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7818 40449749 जिनोदय?JINODAYA *योग्य की उपेक्षा और अयोग्य का उत्थान: पतन की शुरुआत* जब किसी भी संस्था, समाज या संगठन में योग्य व्यक्ति की जगह अयोग्य व्यक्ति को बैठा दिया जाता है, तो सबसे पहले उस पद की गरिमा कम होती है। पद स्वयं कभी छोटा नहीं होता, उसे छोटा या बड़ा बनाने वाला उस पर बैठा व्यक्ति होता है। यदि निर्णय क्षमता, विवेक, संयम और नैतिक बल कमजोर हो, तो बड़े से बड़ा पद भी अपनी चमक खो देता है। ऐसे में निर्णय कमजोर पड़ते हैं, पक्षपात बढ़ता है और व्यवस्था धीरे-धीरे ठोकरें खाने लगती है। अयोग्यता जब अधिकार के साथ जुड़ जाती है, तो वह केवल स्वयं का नहीं, पूरी व्यवस्था का नुकसान करती है। सबसे बड़ी समस्या तब पैदा होती है जब अयोग्य व्यक्ति घमंड में चूर हो जाता है। उसे लगता है कि वही अंतिम सत्य है, वही सबसे अधिक समझदार है। वह हर असहमति को विद्रोह समझता है और हर योग्य व्यक्ति को अपने लिए खतरा मानता है। परिणामस्वरूप वह दूसरों को अयोग्य घोषित करने में लग जाता है ताकि उसकी कुर्सी सुरक्षित रहे। इस प्रक्रिया में सच्ची प्रतिभा हतोत्साहित होती है, ईमानदार लोग किनारे कर दिए जाते हैं और चाटुकारिता को बढ़ावा मिलता है। यह स्थिति किसी भी समाज के लिए घातक होती है। यह बात धार्मिक संस्थाओं और विशेषकर जैन साधुओं के गच्छ पर भी लागू होती है। गच्छ का उद्देश्य आत्मशुद्धि, संयम और समाज मार्गदर्शन है, न कि व्यक्तिगत अहंकार की तुष्टि। जब नेतृत्व योग्य, विनम्र और शास्त्रसम्मत होता है, तो गच्छ समाज के लिए प्रेरणा बनता है। लेकिन जब नेतृत्व अहंकार, पक्षपात और निजी स्वार्थ से संचालित होने लगे, तो साधु-संस्था दोनों की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लग जाते हैं। कुछ लोग स्वयं को गच्छ का मालिक समझने लगते हैं, जबकि वास्तव में वे केवल उत्तरदायित्व निभाने के लिए नियुक्त होते हैं। धर्म में पद सेवा का माध्यम है, स्वामित्व का प्रमाण नहीं। यदि चयन योग्यता के आधार पर न होकर समीकरणों, समूहबंदी या दबाव के आधार पर हो, तो उसके दुष्परिणाम दूर तक जाते हैं। समाज में भ्रम फैलता है, श्रद्धा डगमगाती है और नई पीढ़ी का विश्वास कमजोर होता है। इसलिए आवश्यक है कि हर संस्था आत्ममंथन करे। पद पर वही बैठे जो संयम, अध्ययन, विनम्रता और निर्णय क्षमता में श्रेष्ठ हो। योग्यता का सम्मान और अयोग्यता पर संयमित नियंत्रण ही व्यवस्था को स्थिर रख सकता है। अन्यथा इतिहास गवाह है कि जहाँ योग्य की उपेक्षा हुई है, वहाँ पतन निश्चित हुआ है। नितिन जैन, संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा), जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल, मोबाइल: 9215635871 2026-02-17 19:35:25
7816 40449667 संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी भगवान महावीर के बाद अनेकों महान आचार्य हुए किंतु कुंदकुंद आचार्य को ही क्यों अधिक स्मृत किया जाता सर्वज्ञ के बराबर मान के ??? अरे ! जैन धर्म श्रमणों का धर्म रहा श्रमण यानि जो श्रम करे उस मार्ग पर चले आचार्य कुंदकुंद ने दिया अध्यात्म का ज्ञान व्यवहार और निश्चय की समन्वयता बैठाकर समझाया वस्तु तत्व को जिससे धर्म के मर्म को समझने लगे सब अच्छे से शायद इसीलिए उनको स्मृत किया जाता सर्वज्ञ के बराबर मान के इस कलयुग के ,,, की रचना अध्यात्म ग्रंथों की समीचीन दृष्टि से इसलिए उनको याद ... <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1179644308?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=JBHJP&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1179644308?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=JBHJP&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING</a> 2026-02-17 19:35:18
7817 40449668 आ,गुरु विद्यासागरजी कहां विराजमान है भगवान महावीर के बाद अनेकों महान आचार्य हुए किंतु कुंदकुंद आचार्य को ही क्यों अधिक स्मृत किया जाता सर्वज्ञ के बराबर मान के ??? अरे ! जैन धर्म श्रमणों का धर्म रहा श्रमण यानि जो श्रम करे उस मार्ग पर चले आचार्य कुंदकुंद ने दिया अध्यात्म का ज्ञान व्यवहार और निश्चय की समन्वयता बैठाकर समझाया वस्तु तत्व को जिससे धर्म के मर्म को समझने लगे सब अच्छे से शायद इसीलिए उनको स्मृत किया जाता सर्वज्ञ के बराबर मान के इस कलयुग के ,,, की रचना अध्यात्म ग्रंथों की समीचीन दृष्टि से इसलिए उनको याद ... <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1179644308?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=JBHJP&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1179644308?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=JBHJP&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING</a> 2026-02-17 19:35:18
7815 40449755 वर्णी आश्रम पारसनाथ ईसरी 2026-02-17 19:34:56
7814 40449666 निर्यापक समय सागर जी भक्त अन्तरात्मा बहिरात्मा और परमात्मा ये तीन दशा बताई जैन धर्म में आत्मा की,,, परिचित हैं जिससे हम सभी इस कलयुग में हो गई एक चौथी श्रेणी भी जिसे कहते बैठीआत्मा चिपकी रहती जो हर समय मोबाइल से नहीं कोई ध्येय न कोई दिशा बस लगे रहते औरों को अपना मानने में अपने को ज्ञानी / महाज्ञानी दिखाने में,,, आचरण में कुछ नहीं किंतु जानकारी में मुझसे बड़ा कोई नहीं,,,, पच्चीस कषाय बताई जैन दर्शन में छब्बीसवीं कषाय हो गई आज लोग क्या कहेंगे ? नमोस्तु आचार्य श्री !!! अनिल जैन “राजधानी” श्रुत संवर्धक ... <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1179644272?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=JBHJP&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1179644272?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=JBHJP&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING</a> 2026-02-17 19:34:08
7812 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *रोहतक के सरकारी मेडिकल कॉलेज में 800 में से चार नंबर लाने वाले उम्मीदवार का मेडिकल में सिलेक्शन हुआ। धन्य है भारत का संविधान।*??? 2026-02-17 19:33:24
7813 40449668 आ,गुरु विद्यासागरजी कहां विराजमान है भगवान महावीर के बाद अनेकों महान आचार्य हुए किंतु कुंदकुंद आचार्य को ही क्यों अधिक स्मृत किया जाता सर्वज्ञ के बराबर मान के ??? अरे ! जैन धर्म श्रमणों का धर्म रहा श्रमण यानि जो श्रम करे उस मार्ग पर चले आचार्य कुंदकुंद ने दिया अध्यात्म का ज्ञान व्यवहार और निश्चय की समन्वयता बैठाकर समझाया वस्तु तत्व को जिससे धर्म के मर्म को समझने लगे सब अच्छे से शायद इसीलिए उनको स्मृत किया जाता सर्वज्ञ के बराबर मान के इस कलयुग के ,,, की रचना अध्यात्म ग्रंथों की समीचीन दृष्टि से इसलिए उनको याद ... <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1179644308?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=JBHJP&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1179644308?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=JBHJP&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING</a> 2026-02-17 19:33:24
7811 40449667 संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी भगवान महावीर के बाद अनेकों महान आचार्य हुए किंतु कुंदकुंद आचार्य को ही क्यों अधिक स्मृत किया जाता सर्वज्ञ के बराबर मान के ??? अरे ! जैन धर्म श्रमणों का धर्म रहा श्रमण यानि जो श्रम करे उस मार्ग पर चले आचार्य कुंदकुंद ने दिया अध्यात्म का ज्ञान व्यवहार और निश्चय की समन्वयता बैठाकर समझाया वस्तु तत्व को जिससे धर्म के मर्म को समझने लगे सब अच्छे से शायद इसीलिए उनको स्मृत किया जाता सर्वज्ञ के बराबर मान के इस कलयुग के ,,, की रचना अध्यात्म ग्रंथों की समीचीन दृष्टि से इसलिए उनको याद ... <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1179644308?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=JBHJP&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1179644308?utm_source=android_post_share_web&amp;referral_code=JBHJP&amp;utm_screen=post_share&amp;utm_referrer_state=PENDING</a> 2026-02-17 19:33:23
7810 40449770 1दिगजैनविकी All India Grp *आप आ रहे हैं ना...*.. *धर्मशिरोमणि की धर्मगाथा सुनने..*.. *धर्मशिरोमणि गुणानुवाद अमृत महोत्सव* तिथि - *फाल्गुन शुक्ल अष्टमी* दिनांक - *24 फरवरी* 2026 स्थान - बाड़ा *पदमपुरा* (जयपुर) पावन सान्निध्य - पंचम पट्टाचार्य वात्सल्य वारिधि 108 *श्री वर्धमान सागर महाराज ससंघ* आप आये... अपनों को साथ लाये....*जीवन को धर्म से जोड़ते हुए धन्य बनाएं...*... 2026-02-17 19:32:51
7809 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा *आप आ रहे हैं ना...*.. *धर्मशिरोमणि की धर्मगाथा सुनने..*.. *धर्मशिरोमणि गुणानुवाद अमृत महोत्सव* तिथि - *फाल्गुन शुक्ल अष्टमी* दिनांक - *24 फरवरी* 2026 स्थान - बाड़ा *पदमपुरा* (जयपुर) पावन सान्निध्य - पंचम पट्टाचार्य वात्सल्य वारिधि 108 *श्री वर्धमान सागर महाराज ससंघ* आप आये... अपनों को साथ लाये....*जीवन को धर्म से जोड़ते हुए धन्य बनाएं...*... 2026-02-17 19:32:01