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229070 40449699 3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) 2026-06-14 09:03:22
229067 40449749 जिनोदय?JINODAYA ??????? ?????जयपुर? 2026-06-14 09:03:03
229068 40449749 जिनोदय?JINODAYA ??????? ?????जयपुर? 2026-06-14 09:03:03
229065 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ### *"धर्मात्मा आत्मा के आश्रय से सुखी है - श्री स्वामी जी"* ### *"शान्ति और आनन्द से परिपूर्ण भरा ज्ञायक मैं हूँ - पारसमणी"* #### *1. सच्चा सुखी कौन? - जिसके पास "मैं" है* *तस्वीर का सार एक वाक्य में*: _अहो! आत्मा आनन्दस्वभाव से परिपूर्ण है - ऐसे आत्मा की ओर देखे तो दुःख है ही कहाँ?_ *दुनिया का हिसाब*: _बंगला, बैंक बैलेंस, पद, प्रतिष्ठा = सुखी_। _शरीर बीमार, ब्रह्मांड पलट जाए = दुःखी_। *धर्मात्मा का हिसाब*: _भले शरीर का चाहे जो हो, ब्रह्मांड पलट जाए_ → _मेरी शांति-मेरा आनंद आत्मा के ही आश्रित है_। _कल पढ़ा न? स्वकी अस्ति में परकी नास्ति_। _जब "मैं ज्ञायक हूँ" का आश्रय ले लिया_ → _बाहर क्या हुआ, इससे फर्क ही नहीं पड़ता_। #### *2. सुख बाहर नहीं, स्व-आश्रित है - यही निज वैभव है* *श्री स्वामी जी बोल रहे हैं*: _मैं अपने आनंद-सागर में डुबकी लगाकर लीन हुआ_। _वहाँ मेरी शांति में विघ्न डालने वाला जगत में कोई नहीं है_। *क्यों नहीं है विघ्न डालने वाला?* _क्योंकि दुःख आता है पर-आश्रय से_। _"इसने बुरा कहा इसलिए दुःख"_, _"नुकसान हो गया इसलिए दुःख"_। _स्व-आश्रय = "मैं ज्ञायक हूँ, शांत हूँ, आनंद हूँ"_ → _यहाँ कोई विघ्न डाल ही नहीं सकता_। _कल पढ़ा: जब उपयोग स्वभाव में लगे तो विभाव अपने आप हट जाएं_। _स्वभाव = आनंद_। _उपयोग लगा = सुख प्रकट_। #### *3. "शान्ति और आनन्द से परिपूर्ण भरा ज्ञायक मैं हूँ"* *पारसमणी का वचन - पक्का निर्णय*: *_खाली नहीं हूँ, भरा हुआ हूँ_। _किससे भरा?_ _शांति से, आनंद से, ज्ञान-दर्शन से_।* _कमी किसकी?_ _किसी की नहीं_। _परद्रव्य की जरूरत ही नहीं_। _वो सुख कहाँ है?_ _बाहर स्वर्ग में नहीं_ → _तेरे ज्ञायक स्वभाव में_। ### *आज का 10 मिनट का "स्व-आश्रय" प्रयोग* *जब दुःख, टेंशन, अशांति आए, तुरंत ये 3 बात भासो*: *1. "अहो! मैं आनंदस्वभाव से परिपूर्ण हूँ"* *2. "भले शरीर का चाहे जो हो, मेरी शांति आत्मा के आश्रित है"* *3. "मेरा आनंद-सागर मैं खुद हूँ, इसमें डुबकी लगाता हूँ"* _बस 10 मिनट स्व में टिके_ → _बाहर की सृष्टि वही रहेगी, पर तुम्हारी सृष्टि शांत हो जाएगी_। ### *सार: 10 दिन की माला का मुकुट* _1. दृष्टि बदली_ → _2. निश्चय प्रतिक्रमण किया_ → _3. उपयोग स्वभाव में लगाया_ → _4. आज: आत्म-आश्रय से सुखी हुए_ _पहले हम सुख ढूंढते थे_ → _अब हम मै सुख हैं_। _पहले शांति मांगते थे_ → _अब शांति हम में हैं_। _धर्मात्मा वो नहीं जो मंदिर जाता है_। _धर्मात्मा वो है जो आत्मा के आश्रय जीता है_। _आत्मा को कभी मत बेचना - न सुख के लिए, न शांति के लिए_। _क्योंकि आत्मा खुद आनंदस्वभाव ही है - उसका आश्रय ले लो, बस सुखी हो जाओ_। _पूर्णता के लक्ष से ही धर्म की शुरुआत होती है_। *_स्वयंकी ओर देखते हुये स्वयंमें मग्न हुआ वही सच्चा निज-दर्शन हैं_ ?* *स्वाध्याय परम निर्दोष तप है। आज दिन भर एक ही धुन: "मैं ज्ञायक हूँ, मैं आनंद हूँ, मैं सुखी हूँ"* ?✨ *सर्वज्ञ शासन जयवंत वर्ते* *शुद्ध आगम वाणी* 2026-06-14 09:02:56
229066 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ### *"धर्मात्मा आत्मा के आश्रय से सुखी है - श्री स्वामी जी"* ### *"शान्ति और आनन्द से परिपूर्ण भरा ज्ञायक मैं हूँ - पारसमणी"* #### *1. सच्चा सुखी कौन? - जिसके पास "मैं" है* *तस्वीर का सार एक वाक्य में*: _अहो! आत्मा आनन्दस्वभाव से परिपूर्ण है - ऐसे आत्मा की ओर देखे तो दुःख है ही कहाँ?_ *दुनिया का हिसाब*: _बंगला, बैंक बैलेंस, पद, प्रतिष्ठा = सुखी_। _शरीर बीमार, ब्रह्मांड पलट जाए = दुःखी_। *धर्मात्मा का हिसाब*: _भले शरीर का चाहे जो हो, ब्रह्मांड पलट जाए_ → _मेरी शांति-मेरा आनंद आत्मा के ही आश्रित है_। _कल पढ़ा न? स्वकी अस्ति में परकी नास्ति_। _जब "मैं ज्ञायक हूँ" का आश्रय ले लिया_ → _बाहर क्या हुआ, इससे फर्क ही नहीं पड़ता_। #### *2. सुख बाहर नहीं, स्व-आश्रित है - यही निज वैभव है* *श्री स्वामी जी बोल रहे हैं*: _मैं अपने आनंद-सागर में डुबकी लगाकर लीन हुआ_। _वहाँ मेरी शांति में विघ्न डालने वाला जगत में कोई नहीं है_। *क्यों नहीं है विघ्न डालने वाला?* _क्योंकि दुःख आता है पर-आश्रय से_। _"इसने बुरा कहा इसलिए दुःख"_, _"नुकसान हो गया इसलिए दुःख"_। _स्व-आश्रय = "मैं ज्ञायक हूँ, शांत हूँ, आनंद हूँ"_ → _यहाँ कोई विघ्न डाल ही नहीं सकता_। _कल पढ़ा: जब उपयोग स्वभाव में लगे तो विभाव अपने आप हट जाएं_। _स्वभाव = आनंद_। _उपयोग लगा = सुख प्रकट_। #### *3. "शान्ति और आनन्द से परिपूर्ण भरा ज्ञायक मैं हूँ"* *पारसमणी का वचन - पक्का निर्णय*: *_खाली नहीं हूँ, भरा हुआ हूँ_। _किससे भरा?_ _शांति से, आनंद से, ज्ञान-दर्शन से_।* _कमी किसकी?_ _किसी की नहीं_। _परद्रव्य की जरूरत ही नहीं_। _वो सुख कहाँ है?_ _बाहर स्वर्ग में नहीं_ → _तेरे ज्ञायक स्वभाव में_। ### *आज का 10 मिनट का "स्व-आश्रय" प्रयोग* *जब दुःख, टेंशन, अशांति आए, तुरंत ये 3 बात भासो*: *1. "अहो! मैं आनंदस्वभाव से परिपूर्ण हूँ"* *2. "भले शरीर का चाहे जो हो, मेरी शांति आत्मा के आश्रित है"* *3. "मेरा आनंद-सागर मैं खुद हूँ, इसमें डुबकी लगाता हूँ"* _बस 10 मिनट स्व में टिके_ → _बाहर की सृष्टि वही रहेगी, पर तुम्हारी सृष्टि शांत हो जाएगी_। ### *सार: 10 दिन की माला का मुकुट* _1. दृष्टि बदली_ → _2. निश्चय प्रतिक्रमण किया_ → _3. उपयोग स्वभाव में लगाया_ → _4. आज: आत्म-आश्रय से सुखी हुए_ _पहले हम सुख ढूंढते थे_ → _अब हम मै सुख हैं_। _पहले शांति मांगते थे_ → _अब शांति हम में हैं_। _धर्मात्मा वो नहीं जो मंदिर जाता है_। _धर्मात्मा वो है जो आत्मा के आश्रय जीता है_। _आत्मा को कभी मत बेचना - न सुख के लिए, न शांति के लिए_। _क्योंकि आत्मा खुद आनंदस्वभाव ही है - उसका आश्रय ले लो, बस सुखी हो जाओ_। _पूर्णता के लक्ष से ही धर्म की शुरुआत होती है_। *_स्वयंकी ओर देखते हुये स्वयंमें मग्न हुआ वही सच्चा निज-दर्शन हैं_ ?* *स्वाध्याय परम निर्दोष तप है। आज दिन भर एक ही धुन: "मैं ज्ञायक हूँ, मैं आनंद हूँ, मैं सुखी हूँ"* ?✨ *सर्वज्ञ शासन जयवंत वर्ते* *शुद्ध आगम वाणी* 2026-06-14 09:02:56
229063 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 1 *प्रमाद अर्थात आत्मा का घात।* 2 *टालने वाले मोह को मार नहीं पाते।* 3 *दवा की जरूरत असावधान लोगों को पड़ती है।* 4 *आत्मा की खबर पड़ना महाभाग्य है।* 5 *असावधानी अर्थात चोर की आगवानी।* 6 *दूसरे की चिंता अर्थात व्यर्थ का विकल्प।* 7 *राग की आग को न भड़काना हो तो विषयों से दूर रहो।* 8 *बुरा चाहना अर्थात बुरे वक्त को बुलाना।* 9 *अच्छाई और बुराई ये है आपकी पुरानी कमाई।* 10 *करनी का फल ही फलता है।*       (श्रेणिक जैन जबलपुर 14-6-26) 2026-06-14 09:02:54
229064 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 1 *प्रमाद अर्थात आत्मा का घात।* 2 *टालने वाले मोह को मार नहीं पाते।* 3 *दवा की जरूरत असावधान लोगों को पड़ती है।* 4 *आत्मा की खबर पड़ना महाभाग्य है।* 5 *असावधानी अर्थात चोर की आगवानी।* 6 *दूसरे की चिंता अर्थात व्यर्थ का विकल्प।* 7 *राग की आग को न भड़काना हो तो विषयों से दूर रहो।* 8 *बुरा चाहना अर्थात बुरे वक्त को बुलाना।* 9 *अच्छाई और बुराई ये है आपकी पुरानी कमाई।* 10 *करनी का फल ही फलता है।*       (श्रेणिक जैन जबलपुर 14-6-26) 2026-06-14 09:02:54
229061 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ??????? ?????जयपुर? 2026-06-14 09:01:57
229062 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ??????? ?????जयपुर? 2026-06-14 09:01:57
229059 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म ??????? ?????जयपुर? 2026-06-14 09:01:30