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228236 40449659 सकल जैन महिला मंडळ फलटण *सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरि : परंपरा के पुनः साकार होते दिव्य दर्शन* महाराष्ट्र की पुण्यभूमि पर अवस्थित सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरि केवल एक तीर्थ नहीं, अपितु संयम, साधना, तप, त्याग और आत्मकल्याण की जीवंत गाथा है। यह वह पावन भूमि है जहाँ जैन धर्म के महान तपस्वियों ने अपने पुरुषार्थ से आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त किया तथा अपनी साधना से इस क्षेत्र को आध्यात्मिक वैभव से मंडित किया। जैन परंपरा के अनुसार यह सिद्धक्षेत्र कुलभूषण एवं देशभूषण केवली भगवान की सिद्धिभूमि के रूप में प्रसिद्ध है। उनकी तपस्या और मोक्षकल्याणक से पवित्र हुई यह भूमि युगों से साधकों को आत्मकल्याण की प्रेरणा देती रही है। भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी के शासनकाल में भी इस क्षेत्र का विशेष महात्म्य वर्णित मिलता है। तपश्चर्या में लीन कुलभूषण-देशभूषण दो मुनिराजों पर उपसर्ग उपस्थित हुआ था, जिसे श्रीराम एवं लक्ष्मण ने दूर कर उनकी रक्षा की तथा भगवान की भक्तिपूर्वक पूजा-अर्चना कर इस क्षेत्र के गौरव में एक नवीन अध्याय जोड़ा। इस प्रकार कुंथलगिरि केवल सिद्धों की भूमि ही नहीं, बल्कि धर्मरक्षा, भक्ति और साधना के अद्भुत समन्वय की भी साक्षी रही है। चारित्र चक्रवर्ती प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की दिव्य सल्लेखना और समाधि ने कुंथलगिरि को विशेष गौरव प्रदान किया। आज भी उनके जीवन-वृत्तांत पढ़ते समय, उनके दुर्लभ चित्रों को देखते समय और उनकी तपस्या का स्मरण करते समय साधक का मन श्रद्धा से भर उठता है। उनकी सल्लेखना के वे दृश्य इतिहास के अमर अध्याय बन चुके हैं। इसी गुरु-परंपरा में महाकवि आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का नाम भी अत्यंत श्रद्धा से स्मरण किया जाता है। उन्होंने अपने आचार्य पद का त्याग कर संत-शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज को आचार्य पद प्रदान किया और स्वयं आत्मसाधना के मार्ग पर अग्रसर हुए। तत्पश्चात् संत-शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने गुरु की सेवा, वैयावृत्ति, ज्ञानोपासना और सल्लेखना में जो अनुपम आदर्श प्रस्तुत किया, वह गुरु-भक्ति का कालजयी उदाहरण बन गया। आज इतिहास मानो पुनः स्वयं को दोहराता हुआ प्रतीत हो रहा है। वर्तमान में शान्तमूर्ति दक्षिण भारत गौरव आचार्य श्री सन्मतिसागर जी महाराज के परम शिष्य आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महामुनिराज ने भी अपने आचार्य पद का त्याग कर दक्षिण भारत में “छोटे विद्यासागर जी” के नाम से विख्यात, विद्यासागर-सम तेजस्वी व्यक्तित्व, आगम चक्रवर्ती आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज को आचार्य पद प्रदान किया और स्वयं आत्माराधना एवं आत्मोन्नति के पथ पर अग्रसर हुए। यहीं कुंथलगिरि में आज जो दृश्य उपस्थित है, वह गुरु-परंपरा के उसी अमर इतिहास का पुनः साकार रूप प्रतीत होता है। जिस प्रकार संत-शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने गुरु आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज की सेवा, वैयावृत्ति, ज्ञानोपासना और सल्लेखना में स्वयं को समर्पित कर दिया था, उसी प्रकार आज आगम चक्रवर्ती आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज अपने गुरु आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज की सेवा, वैयावृत्ति, ज्ञानोपासना और सल्लेखना में पूर्ण समर्पण के साथ उपस्थित हैं। साथ ही निर्यापक महाश्रमण परम पूज्य श्री सिद्धांतसागर जी महाराज के साथ संपूर्ण संघ बड़े ही वात्सल्य भाव के साथ अपने आचार्य गुरुदेव की सेवा में मग्न है। यह दृश्य गुरु-भक्ति की उसी गौरवशाली परंपरा का पुनः साकार स्वरूप है। इसी प्रकार यदि चारित्र चक्रवर्ती प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की सल्लेखना और साधना के ऐतिहासिक चित्रों का स्मरण करें, तो आज आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज की उत्कृष्ट साधना में उसी तप, उसी वैराग्य, उसी आत्मनिष्ठा और उसी समाधि-भाव के दर्शन होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो इतिहास के पृष्ठों से निकलकर आचार्य शांतिसागर जी महाराज की तपस्या पुनः हमारे समक्ष साकार हो उठी हो। इस प्रकार कुंथलगिरि में आज दो दिव्य और दुर्लभ दर्शन एक साथ सुलभ हैं—एक ओर आचार्य वर्धमानसागर जी महाराज की साधना में चारित्र चक्रवर्ती प्रथमाचार्य आचार्य शांतिसागर जी महाराज की तपश्चर्या के पुनः दर्शन, और दूसरी ओर आगम चक्रवर्ती आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज में संत-शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज की गुरु-भक्ति, सेवा एवं वैयावृत्ति के पुनः दर्शन। यह केवल दर्शन का अवसर नहीं, अपितु आत्मचिंतन का भी अनुपम अवसर है। जब एक ओर उत्कृष्ट साधना अपने चरम वैराग्य का संदेश दे रही हो और दूसरी ओर गुरु-सेवा एवं समर्पण की परंपरा सजीव रूप में हमारे समक्ष उपस्थित हो, तब प्रत्येक श्रद्धालु के लिए यह अवसर आत्मकल्याण की प्रेरणा ग्रहण करने का माध्यम बन जाता है। कुंथलगिरि की यह पुण्यभूमि आज भी उसी प्रकार तप, त्याग और साधना की सुगंध से सुवासित है, जैसी वह अपने गौरवशाली इतिहास के स्वर्णिम काल में रही होगी। हममें से अधिकांश लोगों को चारित्र चक्रवर्ती प्रथमाचार्य आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की सल्लेखना एवं साधना के वे दिव्य दृश्य प्रत्यक्ष देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ। इसी प्रकार संत-शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज द्वारा अपने परम पूज्य गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज की सेवा, वैयावृत्ति एवं सल्लेखना के वे ऐतिहासिक क्षण भी हम केवल पढ़ और सुन ही सके हैं। किन्तु प्रकृति और पुण्य का यह कितना अद्भुत संयोग है कि आज वही दोनों दिव्य दृश्य मानो पुनः हमारे समक्ष साकार हो रहे हैं। आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज की उत्कृष्ट साधना में आचार्य शांतिसागर जी महाराज के तप एवं समाधि के दर्शन हो रहे हैं तथा आगम चक्रवर्ती आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज की गुरु-सेवा, वैयावृत्ति और समर्पण में संत-शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की गौरवशाली परंपरा पुनः जीवंत दिखाई दे रही है। ऐसे दुर्लभ और अलौकिक क्षण युगों में कभी-कभी ही सुलभ होते हैं। अतः हमें इस अवसर को खोना नहीं चाहिए। सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरि पधारकर इन दिव्य दृश्यों के दर्शन कर अपने जीवन को धन्य, अपनी श्रद्धा को दृढ़ और अपनी आँखों को पवित्र एवं सौभाग्यशाली बनाने का यह अनुपम अवसर अवश्य ग्रहण करना चाहिए। संभव है कि इतिहास को पुनः साकार रूप में देखने का ऐसा अवसर पुनः सहज उपलब्ध न हो। जो श्रद्धालु इन दिव्य क्षणों के साक्षी बनेंगे, वे केवल एक दृश्य नहीं देखेंगे, बल्कि जैन गुरु-परंपरा के अमर इतिहास को अपनी आँखों के समक्ष पुनः सजीव होते हुए अनुभव करेंगे। यह भी एक विचारणीय तथ्य है कि आचार्य कुंदकुंद से चली आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज से लेकर वर्तमान गुरु-परंपरा तक दक्षिण भारत की यह पुण्यभूमि निरंतर जैन साधना, तप और त्याग का केंद्र बनी हुई है। अनेक विद्वानों का मत है कि भविष्य में जैन धर्म का प्रमुख आधार दक्षिण भारत ही रहेगा। ऐसे में दक्षिण भारत में स्थित सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरि का वर्तमान आध्यात्मिक वैभव और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है, जहाँ आज भी तप, साधना, गुरु-भक्ति और आत्माराधना की गौरवशाली परंपरा सजीव रूप में दृष्टिगोचर हो रही है। - विद्वतश्री वैभव प्रकाशचंद मेहेत्रे जालना, महाराष्ट्र स्नातक, श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर, जयपुर (राजस्थान 2026-06-13 22:12:31
228233 50892187 श्री जिनेन्द्र भक्तमण्डल ग्वालियर 2026-06-13 22:08:47
228234 50892187 श्री जिनेन्द्र भक्तमण्डल ग्वालियर 2026-06-13 22:08:47
228231 50892187 श्री जिनेन्द्र भक्तमण्डल ग्वालियर मुनि श्री मेघदत्त सागर ससंघ का विहार चौरासी से ग्वालियर की ओर 2026-06-13 22:08:45
228232 50892187 श्री जिनेन्द्र भक्तमण्डल ग्वालियर मुनि श्री मेघदत्त सागर ससंघ का विहार चौरासी से ग्वालियर की ओर 2026-06-13 22:08:45
228230 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-13 22:04:18
228229 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-13 22:04:17
228227 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-13 22:04:15
228228 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-13 22:04:15
228224 40449690 गुरु आर्जव वाणी New 1️⃣ 2026-06-13 22:00:04