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70611 40449675 ?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? *मुनिश्री विनियोगसागर जी* *09.04.2026* *DAILY MOTIVATION* *Instagram link* :- <a href="https://www.instagram.com/viniyogworld?igsh=cmhkcHJzaTMwa29h" target="_blank">https://www.instagram.com/viniyogworld?igsh=cmhkcHJzaTMwa29h</a> *WhatsApp group link* :- <a href="https://chat.whatsapp.com/D6Eh34SN4kiHf9DNq2niWw?mode=hq1tcla" target="_blank">https://chat.whatsapp.com/D6Eh34SN4kiHf9DNq2niWw?mode=hq1tcla</a> ? *नियम निभाए पुण्य बढ़ाएं*~ ?*णमोकार चालीसा* 2026-04-09 06:07:55
70612 40449675 ?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? *मुनिश्री विनियोगसागर जी* *09.04.2026* *DAILY MOTIVATION* *Instagram link* :- <a href="https://www.instagram.com/viniyogworld?igsh=cmhkcHJzaTMwa29h" target="_blank">https://www.instagram.com/viniyogworld?igsh=cmhkcHJzaTMwa29h</a> *WhatsApp group link* :- <a href="https://chat.whatsapp.com/D6Eh34SN4kiHf9DNq2niWw?mode=hq1tcla" target="_blank">https://chat.whatsapp.com/D6Eh34SN4kiHf9DNq2niWw?mode=hq1tcla</a> ? *नियम निभाए पुण्य बढ़ाएं*~ ?*णमोकार चालीसा* 2026-04-09 06:07:55
70610 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ ?? 2026-04-09 06:06:03
70609 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ ?? 2026-04-09 06:06:02
70606 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ 2026-04-09 06:04:51
70607 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *कहानी बड़ी सुहानी* (1) *कहानी* *विश्वास* *एक व्यक्ति की नई नई शादी हुई और वो अपनी पत्नी के साथ वापिस आ रहे थे* ! *रास्ते में वो दोनों एक बडी झील को नाव के द्वारा पार कर रहे थे, तभी अचानक एक भयंकर तूफ़ान आ गया* !' *वो आदमी वीर था लेकिन औरत बहुत डरी हुई थी क्योंकि हालात बिल्कुल खराब थे*!* *नाव बहुत छोटी थी और तूफ़ान वास्तव में भयंकर था और दोनों किसी भी समय डूब सकते थे*! *लेकिन वो आदमी चुपचाप,निश्चल और शान्त बैठा था जैसे कि कुछ नहीं होने वाला* ! *औरत डर के मारे कांप रही थी और वो बोली "क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा" ये हमारे जीवन का आखिरी क्षण हो सकता है* ! *ऐसा नहीं लगता कि हम दूसरे किनारे पर कभी पहुंच भी पायेंगे ! अब तो कोई चमत्कार ही हमें बचा सकता है वर्ना हमारी मौत निश्चित है* ! *क्या तुम्हें बिल्कुल डर नहीं लग रहा ? कहीं तुम पागल या पत्थर तो नहीं हो* ? *वो आदमी खूब हँसा और एकाएक उसने म्यान से तलवार निकाल ली* ? *औरत अब और परेशान हो गई कि वो क्या कर रहा था* ? . *तब वो उस नंगी तलवार को उस औरत की गर्दन के पास ले आया, इतना पास कि उसकी गर्दन और तलवार के बीच बिल्कुल कम फर्क बचा था क्योंकि तलवार लगभग उसकी गर्दन को छू रही थी* ! *वो अपनी पत्नी से बोला "क्या तुम्हें डर लग रहा है"* *पत्नी खूब हँसी और बोली "जब तलवार तुम्हारे हाथ में है तो मुझे क्या डर"*? *मैं जानती हूं कि तुम मुझे बहुत प्यार करते हो !* *उसने तलवार वापिस म्यान में डाल दी और बोला कि "यही मेरा जवाब है"*. *मैं जानता हूं कि भगवान मुझे बहुत प्यार करते हैं और ये तूफ़ान उनके हाथ में है ! इसलिए जो भी होगा अच्छा ही होगा!* *अगर हम बच गये तो भी अच्छा और अगर नहीं बचे तो भी अच्छा, क्योंकि सब कुछ उस परमात्मा के हाथ में है और वो कभी कुछ भी गलत नहीं कर सकते !* *वो जो भी करेंगे हमारे भले के लिए करेंगे।* *हमेशा विश्वास बनाये रक्खो ! "व्यक्ति को हमेशा उस परमपिता परमात्मा पर विश्वास रखना चाहिये जो हमारे पूरे जीवन को बदल सकता है। **************************************** (2) *आज का सकारात्मक चिंतन* ?️अगर आप दुख पर ध्यान देंगे तो हमेशा दुखी रहेंगे और सुख पर ध्यान देंगे तो हमेशा सुखी रहेंगे क्योंकि यह जीवन का शाश्वत नियम है कि आप जिस पर ध्यान देंगे वही चीज सक्रिय हो जाती है। ?️यदि दो पेड़ों को एक साथ लगाया जाए मगर देख रेख एक ही पेड़ की की जाए, एक ही पेड़ का ध्यान रखा जाए और समय - समय पर खाद पानी भी उसी एक पेड़ को दिया जाए तो सीधी सी बात है कि जिस पेड़ पर ध्यान दिया जाएगा वही अच्छे से पुष्पित और फलित हो पायेगा। ठीक ऐसे ही सुख पर ध्यान केंद्रित करोगे तो जीवन में सुख की ही वृद्धि पाओगे और दुख पर ध्यान केंद्रित करोगे तो जीवन में दुख ही दुख प्राप्त होंगे। ?️विज्ञान ने भी इस बात को सिद्ध किया है कि जीवन में जिस वस्तु की हम उपेक्षा करने लगते हैं वो वस्तु धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को खोना शुरू कर देती हैं। भले ही वो प्रेम हो, करुणा हो,जीवन का उल्लास हो अथवा सुख ही क्यों न हो। ?️जहाँ सकारात्मक दृष्टि जीवन में सुख की जननी होती है वहीं नकारात्मक दृष्टि जीवन को दुख और विषाद से भी भर देती है। इसलिए जीवन में सदा सकारात्मक दृष्टि ही रखी जानी चाहिए ताकि व्यक्ति के दुख और विषाद जैसे काल्पनिक शत्रुओं का समूल नाश हो सके। नाव डूबने के बाद नाविक और पांच-सात कुशल तैराक नदी में तैरकर अपनी-अपनी जान बचाये. उधर नाव, सबको नदी में छोड़.. खुद आगे निकल गई. बचे हुए लोग राजा के दरबार में पेश किये गये - राजा ने नाविक से पूछा- नाव कैसे डूबी! नाव में छेद था क्या? नाविक- नहीं महाराज! नाव बिल्कुल दुरुस्त थी. महाराज- इसका मतलब, तुमने सवारी अधिक बिठाई! नाविक- नहीं महाराज! सवारी नाव की क्षमतानुसार ही थे और न जाने कितनी बार मैंने उससे अधिक सवारी बिठाकर नाव पार लगाई है. राजा- आंधी, तूफान जैसी कोई प्राकृतिक आपदा भी तो नहीं थी! नाविक- मौसम सुहाना तथा नदी भी बिल्कुल शान्त थी महाराज. राजा- मदिरा पान तो नहीं न किया था तुमने. नाविक- नहीं महाराज! आप चाहें तो इन लोगों से पूछ कर संतुष्ट हो सकते हैं यह लोग भी मेरे साथ तैरकर जीवित लौटे हैं. महाराज- फिर, क्या चूक हुई? कैसे हुई इतनी बड़ी दुर्घटना? नाविक- महाराज! नाव हौले-हौले, बिना हिलकोरे लिये नदी में चल रही थी. तभी नाव में बैठे एक आदमी ने नाव के भीतर ही थूक दिया. मैंने पतवार रोक के उसका विरोध किया और पूछा कि "तुमने नाव के भीतर क्यों थूका?" उसने उपहास में कहा कि "क्या मेरे नाव थूकने से नाव डूब जायेगी." राजा- फिर? नाविक- महाराज मेरी इतनी बात पर वो तुनक गया बोला पैसा देते हैं नदी पार करने के. कोई एहसान नहीं कर रहे तुम और तुम्हारी नाव. राजा (विस्मय के साथ)- पैसा देने का क्या मतलब! नाव में थूकेगा? अच्छा! फिर क्या हुआ? नाविक- महाराज वो मुझसे बहस करने लगा. राजा-नाव में बैठे और लोग क्या कर रहे थे? क्या उन लोगों ने उसका विरोध नहीं किया? नाविक- महाराज ऐसा नहीं था.. नाव के बहुत से लोग मेरे साथ उसका विरोध करने लगे. राजा- तब तो उसका मनोबल टूटा होगा. उसको अपनी गलती का एहसास हुआ होगा. नाविक- ऐसा नहीं था महाराज! नाव में कुछ लोग ऐसे भी थे जो उसके साथ खड़े हो गये तथा नाव के भीतर ही दो खेमे बंट गये. बीच मझधार में ही यात्री आपस में उलझ पड़े. राजा- चलती नाव में ही मारपीट! तुमने उन्हें समझाया तथा रोका नहीं.. नाविक- रोका महाराज, हाथ जोड़कर विनती भी की. मैने कहा " नाव इस वक्त अपने नाजुक दौर में है. इस वक्त नाव में तनिक भी हलचल हम-सबकी जान का खतरा बन जायेगी" लेकिन कौन मेरी सुने! सब एक दूसरे पर टूट पड़े. तथा नाव ने बीच धारा में ही संतुलन खो दिया महाराज. *कहानी का सार*:- इस नाजुक दौर में संतुलन बनाये रखे ताकि नाव के संतुलन खोने से बाकी साथियों को नुकसान न हो। मैंने कहा- "नाव तो नहीं डूबेगी लेकिन तुम्हारे इस निकृष्ट कार्य से हम शर्म से डूब रहें हैं.. बताओ!जो नाव तुमको अपने सीने पर बिठाकर इस पार से उस पार ले जा रही है तुम उसी में थूक रहे हो. **************************************** (3) *कहानी* *।। माँ और बेटी ।।* *एक सौदागर राजा के महल में दो गायों को लेकर आया - दोनों ही स्वस्थ, सुंदर व दिखने में लगभग एक जैसी थीं।* *सौदागर ने राजा से कहा "महाराज - ये गायें माँ-बेटी हैं परन्तु मुझे यह नहीं पता कि माँ कौन है व बेटी कौन - क्योंकि दोनों में खास अंतर नहीं है।* मैंने अनेक जगह पर लोगों से यह पूछा किंतु कोई भी इन दोनों में माँ - बेटी की पहचान नहीं कर पाया बाद में मुझे किसी ने यह कहा कि आपका बुजुर्ग मंत्री बेहद कुशाग्र बुद्धि का है और यहाँ पर मुझे अवश्य मेरे प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा... इसलिए मैं यहाँ पर चला आया - कृपया मेरी समस्या का समाधान किया जाए।" यह सुनकर सभी दरबारी मंत्री की ओर देखने लगे मंत्री अपने स्थान से उठकर गायों की तरफ गया। उसने दोनों का बारीकी से निरीक्षण किया किंतु वह भी नहीं पहचान पाया कि वास्तव में कौन मां है और कौन बेटी ? अब मंत्री बड़ी दुविधा में फंस गया, उसने सौदागर से एक दिन की मोहलत मांगी। घर आने पर वह बेहद परेशान रहा - उसकी पत्नी इस बात को समझ गई। उसने जब मंत्री से परेशानी का कारण पूछा तो उसने सौदागर की बात बता दी। यह सुनकर पत्नी बोली 'अरे ! बस इतनी सी बात है - यह तो मैं भी बता सकती हूँ ।' अगले दिन मंत्री अपनी पत्नी को वहाँ ले गया जहाँ गायें बंधी थीं। मंत्री की पत्नी ने दोनों गायों के आगे अच्छा भोजन रखा - कुछ ही देर बाद उसने माँ व बेटी में अंतर बता दिया - लोग चकित रह गए। मंत्री की पत्नी बोली "पहली गाय जल्दी - जल्दी खाने के बाद दूसरी गाय के भोजन में मुंह मारने लगी और दूसरी वाली ने पहली वाली के लिए अपना भोजन छोड़ दिया, ऐसा केवल एक मां ही कर सकती है - यानि दूसरी वाली माँ है। माँ ही बच्चे के लिए भूखी रह सकती है - माँ में ही त्याग, करुणा, वात्सल्य, ममत्व के गुण विद्यमान होते है.... दोस्तों इस दुनियाँ मे माँ से महान कोई नही है माँ के चरणों मे भगवान कॊ भी झुकना पड़ता है.. *माँ ममता का सागर नहीं..पर महासागर है...* *सदैव प्रसन्न रहें...* *कभी अपने लिए तो कभी अपनों के लिए...* **************************************** (4) *कहानी* *दूसरों को सही-गलत साबित करने में जल्दबाजी न करें* *पहली कहानी :* ट्रेन में एक पिता-पुत्र सफर कर रहे थे. 24 वर्षीय पुत्र खिड़की से बाहर देख रहा था, अचानक वो चिल्लाया – पापा देखो पेड़ पीछे की ओर भाग रहे हैं ! पिता कुछ बोला नहीं, बस सुनकर मुस्कुरा दिया. ये देखकर बगल में बैठे एक युवा दम्पति को अजीब लगा और उस लड़के के बचकाने व्यवहार पर दया भी आई. तब तक वो लड़का फिर से बोला – पापा देखो बादल हमारे साथ दौड़ रहे हैं ! युवा दम्पति से रहा नहीं गया और वो उसके पिता से बोल पड़े – आप अपने लड़के को किसी अच्छे डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाते ? लड़के का पिता मुस्कुराया और बोला – हमने दिखाया था और हम अभी सीधे हॉस्पिटल से ही आ रहे हैं. मेरा लड़का जन्म से अंधा था और आज वो यह दुनिया पहली बार देख रहा है. ———- *दूसरी कहानी :* एक प्रोफेसर अपनी क्लास में कहानी सुना रहे थे, जोकि इस प्रकार है – एक बार समुद्र के बीच में एक बड़े जहाज पर बड़ी दुर्घटना हो गयी. कप्तान ने शिप खाली करने का आदेश दिया. जहाज पर एक युवा दम्पति थे. जब लाइफबोट पर चढ़ने का उनका नम्बर आया तो देखा गया नाव पर केवल एक व्यक्ति के लिए ही जगह है. इस मौके पर आदमी ने पत्नी को छोड़ दिया और खुद नाव पर कूद गया. डूबते हुए जहाज पर खड़ी औरत ने जाते हुए अपने पति से चिल्लाकर एक वाक्य कहा. अब प्रोफेसर ने रुककर स्टूडेंट्स से पूछा – तुम लोगों को क्या लगता है, उस स्त्री ने अपने पति से क्या कहा होगा ? ज्यादातर विद्यार्थी फ़ौरन चिल्लाये – स्त्री ने कहा – मैं तुमसे नफरत करती हूँ ! I hate you ! प्रोफेसर ने देखा एक स्टूडेंट एकदम शांत बैठा हुआ था, प्रोफेसर ने उससे पूछा कि तुम बताओ तुम्हे क्या लगता है ? वो लड़का बोला – मुझे लगता है, औरत ने कहा होगा – हमारे बच्चे का ख्याल रखना ! प्रोफेसर को आश्चर्य हुआ, उन्होंने लडके से पूछा – क्या तुमने यह कहानी पहले सुन रखी थी ? लड़का बोला- जी नहीं, लेकिन यही बात बीमारी से मरती हुई मेरी माँ ने मेरे पिता से कही थी. प्रोफेसर ने दुखपूर्वक कहा – तुम्हारा उत्तर सही है ! प्रोफेसर ने कहानी आगे बढ़ाई – जहाज डूब गया, स्त्री मर गयी, पति किनारे पहुंचा और उसने अपना बाकि जीवन अपनी एकमात्र पुत्री के समुचित लालन-पालन में लगा दिया. कई सालों बाद जब वो व्यक्ति मर गया तो एक दिन सफाई करते हुए उसकी लड़की को अपने पिता की एक डायरी मिली. डायरी से उसे पता चला कि जिस समय उसके माता-पिता उस जहाज पर सफर कर रहे थे तो उसकी माँ एक जानलेवा बीमारी से ग्रस्त थी और उनके जीवन के कुछ दिन ही शेष थे. ऐसे कठिन मौके पर उसके पिता ने एक कड़ा निर्णय लिया और लाइफबोट पर कूद गया. उसके पिता ने डायरी में लिखा था – तुम्हारे बिना मेरे जीवन को कोई मतलब नहीं, मैं तो तुम्हारे साथ ही समंदर में समा जाना चाहता था. लेकिन अपनी संतान का ख्याल आने पर मुझे तुमको अकेले छोड़कर जाना पड़ा. जब प्रोफेसर ने कहानी समाप्त की तो, पूरी क्लास में शांति थी. ————— *?इस संसार में कईयों सही गलत बातें हैं लेकिन उसके अतिरिक्त भी कई जटिलतायें हैं, जिन्हें समझना आसान नहीं. इसीलिए ऊपरी सतह से देखकर बिना गहराई को जाने-समझे हर परिस्थिति का एकदम सही आकलन नहीं किया जा सकता.* ?*कलह होने पर जो पहले माफ़ी मांगे, जरुरी नहीं उसी की गलती हो. हो सकता है वो रिश्ते को बनाये रखना ज्यादा महत्वपूर्ण समझता हो.* ?*दोस्तों के साथ खाते-पीते, पार्टी करते समय जो दोस्त बिल पे करता है, जरुरी नहीं उसकी जेब नोटों से ठसाठस भरी हो. हो सकता है उसके लिए दोस्ती के सामने पैसों की अहमियत कम हो.* ?*जो लोग आपकी मदद करते हैं, जरुरी नहीं वो आपके एहसानों के बोझ तले दबे हों. वो आपकी मदद करते हैं क्योंकि उनके दिलों में दयालुता और करुणा का निवास है.* ?*आजकल जीवन कठिन इसीलिए हो गया है क्योंकि हमने लोगो को समझना कम कर दिया और फौरी तौर पर judge करना शुरू कर दिया है. थोड़ी सी समझ और थोड़ी सी मानवता ही आपको सही रास्ता दिखा सकती है. जीवन में निर्णय लेने के कई ऐसे पल आयेंगे, सो अगली बार किसी पर भी अपने पूर्वाग्रह का ठप्पा लगाने से पहले विचार अवश्य करें.* ********************************** 2026-04-09 06:04:51
70608 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ 2026-04-09 06:04:51
70605 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *कहानी बड़ी सुहानी* (1) *कहानी* *विश्वास* *एक व्यक्ति की नई नई शादी हुई और वो अपनी पत्नी के साथ वापिस आ रहे थे* ! *रास्ते में वो दोनों एक बडी झील को नाव के द्वारा पार कर रहे थे, तभी अचानक एक भयंकर तूफ़ान आ गया* !' *वो आदमी वीर था लेकिन औरत बहुत डरी हुई थी क्योंकि हालात बिल्कुल खराब थे*!* *नाव बहुत छोटी थी और तूफ़ान वास्तव में भयंकर था और दोनों किसी भी समय डूब सकते थे*! *लेकिन वो आदमी चुपचाप,निश्चल और शान्त बैठा था जैसे कि कुछ नहीं होने वाला* ! *औरत डर के मारे कांप रही थी और वो बोली "क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा" ये हमारे जीवन का आखिरी क्षण हो सकता है* ! *ऐसा नहीं लगता कि हम दूसरे किनारे पर कभी पहुंच भी पायेंगे ! अब तो कोई चमत्कार ही हमें बचा सकता है वर्ना हमारी मौत निश्चित है* ! *क्या तुम्हें बिल्कुल डर नहीं लग रहा ? कहीं तुम पागल या पत्थर तो नहीं हो* ? *वो आदमी खूब हँसा और एकाएक उसने म्यान से तलवार निकाल ली* ? *औरत अब और परेशान हो गई कि वो क्या कर रहा था* ? . *तब वो उस नंगी तलवार को उस औरत की गर्दन के पास ले आया, इतना पास कि उसकी गर्दन और तलवार के बीच बिल्कुल कम फर्क बचा था क्योंकि तलवार लगभग उसकी गर्दन को छू रही थी* ! *वो अपनी पत्नी से बोला "क्या तुम्हें डर लग रहा है"* *पत्नी खूब हँसी और बोली "जब तलवार तुम्हारे हाथ में है तो मुझे क्या डर"*? *मैं जानती हूं कि तुम मुझे बहुत प्यार करते हो !* *उसने तलवार वापिस म्यान में डाल दी और बोला कि "यही मेरा जवाब है"*. *मैं जानता हूं कि भगवान मुझे बहुत प्यार करते हैं और ये तूफ़ान उनके हाथ में है ! इसलिए जो भी होगा अच्छा ही होगा!* *अगर हम बच गये तो भी अच्छा और अगर नहीं बचे तो भी अच्छा, क्योंकि सब कुछ उस परमात्मा के हाथ में है और वो कभी कुछ भी गलत नहीं कर सकते !* *वो जो भी करेंगे हमारे भले के लिए करेंगे।* *हमेशा विश्वास बनाये रक्खो ! "व्यक्ति को हमेशा उस परमपिता परमात्मा पर विश्वास रखना चाहिये जो हमारे पूरे जीवन को बदल सकता है। **************************************** (2) *आज का सकारात्मक चिंतन* ?️अगर आप दुख पर ध्यान देंगे तो हमेशा दुखी रहेंगे और सुख पर ध्यान देंगे तो हमेशा सुखी रहेंगे क्योंकि यह जीवन का शाश्वत नियम है कि आप जिस पर ध्यान देंगे वही चीज सक्रिय हो जाती है। ?️यदि दो पेड़ों को एक साथ लगाया जाए मगर देख रेख एक ही पेड़ की की जाए, एक ही पेड़ का ध्यान रखा जाए और समय - समय पर खाद पानी भी उसी एक पेड़ को दिया जाए तो सीधी सी बात है कि जिस पेड़ पर ध्यान दिया जाएगा वही अच्छे से पुष्पित और फलित हो पायेगा। ठीक ऐसे ही सुख पर ध्यान केंद्रित करोगे तो जीवन में सुख की ही वृद्धि पाओगे और दुख पर ध्यान केंद्रित करोगे तो जीवन में दुख ही दुख प्राप्त होंगे। ?️विज्ञान ने भी इस बात को सिद्ध किया है कि जीवन में जिस वस्तु की हम उपेक्षा करने लगते हैं वो वस्तु धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को खोना शुरू कर देती हैं। भले ही वो प्रेम हो, करुणा हो,जीवन का उल्लास हो अथवा सुख ही क्यों न हो। ?️जहाँ सकारात्मक दृष्टि जीवन में सुख की जननी होती है वहीं नकारात्मक दृष्टि जीवन को दुख और विषाद से भी भर देती है। इसलिए जीवन में सदा सकारात्मक दृष्टि ही रखी जानी चाहिए ताकि व्यक्ति के दुख और विषाद जैसे काल्पनिक शत्रुओं का समूल नाश हो सके। नाव डूबने के बाद नाविक और पांच-सात कुशल तैराक नदी में तैरकर अपनी-अपनी जान बचाये. उधर नाव, सबको नदी में छोड़.. खुद आगे निकल गई. बचे हुए लोग राजा के दरबार में पेश किये गये - राजा ने नाविक से पूछा- नाव कैसे डूबी! नाव में छेद था क्या? नाविक- नहीं महाराज! नाव बिल्कुल दुरुस्त थी. महाराज- इसका मतलब, तुमने सवारी अधिक बिठाई! नाविक- नहीं महाराज! सवारी नाव की क्षमतानुसार ही थे और न जाने कितनी बार मैंने उससे अधिक सवारी बिठाकर नाव पार लगाई है. राजा- आंधी, तूफान जैसी कोई प्राकृतिक आपदा भी तो नहीं थी! नाविक- मौसम सुहाना तथा नदी भी बिल्कुल शान्त थी महाराज. राजा- मदिरा पान तो नहीं न किया था तुमने. नाविक- नहीं महाराज! आप चाहें तो इन लोगों से पूछ कर संतुष्ट हो सकते हैं यह लोग भी मेरे साथ तैरकर जीवित लौटे हैं. महाराज- फिर, क्या चूक हुई? कैसे हुई इतनी बड़ी दुर्घटना? नाविक- महाराज! नाव हौले-हौले, बिना हिलकोरे लिये नदी में चल रही थी. तभी नाव में बैठे एक आदमी ने नाव के भीतर ही थूक दिया. मैंने पतवार रोक के उसका विरोध किया और पूछा कि "तुमने नाव के भीतर क्यों थूका?" उसने उपहास में कहा कि "क्या मेरे नाव थूकने से नाव डूब जायेगी." राजा- फिर? नाविक- महाराज मेरी इतनी बात पर वो तुनक गया बोला पैसा देते हैं नदी पार करने के. कोई एहसान नहीं कर रहे तुम और तुम्हारी नाव. राजा (विस्मय के साथ)- पैसा देने का क्या मतलब! नाव में थूकेगा? अच्छा! फिर क्या हुआ? नाविक- महाराज वो मुझसे बहस करने लगा. राजा-नाव में बैठे और लोग क्या कर रहे थे? क्या उन लोगों ने उसका विरोध नहीं किया? नाविक- महाराज ऐसा नहीं था.. नाव के बहुत से लोग मेरे साथ उसका विरोध करने लगे. राजा- तब तो उसका मनोबल टूटा होगा. उसको अपनी गलती का एहसास हुआ होगा. नाविक- ऐसा नहीं था महाराज! नाव में कुछ लोग ऐसे भी थे जो उसके साथ खड़े हो गये तथा नाव के भीतर ही दो खेमे बंट गये. बीच मझधार में ही यात्री आपस में उलझ पड़े. राजा- चलती नाव में ही मारपीट! तुमने उन्हें समझाया तथा रोका नहीं.. नाविक- रोका महाराज, हाथ जोड़कर विनती भी की. मैने कहा " नाव इस वक्त अपने नाजुक दौर में है. इस वक्त नाव में तनिक भी हलचल हम-सबकी जान का खतरा बन जायेगी" लेकिन कौन मेरी सुने! सब एक दूसरे पर टूट पड़े. तथा नाव ने बीच धारा में ही संतुलन खो दिया महाराज. *कहानी का सार*:- इस नाजुक दौर में संतुलन बनाये रखे ताकि नाव के संतुलन खोने से बाकी साथियों को नुकसान न हो। मैंने कहा- "नाव तो नहीं डूबेगी लेकिन तुम्हारे इस निकृष्ट कार्य से हम शर्म से डूब रहें हैं.. बताओ!जो नाव तुमको अपने सीने पर बिठाकर इस पार से उस पार ले जा रही है तुम उसी में थूक रहे हो. **************************************** (3) *कहानी* *।। माँ और बेटी ।।* *एक सौदागर राजा के महल में दो गायों को लेकर आया - दोनों ही स्वस्थ, सुंदर व दिखने में लगभग एक जैसी थीं।* *सौदागर ने राजा से कहा "महाराज - ये गायें माँ-बेटी हैं परन्तु मुझे यह नहीं पता कि माँ कौन है व बेटी कौन - क्योंकि दोनों में खास अंतर नहीं है।* मैंने अनेक जगह पर लोगों से यह पूछा किंतु कोई भी इन दोनों में माँ - बेटी की पहचान नहीं कर पाया बाद में मुझे किसी ने यह कहा कि आपका बुजुर्ग मंत्री बेहद कुशाग्र बुद्धि का है और यहाँ पर मुझे अवश्य मेरे प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा... इसलिए मैं यहाँ पर चला आया - कृपया मेरी समस्या का समाधान किया जाए।" यह सुनकर सभी दरबारी मंत्री की ओर देखने लगे मंत्री अपने स्थान से उठकर गायों की तरफ गया। उसने दोनों का बारीकी से निरीक्षण किया किंतु वह भी नहीं पहचान पाया कि वास्तव में कौन मां है और कौन बेटी ? अब मंत्री बड़ी दुविधा में फंस गया, उसने सौदागर से एक दिन की मोहलत मांगी। घर आने पर वह बेहद परेशान रहा - उसकी पत्नी इस बात को समझ गई। उसने जब मंत्री से परेशानी का कारण पूछा तो उसने सौदागर की बात बता दी। यह सुनकर पत्नी बोली 'अरे ! बस इतनी सी बात है - यह तो मैं भी बता सकती हूँ ।' अगले दिन मंत्री अपनी पत्नी को वहाँ ले गया जहाँ गायें बंधी थीं। मंत्री की पत्नी ने दोनों गायों के आगे अच्छा भोजन रखा - कुछ ही देर बाद उसने माँ व बेटी में अंतर बता दिया - लोग चकित रह गए। मंत्री की पत्नी बोली "पहली गाय जल्दी - जल्दी खाने के बाद दूसरी गाय के भोजन में मुंह मारने लगी और दूसरी वाली ने पहली वाली के लिए अपना भोजन छोड़ दिया, ऐसा केवल एक मां ही कर सकती है - यानि दूसरी वाली माँ है। माँ ही बच्चे के लिए भूखी रह सकती है - माँ में ही त्याग, करुणा, वात्सल्य, ममत्व के गुण विद्यमान होते है.... दोस्तों इस दुनियाँ मे माँ से महान कोई नही है माँ के चरणों मे भगवान कॊ भी झुकना पड़ता है.. *माँ ममता का सागर नहीं..पर महासागर है...* *सदैव प्रसन्न रहें...* *कभी अपने लिए तो कभी अपनों के लिए...* **************************************** (4) *कहानी* *दूसरों को सही-गलत साबित करने में जल्दबाजी न करें* *पहली कहानी :* ट्रेन में एक पिता-पुत्र सफर कर रहे थे. 24 वर्षीय पुत्र खिड़की से बाहर देख रहा था, अचानक वो चिल्लाया – पापा देखो पेड़ पीछे की ओर भाग रहे हैं ! पिता कुछ बोला नहीं, बस सुनकर मुस्कुरा दिया. ये देखकर बगल में बैठे एक युवा दम्पति को अजीब लगा और उस लड़के के बचकाने व्यवहार पर दया भी आई. तब तक वो लड़का फिर से बोला – पापा देखो बादल हमारे साथ दौड़ रहे हैं ! युवा दम्पति से रहा नहीं गया और वो उसके पिता से बोल पड़े – आप अपने लड़के को किसी अच्छे डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाते ? लड़के का पिता मुस्कुराया और बोला – हमने दिखाया था और हम अभी सीधे हॉस्पिटल से ही आ रहे हैं. मेरा लड़का जन्म से अंधा था और आज वो यह दुनिया पहली बार देख रहा है. ———- *दूसरी कहानी :* एक प्रोफेसर अपनी क्लास में कहानी सुना रहे थे, जोकि इस प्रकार है – एक बार समुद्र के बीच में एक बड़े जहाज पर बड़ी दुर्घटना हो गयी. कप्तान ने शिप खाली करने का आदेश दिया. जहाज पर एक युवा दम्पति थे. जब लाइफबोट पर चढ़ने का उनका नम्बर आया तो देखा गया नाव पर केवल एक व्यक्ति के लिए ही जगह है. इस मौके पर आदमी ने पत्नी को छोड़ दिया और खुद नाव पर कूद गया. डूबते हुए जहाज पर खड़ी औरत ने जाते हुए अपने पति से चिल्लाकर एक वाक्य कहा. अब प्रोफेसर ने रुककर स्टूडेंट्स से पूछा – तुम लोगों को क्या लगता है, उस स्त्री ने अपने पति से क्या कहा होगा ? ज्यादातर विद्यार्थी फ़ौरन चिल्लाये – स्त्री ने कहा – मैं तुमसे नफरत करती हूँ ! I hate you ! प्रोफेसर ने देखा एक स्टूडेंट एकदम शांत बैठा हुआ था, प्रोफेसर ने उससे पूछा कि तुम बताओ तुम्हे क्या लगता है ? वो लड़का बोला – मुझे लगता है, औरत ने कहा होगा – हमारे बच्चे का ख्याल रखना ! प्रोफेसर को आश्चर्य हुआ, उन्होंने लडके से पूछा – क्या तुमने यह कहानी पहले सुन रखी थी ? लड़का बोला- जी नहीं, लेकिन यही बात बीमारी से मरती हुई मेरी माँ ने मेरे पिता से कही थी. प्रोफेसर ने दुखपूर्वक कहा – तुम्हारा उत्तर सही है ! प्रोफेसर ने कहानी आगे बढ़ाई – जहाज डूब गया, स्त्री मर गयी, पति किनारे पहुंचा और उसने अपना बाकि जीवन अपनी एकमात्र पुत्री के समुचित लालन-पालन में लगा दिया. कई सालों बाद जब वो व्यक्ति मर गया तो एक दिन सफाई करते हुए उसकी लड़की को अपने पिता की एक डायरी मिली. डायरी से उसे पता चला कि जिस समय उसके माता-पिता उस जहाज पर सफर कर रहे थे तो उसकी माँ एक जानलेवा बीमारी से ग्रस्त थी और उनके जीवन के कुछ दिन ही शेष थे. ऐसे कठिन मौके पर उसके पिता ने एक कड़ा निर्णय लिया और लाइफबोट पर कूद गया. उसके पिता ने डायरी में लिखा था – तुम्हारे बिना मेरे जीवन को कोई मतलब नहीं, मैं तो तुम्हारे साथ ही समंदर में समा जाना चाहता था. लेकिन अपनी संतान का ख्याल आने पर मुझे तुमको अकेले छोड़कर जाना पड़ा. जब प्रोफेसर ने कहानी समाप्त की तो, पूरी क्लास में शांति थी. ————— *?इस संसार में कईयों सही गलत बातें हैं लेकिन उसके अतिरिक्त भी कई जटिलतायें हैं, जिन्हें समझना आसान नहीं. इसीलिए ऊपरी सतह से देखकर बिना गहराई को जाने-समझे हर परिस्थिति का एकदम सही आकलन नहीं किया जा सकता.* ?*कलह होने पर जो पहले माफ़ी मांगे, जरुरी नहीं उसी की गलती हो. हो सकता है वो रिश्ते को बनाये रखना ज्यादा महत्वपूर्ण समझता हो.* ?*दोस्तों के साथ खाते-पीते, पार्टी करते समय जो दोस्त बिल पे करता है, जरुरी नहीं उसकी जेब नोटों से ठसाठस भरी हो. हो सकता है उसके लिए दोस्ती के सामने पैसों की अहमियत कम हो.* ?*जो लोग आपकी मदद करते हैं, जरुरी नहीं वो आपके एहसानों के बोझ तले दबे हों. वो आपकी मदद करते हैं क्योंकि उनके दिलों में दयालुता और करुणा का निवास है.* ?*आजकल जीवन कठिन इसीलिए हो गया है क्योंकि हमने लोगो को समझना कम कर दिया और फौरी तौर पर judge करना शुरू कर दिया है. थोड़ी सी समझ और थोड़ी सी मानवता ही आपको सही रास्ता दिखा सकती है. जीवन में निर्णय लेने के कई ऐसे पल आयेंगे, सो अगली बार किसी पर भी अपने पूर्वाग्रह का ठप्पा लगाने से पहले विचार अवश्य करें.* ********************************** 2026-04-09 06:04:50
70603 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर *णमोकार महामंत्र का महात्म्य* _जैन दर्शन में णमोकार महामंत्र जिसे नमस्कार मंत्र भी कहा जाता है, यह एक पवित्र मंत्र है। यह मंत्र जैन धर्म के मूल सिद्धांतों का प्रतीक है और इसे जैन परम्परा का सबसे प्रमुख एवं सर्व व्यापक मंत्र माना जाता है। इसका उच्चारण करने से साधक को शांति और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। इस मंत्र में किसकी स्तुति की गई है, इस मंत्र की विशेषता और महत्व क्या है ? इस विषय को समझते है।_ *णमोकार महामंत्र-* *णमो अरिहंताणं,* *णमो सिद्धाणं* *णमो आइरियाणं* *णमो उवज्झायाणं* *णमो लोएसव्व साहूणं।।* _अर्थात् नमस्कार हो लोक के सभी अरिहंतो को, नमस्कार हो लोक के सभी सिद्धों को, नमस्कार हो लोक के सभी आचार्यों को, नमस्कार हो लोक के सभी उपाध्यायों को और नमस्कार हो लोक के सभी साधुओं को।_ *णमोकार महामंत्र की विशेषता -* *1- रचना -* _णमोकार महामंत्र की रचना किसी ने नहीं की है यह स्वयमेव रचा हुआ है, शाश्वत है, अनादिकाल से प्रवर्तमान अनादि अनिधन मंत्र है। इस मंत्र को ईसा की पहली शताब्दी में सर्वप्रथम आचार्य श्री पुष्पदंत मुनि और आचार्य श्री भूतबली जी मुनि ने षट् खण्डागम ग्रंथ में मंगलाचरण के रूप में प्राकृत भाषा में आर्या छन्द में लिपिबद्ध किया था।_ *2- विषय -* _इस मंत्र में पञ्च परमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है। जो परम पद में स्थित होते है तथा जो आत्मा के पदों और गुणों में सबसे बड़े होते है तथा राजा, महाराजा व इन्द्र भी जिनको सिर झुकाते हैं, उन्हें परमेष्ठी कहते है। परमेष्ठी पांच होते है - अरिहंत परमेष्ठी, सिद्ध परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय परमेष्ठी और साधु परमेष्ठी।_ *3- बनावट -* _इस मंत्र में 5 पद, 35 अक्षर और 58 मात्राएं है। णमो अरिहंताणं में 7 अक्षर 11 मात्राएं, णमो सिद्धाणं में 5 अक्षर 9 मात्राएं, णमो आइरियाणं में 7 अक्षर 11 मात्राएं, णमो उवज्झायाणं में 7 अक्षर 12 मात्राएं, णमो लोए सव्व साहूणं में 9 अक्षर 15 मात्राएं है।_ *4- अनेक नाम -* _णमोकार मंत्र को नमस्कार मंत्र, पञ्च परमेष्ठी मंत्र, पञ्च नमस्कार मंत्र,अनादिमूलमंत्र,अनादि अनिधन मंत्र, अपराजित मंत्र, महामंत्र, मूलमंत्र,मंत्रराज,सर्वकालिक मंत्र,मोक्ष प्रदायक मंत्र,पंच मंगल मंत्र, पैंतीस अक्षर वाला मंत्र आदि नामों से भी जाना जाता है।_ *5- उच्चारण -* _शुद्ध उच्चारण करते हुए एक बार णमोकार मंत्र पढ़ते हुए तीन श्वासोच्छवास लगते है।_ *6- साधन -* _इस णमोकार मंत्र से चौरासी लाख मंत्रों की उत्पत्ति हुई है।_ *7- फल -* _यह णमोकार मंत्र वाचक जाप से मानस जाप में हजार गुणा अधिक पुण्य संचय कराता है। धवला ग्रंथ में आया है कि चलते-फिरते, उठते-बैठते णमोकार मंत्र को भाव सहित पढ़ने से अनन्त गुणी कर्मों की निर्जरा होती है।_ *8- सार्वभौमिकता -* _णमोकार मंत्र में किसी विशेष व्यक्ति,जाति या वर्ग का नाम नहीं आता है। यह सभी अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और साधुओं का समर्पण पूर्वक सम्मान करता है।_ *9- आत्मिक शुद्धि -* _इस मंत्र का जाप साधक को मन और आत्मा की शुद्धि की दिशा में प्रेरित करता है। यह भावनाओं और विचारों को संयमित करने का साधन है। यह मंत्र जैन-धर्म का प्रमुख मंत्र होने के बावजूद सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का संदेश देता है और सभी को आत्मिक शांति और सुख प्रदान करने की दिशा में अग्रसर करता है।_ *10- पवित्रता -* _यह मंत्र अत्यंत पवित्र है और इसे जैन साधक दिन-रात जपते हैं। इसके द्वारा आत्मा के चारित्रिक दोष दूर होते है और संयम, त्याग और साधना में वृत्ति बढ़ती है।_ *11- अहिंसा का संदेश -* _णमोकार मंत्र अहिंसा, करूणा और सर्वकल्याण का प्रतीक है। इसमें किसी जीव या वस्तु के प्रति हिंसा का कोई भाव नहीं है, अपितु परमेष्ठी के गुणों का गुणानुवाद ही है।_ *12- कर्म निर्जरा -* _यह मंत्र जैन साधकों को कर्मों की निर्जरा (कर्मों का नाश) की दिशा में प्रेरित करता है। इसका नियमित उच्चारण जीवन में धर्म का विकास करता है और आत्मा को शुद्ध करने में सहायक होता है।_ *13- समता भाव -* _इस मंत्र में किसी एक विशेष गुरु या भगवान का नाम नहीं लिया गया है। यह सभी को समान भाव से नमस्कार करता है, जिससे समता गुण विकसित होता है।_ *णमोकार मंत्र के जाप के समय रखने योग्य शुद्धियां -* _णमोकार मंत्र का जाप करने के लिए सर्वप्रथम आठ प्रकार की शुद्धियों का होना आवश्यक है।_ *1- द्रव्य शुद्धि -* _पंचेन्द्रिय तथा मन को वश कर कषाय और परिग्रह का शक्ति के अनुसार त्याग कर कोमल और दयालु चित्त हो जाप करना। यहां द्रव्य शुद्धि का अभिप्राय पात्र की अन्तरंग शुद्धि से है। जाप करने वाले को यथाशक्ति अपने विकारों को हटाकर ही जाप करना चाहिए। अन्तरंग से काम, क्रोध,लोभ,मोह,मान, माया आदि विकारों को हटाना आवश्यक है।_ *2- क्षेत्र शुद्धि -* _निराकुल स्थान, जहां हल्ला-गुल्ला न हो तथा डांह, मच्छर आदि बाधक जन्तु न हो, चित्त में क्षोभ उत्पन्न करने वाले उपद्रव एवं शीत-उष्ण की बाधा न हो,ऐसा एकान्त निर्जन स्थान जाप करने के लिए उत्तम है। घर के किसी एकांत प्रदेश में, जहां अन्य किसी प्रकार की बाधा न हो और पूर्ण शांति रह सके,उस स्थान पर भी जाप किया जा सकता है।_ *3- समय शुद्धि -* _प्रातः, मध्याह्न और सांयकाल के समय कम से कम अड़तालीस मिनट तक लगातार इस महामंत्र का जाप करना चाहिए। जाप करते समय निश्चित रहना एवं निराकुल होना परम आवश्यक है।_ *4- आसन शुद्धि -* _काष्ठ,शिला, भूमि,चटाई या शीतल पट्टी पर पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पद्मासन, खड्गासन या अर्ध पद्मासन होकर क्षेत्र तथा काल का प्रमाण करके मौन पूर्वक इस मंत्र का जाप करना चाहिए।_ *5- विनय शुद्धि -* _जिस आसन पर बैठकर जाप करना हो उस आसन को सावधानी पूर्वक ईर्यापथ शुद्धि के साथ साफ करना चाहिए तथा जाप करने के लिए नम्रता पूर्वक भीतर का अनुराग भी रहना आवश्यक है। जब तक जाप करने के लिए भीतर का उत्साह नहीं होगा,तब तक सच्चे मन से जाप नहीं किया जा सकता।_ *6- मन: शुद्धि -* _विचारों की गन्दगी को त्यागकर मन को एकाग्र करना, चंचल मन इधर-उधर न भटकने पाये इसकी चेष्टा करना,मन को पूर्णतया पवित्र बनाने का प्रयास करना ही इस शुद्धि में अभिप्रेत है।_ *7- वचन शुद्धि -* _धीरे-धीरे साम्यभाव पूर्वक इस मंत्र का शुद्ध जाप करना अर्थात् उच्चारण करने में अशुद्धि न होने पाये तथा उच्चारण मन ही मन में होना चाहिए।_ *8- काय शुद्धि -* _शौचादि शंकाओं से निवृत्त होकर यत्नाचार पूर्वक शरीर शुद्ध करके हलन-चलन क्रिया से रहित जाप करना चाहिए। जाप के समय शारीरिक शुद्धि का भी ध्यान रखना चाहिए।_ _इस महामंत्र का जाप यदि खड़े होकर करना हो तो तीन-तीन श्वासोच्छवासों में एक बार पढ़ना चाहिए। 108 बार के जाप में कुल 324 श्वासोच्छवास लेना चाहिए।_ *णमोकार मंत्र के जाप करने की विधि -* _जाप तीन प्रकार से किया जाता है - *वाचक* जाप, *उपांशु* जाप और *मानस* जाप।_ *वाचक* _जाप में शब्दों का उच्चारण किया जाता है अर्थात् मन्त्र को मुंह से बोल-बोल कर जाप किया जाता है।_ *उपांशु जाप* _में मंत्र को भीतर से शब्दोच्चारण की क्रिया होती है,जीभ अंदर चलती रहती है,कण्ठ स्थान पर मंत्र के शब्द गूंजते रहते है किन्तु मुख से उच्चारण नहीं किया जाता है।_ *मानस जाप* _में बाहरी और भीतरी शब्दोच्चारण का प्रयास रुक जाता है, सिर्फ मन में णमोकार मंत्र का चिन्तन होता रहता है। यही क्रिया ध्यान का रूप धारण करती है।_ *यशस्तिलक चम्पु* _में कहा गया है -_ *वचसा वा मनसा वा कार्यो जाप्य: सव्याहितस्रान्ते।* *शतगुणमाद्ये पुण्ये सहस्रसंख्यं द्वितीये तु।।* _वाचक जाप से उपांशु जाप में शतगुणा पुण्य और उपांशु जाप की अपेक्षा मानस जाप में सहस्रगुणा पुण्य होता है। मानस जाप ही ध्यान का रूप है, यह अन्तर्जल्प रहित मौन रूप होता है।_ *णमोकार महामंत्र का महात्म्य -* *ऐसो पंच णमोयारो,सव्व पावप्पणासणो।* *मंगलाणं च सव्वेसिं,पढमं होई मंगलं।।* _यह पंच नमस्कार मंत्र सब पापों को नष्ट करने वाला है और सब मंगलों में पहला मंगल है। इसलिए प्रत्येक शुभ कार्य करने के पहले यह मंत्र जरुर बोलना चाहिए।_ _यह मंत्र प्रत्येक मनुष्य पढ़ सकते है। संसार में जितने भी मन्त्रों का प्रचलन है उनमें से यह णमोकार महामंत्र सबसे महान् है। इस मंत्र को प्रतिदिन 108 बार मन लगाकर जाप करने से सभी रोग,संकट, आपत्तियां, दुःख आदि दूर हो जाते है। समस्त सुखों की प्राप्ति होती है और अंत में मोक्ष प्राप्त होता है। अतः प्रतिदिन इस मंत्र को 108 बार अवश्य जपना चाहिए।_ *दु:खे सुखे भयस्थाने,पथि दुर्गे रणेऽपि वा।* *श्री पंचगुरुमंत्रस्य,पाठ: कार्य: पदे पदे।।* _अर्थात् - दुःख में, सुख में,डर के स्थान में, मार्ग में, भयानक स्थान में, युद्ध के मैदान में, कदम-कदम पर णमोकार मंत्र का जाप करना चाहिए।_ _यह महामंत्र तीनों लोकों में अनुपम है,इस मंत्र के समान चमत्कारी और प्रभावशाली अन्य कई मंत्र नहीं है, यह समस्त पापों का अरि है। इस मंत्र का जाप करने से किसी भी प्रकार का पाप नष्ट हुए बिना नहीं रहता है,जिस प्रकार अग्नि का एक कण घांस-फूस के बड़े-बड़े ढेरों को नष्ट कर देता है,उसी प्रकार यह मंत्र सभी तरह के पापों को नष्ट करने वाला होने के कारण पापारि है। यह मंत्र संसार का उच्छेदक, व्यक्ति के भाव संसार राग -द्वेष आदि और द्रव्य संसार ज्ञानावरण आदि कर्मों का विनाशक है,तिक्ष्ण विषों का नाश करने वाला है अर्थात् इस महामंत्र के प्रभाव से सभी प्रकार की विष-बाधाएं दूर हो जाती है। इस मंत्र का भाव सहित उच्चारण करने से कर्मों की निर्जरा होती है तथा योग-निरोध पूर्वक इसका स्मरण करने से कर्मों का विनाश होता है। यह मंत्र सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है,भाव सहित और विधि सहित इस मंत्र का अनुष्ठान करने से सभी तरह की लौकिक-अलौकिक सिद्धियां प्राप्त हो जाती है,साधक जिस वस्तु की कामना करता है,वह उसे प्राप्त हो जाती है। दुर्लभ और असम्भव कार्य भी इस महामंत्र की साधना से पूर्ण हो जाते है, यह मंत्र मोक्ष-सुख को उत्पन्न करने वाला है। यह मंत्र केवलज्ञान मंत्र कहलाता है अर्थात् इसके जाप से केवलज्ञान की प्राप्ति होती है तथा यही मंत्र निर्वाण सुख को देने वाला भी है।_ _पवित्र या अपवित्र अथवा सोते, जागते,चलते, फिरते किसी भी अवस्था में इस णमोकार मंत्र का स्मरण करने से आत्मा सर्वपापों से मुक्त हो जाता है,शरीर और मन पवित्र हो जाते है। यह मंत्र आत्मा को पवित्र करने वाला है। यह णमोकार मंत्र अपराजित है, अन्य किसी मंत्र द्वारा इसकी शक्ति प्रतिहत अवरूद्ध नहीं की जा सकती है, इसमें अद्भुत सामर्थ्य निहित है। समस्त विध्नों को क्षणभर में ही दूर किया जा सकता है। जिस प्रकार हलाहल विष तत्काल अपना फल देता है और उसका फल अव्यर्थ होता है,उसी प्रकार णमोकार मंत्र भी तत्काल शुभ पुण्य का आस्रव करता है तथा अशुभोदय के प्रभाव को क्षीण करता है। यह सम्यक्त्व की वृद्धि में सहायक होता है। मनुष्य जीवन-भर पापास्रव करने पर भी अन्तिम समय में इस महामंत्र के स्मरण के प्रभाव से स्वर्गादि सुखों को प्राप्त कर लेता है। यह णमोकार मंत्र सभी प्रकार की आकुलताओं को दूर करने वाला है।_ _मरणोन्मुख कुत्ते को जीवन्धर स्वामी ने करुणावश णमोकार मंत्र सुनाया था,इस मंत्र के प्रभाव से वह पापाचारी श्वान देवता के रूप में उत्पन्न हुआ। अतः सिद्ध है कि यह मंत्र आत्म विशुद्धि का बहुत बड़ा कारण है। णमोकार मंत्र के एक अक्षर का भी भाव सहित स्मरण करने से सात सागर तक भोगा जाने वाला पाप नष्ट हो जाता है, एक पद भाव सहित स्मरण करने से पचास सागर तक भोगे जाने वाले पाप का नाश होता है और समग्र मंत्र का भक्ति भाव सहित विधि पूर्वक स्मरण करने से पांच सौ सागर तक भोगे जाने वाले पाप का नाश हो जाता है। भाव सहित स्मरण किया गया यह णमोकार मंत्र असंख्य दुःखों को क्षय करने वाला तथा इह लौकिक और पारलौकिक समस्त सुखों को देने वाला है। इस पंचमकाल में कल्पवृक्ष के समान सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाला यह मंत्र ही है, अतः संसारी प्राणियों को इसका जाप अवश्य करना चाहिए। जिस अज्ञान,पाप और संक्लेश के अन्धकार को सूर्य, चन्द्र और दीपक दूर नहीं कर सकते हैं,उस घने अन्धकार को यह मंत्र नष्ट कर देता है।_ ??????? 2026-04-09 06:03:32
70604 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर *णमोकार महामंत्र का महात्म्य* _जैन दर्शन में णमोकार महामंत्र जिसे नमस्कार मंत्र भी कहा जाता है, यह एक पवित्र मंत्र है। यह मंत्र जैन धर्म के मूल सिद्धांतों का प्रतीक है और इसे जैन परम्परा का सबसे प्रमुख एवं सर्व व्यापक मंत्र माना जाता है। इसका उच्चारण करने से साधक को शांति और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। इस मंत्र में किसकी स्तुति की गई है, इस मंत्र की विशेषता और महत्व क्या है ? इस विषय को समझते है।_ *णमोकार महामंत्र-* *णमो अरिहंताणं,* *णमो सिद्धाणं* *णमो आइरियाणं* *णमो उवज्झायाणं* *णमो लोएसव्व साहूणं।।* _अर्थात् नमस्कार हो लोक के सभी अरिहंतो को, नमस्कार हो लोक के सभी सिद्धों को, नमस्कार हो लोक के सभी आचार्यों को, नमस्कार हो लोक के सभी उपाध्यायों को और नमस्कार हो लोक के सभी साधुओं को।_ *णमोकार महामंत्र की विशेषता -* *1- रचना -* _णमोकार महामंत्र की रचना किसी ने नहीं की है यह स्वयमेव रचा हुआ है, शाश्वत है, अनादिकाल से प्रवर्तमान अनादि अनिधन मंत्र है। इस मंत्र को ईसा की पहली शताब्दी में सर्वप्रथम आचार्य श्री पुष्पदंत मुनि और आचार्य श्री भूतबली जी मुनि ने षट् खण्डागम ग्रंथ में मंगलाचरण के रूप में प्राकृत भाषा में आर्या छन्द में लिपिबद्ध किया था।_ *2- विषय -* _इस मंत्र में पञ्च परमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है। जो परम पद में स्थित होते है तथा जो आत्मा के पदों और गुणों में सबसे बड़े होते है तथा राजा, महाराजा व इन्द्र भी जिनको सिर झुकाते हैं, उन्हें परमेष्ठी कहते है। परमेष्ठी पांच होते है - अरिहंत परमेष्ठी, सिद्ध परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय परमेष्ठी और साधु परमेष्ठी।_ *3- बनावट -* _इस मंत्र में 5 पद, 35 अक्षर और 58 मात्राएं है। णमो अरिहंताणं में 7 अक्षर 11 मात्राएं, णमो सिद्धाणं में 5 अक्षर 9 मात्राएं, णमो आइरियाणं में 7 अक्षर 11 मात्राएं, णमो उवज्झायाणं में 7 अक्षर 12 मात्राएं, णमो लोए सव्व साहूणं में 9 अक्षर 15 मात्राएं है।_ *4- अनेक नाम -* _णमोकार मंत्र को नमस्कार मंत्र, पञ्च परमेष्ठी मंत्र, पञ्च नमस्कार मंत्र,अनादिमूलमंत्र,अनादि अनिधन मंत्र, अपराजित मंत्र, महामंत्र, मूलमंत्र,मंत्रराज,सर्वकालिक मंत्र,मोक्ष प्रदायक मंत्र,पंच मंगल मंत्र, पैंतीस अक्षर वाला मंत्र आदि नामों से भी जाना जाता है।_ *5- उच्चारण -* _शुद्ध उच्चारण करते हुए एक बार णमोकार मंत्र पढ़ते हुए तीन श्वासोच्छवास लगते है।_ *6- साधन -* _इस णमोकार मंत्र से चौरासी लाख मंत्रों की उत्पत्ति हुई है।_ *7- फल -* _यह णमोकार मंत्र वाचक जाप से मानस जाप में हजार गुणा अधिक पुण्य संचय कराता है। धवला ग्रंथ में आया है कि चलते-फिरते, उठते-बैठते णमोकार मंत्र को भाव सहित पढ़ने से अनन्त गुणी कर्मों की निर्जरा होती है।_ *8- सार्वभौमिकता -* _णमोकार मंत्र में किसी विशेष व्यक्ति,जाति या वर्ग का नाम नहीं आता है। यह सभी अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और साधुओं का समर्पण पूर्वक सम्मान करता है।_ *9- आत्मिक शुद्धि -* _इस मंत्र का जाप साधक को मन और आत्मा की शुद्धि की दिशा में प्रेरित करता है। यह भावनाओं और विचारों को संयमित करने का साधन है। यह मंत्र जैन-धर्म का प्रमुख मंत्र होने के बावजूद सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का संदेश देता है और सभी को आत्मिक शांति और सुख प्रदान करने की दिशा में अग्रसर करता है।_ *10- पवित्रता -* _यह मंत्र अत्यंत पवित्र है और इसे जैन साधक दिन-रात जपते हैं। इसके द्वारा आत्मा के चारित्रिक दोष दूर होते है और संयम, त्याग और साधना में वृत्ति बढ़ती है।_ *11- अहिंसा का संदेश -* _णमोकार मंत्र अहिंसा, करूणा और सर्वकल्याण का प्रतीक है। इसमें किसी जीव या वस्तु के प्रति हिंसा का कोई भाव नहीं है, अपितु परमेष्ठी के गुणों का गुणानुवाद ही है।_ *12- कर्म निर्जरा -* _यह मंत्र जैन साधकों को कर्मों की निर्जरा (कर्मों का नाश) की दिशा में प्रेरित करता है। इसका नियमित उच्चारण जीवन में धर्म का विकास करता है और आत्मा को शुद्ध करने में सहायक होता है।_ *13- समता भाव -* _इस मंत्र में किसी एक विशेष गुरु या भगवान का नाम नहीं लिया गया है। यह सभी को समान भाव से नमस्कार करता है, जिससे समता गुण विकसित होता है।_ *णमोकार मंत्र के जाप के समय रखने योग्य शुद्धियां -* _णमोकार मंत्र का जाप करने के लिए सर्वप्रथम आठ प्रकार की शुद्धियों का होना आवश्यक है।_ *1- द्रव्य शुद्धि -* _पंचेन्द्रिय तथा मन को वश कर कषाय और परिग्रह का शक्ति के अनुसार त्याग कर कोमल और दयालु चित्त हो जाप करना। यहां द्रव्य शुद्धि का अभिप्राय पात्र की अन्तरंग शुद्धि से है। जाप करने वाले को यथाशक्ति अपने विकारों को हटाकर ही जाप करना चाहिए। अन्तरंग से काम, क्रोध,लोभ,मोह,मान, माया आदि विकारों को हटाना आवश्यक है।_ *2- क्षेत्र शुद्धि -* _निराकुल स्थान, जहां हल्ला-गुल्ला न हो तथा डांह, मच्छर आदि बाधक जन्तु न हो, चित्त में क्षोभ उत्पन्न करने वाले उपद्रव एवं शीत-उष्ण की बाधा न हो,ऐसा एकान्त निर्जन स्थान जाप करने के लिए उत्तम है। घर के किसी एकांत प्रदेश में, जहां अन्य किसी प्रकार की बाधा न हो और पूर्ण शांति रह सके,उस स्थान पर भी जाप किया जा सकता है।_ *3- समय शुद्धि -* _प्रातः, मध्याह्न और सांयकाल के समय कम से कम अड़तालीस मिनट तक लगातार इस महामंत्र का जाप करना चाहिए। जाप करते समय निश्चित रहना एवं निराकुल होना परम आवश्यक है।_ *4- आसन शुद्धि -* _काष्ठ,शिला, भूमि,चटाई या शीतल पट्टी पर पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पद्मासन, खड्गासन या अर्ध पद्मासन होकर क्षेत्र तथा काल का प्रमाण करके मौन पूर्वक इस मंत्र का जाप करना चाहिए।_ *5- विनय शुद्धि -* _जिस आसन पर बैठकर जाप करना हो उस आसन को सावधानी पूर्वक ईर्यापथ शुद्धि के साथ साफ करना चाहिए तथा जाप करने के लिए नम्रता पूर्वक भीतर का अनुराग भी रहना आवश्यक है। जब तक जाप करने के लिए भीतर का उत्साह नहीं होगा,तब तक सच्चे मन से जाप नहीं किया जा सकता।_ *6- मन: शुद्धि -* _विचारों की गन्दगी को त्यागकर मन को एकाग्र करना, चंचल मन इधर-उधर न भटकने पाये इसकी चेष्टा करना,मन को पूर्णतया पवित्र बनाने का प्रयास करना ही इस शुद्धि में अभिप्रेत है।_ *7- वचन शुद्धि -* _धीरे-धीरे साम्यभाव पूर्वक इस मंत्र का शुद्ध जाप करना अर्थात् उच्चारण करने में अशुद्धि न होने पाये तथा उच्चारण मन ही मन में होना चाहिए।_ *8- काय शुद्धि -* _शौचादि शंकाओं से निवृत्त होकर यत्नाचार पूर्वक शरीर शुद्ध करके हलन-चलन क्रिया से रहित जाप करना चाहिए। जाप के समय शारीरिक शुद्धि का भी ध्यान रखना चाहिए।_ _इस महामंत्र का जाप यदि खड़े होकर करना हो तो तीन-तीन श्वासोच्छवासों में एक बार पढ़ना चाहिए। 108 बार के जाप में कुल 324 श्वासोच्छवास लेना चाहिए।_ *णमोकार मंत्र के जाप करने की विधि -* _जाप तीन प्रकार से किया जाता है - *वाचक* जाप, *उपांशु* जाप और *मानस* जाप।_ *वाचक* _जाप में शब्दों का उच्चारण किया जाता है अर्थात् मन्त्र को मुंह से बोल-बोल कर जाप किया जाता है।_ *उपांशु जाप* _में मंत्र को भीतर से शब्दोच्चारण की क्रिया होती है,जीभ अंदर चलती रहती है,कण्ठ स्थान पर मंत्र के शब्द गूंजते रहते है किन्तु मुख से उच्चारण नहीं किया जाता है।_ *मानस जाप* _में बाहरी और भीतरी शब्दोच्चारण का प्रयास रुक जाता है, सिर्फ मन में णमोकार मंत्र का चिन्तन होता रहता है। यही क्रिया ध्यान का रूप धारण करती है।_ *यशस्तिलक चम्पु* _में कहा गया है -_ *वचसा वा मनसा वा कार्यो जाप्य: सव्याहितस्रान्ते।* *शतगुणमाद्ये पुण्ये सहस्रसंख्यं द्वितीये तु।।* _वाचक जाप से उपांशु जाप में शतगुणा पुण्य और उपांशु जाप की अपेक्षा मानस जाप में सहस्रगुणा पुण्य होता है। मानस जाप ही ध्यान का रूप है, यह अन्तर्जल्प रहित मौन रूप होता है।_ *णमोकार महामंत्र का महात्म्य -* *ऐसो पंच णमोयारो,सव्व पावप्पणासणो।* *मंगलाणं च सव्वेसिं,पढमं होई मंगलं।।* _यह पंच नमस्कार मंत्र सब पापों को नष्ट करने वाला है और सब मंगलों में पहला मंगल है। इसलिए प्रत्येक शुभ कार्य करने के पहले यह मंत्र जरुर बोलना चाहिए।_ _यह मंत्र प्रत्येक मनुष्य पढ़ सकते है। संसार में जितने भी मन्त्रों का प्रचलन है उनमें से यह णमोकार महामंत्र सबसे महान् है। इस मंत्र को प्रतिदिन 108 बार मन लगाकर जाप करने से सभी रोग,संकट, आपत्तियां, दुःख आदि दूर हो जाते है। समस्त सुखों की प्राप्ति होती है और अंत में मोक्ष प्राप्त होता है। अतः प्रतिदिन इस मंत्र को 108 बार अवश्य जपना चाहिए।_ *दु:खे सुखे भयस्थाने,पथि दुर्गे रणेऽपि वा।* *श्री पंचगुरुमंत्रस्य,पाठ: कार्य: पदे पदे।।* _अर्थात् - दुःख में, सुख में,डर के स्थान में, मार्ग में, भयानक स्थान में, युद्ध के मैदान में, कदम-कदम पर णमोकार मंत्र का जाप करना चाहिए।_ _यह महामंत्र तीनों लोकों में अनुपम है,इस मंत्र के समान चमत्कारी और प्रभावशाली अन्य कई मंत्र नहीं है, यह समस्त पापों का अरि है। इस मंत्र का जाप करने से किसी भी प्रकार का पाप नष्ट हुए बिना नहीं रहता है,जिस प्रकार अग्नि का एक कण घांस-फूस के बड़े-बड़े ढेरों को नष्ट कर देता है,उसी प्रकार यह मंत्र सभी तरह के पापों को नष्ट करने वाला होने के कारण पापारि है। यह मंत्र संसार का उच्छेदक, व्यक्ति के भाव संसार राग -द्वेष आदि और द्रव्य संसार ज्ञानावरण आदि कर्मों का विनाशक है,तिक्ष्ण विषों का नाश करने वाला है अर्थात् इस महामंत्र के प्रभाव से सभी प्रकार की विष-बाधाएं दूर हो जाती है। इस मंत्र का भाव सहित उच्चारण करने से कर्मों की निर्जरा होती है तथा योग-निरोध पूर्वक इसका स्मरण करने से कर्मों का विनाश होता है। यह मंत्र सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है,भाव सहित और विधि सहित इस मंत्र का अनुष्ठान करने से सभी तरह की लौकिक-अलौकिक सिद्धियां प्राप्त हो जाती है,साधक जिस वस्तु की कामना करता है,वह उसे प्राप्त हो जाती है। दुर्लभ और असम्भव कार्य भी इस महामंत्र की साधना से पूर्ण हो जाते है, यह मंत्र मोक्ष-सुख को उत्पन्न करने वाला है। यह मंत्र केवलज्ञान मंत्र कहलाता है अर्थात् इसके जाप से केवलज्ञान की प्राप्ति होती है तथा यही मंत्र निर्वाण सुख को देने वाला भी है।_ _पवित्र या अपवित्र अथवा सोते, जागते,चलते, फिरते किसी भी अवस्था में इस णमोकार मंत्र का स्मरण करने से आत्मा सर्वपापों से मुक्त हो जाता है,शरीर और मन पवित्र हो जाते है। यह मंत्र आत्मा को पवित्र करने वाला है। यह णमोकार मंत्र अपराजित है, अन्य किसी मंत्र द्वारा इसकी शक्ति प्रतिहत अवरूद्ध नहीं की जा सकती है, इसमें अद्भुत सामर्थ्य निहित है। समस्त विध्नों को क्षणभर में ही दूर किया जा सकता है। जिस प्रकार हलाहल विष तत्काल अपना फल देता है और उसका फल अव्यर्थ होता है,उसी प्रकार णमोकार मंत्र भी तत्काल शुभ पुण्य का आस्रव करता है तथा अशुभोदय के प्रभाव को क्षीण करता है। यह सम्यक्त्व की वृद्धि में सहायक होता है। मनुष्य जीवन-भर पापास्रव करने पर भी अन्तिम समय में इस महामंत्र के स्मरण के प्रभाव से स्वर्गादि सुखों को प्राप्त कर लेता है। यह णमोकार मंत्र सभी प्रकार की आकुलताओं को दूर करने वाला है।_ _मरणोन्मुख कुत्ते को जीवन्धर स्वामी ने करुणावश णमोकार मंत्र सुनाया था,इस मंत्र के प्रभाव से वह पापाचारी श्वान देवता के रूप में उत्पन्न हुआ। अतः सिद्ध है कि यह मंत्र आत्म विशुद्धि का बहुत बड़ा कारण है। णमोकार मंत्र के एक अक्षर का भी भाव सहित स्मरण करने से सात सागर तक भोगा जाने वाला पाप नष्ट हो जाता है, एक पद भाव सहित स्मरण करने से पचास सागर तक भोगे जाने वाले पाप का नाश होता है और समग्र मंत्र का भक्ति भाव सहित विधि पूर्वक स्मरण करने से पांच सौ सागर तक भोगे जाने वाले पाप का नाश हो जाता है। भाव सहित स्मरण किया गया यह णमोकार मंत्र असंख्य दुःखों को क्षय करने वाला तथा इह लौकिक और पारलौकिक समस्त सुखों को देने वाला है। इस पंचमकाल में कल्पवृक्ष के समान सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाला यह मंत्र ही है, अतः संसारी प्राणियों को इसका जाप अवश्य करना चाहिए। जिस अज्ञान,पाप और संक्लेश के अन्धकार को सूर्य, चन्द्र और दीपक दूर नहीं कर सकते हैं,उस घने अन्धकार को यह मंत्र नष्ट कर देता है।_ ??????? 2026-04-09 06:03:32