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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Phone
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Message
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Status
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Date |
View |
| 81808 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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Jai Jinender ? |
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2026-04-13 08:10:31 |
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| 81807 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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Jai Jinender ? |
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2026-04-13 08:10:29 |
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| 81806 |
48340398 |
???गुरु भगवान??? |
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सपरिवार को मंगलमय आशीर्वाद |
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2026-04-13 08:09:54 |
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| 81805 |
48340398 |
???गुरु भगवान??? |
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सपरिवार को मंगलमय आशीर्वाद |
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2026-04-13 08:09:53 |
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| 81804 |
40449666 |
निर्यापक समय सागर जी भक्त |
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?Jay Jinedra ? 1 *दिखावा में आनंद नहीं होता है अतः सहज रहिए।* 2 *प्रभावना के लिए हृदय बड़ा चाहिए।* 3 *परिग्रह व्यक्ति को उलझाकर रखता है।* 4 *कषाय की उपस्थिति ही दुख देती है।* 5 *मोह सुख के नाम पर धोखा देता है सुख नहीं।* 6 *ज्ञान बहुत सुकून देता है अतः अपना ज्ञान व्यवस्थित करो।* 7 *सफलता अहंकार के लिए नहीं,कषाय विकार मिटाने के लिए होती है।* 8 *पद के भूखे लोग हित के लिए नहीं पद के लिए का कार्य करते हैं।* 9 *दुर्भावना से न तो आराधना होती है और न ही प्रभावना।* 10 *काम लड़ने से नहीं प्रेम और सौह... <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1184071057?utm_source=android_post_share_web&referral_code=JBHJP&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=PENDING" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1184071057?utm_source=android_post_share_web&referral_code=JBHJP&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=PENDING</a> |
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2026-04-13 08:09:31 |
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| 81803 |
40449666 |
निर्यापक समय सागर जी भक्त |
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?Jay Jinedra ? 1 *दिखावा में आनंद नहीं होता है अतः सहज रहिए।* 2 *प्रभावना के लिए हृदय बड़ा चाहिए।* 3 *परिग्रह व्यक्ति को उलझाकर रखता है।* 4 *कषाय की उपस्थिति ही दुख देती है।* 5 *मोह सुख के नाम पर धोखा देता है सुख नहीं।* 6 *ज्ञान बहुत सुकून देता है अतः अपना ज्ञान व्यवस्थित करो।* 7 *सफलता अहंकार के लिए नहीं,कषाय विकार मिटाने के लिए होती है।* 8 *पद के भूखे लोग हित के लिए नहीं पद के लिए का कार्य करते हैं।* 9 *दुर्भावना से न तो आराधना होती है और न ही प्रभावना।* 10 *काम लड़ने से नहीं प्रेम और सौह... <a href="https://primetrace.com/group/7374/post/1184071057?utm_source=android_post_share_web&referral_code=JBHJP&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=PENDING" target="_blank">https://primetrace.com/group/7374/post/1184071057?utm_source=android_post_share_web&referral_code=JBHJP&utm_screen=post_share&utm_referrer_state=PENDING</a> |
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2026-04-13 08:09:30 |
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| 81802 |
40449660 |
Acharya PulakSagarji 07 |
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2026-04-13 08:09:27 |
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| 81801 |
40449660 |
Acharya PulakSagarji 07 |
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2026-04-13 08:09:26 |
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| 81799 |
40449696 |
?? श्री सम्मेद शिखर जी ?? |
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*मेरी भावना*
*जिसने रागद्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया।*
*सब जीवों को मोक्षमार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया॥*
*बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो।*
*भक्ति भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो॥ 1॥*
*भावार्थ -* _जिस महात्मा ने राग-द्वेष, कामराज आदि आत्मा के जो भयंकर शत्रु है, कालिमा लगाने वाला है एवं क्रश करने वाला है तथा संसार रूपी दावानल में रुलाने वाला है ऐसे महान् कर्म रूपी शत्रुओं को जिसने जीत लिया है और सारे लोकालोक को जान लिया है वैसे महात्मा सिद्धि के पात्र साधुओं ने नि:स्पृह नि:सार्थ भावना से जगत के त्रस्त एवं भव्य जीवों को आकुलित एवं करुणा भाव से उनकी सर्व सिद्धि के लिए कुछ सन्मार्ग के लिए उपदेश दिया है और देते हैं ऐसे महात्माओं का जो भी नाम हो चाहे बुद्ध हो, महावीर हो, हरि हो, हरि हर हो, ब्रह्म हो, विष्णु हो, अल्लाह हो, गॉड हो, शंकर हो, राम हो, कृष्णा हो एवं सिद्धि प्राप्ति के योग्य हो और उसके आधीन हो, भक्ति भाव से प्रेरित हो तथा अपना चित्त भव्य जीवों के कल्याण में ही हो किसी न किसी उपाय से भव्य जीवों का कल्याण हो।_
*विषयों की आशा नहिं,* *जिनके साम्य भाव धन रखते हैं।*
*निज पर के हित साधन में जो, निशदिन तत्पर रहते हैं।*
*स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं।*
*ऐसे ज्ञानी साधु जगत के, दुख समूह को हरते हैं॥ 2॥*
*भावार्थ -* _विषयों की आशा नहीं जिसको एवं विश्व के समस्त प्राणी मात्र पर साम्य भाव (समता) रखते हैं चाहे शत्रु हो या मित्र हो, ऐसे साधु जो हमेशा स्व के और पर के कल्याण में ही निरंतर तत्पर रहते हैं स्वार्थ एवं सांसारिक सुखों से अलिप्त रहने की महान् कठिन तपस्या बिना खेद तथा संपूर्ण समता भाव से सहन करते हैं जो आत्मा की महान् शक्ति का सदुपयोग संसार में गिरे हुए, पतित हुए एवं सांसारिक दुखों को जिसने जान लिया है जो भवचक्र में जैसे पशु कभी पक्षी, नरक, स्वर्ग के सुख भी नाशवंत है ऐसे त्रस्त हुए भव्य प्राणियों का दुःख को दूर करके सद्गति को जैसे गिरे हुए को उतारने वाले, पतित को पावन करने वाले ऐसे नि:स्वार्थ साधु भी जगत के प्राणियों के दुखों को हर सकते हैं, हरते हैं । तो ऐसे संत पुरुषों-महात्माओं की वाणी सुनने की अभिलाषा रख करके सुनो गुनो,मनन करो एवं उसका आचरण करो, उनके शब्दों पर चलने का प्रयास करो ।_
*रहे सदा सत्संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं का नित्य रहे।*
*उन ही जैसी चर्या में यह, चित्त सदा अनुरक्त रहे॥*
*नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नहीं कहा करूँ ।*
*परधन वनिता पर न लुभाऊँ , संतोषामृत पिया करूँ॥ 3॥*
*भावार्थ -* _जैसे साधुओं की संगति करने का भाव करके उनके समीप रहने का प्रयास करूं,ऐसे महान आत्माओं का सत् संगति करने से ही मेरी आत्मा को उन्हीं का जैसा बनाने का मौका प्राप्त करूं जो भव बंधनों से छुड़ाने वाला है । सत्संगति से ही सत् ज्ञान एवं सत् चारित्र की प्राप्ति होती है, तो ऐसे ज्ञानी ध्यानी आत्माओं की सत्संगति करने का भाव मेरे में अहर्निश रहे, ऐसा जो भव्य जीव सांसारिक नाशवंत सुख जो है और शाश्वत सुखों की प्राप्ति के लिए इन महान् पुरुषों जैसी चर्या आचरण करूं, दूराचारों से दूर रहकर एवं कभी किसी प्रकार से सताने का भाव कभी भी मेरे मन में ना लाऊं तथा कभी भी स्वार्थ के वश होकर झूठ हंसी मजाक में न बोलूं तथा पराया धन, पराई स्त्री पर मेरा मन किंचित मात्र भी आकर्षित न हो तथा सभी प्रकार से संतोषामृत पिया करूं- यही मेरी भावना और अहर्निश रहे।_
*अहंकार का भाव न रक्खूँ, नहीं किसी पर क्रोध करूँ ।*
*देख दूसरों की बढ़ती को, कभी न ईर्ष्या -भाव धरूँ॥*
*रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करूँ।*
*बने जहाँ तक इस जीवन में, औरों का उपकार करूँ ॥ 4॥*
*भावार्थ -* _अहंकार का भाव मन में कदापि नहीं लाऊं,ना किसी पर क्रोध करूं और दूसरों की बढ़ती को देखकर कभी ईर्ष्या भावना मैं मन में कदापि नहीं लाऊं एवं मेरी भावना हमेशा के लिए सरल एवं सत्य व्यवहार विश्व के हर प्राणी पर रहे । जहां तक बन सके वहां तक दूसरे प्राणी पर उपकार करने की भावना हमेशा रहा करें, उसमें किसी प्रकार के बदले की भावना किंचित मात्र भी न रहे।_
*मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे।*
*दीन-दुखी जीवों पर मेरे उर से करुणा स्रोत बहे॥*
*दुर्जन क्रूर - कुमार्गरतों पर, क्षोभ नहीं मुझको आवे।*
*साम्यभाव रक्खूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे॥ 5॥*
*भावार्थ -* _मेरी मैत्री भावना विश्व के सभी प्राणियों, मनुष्यों समेत सभी पर सदा एक समान रहे तथा दिन दुःखी जीवों पर मेरे हृदय से करुणा रूपी झरना बहा करें, ऐसी हमेशा भावना बनी रहे तथा कोई दुर्जन हो या सज्जन, कुमार्गी हो, ऐसे सभी जीवों पर समान भाव एवं अंश मात्र भी क्षोभ नहीं आवे, सभी पर समभाव रहे, ऐसी परिणति मेरी सदा के लिए हो।_
*गुणीजनों को देख हृदय में, मेरे प्रेम उमड़ आवे।*
*बने जहाँ तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे॥*
*होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे।*
*गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे॥ 6॥*
*भावार्थ -* _गुणीजनों को देखते ही मेरे मन में हर्षोल्लाह से हृदय गदगद होवे एवं प्रेम की मन में एक लहर प्रगट हो फिर जहां तक हो उनकी सेवा सुश्रुषा करके यह मन अत्यंत सुखों का अनुभव करें, हो नहीं कृतध्न किसी से, जो किसी पर उपकार कर नहीं सकता न करूं मगर किसी पर अपकार करने की भावना को मन में कदापि स्थान न दूं एवं किसी पर मन में द्रोह का भाव भी न उत्पन्न हो तथा मेरा अहर्निश दूसरों का गुण ही गुण देखना भाव सदा बना रहे एवं उनके अवगुणों पर कदापि दृष्टि ना जावे।_
*कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे।*
*लाखों वर्षों तक जीऊँ या, मृत्यु आज ही आ जावे॥*
*अथवा कोई कैसा ही भय, या लालच देने आवे।*
*तो भी न्याय-मार्ग से मेरा, कभी न पग डिगने पावे॥ 7॥*
*भावार्थ -* _कभी भी किसी समय कोई मुझे बुरा कहे या अच्छा कहे तथा लक्ष्मी आवे या जावे एवं लाखों वर्षों तक जीऊं या आज ही मृत्यु आज ही आ जाए अथवा कोई भी कैसा भी भय या लालच देने आए तो भी मेरा न्याय निष्ठा के प्रति कभी भी पथभ्रष्ट या जरा सी भी लालच से मेरा पद विचलित नहीं हो एवं डिगे नहीं हमेशा-हमेशा के लिए न्याय नीति से ही मेरा जीवन यापन हो यही मेरी भावना सदा बनी रहे।_
*होकर सुख में मग्न न फूलै दुख में कभी न घबरावे।*
*पर्वत नदी श्मशान भयानक, अटवी से नहिं भय खावे॥*
*रहे अडोल अकम्प निरन्तर, यह मन दृढ़तर बन जावे।*
*इष्टवियोग अनिष्टयोग में, सहनशीलता दिखलावे॥ 8॥*
*भावार्थ -* _कभी भी में सुख आने पर फूल नहीं जाऊं एवं घमंड में नहीं आऊं और कभी दुःख आने पर नहीं घबराऊं, दोनों परिस्थितियों में साम्यभाव मेरा बना रहे, पर्वत, नदी की बाढ़, श्मशान जैसे भयानक स्थान में रंच मात्र भी घबराहट का अनुभव नहीं करूं, कैसी भी भयंकर स्थिति में घबराहट न हर्ष दोनों अवस्था में चित्त को दृढ़ रख करके साम्यभाव से परिणाम को स्थिर करुं एवं इष्ट वियोग एवं अनिष्ट संयोगों को मिलने पर भी मेरी परिणीति साम्य रहे, ऐसी परिस्थिति को दृष्टा भाव से सहन करते चलूं।_
*सुखी रहें सब जीव जगत के, कोई कभी न घबरावे।*
*बैर-पाप अभिमान छोड़ जग, नित्य नये मंगल गावे॥*
*घर-घर चर्चा रहे धर्म की, दुष्कृत-दुष्कर हो जावे।*
*ज्ञानचरित उन्नत कर अपना, मनुजजन्म फल सब पावे॥ 9॥*
*भावार्थ -* _संसार के सभी प्राणी सुखी हो शांतिपूर्वक रहे एवं किसी प्रकार की मन में घबराहट का अनुभव नहीं करें, ये ही मेरी भावना निरंतर बनी रहे तथा किसी प्रकार का वैर-भाव एवं पापयुक्त अभिमान को छोड़कर नित्य सदा नए-नए मंगलकारी आचरण, नई भावना बनी रहे तथा घर-घर में धर्म की चर्चा हो, घर में परिवार में धर्म का पालन हो और धर्ममयी वातावरण बनाए रखें जिससे किसी प्रकार धर्म के प्रभाव से मन में उद्वेग न रहे अहर्निश शांतिमय वातावरण बना रहे। ऐसे वातावरण से मैं दुष्कृत दुष्कर्म हो जाऊं और ज्ञान चारित्र में उन्नति करके अपने मनुष्य जन्म को सफल बनाऊं, जिससे मनुष्य जन्म के फलस्वरुप मुक्ति की प्राप्ति हो और मेरा यह जन्म सफल हो जाए।_
*ईति-भीति व्यापे नहिं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे,*
*धर्म-निष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजा का किया करे।*
*रोग-मरी-दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शान्ति से जिया करे।*
*परम अहिंसा धर्म जगत में, फैल सर्वहित किया करे॥10॥*
*भावार्थ -* _जगत के किसी प्रकार की इती एवं भीती व्यापे नहीं एवं वृष्टि समय पर हुआ करे और धर्म से युक्त निष्ठावान होकर राजा न्याय युक्त प्रजा का पालन करें राज्य में सुख एवं शांति बनाए रखें तथा किसी प्रकार का रोग दुर्भिक्ष आदि राज्य में पनप नहीं पाए एवं प्रजा का जीवन सुख एवं शांतिपूर्वक व्यतीत हो यही भावना मेरी बनी रहे धर्म में जो परम धर्म है वह "अहिंसा परमो धर्म" समस्त विश्व में फैल कर सर्वत्र सब का हित होता रहे यही मेरी राष्ट्र के प्रति भावना बनी रहे।_
*फैले प्रेम परस्पर जग में, मोह दूर ही रहा करे।*
*अप्रिय-कटुक-कठोर शब्द नहिं, कोई मुख से कहा करे॥*
*बनकर सब ‘युगवीर’ हृदय से, देशोन्नति रत रहा करे।*
*वस्तु स्वरूप विचार खुशी से,सब दुख संकट सहा करे॥11॥*
*भावार्थ -* _विश्व में परस्पर प्रेम रूपी वृक्ष फैला ही करें तथा मोह जो अपने शाश्वत सुख की प्राप्ति में सर्वथा बाधक है ऐसे मोह से हमेशा के लिए दूर रहकर तथा अप्रिय एवं कटु वचन जो दूसरों के दिल को दुःख पहुंचाने वाला है ऐसा वचन किसी के मुख से नहीं निकले, वीर योद्धा बनकर सभी युगों में वीरता पूर्वक ह्रदय से देश की उन्नति की भावना हमेशा बनी रहे। ऐसे वस्तुओं का स्वरूप समझ करके समस्त विश्व के प्राणी मात्र की सुख एवं शांति के लिए किसी भी प्रकार के संकट को सहन करने का समर्थ बनाए रखें यही भावना मेरी है।_
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2026-04-13 08:09:16 |
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| 81800 |
40449696 |
?? श्री सम्मेद शिखर जी ?? |
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*मेरी भावना*
*जिसने रागद्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया।*
*सब जीवों को मोक्षमार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया॥*
*बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो।*
*भक्ति भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो॥ 1॥*
*भावार्थ -* _जिस महात्मा ने राग-द्वेष, कामराज आदि आत्मा के जो भयंकर शत्रु है, कालिमा लगाने वाला है एवं क्रश करने वाला है तथा संसार रूपी दावानल में रुलाने वाला है ऐसे महान् कर्म रूपी शत्रुओं को जिसने जीत लिया है और सारे लोकालोक को जान लिया है वैसे महात्मा सिद्धि के पात्र साधुओं ने नि:स्पृह नि:सार्थ भावना से जगत के त्रस्त एवं भव्य जीवों को आकुलित एवं करुणा भाव से उनकी सर्व सिद्धि के लिए कुछ सन्मार्ग के लिए उपदेश दिया है और देते हैं ऐसे महात्माओं का जो भी नाम हो चाहे बुद्ध हो, महावीर हो, हरि हो, हरि हर हो, ब्रह्म हो, विष्णु हो, अल्लाह हो, गॉड हो, शंकर हो, राम हो, कृष्णा हो एवं सिद्धि प्राप्ति के योग्य हो और उसके आधीन हो, भक्ति भाव से प्रेरित हो तथा अपना चित्त भव्य जीवों के कल्याण में ही हो किसी न किसी उपाय से भव्य जीवों का कल्याण हो।_
*विषयों की आशा नहिं,* *जिनके साम्य भाव धन रखते हैं।*
*निज पर के हित साधन में जो, निशदिन तत्पर रहते हैं।*
*स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं।*
*ऐसे ज्ञानी साधु जगत के, दुख समूह को हरते हैं॥ 2॥*
*भावार्थ -* _विषयों की आशा नहीं जिसको एवं विश्व के समस्त प्राणी मात्र पर साम्य भाव (समता) रखते हैं चाहे शत्रु हो या मित्र हो, ऐसे साधु जो हमेशा स्व के और पर के कल्याण में ही निरंतर तत्पर रहते हैं स्वार्थ एवं सांसारिक सुखों से अलिप्त रहने की महान् कठिन तपस्या बिना खेद तथा संपूर्ण समता भाव से सहन करते हैं जो आत्मा की महान् शक्ति का सदुपयोग संसार में गिरे हुए, पतित हुए एवं सांसारिक दुखों को जिसने जान लिया है जो भवचक्र में जैसे पशु कभी पक्षी, नरक, स्वर्ग के सुख भी नाशवंत है ऐसे त्रस्त हुए भव्य प्राणियों का दुःख को दूर करके सद्गति को जैसे गिरे हुए को उतारने वाले, पतित को पावन करने वाले ऐसे नि:स्वार्थ साधु भी जगत के प्राणियों के दुखों को हर सकते हैं, हरते हैं । तो ऐसे संत पुरुषों-महात्माओं की वाणी सुनने की अभिलाषा रख करके सुनो गुनो,मनन करो एवं उसका आचरण करो, उनके शब्दों पर चलने का प्रयास करो ।_
*रहे सदा सत्संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं का नित्य रहे।*
*उन ही जैसी चर्या में यह, चित्त सदा अनुरक्त रहे॥*
*नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नहीं कहा करूँ ।*
*परधन वनिता पर न लुभाऊँ , संतोषामृत पिया करूँ॥ 3॥*
*भावार्थ -* _जैसे साधुओं की संगति करने का भाव करके उनके समीप रहने का प्रयास करूं,ऐसे महान आत्माओं का सत् संगति करने से ही मेरी आत्मा को उन्हीं का जैसा बनाने का मौका प्राप्त करूं जो भव बंधनों से छुड़ाने वाला है । सत्संगति से ही सत् ज्ञान एवं सत् चारित्र की प्राप्ति होती है, तो ऐसे ज्ञानी ध्यानी आत्माओं की सत्संगति करने का भाव मेरे में अहर्निश रहे, ऐसा जो भव्य जीव सांसारिक नाशवंत सुख जो है और शाश्वत सुखों की प्राप्ति के लिए इन महान् पुरुषों जैसी चर्या आचरण करूं, दूराचारों से दूर रहकर एवं कभी किसी प्रकार से सताने का भाव कभी भी मेरे मन में ना लाऊं तथा कभी भी स्वार्थ के वश होकर झूठ हंसी मजाक में न बोलूं तथा पराया धन, पराई स्त्री पर मेरा मन किंचित मात्र भी आकर्षित न हो तथा सभी प्रकार से संतोषामृत पिया करूं- यही मेरी भावना और अहर्निश रहे।_
*अहंकार का भाव न रक्खूँ, नहीं किसी पर क्रोध करूँ ।*
*देख दूसरों की बढ़ती को, कभी न ईर्ष्या -भाव धरूँ॥*
*रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करूँ।*
*बने जहाँ तक इस जीवन में, औरों का उपकार करूँ ॥ 4॥*
*भावार्थ -* _अहंकार का भाव मन में कदापि नहीं लाऊं,ना किसी पर क्रोध करूं और दूसरों की बढ़ती को देखकर कभी ईर्ष्या भावना मैं मन में कदापि नहीं लाऊं एवं मेरी भावना हमेशा के लिए सरल एवं सत्य व्यवहार विश्व के हर प्राणी पर रहे । जहां तक बन सके वहां तक दूसरे प्राणी पर उपकार करने की भावना हमेशा रहा करें, उसमें किसी प्रकार के बदले की भावना किंचित मात्र भी न रहे।_
*मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे।*
*दीन-दुखी जीवों पर मेरे उर से करुणा स्रोत बहे॥*
*दुर्जन क्रूर - कुमार्गरतों पर, क्षोभ नहीं मुझको आवे।*
*साम्यभाव रक्खूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे॥ 5॥*
*भावार्थ -* _मेरी मैत्री भावना विश्व के सभी प्राणियों, मनुष्यों समेत सभी पर सदा एक समान रहे तथा दिन दुःखी जीवों पर मेरे हृदय से करुणा रूपी झरना बहा करें, ऐसी हमेशा भावना बनी रहे तथा कोई दुर्जन हो या सज्जन, कुमार्गी हो, ऐसे सभी जीवों पर समान भाव एवं अंश मात्र भी क्षोभ नहीं आवे, सभी पर समभाव रहे, ऐसी परिणति मेरी सदा के लिए हो।_
*गुणीजनों को देख हृदय में, मेरे प्रेम उमड़ आवे।*
*बने जहाँ तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे॥*
*होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे।*
*गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे॥ 6॥*
*भावार्थ -* _गुणीजनों को देखते ही मेरे मन में हर्षोल्लाह से हृदय गदगद होवे एवं प्रेम की मन में एक लहर प्रगट हो फिर जहां तक हो उनकी सेवा सुश्रुषा करके यह मन अत्यंत सुखों का अनुभव करें, हो नहीं कृतध्न किसी से, जो किसी पर उपकार कर नहीं सकता न करूं मगर किसी पर अपकार करने की भावना को मन में कदापि स्थान न दूं एवं किसी पर मन में द्रोह का भाव भी न उत्पन्न हो तथा मेरा अहर्निश दूसरों का गुण ही गुण देखना भाव सदा बना रहे एवं उनके अवगुणों पर कदापि दृष्टि ना जावे।_
*कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे।*
*लाखों वर्षों तक जीऊँ या, मृत्यु आज ही आ जावे॥*
*अथवा कोई कैसा ही भय, या लालच देने आवे।*
*तो भी न्याय-मार्ग से मेरा, कभी न पग डिगने पावे॥ 7॥*
*भावार्थ -* _कभी भी किसी समय कोई मुझे बुरा कहे या अच्छा कहे तथा लक्ष्मी आवे या जावे एवं लाखों वर्षों तक जीऊं या आज ही मृत्यु आज ही आ जाए अथवा कोई भी कैसा भी भय या लालच देने आए तो भी मेरा न्याय निष्ठा के प्रति कभी भी पथभ्रष्ट या जरा सी भी लालच से मेरा पद विचलित नहीं हो एवं डिगे नहीं हमेशा-हमेशा के लिए न्याय नीति से ही मेरा जीवन यापन हो यही मेरी भावना सदा बनी रहे।_
*होकर सुख में मग्न न फूलै दुख में कभी न घबरावे।*
*पर्वत नदी श्मशान भयानक, अटवी से नहिं भय खावे॥*
*रहे अडोल अकम्प निरन्तर, यह मन दृढ़तर बन जावे।*
*इष्टवियोग अनिष्टयोग में, सहनशीलता दिखलावे॥ 8॥*
*भावार्थ -* _कभी भी में सुख आने पर फूल नहीं जाऊं एवं घमंड में नहीं आऊं और कभी दुःख आने पर नहीं घबराऊं, दोनों परिस्थितियों में साम्यभाव मेरा बना रहे, पर्वत, नदी की बाढ़, श्मशान जैसे भयानक स्थान में रंच मात्र भी घबराहट का अनुभव नहीं करूं, कैसी भी भयंकर स्थिति में घबराहट न हर्ष दोनों अवस्था में चित्त को दृढ़ रख करके साम्यभाव से परिणाम को स्थिर करुं एवं इष्ट वियोग एवं अनिष्ट संयोगों को मिलने पर भी मेरी परिणीति साम्य रहे, ऐसी परिस्थिति को दृष्टा भाव से सहन करते चलूं।_
*सुखी रहें सब जीव जगत के, कोई कभी न घबरावे।*
*बैर-पाप अभिमान छोड़ जग, नित्य नये मंगल गावे॥*
*घर-घर चर्चा रहे धर्म की, दुष्कृत-दुष्कर हो जावे।*
*ज्ञानचरित उन्नत कर अपना, मनुजजन्म फल सब पावे॥ 9॥*
*भावार्थ -* _संसार के सभी प्राणी सुखी हो शांतिपूर्वक रहे एवं किसी प्रकार की मन में घबराहट का अनुभव नहीं करें, ये ही मेरी भावना निरंतर बनी रहे तथा किसी प्रकार का वैर-भाव एवं पापयुक्त अभिमान को छोड़कर नित्य सदा नए-नए मंगलकारी आचरण, नई भावना बनी रहे तथा घर-घर में धर्म की चर्चा हो, घर में परिवार में धर्म का पालन हो और धर्ममयी वातावरण बनाए रखें जिससे किसी प्रकार धर्म के प्रभाव से मन में उद्वेग न रहे अहर्निश शांतिमय वातावरण बना रहे। ऐसे वातावरण से मैं दुष्कृत दुष्कर्म हो जाऊं और ज्ञान चारित्र में उन्नति करके अपने मनुष्य जन्म को सफल बनाऊं, जिससे मनुष्य जन्म के फलस्वरुप मुक्ति की प्राप्ति हो और मेरा यह जन्म सफल हो जाए।_
*ईति-भीति व्यापे नहिं जग में, वृष्टि समय पर हुआ करे,*
*धर्म-निष्ठ होकर राजा भी, न्याय प्रजा का किया करे।*
*रोग-मरी-दुर्भिक्ष न फैले, प्रजा शान्ति से जिया करे।*
*परम अहिंसा धर्म जगत में, फैल सर्वहित किया करे॥10॥*
*भावार्थ -* _जगत के किसी प्रकार की इती एवं भीती व्यापे नहीं एवं वृष्टि समय पर हुआ करे और धर्म से युक्त निष्ठावान होकर राजा न्याय युक्त प्रजा का पालन करें राज्य में सुख एवं शांति बनाए रखें तथा किसी प्रकार का रोग दुर्भिक्ष आदि राज्य में पनप नहीं पाए एवं प्रजा का जीवन सुख एवं शांतिपूर्वक व्यतीत हो यही भावना मेरी बनी रहे धर्म में जो परम धर्म है वह "अहिंसा परमो धर्म" समस्त विश्व में फैल कर सर्वत्र सब का हित होता रहे यही मेरी राष्ट्र के प्रति भावना बनी रहे।_
*फैले प्रेम परस्पर जग में, मोह दूर ही रहा करे।*
*अप्रिय-कटुक-कठोर शब्द नहिं, कोई मुख से कहा करे॥*
*बनकर सब ‘युगवीर’ हृदय से, देशोन्नति रत रहा करे।*
*वस्तु स्वरूप विचार खुशी से,सब दुख संकट सहा करे॥11॥*
*भावार्थ -* _विश्व में परस्पर प्रेम रूपी वृक्ष फैला ही करें तथा मोह जो अपने शाश्वत सुख की प्राप्ति में सर्वथा बाधक है ऐसे मोह से हमेशा के लिए दूर रहकर तथा अप्रिय एवं कटु वचन जो दूसरों के दिल को दुःख पहुंचाने वाला है ऐसा वचन किसी के मुख से नहीं निकले, वीर योद्धा बनकर सभी युगों में वीरता पूर्वक ह्रदय से देश की उन्नति की भावना हमेशा बनी रहे। ऐसे वस्तुओं का स्वरूप समझ करके समस्त विश्व के प्राणी मात्र की सुख एवं शांति के लिए किसी भी प्रकार के संकट को सहन करने का समर्थ बनाए रखें यही भावना मेरी है।_
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2026-04-13 08:09:16 |
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