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223239 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ 2026-06-12 04:26:31
223237 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-12 04:24:51
223238 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-06-12 04:24:51
223235 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ 2026-06-12 04:21:12
223236 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ 2026-06-12 04:21:12
223234 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ Ashirwad 2026-06-12 04:09:13
223233 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ Ashirwad 2026-06-12 04:09:12
223232 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ *कहानी बड़ी सुहानी* (1) *कहानी* *नजरिया अपना-अपना* मास्टर जी क्लास में पढ़ा रहे थे, तभी पीछे से दो बच्चों के आपस में झगड़ा करने की आवाज़ आने लगी। “क्या हुआ तुम लोग इस तरह झगड़ क्यों रहे हो ?” मास्टर जी ने पूछा। राहुल : सर, अमित अपनी बात को लेकर अड़ा है और मेरी सुनने को तैयार ही नहीं है। अमित : नहीं सर, राहुल जो कह रहा है वह बिलकुल गलत है इसलिए उसकी बात सुनने से कोई फायदा नही। और ऐसा कह कर वे फिर तू-तू मैं-मैं करने लगे। मास्टर जी ने पास आने का इशारा कहा,”तुम दोनों यहाँ मेरे पास आओ।” अगले ही पल दोनो परस्पर व्यंगात्मक भाव लिए मास्टर जी की टेबल पर पँहुच गए। मास्टर जी ने दोनों छात्रों को अपनी टेबल के दाएं बाएं बैठने को कहा। अब शेष छात्रों को सम्बोधित करते हुए बोले, ”Fingure On The Lips. सभी छात्र पूर्ण शान्ति से बैठे रहें।” कक्षा में पूर्ण सन्नाटा छा गया सभी छात्रों की कौतुक नजरें मास्टर जी की तरफ। “जब तक ये दोनों छात्र यँहा मेरे पास हैं तब तक आप में से कोई छात्र कुछ नहीं बोलेगा।”मास्टर जी ने एक बार पुनः अपना आदेश दोहराया। अब मास्टर जी ने कवर्ड से एक बड़ी सी गेंद निकाली और अपनी टेबल के बीचो-बीच रख दी। मास्टर जी ने अपनी दायीं ओर बैठे राहुल से पूछा, “बताओ,यह गेंद किस रंग की है। राहुल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,” जी यह सफ़ेद रंग की है।” मास्टर जी ने वही प्रश्न बाएं ओर के अमित से भी पूछा,”तुम बताओ यह गेंद किस रंग की है? अमित पूर्ण विश्वास के साथ बोला,”जी काली है।” दोनों छात्र अपने जवाब को लेकर पूरी तरह कॉंफिडेंट थे। अब फिर दोनों ने गेंद के रंग को लेकर बहस शुरू कर दी। मास्टर जी ने उन्हें शांत कराते हुए कहा,”अब तुम दोनों अपना अपना स्थान बदल लो और फिर बताओ की गेंद किस रंग की है ?” कक्षा के शेष छात्र कौतुक दृष्टि से तमाशा देख रहे थे। अमित अब दायीं ओर जबकि राहुल बाईं ओर आ गया था। इस बार उनके जवाब भी बदल चुके थे।राहुल ने गेंद का रंग काला तो अमित ने सफ़ेद बताया। मास्टर जी ने दोनों को अपनी अपनी सीट पर भेज कर गंभीर स्वर में कहा ,” बच्चों! यह गेंद दो रंगो से बनी है और जिस तरह यह एक जगह से देखने पर काली और दूसरी जगह से देखने पर सफ़ेद दिखाई देती है। उसी प्रकार हमारे जीवन में भी हर एक चीज को अलग अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। ज़रूरी नहीं कि जिस तरह से आप किसी चीज को देखते हैं उसी तरह दूसरा भी उसे देखे..इसलिए *यदि कभी हमारे बीच विचारों को लेकर मतभेद हो तो यह ना सोचें कि सामने वाला बिलकुल गलत है बल्कि चीजों को उसके नज़रिये से देखने और उसे अपना नजरिया समझाने का प्रयास करें। तभी आप एक अर्थपूर्ण संवाद कर सकते हैं।”* सभी छात्रों ने करतल ध्वनि से मास्टर जी की बात का समर्थन किया। *शिक्षा* :- आईये उक्त कथा से सीख लेते हुए हम भी एक दूसरे के नज़रिए को समझ कर अपने बीच उपजी संवादहीनता को दूर करने का प्रयास करें क्योंकि संवाद ही एकमात्र वह प्रक्रिया है जो हमारी गलतवहमी को दूर कर आपसी रिश्तों को मजबूत बनाती है। **************************************** (2) *कहानी* *सकारात्मक सोच* एक राजा के पास कई हाथी थे, लेकिन एक हाथी बहुत शक्तिशाली तो था ही इसके साथ ही बहुत समझदार, आज्ञाकारी एवं युद्ध - कौशल में भी निपुण था। बहुत से युद्धों में वह भेजा गया था और वह राजा को विजय दिलाकर ही वापस लौटता था इसलिए वह महाराज का सबसे प्रिय हाथी था। *समय गुजरता गया और एक समय ऐसा भी आया, जब वह वृद्ध दिखने लगा अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर पाता था। इसलिए अब राजा उसे युद्ध क्षेत्र में भी नहीं भेजते थे।* एक दिन वह सरोवर में जल पीने के लिए गया, लेकिन वहीं कीचड़ में उसका पैर धँस गया और फिर धँसता ही चला गया। उस हाथी ने बहुत कोशिश की, लेकिन वह उस कीचड़ से स्वयं को नहीं निकाल पाया। उसकी चिंघाड़ने की आवाज से लोगों को यह पता चल गया कि वह हाथी संकट में है। हाथी के फँसने का समाचार राजा तक भी पहुँचा। राजा समेत सभी लोग हाथी के आसपास ईकट्ठे हो गए और विभिन्न प्रकार के प्रयत्न कर उसे निकालने के लिए प्रयास करने लगे। लेकिन बहुत देर तक प्रयास करने के उपरांत भी जब कोई मार्ग नहीं निकला तो निराश हो कर परिस्थिति पर निर्भर हो कर बैठ गए। तभी गौतम बुद्ध मार्ग भ्रमण कर रहे थे। ऐसी सुचना राजा को मिली तो राजा और उनका सारा मंत्रीमंडल तथागत गौतम बुद्ध के पास गये और अनुरोध किया कि आप हमें इस विकट परिस्थिति में मार्गदर्शन करें *गौतम बुद्ध ने सबसे पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया और फिर राजा को सुझाव दिया कि सरोवर के चारों और युद्ध के नगाड़े बजाए जाएँ।* सुनने वालों को विचित्र लगा कि भला नगाड़े बजाने से वह फँसा हुआ हाथी बाहर कैसे निकलेगा। *किन्तु जैसे ही युद्ध के नगाड़े बजने प्रारंभ हुए, वैसे ही उस मृतप्राय हाथी के हाव-भाव में परिवर्तन आने लगा। पहले तो वह धीरे-धीरे करके खड़ा हुआ और फिर सबको हतप्रभ करते हुए स्वयं ही कीचड़ से बाहर निकल आया।* गौतम बुद्ध ने सबको स्पष्ट किया कि हाथी की शारीरिक क्षमता में कमी नहीं थी, आवश्यकता मात्र उसके अंदर उत्साह के संचार करने की थी। *जीवन में उत्साह बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य सकारात्मक चिंतन बनाए रखें और निराशा को हावी न होने दें...* कभी–कभी निरंतर मिलने वाली असफलताओं से व्यक्ति यह मान लेता है कि अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर सकता, लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है... *"सकारात्मक सोच ही मनुष्य को "मनुष्य" बनाती है और उसे अपनी मंजिल तक ले जाती है **************************************** (3) *कहानी* *कड़वा वचन* सुंदर नगर में एक सेठ रहते थे | उनमें हर गुण था – नहीं था तो बस खुद को संयत में रख पाने का गुण | जरा-सी बात पर वे बिगड़ जाते थे | आसपास तक के लोग उनसे परेशान थे | खुद उनके घर वाले तक उनसे परेशान होकर बोलना छोड़ देते | किंतु, यह सब कब तक चलता | वे पुन: उनसे बोलने लगते | इस प्रकार काफी समय बीत गया, लेकिन सेठ की आदत नहीं बदली | उनके स्वभाव में तनिक भी फर्क नहीं आया | अंततः एक दिन उसके घरवाले एक साधु के पास गये और अपनी समस्या बताकर बोले – “ महाराज ! हम उनसे अत्यधिक परेशान हो गये हैं, कृपया कोई उपाय बताइये |” तब, साधु ने कुछ सोचकर कहा – “ सेठ जी ! को मेरे पास भेज देना |” “ ठीक है, महाराज ” कहकर सेठ जी के घरवाले वापस लौट गये | घर जाकर उन्होंने सेठ जी को अलग-अलग उपायों के साथ उन्हें साधु महाराज के पास ले जाना चाहा | किंतु, सेठ जी साधु-महात्माओं पर विश्वास नहीं करते थे | अतः वे साधु के पास नहीं आये | तब एक दिन साधु महाराज स्वय ही उनके घर पहुंच गये | वे अपने साथ एक गिलास में कोई द्रव्य लेकर गये थे | साधु को देखकर सेठ जी की प्योरिया चढ़ गयी | परंतु घरवालों के कारण वे चुप रहे | साधु महाराज सेठ जी से बोले – “ सेठ जी ! मैं हिमालय पर्वत से आपके लिए यह पदार्थ लाया हूं, जरा पीकर देखिये |” पहले तो सेठ जी ने आनाकानी की, परंतु फिर घरवालों के आग्रह पर भी मान गये | उन्होंने द्रव्य का गिलास लेकर मुंह से लगाया और उसमें मौजूद द्रव्य को जीभ से चाटा | ऐसा करते ही उन्होंने सड़ा-सा मुंह बनाकर गिलास होठों से दूर कर लिया | और साधु से बोले – “ यह तो अत्यधिक कड़वा है, क्या है यह ?” “ अरे आपकी जबान जानती है, कि कड़वा क्या होता है ” साधु महाराज ने कहा | “ यह तो हर कोई जानता है ” कहते समय सेठ ने रहस्यमई दृष्टि से साधु की ओर देखा | “ नहीं ऐसा नहीं है, अगर हर कोई जानता होता तो इस कड़वे पदार्थ से कहीं अधिक कड़वे शब्द अपने मुंह से नहीं निकालता | सेठ जी वह एक पल को रुके फिर बोले | सेठ जी याद रखिये जो आदमी कटु वचन बोलता है | वह दूसरों को दुख पहुंचाने से पहले, अपनी जबान को गंदा करता है |” सेठ समझ गये थे, कि साधु ने जो कुछ कहा है | उन्हें लक्षित करके कहा है | वह फौरन साधु के पैरों में गिर पड़े – “ बोले साधु महाराज ! आपने मेरी आंखें खोल दी, अब मैं आगे से कभी कटु वचनों का प्रयोग नहीं करूंगा |” सेठ के मुंह से ऐसे वाक्य सुनकर उनके घरवाले प्रसंता से भर उठे | तभी सेठ जी ने साधु से पूछा – “ किंतु, महाराज ! यह पदार्थ जो आप हिमालय से लाये हो वास्तव में यह क्या है ?” साधु मुस्कुराकर बोले – “ नीम के पत्तों का अर्क |” “ क्या ” सेठ जी के मुंह से निकला और फिर वे धीरे-से मुस्कुरा दिये | मित्रों" कड़वा वचन बोलने से बढ़कर इस संसार में और कड़वा कुछ नहीं | किसी द्रव्य के कड़वे होने से जीभ का स्वाद कुछ ही देर के लिए कड़वा होता है | परंतु कड़वे वचन से तो मन और आत्मा को चोट लगती है |” **************************************** (4) *कहानी* *संतवाणी* हमारे घर के अंदर अगर मकड़ी का जाला लग जाता है तो हम उसे झाड़ू से साफ करते है। वह जाला झाड़ू पर चिपक जाता है और हमारे घर की साफ सफाई हो जाती है। ठीक इसी तरह हम किसी की बुराई करते हैं या निंदा करते हैं तो समझो हम झाड़ू का काम कर रहे। उसकी बुराई अपने सिर पर ले लेते हैं। जिस तरह झाड़ू पर जाला चिपकता उसी ही तरह सामने वाले के अवगुणो के पाप हमारे ऊपर चिपक जाते हैं। इसलिए सभी संतों ने कहा है किसी की बुराई मत करो। तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँव तले होय। कबहुँ उड़ आखों पड़े, पीर घनेरी होय।। **************************************** (5) *कहानी* *चोरी का दंड अवश्य भोगना पड़ता है...* *एक समय कांचीपुर नामक गांव में वज्र नाम का एक चोर रहता था।* *चोर नाम के भांति ही वज्र ह्रदय का था। उसे जिसका जो मिलता चुरा लेता। उसे तनिक भी दया नहीं आती थी कि उस सामान के स्वामी को कितना कष्ट होगा !* *वह चुराए हुए धन को सिपाहियों के भय से जंगल में जमीन के अंदर छुपा देता था !* *एक रात विरदत्त नाम के लकड़हारे ने ये घटना देख ली। और चोर के जाने के पश्चात जमीन खोद कर उसके चुराए हुए धन का दसवां हिस्सा निकाल लिया और गड्ढे को पहले की भांति ढक दिया।* *लकड़हारा इतनी चालाकी से सामान निकलता की चोर को इस चोरी का पता ही नहीं चल पता था।* *एक दिन लकड़हारा अपनी पत्नी को धन देते हुए बोला, कि तुम रोज धन माँगा करती थी, लो आज पर्याप्त धन इक्कठा हो गया है।* *उसकी पत्नी ने कहा, जो धन अपने परिश्रम से उपार्जित न किया गया हो वह स्थाई नहीं होता है। इसलिए इस धन को जनता की भलाई में लगा दीजिये।* *विरदत्त को भी ये बात जच गयी ! इसलिए उसने इस धन से एक बहुत बड़ा तालाब खुदवाया जिसका पानी कभी भी नहीं सूखता था।* *लेकिन इसमें सीढ़िया लगनी रह गयी थी और सारे पैसे समाप्त हो गये थे।* *तो वह फिर से छिपकर चोर का अनुसरण करने लगा की वह धन कहां छुपाता है। इसके बाद फिर उससे दसवां हिस्सा निकाल कर तालाब का काम पूरा करवाया !* *तथा उसने भगवान शंकर और भगवान विष्णु के भव्य मंदिर बनवाए। बंजर जमीन पर खेत बनवाये और गरीबों में वितरित कर दिया।* *गरीबों ने उसकी सेवा से प्रसन्न होकर उसका नाम द्विजवर्मा रखा।* *जब द्विजवर्मा की मृत्यु हुई तब एक ओर से यमदूत आये और एक ओर से भगवान शंकर के गण आये। उनमे आपस में विवाद होने लगा इसी बीच वहां नारद जी पधारे।* *नारद जी ने उनको समझाया, आप विवाद न करें इस लकड़हारे ने चोरी के धन से परोपकार के कामों को कराया है...* *इसलिए जब तक यह कुमार्ग से अर्जित धन का प्रायश्चित नहीं कर लेता तब तक वायु रूप में अंतरिक्ष में विचरण करता रहेगा।* *नारद जी की बात सुनकर सभी दूत वापस लौट गए तथा द्विजवर्मा बारह वर्षों तक प्रेत बनकर घूमता रहा।* *नारद जी ने लकड़हारे की पत्नी से कहा, तुम ने अपने पति को सदमार्ग दिखाया इसलिए तुम ब्रम्ह्लोक जाओगी।* *लेकिन लकड़हारे की पत्नी अपने पति के दुःख से दुखी थी। वह देवर्षि से बोली, जब तक मेरे पति को देह नहीं मिलती तब तक मैं यहीं रहूंगी।* *जो गति मेरे पति की हुई वही गति मैं भी चाहती हूँ !* *ये बातें सुनकर देवर्षि बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बताया की तुम अपने पति की मुक्ति के लिए शिव की आराधना करो।* *उसने अपने पति की मुक्ति के लिए अथक मेहनत से भगवान शिव की आराधना की।* *इससे उसके पति के चोरी का सारा पाप धुल गया। फिर दोनों पति पत्नी को उत्तम लोक मिला।* *इस पौराणिक सत्य कथा का निष्कर्ष यही है कि कोई भला काम करने का अच्छा फल जरूर मिलता है लेकिन कोई भला काम करने के लिए कभी किसी गलत काम का सहारा नहीं लेना चाहिए...* *अन्यथा उस गलत काम का भी दंड जिंदा रहते या मरने के बाद जरूर भुगतना पड़ता है !* ********************* 2026-06-12 04:09:10
223231 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ *कहानी बड़ी सुहानी* (1) *कहानी* *नजरिया अपना-अपना* मास्टर जी क्लास में पढ़ा रहे थे, तभी पीछे से दो बच्चों के आपस में झगड़ा करने की आवाज़ आने लगी। “क्या हुआ तुम लोग इस तरह झगड़ क्यों रहे हो ?” मास्टर जी ने पूछा। राहुल : सर, अमित अपनी बात को लेकर अड़ा है और मेरी सुनने को तैयार ही नहीं है। अमित : नहीं सर, राहुल जो कह रहा है वह बिलकुल गलत है इसलिए उसकी बात सुनने से कोई फायदा नही। और ऐसा कह कर वे फिर तू-तू मैं-मैं करने लगे। मास्टर जी ने पास आने का इशारा कहा,”तुम दोनों यहाँ मेरे पास आओ।” अगले ही पल दोनो परस्पर व्यंगात्मक भाव लिए मास्टर जी की टेबल पर पँहुच गए। मास्टर जी ने दोनों छात्रों को अपनी टेबल के दाएं बाएं बैठने को कहा। अब शेष छात्रों को सम्बोधित करते हुए बोले, ”Fingure On The Lips. सभी छात्र पूर्ण शान्ति से बैठे रहें।” कक्षा में पूर्ण सन्नाटा छा गया सभी छात्रों की कौतुक नजरें मास्टर जी की तरफ। “जब तक ये दोनों छात्र यँहा मेरे पास हैं तब तक आप में से कोई छात्र कुछ नहीं बोलेगा।”मास्टर जी ने एक बार पुनः अपना आदेश दोहराया। अब मास्टर जी ने कवर्ड से एक बड़ी सी गेंद निकाली और अपनी टेबल के बीचो-बीच रख दी। मास्टर जी ने अपनी दायीं ओर बैठे राहुल से पूछा, “बताओ,यह गेंद किस रंग की है। राहुल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,” जी यह सफ़ेद रंग की है।” मास्टर जी ने वही प्रश्न बाएं ओर के अमित से भी पूछा,”तुम बताओ यह गेंद किस रंग की है? अमित पूर्ण विश्वास के साथ बोला,”जी काली है।” दोनों छात्र अपने जवाब को लेकर पूरी तरह कॉंफिडेंट थे। अब फिर दोनों ने गेंद के रंग को लेकर बहस शुरू कर दी। मास्टर जी ने उन्हें शांत कराते हुए कहा,”अब तुम दोनों अपना अपना स्थान बदल लो और फिर बताओ की गेंद किस रंग की है ?” कक्षा के शेष छात्र कौतुक दृष्टि से तमाशा देख रहे थे। अमित अब दायीं ओर जबकि राहुल बाईं ओर आ गया था। इस बार उनके जवाब भी बदल चुके थे।राहुल ने गेंद का रंग काला तो अमित ने सफ़ेद बताया। मास्टर जी ने दोनों को अपनी अपनी सीट पर भेज कर गंभीर स्वर में कहा ,” बच्चों! यह गेंद दो रंगो से बनी है और जिस तरह यह एक जगह से देखने पर काली और दूसरी जगह से देखने पर सफ़ेद दिखाई देती है। उसी प्रकार हमारे जीवन में भी हर एक चीज को अलग अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। ज़रूरी नहीं कि जिस तरह से आप किसी चीज को देखते हैं उसी तरह दूसरा भी उसे देखे..इसलिए *यदि कभी हमारे बीच विचारों को लेकर मतभेद हो तो यह ना सोचें कि सामने वाला बिलकुल गलत है बल्कि चीजों को उसके नज़रिये से देखने और उसे अपना नजरिया समझाने का प्रयास करें। तभी आप एक अर्थपूर्ण संवाद कर सकते हैं।”* सभी छात्रों ने करतल ध्वनि से मास्टर जी की बात का समर्थन किया। *शिक्षा* :- आईये उक्त कथा से सीख लेते हुए हम भी एक दूसरे के नज़रिए को समझ कर अपने बीच उपजी संवादहीनता को दूर करने का प्रयास करें क्योंकि संवाद ही एकमात्र वह प्रक्रिया है जो हमारी गलतवहमी को दूर कर आपसी रिश्तों को मजबूत बनाती है। **************************************** (2) *कहानी* *सकारात्मक सोच* एक राजा के पास कई हाथी थे, लेकिन एक हाथी बहुत शक्तिशाली तो था ही इसके साथ ही बहुत समझदार, आज्ञाकारी एवं युद्ध - कौशल में भी निपुण था। बहुत से युद्धों में वह भेजा गया था और वह राजा को विजय दिलाकर ही वापस लौटता था इसलिए वह महाराज का सबसे प्रिय हाथी था। *समय गुजरता गया और एक समय ऐसा भी आया, जब वह वृद्ध दिखने लगा अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर पाता था। इसलिए अब राजा उसे युद्ध क्षेत्र में भी नहीं भेजते थे।* एक दिन वह सरोवर में जल पीने के लिए गया, लेकिन वहीं कीचड़ में उसका पैर धँस गया और फिर धँसता ही चला गया। उस हाथी ने बहुत कोशिश की, लेकिन वह उस कीचड़ से स्वयं को नहीं निकाल पाया। उसकी चिंघाड़ने की आवाज से लोगों को यह पता चल गया कि वह हाथी संकट में है। हाथी के फँसने का समाचार राजा तक भी पहुँचा। राजा समेत सभी लोग हाथी के आसपास ईकट्ठे हो गए और विभिन्न प्रकार के प्रयत्न कर उसे निकालने के लिए प्रयास करने लगे। लेकिन बहुत देर तक प्रयास करने के उपरांत भी जब कोई मार्ग नहीं निकला तो निराश हो कर परिस्थिति पर निर्भर हो कर बैठ गए। तभी गौतम बुद्ध मार्ग भ्रमण कर रहे थे। ऐसी सुचना राजा को मिली तो राजा और उनका सारा मंत्रीमंडल तथागत गौतम बुद्ध के पास गये और अनुरोध किया कि आप हमें इस विकट परिस्थिति में मार्गदर्शन करें *गौतम बुद्ध ने सबसे पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया और फिर राजा को सुझाव दिया कि सरोवर के चारों और युद्ध के नगाड़े बजाए जाएँ।* सुनने वालों को विचित्र लगा कि भला नगाड़े बजाने से वह फँसा हुआ हाथी बाहर कैसे निकलेगा। *किन्तु जैसे ही युद्ध के नगाड़े बजने प्रारंभ हुए, वैसे ही उस मृतप्राय हाथी के हाव-भाव में परिवर्तन आने लगा। पहले तो वह धीरे-धीरे करके खड़ा हुआ और फिर सबको हतप्रभ करते हुए स्वयं ही कीचड़ से बाहर निकल आया।* गौतम बुद्ध ने सबको स्पष्ट किया कि हाथी की शारीरिक क्षमता में कमी नहीं थी, आवश्यकता मात्र उसके अंदर उत्साह के संचार करने की थी। *जीवन में उत्साह बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य सकारात्मक चिंतन बनाए रखें और निराशा को हावी न होने दें...* कभी–कभी निरंतर मिलने वाली असफलताओं से व्यक्ति यह मान लेता है कि अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर सकता, लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है... *"सकारात्मक सोच ही मनुष्य को "मनुष्य" बनाती है और उसे अपनी मंजिल तक ले जाती है **************************************** (3) *कहानी* *कड़वा वचन* सुंदर नगर में एक सेठ रहते थे | उनमें हर गुण था – नहीं था तो बस खुद को संयत में रख पाने का गुण | जरा-सी बात पर वे बिगड़ जाते थे | आसपास तक के लोग उनसे परेशान थे | खुद उनके घर वाले तक उनसे परेशान होकर बोलना छोड़ देते | किंतु, यह सब कब तक चलता | वे पुन: उनसे बोलने लगते | इस प्रकार काफी समय बीत गया, लेकिन सेठ की आदत नहीं बदली | उनके स्वभाव में तनिक भी फर्क नहीं आया | अंततः एक दिन उसके घरवाले एक साधु के पास गये और अपनी समस्या बताकर बोले – “ महाराज ! हम उनसे अत्यधिक परेशान हो गये हैं, कृपया कोई उपाय बताइये |” तब, साधु ने कुछ सोचकर कहा – “ सेठ जी ! को मेरे पास भेज देना |” “ ठीक है, महाराज ” कहकर सेठ जी के घरवाले वापस लौट गये | घर जाकर उन्होंने सेठ जी को अलग-अलग उपायों के साथ उन्हें साधु महाराज के पास ले जाना चाहा | किंतु, सेठ जी साधु-महात्माओं पर विश्वास नहीं करते थे | अतः वे साधु के पास नहीं आये | तब एक दिन साधु महाराज स्वय ही उनके घर पहुंच गये | वे अपने साथ एक गिलास में कोई द्रव्य लेकर गये थे | साधु को देखकर सेठ जी की प्योरिया चढ़ गयी | परंतु घरवालों के कारण वे चुप रहे | साधु महाराज सेठ जी से बोले – “ सेठ जी ! मैं हिमालय पर्वत से आपके लिए यह पदार्थ लाया हूं, जरा पीकर देखिये |” पहले तो सेठ जी ने आनाकानी की, परंतु फिर घरवालों के आग्रह पर भी मान गये | उन्होंने द्रव्य का गिलास लेकर मुंह से लगाया और उसमें मौजूद द्रव्य को जीभ से चाटा | ऐसा करते ही उन्होंने सड़ा-सा मुंह बनाकर गिलास होठों से दूर कर लिया | और साधु से बोले – “ यह तो अत्यधिक कड़वा है, क्या है यह ?” “ अरे आपकी जबान जानती है, कि कड़वा क्या होता है ” साधु महाराज ने कहा | “ यह तो हर कोई जानता है ” कहते समय सेठ ने रहस्यमई दृष्टि से साधु की ओर देखा | “ नहीं ऐसा नहीं है, अगर हर कोई जानता होता तो इस कड़वे पदार्थ से कहीं अधिक कड़वे शब्द अपने मुंह से नहीं निकालता | सेठ जी वह एक पल को रुके फिर बोले | सेठ जी याद रखिये जो आदमी कटु वचन बोलता है | वह दूसरों को दुख पहुंचाने से पहले, अपनी जबान को गंदा करता है |” सेठ समझ गये थे, कि साधु ने जो कुछ कहा है | उन्हें लक्षित करके कहा है | वह फौरन साधु के पैरों में गिर पड़े – “ बोले साधु महाराज ! आपने मेरी आंखें खोल दी, अब मैं आगे से कभी कटु वचनों का प्रयोग नहीं करूंगा |” सेठ के मुंह से ऐसे वाक्य सुनकर उनके घरवाले प्रसंता से भर उठे | तभी सेठ जी ने साधु से पूछा – “ किंतु, महाराज ! यह पदार्थ जो आप हिमालय से लाये हो वास्तव में यह क्या है ?” साधु मुस्कुराकर बोले – “ नीम के पत्तों का अर्क |” “ क्या ” सेठ जी के मुंह से निकला और फिर वे धीरे-से मुस्कुरा दिये | मित्रों" कड़वा वचन बोलने से बढ़कर इस संसार में और कड़वा कुछ नहीं | किसी द्रव्य के कड़वे होने से जीभ का स्वाद कुछ ही देर के लिए कड़वा होता है | परंतु कड़वे वचन से तो मन और आत्मा को चोट लगती है |” **************************************** (4) *कहानी* *संतवाणी* हमारे घर के अंदर अगर मकड़ी का जाला लग जाता है तो हम उसे झाड़ू से साफ करते है। वह जाला झाड़ू पर चिपक जाता है और हमारे घर की साफ सफाई हो जाती है। ठीक इसी तरह हम किसी की बुराई करते हैं या निंदा करते हैं तो समझो हम झाड़ू का काम कर रहे। उसकी बुराई अपने सिर पर ले लेते हैं। जिस तरह झाड़ू पर जाला चिपकता उसी ही तरह सामने वाले के अवगुणो के पाप हमारे ऊपर चिपक जाते हैं। इसलिए सभी संतों ने कहा है किसी की बुराई मत करो। तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँव तले होय। कबहुँ उड़ आखों पड़े, पीर घनेरी होय।। **************************************** (5) *कहानी* *चोरी का दंड अवश्य भोगना पड़ता है...* *एक समय कांचीपुर नामक गांव में वज्र नाम का एक चोर रहता था।* *चोर नाम के भांति ही वज्र ह्रदय का था। उसे जिसका जो मिलता चुरा लेता। उसे तनिक भी दया नहीं आती थी कि उस सामान के स्वामी को कितना कष्ट होगा !* *वह चुराए हुए धन को सिपाहियों के भय से जंगल में जमीन के अंदर छुपा देता था !* *एक रात विरदत्त नाम के लकड़हारे ने ये घटना देख ली। और चोर के जाने के पश्चात जमीन खोद कर उसके चुराए हुए धन का दसवां हिस्सा निकाल लिया और गड्ढे को पहले की भांति ढक दिया।* *लकड़हारा इतनी चालाकी से सामान निकलता की चोर को इस चोरी का पता ही नहीं चल पता था।* *एक दिन लकड़हारा अपनी पत्नी को धन देते हुए बोला, कि तुम रोज धन माँगा करती थी, लो आज पर्याप्त धन इक्कठा हो गया है।* *उसकी पत्नी ने कहा, जो धन अपने परिश्रम से उपार्जित न किया गया हो वह स्थाई नहीं होता है। इसलिए इस धन को जनता की भलाई में लगा दीजिये।* *विरदत्त को भी ये बात जच गयी ! इसलिए उसने इस धन से एक बहुत बड़ा तालाब खुदवाया जिसका पानी कभी भी नहीं सूखता था।* *लेकिन इसमें सीढ़िया लगनी रह गयी थी और सारे पैसे समाप्त हो गये थे।* *तो वह फिर से छिपकर चोर का अनुसरण करने लगा की वह धन कहां छुपाता है। इसके बाद फिर उससे दसवां हिस्सा निकाल कर तालाब का काम पूरा करवाया !* *तथा उसने भगवान शंकर और भगवान विष्णु के भव्य मंदिर बनवाए। बंजर जमीन पर खेत बनवाये और गरीबों में वितरित कर दिया।* *गरीबों ने उसकी सेवा से प्रसन्न होकर उसका नाम द्विजवर्मा रखा।* *जब द्विजवर्मा की मृत्यु हुई तब एक ओर से यमदूत आये और एक ओर से भगवान शंकर के गण आये। उनमे आपस में विवाद होने लगा इसी बीच वहां नारद जी पधारे।* *नारद जी ने उनको समझाया, आप विवाद न करें इस लकड़हारे ने चोरी के धन से परोपकार के कामों को कराया है...* *इसलिए जब तक यह कुमार्ग से अर्जित धन का प्रायश्चित नहीं कर लेता तब तक वायु रूप में अंतरिक्ष में विचरण करता रहेगा।* *नारद जी की बात सुनकर सभी दूत वापस लौट गए तथा द्विजवर्मा बारह वर्षों तक प्रेत बनकर घूमता रहा।* *नारद जी ने लकड़हारे की पत्नी से कहा, तुम ने अपने पति को सदमार्ग दिखाया इसलिए तुम ब्रम्ह्लोक जाओगी।* *लेकिन लकड़हारे की पत्नी अपने पति के दुःख से दुखी थी। वह देवर्षि से बोली, जब तक मेरे पति को देह नहीं मिलती तब तक मैं यहीं रहूंगी।* *जो गति मेरे पति की हुई वही गति मैं भी चाहती हूँ !* *ये बातें सुनकर देवर्षि बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बताया की तुम अपने पति की मुक्ति के लिए शिव की आराधना करो।* *उसने अपने पति की मुक्ति के लिए अथक मेहनत से भगवान शिव की आराधना की।* *इससे उसके पति के चोरी का सारा पाप धुल गया। फिर दोनों पति पत्नी को उत्तम लोक मिला।* *इस पौराणिक सत्य कथा का निष्कर्ष यही है कि कोई भला काम करने का अच्छा फल जरूर मिलता है लेकिन कोई भला काम करने के लिए कभी किसी गलत काम का सहारा नहीं लेना चाहिए...* *अन्यथा उस गलत काम का भी दंड जिंदा रहते या मरने के बाद जरूर भुगतना पड़ता है !* ********************* 2026-06-12 04:09:10
223229 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर ???? NAMOSTU NAMOSTU NAMOSTU GURUDEVAJI ?????? 2026-06-12 03:33:30