WhatsApp Messages Dashboard

Total Records in Table: 15076

Records Matching Filters: 15076

From: To: Global Search:

Messages

ID Chat ID
Chat Name
Sender
Phone
Message
Status
Date View
72947 40449697 हथकरघा शांतिधारा पूर्णायु 1 *काला मंजन की डिब्बिया तैयार पाठशाला मे जाने के लिए, रेखा दीदी बुंदी वालो ने पाठशाला के सभी बच्चो के लिए 30 डिब्बिया (100gm-100 Rs, 50gm-50 Rs) वितरित करने हेतु ऑर्डर कर दिया है, यदि आप भी अहिंसक उत्पाद बच्चो को पाठशाला मे वितरित करने हेतु साबुन, टीथ ब्रश इत्यादि ऑर्डर करना चाहते है तो शीघ्र सम्पर्क करे, विद्यासागर इंटरप्राइजेज,9893112665*??? 2026-04-09 19:32:15
72948 40449697 हथकरघा शांतिधारा पूर्णायु 1 *काला मंजन की डिब्बिया तैयार पाठशाला मे जाने के लिए, रेखा दीदी बुंदी वालो ने पाठशाला के सभी बच्चो के लिए 30 डिब्बिया (100gm-100 Rs, 50gm-50 Rs) वितरित करने हेतु ऑर्डर कर दिया है, यदि आप भी अहिंसक उत्पाद बच्चो को पाठशाला मे वितरित करने हेतु साबुन, टीथ ब्रश इत्यादि ऑर्डर करना चाहते है तो शीघ्र सम्पर्क करे, विद्यासागर इंटरप्राइजेज,9893112665*??? 2026-04-09 19:32:15
72946 40449718 विनय गुरु ? 2026-04-09 19:31:19
72945 40449718 विनय गुरु ? 2026-04-09 19:31:18
72944 40449751 Akola Vishistashri Mataji Vihar कुछ उत्तर नदारद है रमेश तोरावत जैन अकोला दिनांक.. 9.4.2025 स्कूली दिनों की शुरुआत थी.. शायद पहली कक्षा में ही पढ़ता था.. एक दिन दोपहर में कक्षा की खिड़की के बाहर देखा.. कक्षा ऊपर दूसरी तीसरी मंजिल पर थी और वहां से बाहर के घर और आंगन दिखते थे.. एक आंगन में दो तीन लोग मिलकर एक बकरी का गला काट रहे थे.. मेरी चीख निकल गयी.. उल्टियां शुरू हो गयी.. माँ बताती थी कि मैं दो दिन तक बुखार में तपता रहा.. मेरा नन्हा मासूम मन रोता रहा, तड़फता रहा. उम्र के पहले चरण में मुझे अहिंसा का ज्ञान नही था.. धर्म नही समझता था.. कभी किसी ने बताया भी नही की हत्या करना गुनाह है.. मगर मैं बेचैन हुआ.. बुरा लगा.. ऐसा क्यो हुआ..? नन्ही सी उम्र में क्यो महसूस हुआ कि ये गलत है.. जिन विषयो पर कभी चर्चा के हालात न बने फिर भी मेरी अंर्तआत्मा ने उसे सिरे नकारा.. उसे गलत समझा.. क्या वजह रही होंगी इसकी.. उत्तर नदारद है. बाबुजी का व्यापार मेहकर में था और मैं अकोला में मामाजी के पास पढ़ता था.. छठवीं कक्षा का पूरा समय मामाजी परिवार के साथ ही बिताया.. दिनभर खूब मस्ती करता था.. नए नए कुछ दोस्त बने.. भाषा अभद्र और घटिया हो गयी थी.. एक दिन बाबुजी मेहकर से आये.. मैं मामाजी के पास गया और उन से पूछा मेरा बाप आया है न..? कहा है..? अपने पिता के सम्बोधन मे बाप सुन मामाजी की आंखे गुस्से में बड़ी हो गई.. मुझे उनके गुस्से का कोई तुक समझ मे नही आया क्योकि बकौल मेरी समझ मे मैने कुछ गलत कहा ही नही था.. मेरे साथ के सब बच्चे अपने पिताजी को बाप ओर बुड्डा ही कहते थे.. मैने फिर क्या गलत कह दिया जो मामाजी नाराज हो रहे थे.. मामाजी ने एक ही वाक्य कहा.. गया लड़का हाथ से.. काफी दिनों बाद मुझे मेरी भाषा के स्तर का भान हुआ.. मैने बाबुजी को बहुत ही घटिया अंदाज में बाप कहा.. कौंन बाप कहता है हमारे सभ्य समाज मे पिता को.. संगी साथियों की भाषा मुझ पर हावी थी.. मैं भूल गया था कि मैं एक सभ्य परिवार का हिस्सा हु.. बच्चा हु.. सोहबत क्या क्या गुल खिलाती है आगे और प्रसंग बाकी है.. मगर अभी दूसरा किस्सा बया करते हैं. पढ़ने में रुचि तो बहुत छोटी सी उम्र में लग गयी थी ( स्कूली पढ़ाई की बात नही करता हु साहेब ) कॉमिक्स, उपन्यास आदि मैं खूब पढ़ता था.. गुलशन नंदा के एक उपन्यास में कथा नायक कुछ अवसाद की स्थिति में बैठा है.. वही पास में एक जगह से चींटियां निकल रही है.. जैसे ही चींटी आती है वह चप्पल से मार देता है.. ऐसा वह लगातार कई बार करता और कई चींटियों को मार देता है.. उन दिनों मेरी उम्र तेरह साल थी.. वही घटनाक्रम मैने भी दोहराया.. चींटीया एक जगह से निकल रही थी.. उन्होंने मेरा कुछ नही बिगाड़ा था मगर फिर भी मैं एक पत्थर से उन्हें मारने लगा.. पहली चींटी मारने के बाद मन मे विचार आया कि एक चींटी को मार कर पाप तो कर दिया है सो पाप तो लगेगा तो ओर चींटियां मारते हैं.. तीन चार चींटी ओर मारी गयी मेरे हाथों.. मन मे थोड़ा दुःख हुआ कि गलत किया है मगर बहुत अधिक कुछ हाहाकार मन मे नही मचा.. बकरी की हत्या देख पागल हो जाने वाला मैं खुद हत्या कर शर्मिंदगी महसूस नही कर रहा था.. पता ही नही चल रहा है कि ये क्योंकर हुआ..? जैन होने का अहसास था.. पता था कि ये गलत कर रहा हु मगर फिर भी रुका नही.. क्यो किया मैने..? किस ने कराया मुझ से..? उपन्यास का कथानक चींटियां देख अचानक आंखों के सामने चलने लगा.. नायक चींटियां मारे जा रहा है.. वह नायक मुझ में क्यो आया..? क्या कर बैठा मैं..? क्यो कर बैठा..? उत्तर कब मिलेगा मुझे..? जासूसी उपन्यास भी बहुत पढ़ता था.. जासूसी उपन्यासों में होटलों के नाम अंग्रेजी में होते हैं और वे नाम मुझे बहुत लुभाते है.. उपन्यास में अंग्रेजी नाम की होटल हमारे शहर में भी थी.. उपन्यास में होटल आलीशान होती है और यह हमारे शहर में छोटी होटल मगर नाम बहुत बड़ा.. यह भी थोड़ी समझ और थोड़ी नासमझी का दौर था.. मित्र के साथ तय हुआ कि आज इस होटल में भोजन किया जाए.. हम दोनों होटल में गए.. वेटर ऑर्डर लेने आया.. हम ने कहा भोजन में क्या क्या है तो वह फर्राटे से दस बीस नाम बोल गया और सब के सब मांस से बने हुए.. मुझे तो सांप सूंघ गया.. है भगवान हम लोग कहा आ गए.. दोनो दौड़कर बाहर भागे.. बाहर आकर इधर उधर नजरे घुमाई की कही कोई हमे देख तो नही रहा है जो इस होटल से हम निकले.. देखता तो पक्का वह सब को बता देता की देखो जैनियो के बच्चो ने भी मुर्ग मसल्लम खाना शुरू कर दिया है.. भगवान का शुक्र की किसी ने नही देखा.. हम बड़े हैरान की इतना अच्छा होटल का नाम और अंदर मांस बेचता है..! अब हम बड़े हो गए थे.. समझदार भी.. मित्र वही था जो उस दिन होटल में था.. तब फेकने गपोड़े के दिन थे.. हम दोनों स्वयं एक दूजे से बड़ा और श्रेष्ठ दिखाते थे.. मैं अपनी बहादुरी की डींगें मारता था तो वह किसी ओर चीज में स्वयं को आगे बताता था.. एक दिन उस ने मुझ से मेरी बहादुरी सिद्ध करने के लिए एक तंदुरुस्त लड़के से लड़ने को मुझे उकसाया.. मैने हामी भरी ओर तय समय पर उस तंदुरुस्त लड़के को लड़ाई में हरा आया.. फिर मैंने उसे चुनौती दी कि तू अब क्या कर सकता..? वह बोला वह मटन खा सकता है.. मैं हैरान रह गया कि शाकाहारी परिवार का मेरा मित्र कैसी बात कर रहा है.. मैने कहा ये अपना काम नही है बाबू तो वह बोला चल लगा ले शर्त.. मैं खा सकता हु.. ओर वह शर्त जीत गया.. मांस खा गया.. मैं काफी दिन उस से नाराज रहा कि वह किस कदर उतार पर है.. उसे क्या खाना क्या नही खाना की समझ ही नही.. उसकी संगत मेरे साथ थी फिर भी वह ईस कदर बिगड़ गया था कि संस्कारो को दफन करने लगा था. अपने जीवन के पन्नो को पलटता हु तो किस्से कई और भी नजर आते हैं.. कुछ प्रसंग संस्कारो की पैरवी करते हैं और कुछ किस्से संस्कारो को चिता के हवाले करते हैं.. मैं पेशोपेश में पड़ जाता हूं कि इन्हें कैसे तोलू..? अगर पूर्व जन्म के संस्कार ही इस जीवन के आधार है तो चींटियों को कैसे मार सकता है कोई..? सोहबत का असर भी होता है तो फिर मांस खाने मनाही कैसे..? जीवन यात्रा एक पहेली है.. कभी कोई निश्चित ठाह नही.. कोई निश्चित सिद्धान्त नही.. सब दौड़े जा रहे हैं.. दिशा का ज्ञान नही.. किसी की पूंछ पकड़ उसे अंतिम सत्य समझ लेते हैं.. अपने सत्य के लिए मेहनत नही करते हैं.. गढ़े हुए नियमो को जीवन समझते हैं.. अनसुलझी जीवन की ये पहली शायद ही कभी सुलझेंगी.. किसी के पास दिशा नही है.. किसी के पास सत्य को स्वीकार करने की शक्ति नही.. खूब पोथियाँ लिखी गयी बाँची गयी.. पल्ले कुछ पड़ा नही.. अनेक अनेक धन्यवाद. रमेश तोरावत जैन अकोला Mob 9028371436 2026-04-09 19:29:27
72943 40449751 Akola Vishistashri Mataji Vihar कुछ उत्तर नदारद है रमेश तोरावत जैन अकोला दिनांक.. 9.4.2025 स्कूली दिनों की शुरुआत थी.. शायद पहली कक्षा में ही पढ़ता था.. एक दिन दोपहर में कक्षा की खिड़की के बाहर देखा.. कक्षा ऊपर दूसरी तीसरी मंजिल पर थी और वहां से बाहर के घर और आंगन दिखते थे.. एक आंगन में दो तीन लोग मिलकर एक बकरी का गला काट रहे थे.. मेरी चीख निकल गयी.. उल्टियां शुरू हो गयी.. माँ बताती थी कि मैं दो दिन तक बुखार में तपता रहा.. मेरा नन्हा मासूम मन रोता रहा, तड़फता रहा. उम्र के पहले चरण में मुझे अहिंसा का ज्ञान नही था.. धर्म नही समझता था.. कभी किसी ने बताया भी नही की हत्या करना गुनाह है.. मगर मैं बेचैन हुआ.. बुरा लगा.. ऐसा क्यो हुआ..? नन्ही सी उम्र में क्यो महसूस हुआ कि ये गलत है.. जिन विषयो पर कभी चर्चा के हालात न बने फिर भी मेरी अंर्तआत्मा ने उसे सिरे नकारा.. उसे गलत समझा.. क्या वजह रही होंगी इसकी.. उत्तर नदारद है. बाबुजी का व्यापार मेहकर में था और मैं अकोला में मामाजी के पास पढ़ता था.. छठवीं कक्षा का पूरा समय मामाजी परिवार के साथ ही बिताया.. दिनभर खूब मस्ती करता था.. नए नए कुछ दोस्त बने.. भाषा अभद्र और घटिया हो गयी थी.. एक दिन बाबुजी मेहकर से आये.. मैं मामाजी के पास गया और उन से पूछा मेरा बाप आया है न..? कहा है..? अपने पिता के सम्बोधन मे बाप सुन मामाजी की आंखे गुस्से में बड़ी हो गई.. मुझे उनके गुस्से का कोई तुक समझ मे नही आया क्योकि बकौल मेरी समझ मे मैने कुछ गलत कहा ही नही था.. मेरे साथ के सब बच्चे अपने पिताजी को बाप ओर बुड्डा ही कहते थे.. मैने फिर क्या गलत कह दिया जो मामाजी नाराज हो रहे थे.. मामाजी ने एक ही वाक्य कहा.. गया लड़का हाथ से.. काफी दिनों बाद मुझे मेरी भाषा के स्तर का भान हुआ.. मैने बाबुजी को बहुत ही घटिया अंदाज में बाप कहा.. कौंन बाप कहता है हमारे सभ्य समाज मे पिता को.. संगी साथियों की भाषा मुझ पर हावी थी.. मैं भूल गया था कि मैं एक सभ्य परिवार का हिस्सा हु.. बच्चा हु.. सोहबत क्या क्या गुल खिलाती है आगे और प्रसंग बाकी है.. मगर अभी दूसरा किस्सा बया करते हैं. पढ़ने में रुचि तो बहुत छोटी सी उम्र में लग गयी थी ( स्कूली पढ़ाई की बात नही करता हु साहेब ) कॉमिक्स, उपन्यास आदि मैं खूब पढ़ता था.. गुलशन नंदा के एक उपन्यास में कथा नायक कुछ अवसाद की स्थिति में बैठा है.. वही पास में एक जगह से चींटियां निकल रही है.. जैसे ही चींटी आती है वह चप्पल से मार देता है.. ऐसा वह लगातार कई बार करता और कई चींटियों को मार देता है.. उन दिनों मेरी उम्र तेरह साल थी.. वही घटनाक्रम मैने भी दोहराया.. चींटीया एक जगह से निकल रही थी.. उन्होंने मेरा कुछ नही बिगाड़ा था मगर फिर भी मैं एक पत्थर से उन्हें मारने लगा.. पहली चींटी मारने के बाद मन मे विचार आया कि एक चींटी को मार कर पाप तो कर दिया है सो पाप तो लगेगा तो ओर चींटियां मारते हैं.. तीन चार चींटी ओर मारी गयी मेरे हाथों.. मन मे थोड़ा दुःख हुआ कि गलत किया है मगर बहुत अधिक कुछ हाहाकार मन मे नही मचा.. बकरी की हत्या देख पागल हो जाने वाला मैं खुद हत्या कर शर्मिंदगी महसूस नही कर रहा था.. पता ही नही चल रहा है कि ये क्योंकर हुआ..? जैन होने का अहसास था.. पता था कि ये गलत कर रहा हु मगर फिर भी रुका नही.. क्यो किया मैने..? किस ने कराया मुझ से..? उपन्यास का कथानक चींटियां देख अचानक आंखों के सामने चलने लगा.. नायक चींटियां मारे जा रहा है.. वह नायक मुझ में क्यो आया..? क्या कर बैठा मैं..? क्यो कर बैठा..? उत्तर कब मिलेगा मुझे..? जासूसी उपन्यास भी बहुत पढ़ता था.. जासूसी उपन्यासों में होटलों के नाम अंग्रेजी में होते हैं और वे नाम मुझे बहुत लुभाते है.. उपन्यास में अंग्रेजी नाम की होटल हमारे शहर में भी थी.. उपन्यास में होटल आलीशान होती है और यह हमारे शहर में छोटी होटल मगर नाम बहुत बड़ा.. यह भी थोड़ी समझ और थोड़ी नासमझी का दौर था.. मित्र के साथ तय हुआ कि आज इस होटल में भोजन किया जाए.. हम दोनों होटल में गए.. वेटर ऑर्डर लेने आया.. हम ने कहा भोजन में क्या क्या है तो वह फर्राटे से दस बीस नाम बोल गया और सब के सब मांस से बने हुए.. मुझे तो सांप सूंघ गया.. है भगवान हम लोग कहा आ गए.. दोनो दौड़कर बाहर भागे.. बाहर आकर इधर उधर नजरे घुमाई की कही कोई हमे देख तो नही रहा है जो इस होटल से हम निकले.. देखता तो पक्का वह सब को बता देता की देखो जैनियो के बच्चो ने भी मुर्ग मसल्लम खाना शुरू कर दिया है.. भगवान का शुक्र की किसी ने नही देखा.. हम बड़े हैरान की इतना अच्छा होटल का नाम और अंदर मांस बेचता है..! अब हम बड़े हो गए थे.. समझदार भी.. मित्र वही था जो उस दिन होटल में था.. तब फेकने गपोड़े के दिन थे.. हम दोनों स्वयं एक दूजे से बड़ा और श्रेष्ठ दिखाते थे.. मैं अपनी बहादुरी की डींगें मारता था तो वह किसी ओर चीज में स्वयं को आगे बताता था.. एक दिन उस ने मुझ से मेरी बहादुरी सिद्ध करने के लिए एक तंदुरुस्त लड़के से लड़ने को मुझे उकसाया.. मैने हामी भरी ओर तय समय पर उस तंदुरुस्त लड़के को लड़ाई में हरा आया.. फिर मैंने उसे चुनौती दी कि तू अब क्या कर सकता..? वह बोला वह मटन खा सकता है.. मैं हैरान रह गया कि शाकाहारी परिवार का मेरा मित्र कैसी बात कर रहा है.. मैने कहा ये अपना काम नही है बाबू तो वह बोला चल लगा ले शर्त.. मैं खा सकता हु.. ओर वह शर्त जीत गया.. मांस खा गया.. मैं काफी दिन उस से नाराज रहा कि वह किस कदर उतार पर है.. उसे क्या खाना क्या नही खाना की समझ ही नही.. उसकी संगत मेरे साथ थी फिर भी वह ईस कदर बिगड़ गया था कि संस्कारो को दफन करने लगा था. अपने जीवन के पन्नो को पलटता हु तो किस्से कई और भी नजर आते हैं.. कुछ प्रसंग संस्कारो की पैरवी करते हैं और कुछ किस्से संस्कारो को चिता के हवाले करते हैं.. मैं पेशोपेश में पड़ जाता हूं कि इन्हें कैसे तोलू..? अगर पूर्व जन्म के संस्कार ही इस जीवन के आधार है तो चींटियों को कैसे मार सकता है कोई..? सोहबत का असर भी होता है तो फिर मांस खाने मनाही कैसे..? जीवन यात्रा एक पहेली है.. कभी कोई निश्चित ठाह नही.. कोई निश्चित सिद्धान्त नही.. सब दौड़े जा रहे हैं.. दिशा का ज्ञान नही.. किसी की पूंछ पकड़ उसे अंतिम सत्य समझ लेते हैं.. अपने सत्य के लिए मेहनत नही करते हैं.. गढ़े हुए नियमो को जीवन समझते हैं.. अनसुलझी जीवन की ये पहली शायद ही कभी सुलझेंगी.. किसी के पास दिशा नही है.. किसी के पास सत्य को स्वीकार करने की शक्ति नही.. खूब पोथियाँ लिखी गयी बाँची गयी.. पल्ले कुछ पड़ा नही.. अनेक अनेक धन्यवाद. रमेश तोरावत जैन अकोला Mob 9028371436 2026-04-09 19:29:26
72942 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन 2026-04-09 19:29:18
72941 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन 2026-04-09 19:29:17
72939 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन 2026-04-09 19:29:16
72940 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन 2026-04-09 19:29:16