यह सब भेदविज्ञान के अभाव के कारण होता है। भेद-भाव से व्यक्ति राग-द्वेष करता रहता है और भेदविज्ञान प्राप्त कर ले तो राग-द्वेष समाप्त हो जाता है। भेदविज्ञान के बल पर ही धर्म में लीन हुआ जाता है। आत्मा में रमण करने के लिए पोथी का ज्ञान आवश्यक नहीं, मात्र भेदविज्ञान की आवश्यकता है। ?आपका मोक्ष मार्ग प्रशस्त हो ?।* *?आपका जीवन मंगलमय हो ?* *?️‍? विद्या पूर्ण धर्म प्रभावना का ऐप है ?️‍?*। <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1188623173?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=N29CX&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=BROADCASTER" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1188623173?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=N29CX&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=BROADCASTER</a> 2026-06-12 17:51:33
225034 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ?? *प्रेरक वाणी*?? चावल जैसा धवल खाद्य पदार्थ भिन्न-भिन्न वस्तुओं का संयोग पाकर पुलाव, खीर, खिचड़ी,......, रूप में बदल जाता है। ठीक इसी तरह मनुष्य भी संगति के साथ विद्वान, साधु, मूर्ख, तस्कर,......, जैसी उपमा को प्राप्त कर लेता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसीलिए उसका परम कर्तव्य है अपने आसपास के समूह को भली प्रकार पहचान कर मेल मिलाप बढ़ाने का प्रयास करें, अन्यथा चाहे अथवा ना चाहे वातावरण की छाप उसके व्यक्तित्व को निश्चित रूप से प्रभावित करेगी। *जय जिनेंद्र*? 2026-06-12 17:49:49
225033 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ?? *प्रेरक वाणी*?? चावल जैसा धवल खाद्य पदार्थ भिन्न-भिन्न वस्तुओं का संयोग पाकर पुलाव, खीर, खिचड़ी,......, रूप में बदल जाता है। ठीक इसी तरह मनुष्य भी संगति के साथ विद्वान, साधु, मूर्ख, तस्कर,......, जैसी उपमा को प्राप्त कर लेता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसीलिए उसका परम कर्तव्य है अपने आसपास के समूह को भली प्रकार पहचान कर मेल मिलाप बढ़ाने का प्रयास करें, अन्यथा चाहे अथवा ना चाहे वातावरण की छाप उसके व्यक्तित्व को निश्चित रूप से प्रभावित करेगी। *जय जिनेंद्र*? 2026-06-12 17:49:48
225032 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन ??????? *श्री गिरनार जी सिद्ध क्षेत्र पर भगवान नेमिनाथ निर्वाण लाडू महामहोत्सव 19-20 जुलाई 2026* ?*नि: शुल्क भोजन एवं आवास सुविधा हेतु रजिस्ट्रेशन फॉर्म* 1. रजिस्ट्रेशन करानें के लिए प्रति यात्री ₹500/= जमा करना अनिवार्य है जो आप आने पर वापस ले सकते हैं। 2. सभी सदस्यों का ओरिजिनल आधार कार्ड और आधार कार्ड का फोटो कॉपी लाना अनिवार्य हे ! 3. 12 वर्ष से अधिक उम्र के बालक / बालिकाओं और वयस्क यात्रियों का रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य है ! 4. पूर्ण रजिस्ट्रेशन राशि जमा होने पर ही फॉर्म मान्य होगा! 5. भुगतान के लिए नीचे दिए गए QR कोड या बैंक विवरण का इस्तेमाल करे ! 6. निःशुल्क भोजन एवं आवास व्यवस्था 19 और 20 जुलाई के लिए उपलब्ध है! 7. रजिस्ट्रेशन कराने की अंतिम तिथि 25 जून 2026 हे! नोट:-⚡ *कृपया आपको बेहतर व्यवस्थाएं उपलब्ध कराने के लिए उक्त नियमों का पालन कर र्निवाण लाडू महोत्सव समिति का सहयोग करे!* ⚡*प्रशासन के आदेशानुसार आधार कार्ड और उसकी कॉपी लाना अनिवार्य है!* *UNION BANK OF INDIA* *A/C NAME* - SHRI DIGAMBER JAIN MANDIR NIRMAL GYAN KENDRA *A/C NO.* .313902010014188 *IFSC CODE* UBIN0531391 विशेष जानकारी के लिए नीचे दिए गए नम्बरों पर संपर्क करे श्री जीतू जैन - 9712081284 श्री मुकेश जैन - श्री देवेश जैन - 9825168188 श्री नवनीत जैन - 9033887248 1 से 6 यात्री <a href="https://forms.gle/r4CAPXreSX1dcU6J6" target="_blank">https://forms.gle/r4CAPXreSX1dcU6J6</a> 1 से 15 यात्री <a href="https://forms.gle/HonBoFvhXks77Sgq5" target="_blank">https://forms.gle/HonBoFvhXks77Sgq5</a> 1 से 30 यात्री <a href="https://forms.gle/YadgjrCNfYtaZgAT9" target="_blank">https://forms.gle/YadgjrCNfYtaZgAT9</a> 1 से 50 यात्री <a href="https://forms.gle/2E6vAaxdBDJtE3PE8" target="_blank">https://forms.gle/2E6vAaxdBDJtE3PE8</a> 2026-06-12 17:49:46