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40449664 |
?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? |
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*समाधिस्थ गणाचार्य श्री विरागसागर जी महामुनिराज* के सुयोग्य शिष्य एवं *चर्या शिरोमणि आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महामुनिराज* के आज्ञाकारी शिष्य श्रमण रत्न वात्सल्य मूर्ति, मनोज्ञ, निर्यापक, *श्रमणोपाध्याय श्री विभंजनसागर जी मुनिराज ससंघ* अभी श्री 1008 महावीर दिगम्बर जैन मन्दिर, हॉटेल ब्रह्मा गार्डन मार्ग, माणिकबाग, वडगांव बुद्रुक, पुणे-51, महाराष्ट्र में विराजमान है..........
जय जिनेन्द्र
आप भी समय पर दर्शन करके...पुण्यार्जन करें।
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???????????
*उपाध्याय श्री की आज की दिनचर्या*
प्रातः 06.30 बजे भक्ति, स्त्रोत पाठ, स्तुति एवं आचार्य वंदना
प्रातः 07.00 बजे स्वाध्याय प्रवचनसार (प्रकृष्ट देशना) ग्रंथ का
प्रातः 07.30 बजे जलाभिषेक एवं शान्तिधारा
प्रातः 08.00 बजे मंगल प्रवचन
प्रातः 09.00 बजे पंचामृत अभिषेक एवं शान्तिधारा
प्रातः 09.30 बजे आहार चर्या
दोपहर: 12.00 बजे से सामायिक, निजी स्वाध्याय एवं मोन साधना
दोपहर: 03.30 बजे श्रमण धर्मदेशना ग्रंथ का स्वाध्याय
शाम: 05.30 बजे से प्रतिक्रमण, सामायिक
शाम: 07.00 बजे से गुरु भक्ति, संस्कार यात्रा, जिज्ञासा समाधान, प्रश्न मंच एवं आरती
रात्रि: 08.00 बजे से 08.30 बजे तक वैयावृत्ती
*********************************
। l ॐ ।।
सुप्रभातम्।
आज का पंचांग।
♦️ तिथि-...*द्वादशी* (12)
*****************************
?आज भद्रा तिथि है जो की द्वितीया, सप्तमी और द्वादसी को होती हैं। इसका जो फल है वह कल्याण व शुभ है। और इन तीनो तिथि में यदि बुधवार का दिन आ जाये तो इस तिथि में प्रारम्भ किया गया कार्य सिद्ध होता है।और या सोमवार या शुक्रवार का दिन आ जाये मृत्यु योग बनता है मतलब कार्य प्रारम्भ अभी मत करें।
♦️ आज का दिन तिथि के अनुसार अच्छा नहीं है आज कोई भी नया कार्य प्रारम्भ मत करें
?दोपहर 01.30 बजे से दोपहर 03.00 बजे तक राहु काल रहेगा। कोई शुभ कार्य ना करें।
?आज के दिन की शुभ चौघड़िया इन समयो में आप शुभ कार्य कर सकते हैं।
लाभ: सुबह 05 बजकर 24 मिनिट से सुबह 06 बजकर 54 मिनिट
अमृत: सुबह 06 बजकर 54 मिनिट से सुबह 08 बजकर 24 मिनिट तक
शुभ: सुबह 09 बजकर 54 मिनिट से सुबह 11 बजकर 24 मिनिट तक
चर: दोपहर 02 बजकर 24 मिनिट से दोपहर 03 बजकर 54 मिनिट तक
लाभ: दोपहर 03 बजकर 54 मिनिट से दोपहर 05 बजकर 24 मिनिट
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♦️ पक्ष................कृष्ण
♦️ नक्षत्र...... अश्विनी/भरणी
♦️ योग...........अतिगंड
♦️ऋतु...............ग्रीष्म
♦️मास.................ज्येष्ठ
♦️ सूर्य की गति...... उत्तरायण
♦️सूर्योदय.......05.24 a m दिल्ली
♦️सूर्यास्त.....07.18 p m दिल्ली
♦️ शुक्रवार.....12 जून
♦️ ईसवी सन.......2026
♦️ वीर निर्वाण संवत...2552
♦️ विक्रम संवत......2083
???????
???जय जिनेन्द्र ???
गुरूदेव से जुड़ी जानकारियां अब आप यूट्यूब से भी प्राप्त कर सकते हैं चातुर्मास के पश्चात् *धार से पुणे तक की यात्रा* के बीच की सभी जानकारी अभिषेक, शान्तिधारा, प्रवचन, स्वाध्याय, गुरु भक्ति, सांस्कृतिक कार्यक्रम, विधान आदि सभी वीडिओ इस लिंक पर देख सकते है....vibhanjansagar ji muniraj channel
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*आप भी मुनिराज के मुखारबिन्द से प्रतिदिन की शान्तिधारा को देख सकते है और अन्य भी आहार विहार के सभी कार्यक्रम और कुछ विशेष भी देख सकते है*....
मुनिश्री की सभी जानकारी और जैन धर्म के बारे में नयी-नयी जानकारी प्राप्त करने के लिए आप भी हमारे
whatsapp से जुड़ सकते हैं ।
जुड़ने के लिए अपना नाम और आप कहाँ से हैं ये अपने नम्बर से हमारे इस नंबर पर send करें-09654793524
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2026-06-12 05:25:54 |
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?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? |
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*कहानी बड़ी सुहानी*
(1) *कहानी*
*"अधर्म का दुष्परिणाम कब"*
एक गांव में एक परचून की दुकान करता था, उसके सामने ही एक हलवाई की दुकान भी थी दोनों की दुकान आमने-सामने थी इन दोनों में परचुनी तो ईमानदारी से धर्म पूर्वक सौदा बेचता था और हलवाई दूध में पानी मिलाकर बेईमानी और अधर्म पूर्वक व्यवहार करता था।
थोड़े ही दिनों में हलवाई मालदार हो गया और परचुनी गरीब ही बना रहा, परचुनी इस विषय में पंडितों से प्रश्न किया करता कि धन कैसे होता है, इसका यह उत्तर कि धर्म से ही धन होता है उसके समझ में नहीं आता था क्योंकि उसका पड़ोसी हलवाई तो अधर्म करके ही मालदार हुवा था।
एक दिन एक विरक्त महात्मा आए। उनसे भी परचुनी ने यही प्रश्न किया महात्मा चुप हो गए और वहीं रहने लगे कुछ दिन बाद महात्मा बोले तुम गंगा स्नान को चलो, वहां पहुंचकर महात्मा ने गंगा किनारे एक गड्ढा आदमी की ऊंचाई से गहरा तैयार कराया और परचुनी से उसके भीतर खड़े होने को कहा उसके खड़े हो जाने पर वह दूसरे आदमियों द्वारा उस गड्ढे में जल डलवाने लगे सौ दो सौ घड़ा जल डालने पर परचूनी की गर्दन तक जल आगया।
इस परचुनी बोला कि अब यदि दो-चार घडे और डलवाए तो मैं डूब कर मर जाऊंगा महात्मा बोले यदि सौ घड़ा पानी डालने पर तू नहीं मारा तो दो चार घडे डलवाने से कैसे मर जाएगा।
फिर उपदेश किया देखो इस जल की ही तरह जब तक पाप मनुष्य के कंठ तक रहता है तब तक पता नहीं चलता, जब आगे बढ़ता है और दम घुटने लगता है तभी उसका दुष्परिणाम जान पड़ता है, इसी प्रकार जब अधर्म उपार्जित संपत्ति को चोर चुरा लेते हैं अग्नि भस्म कर देती है अथवा रोग या मुकदमा बाजी उसे समाप्त कर देती है तभी उसका दुष्परिणाम मालूम होता है वास्तव में तो धर्म से ही धन की रक्षा होती है।
****************************************
(2) *कहानी*
एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी। चलते-चलते वह थक गई थी। तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख बुढ़िया ने आवाज दी,
‘अरे बेटा, एक बात तो सुन।’
घुड़सवार रुक गया।
उसने पूछा, ‘क्या बात है माई?’
बुढ़िया ने कहा, ‘बेटा, मुझे उस सामने वाले
गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं जाती। तू भी शायद उधर ही जा रहा है।यह गठरी घोड़े पर रख ले।
मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर
हूं। गांव अभी बहुत दूर है। पता नहीं तू कब
तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। वहां पहुंचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?’ यह कहकर वह चल पड़ा।
कुछ ही दूर जाने के बाद उसने अपने आप से
कहा, ‘तू भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है,
ठीक से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे
ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं। तुझे
गठरी दे रही थी। संभव है उस गठरी में कोई
कीमती सामान हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता। चल वापस, गठरी ले ले। ‘
वह घूमकर वापस आ गया और बुढ़िया से
बोला, ‘माई, ला अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।’
बुढ़िया ने कहा, ‘न बेटा, अब तू जा, मुझे
गठरी नहीं देनी।’
घुड़सवार ने कहा,
‘अभी तो तू कह रही थी कि ले
चल। अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही।
ऐसा क्यों?
यह उलटी बात तुझे किसने समझाई है?’
बुढ़िया मुस्कराकर बोली, ‘उसी ने समझाई
है जिसने तुझे यह समझाया कि माई
की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है
वही मेरे भीतर भी बैठा है।
तुझे उसने कहा कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी।’
****************************************
(3) *कहानी*
*एक राजा के पास कई हाथी थे,*
*लेकिन एक हाथी बहुत शक्तिशाली आज्ञाकारी,समझदार व युद्ध-कौशल में निपुण था।* युद्धों में वह राजा को विजय दिलाकर ही वापस लौटता था*....
*इसलिए वह महाराज का सबसे प्रिय हाथी था।*
*समय गुजरता गया ..*
*और वह वृद्ध दिखने लगा।*
*एक दिन वह सरोवर में जल पीने के लिए गया, कीचड़ में उसका पैर धँस गया और फिर धँसता ही चला गया।*
*उस हाथी ने बहुत कोशिश की, लेकिन वह उस कीचड़ से स्वयं को नहीं निकाल पाया।*
हाथी के फँसने का समाचार राजा तक भी पहुँचा।*
*राजा समेत सभी लोग हाथी के आसपास ईकट्ठे हो गए और विभिन्न प्रकार के प्रयत्न उसे निकालने के लिए करने लगे।*
*लेकिन बहुत देर तक प्रयास करने के उपरांत कोई मार्ग नहीं निकला..*
*तभी गौतम बुद्ध मार्गभ्रमण कर रहे थे। राजा और सारा मंत्रीमंडल तथागत गौतम बुद्ध के पास गये और अनुरोध किया कि आप हमें इस विकट परिस्थिति में मार्गदर्शन करें गौतम बुद्ध ने सबसे पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया और फिर राजा को सुझाव दिया कि सरोवर के चारों और युद्ध के नगाड़े बजाए जाएँ।*
*सुनने वालों को विचित्र लगा कि भला नगाड़े बजाने से वह फँसा हुआ हाथी बाहर कैसे निकलेगा।
जैसे ही युद्ध के नगाड़े बजने प्रारंभ हुए, वैसे ही उस मृतप्राय हाथी के हाव-भाव में परिवर्तन आने लगा।*
*पहले तो वह धीरे-धीरे करके खड़ा हुआ और फिर सबको हतप्रभ करते हुए स्वयं ही कीचड़ से बाहर निकल आया।*
*गौतम बुद्ध ने सबको स्पष्ट किया कि हाथी की शारीरिक क्षमता में कमी नहीं थी, आवश्यकता मात्र उसके अंदर उत्साह के संचार करने की थी।*
*जीवन में उत्साह बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य सकारात्मक चिंतन बनाए रखें और निराशा को हावी न होने दें...*
*कभी – कभी निरंतर मिलने वाली असफलताओं से व्यक्ति यह मान लेता है कि अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर सकता, लेकिन यह पूर्ण सच नहीं है.....*
*"सकारात्मक सोच ही आदमी को "अपनी मंजिल तक ले जाती है...।।*
*आप हमेशा सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण , स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें*
****************************************
(4) *कहानी*
*उत्तम आचरण का मूल्य अधिक है, धन संपत्ति का कम।*
दो मित्र थे, मोहन और महेश। अनेक विषयों में उनके विचार मिलते थे, और किसी-किसी बात में नहीं भी मिलते थे। *(क्योंकि संसार में ऐसा देखा जाता है कि किन्हीं भी दो व्यक्तियों के विचार 100 % एक समान नहीं होते। कहीं न कहीं, कुछ-न-कुछ अंतर तो होता ही है।)*
फिर भी अनेक विषयों में मोहन और महेश के विचार मिलते थे, इस कारण उनकी मित्रता बन गई। दोनों पढ़े लिखे और बुद्धिमान थे। परोपकारी स्वभाव के भी थे । दोनों में अंतर यह था कि मोहन की रुचि धन संपत्ति इकट्ठी करने में अधिक थी। परंतु महेश की रुचि उत्तम आचरण में अधिक थी।
अपनी रुचि के अनुसार मोहन ने व्यापार करके धन संपत्ति जमा की, और महेश ने उत्तम आचरण करके पुण्य जमा किया। संसार के बुद्धिमान लोगों ने उन दोनों का परीक्षण किया और अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार दोनों को नंबर दिए। मोहन के नंबर कम रहे। महेश के नंबर अधिक रहे। क्या आप सोच पाएंगे, कि ऐसा क्यों हुआ?
इसलिए *कि धन संपत्ति का मूल्य कम है, और उत्तम आचरण का मूल्य अधिक है। क्योंकि धन संपत्ति से सुविधाएं तो मिलती हैं, परंतु शांति नहीं मिलती। जबकि उत्तम आचरण करने से स्वयं को और दूसरों को भी शांति मिलती है।*
इसलिये सुविधाओं की अपेक्षा शांति का मूल्य अधिक होने से, मोहन की अपेक्षा महेश को नंबर अधिक मिले।
अब मृत्यु के बाद अगले जन्म में, ईश्वर भी उन दोनों को नंबर देगा। तो आप समझ ही गए होंगे, कि ईश्वर भी किसको नंबर कम और किसको अधिक देगा?
*ईश्वर भी अगले जन्म में मोहन को नंबर और सुविधाएं कम देगा। तथा महेश को नंबर और सुविधाएं अधिक देगा। यही न्याय है।*
अब आप यदि स्वयं को बुद्धिमान समझते हैं, तो विचार करें, कि *मोहन का अनुकरण किया जाए, या महेश का?*
****************************************
(5) *कहानी*
एक बार समुद्री तूफ़ान के बाद हजारों लाखों मछलियाँ किनारे पर रेत पर तड़प तड़प कर मर रहीँ थीं ! इस भयानक स्थिति को देखकर पास में रहने वाले एक 6 वर्ष के बच्चे से रहा नहीं गया, और वह एक एक मछली उठा कर समुद्र में वापस फेकनें लगा ! यह देख कर उसकी माँ बोली, बेटा लाखों की संख्या में है , तू कितनों की जान बचाएगा ,यह सुनकर बच्चे ने अपनी गति और बढ़ा दी, माँ फिर बोली बेटा रहनें दे कोई फ़र्क नहीं पड़ता ! बच्चा जोर जोर से रोने लगा और एक मछली को समुद्र में फेकतें हुए जोर से बोला- माँ ,इसको तो फ़र्क पड़ता है.
दूसरी मछली को उठाता और फिर बोलता- माँ, इसको तो फ़र्क पड़ता हैं ! माँ ने बच्चे को सीने से लगा लिया !
हो सके तो लोगों को हमेशा होंसला और उम्मीद देनें की कोशिश करो, न जानें कब आपकी वजह से किसी की जिन्दगी बदल जाए!
क्योंकि आपको कोई फ़र्क नहीं पड़ता पर
'उसको तो फ़र्क पड़ता है' .....
इस महामारी में अगर हम किसी एक को भी बचा सके तो हमारा सौभाग्य होगा।
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2026-06-12 05:25:10 |
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?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? |
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*कहानी बड़ी सुहानी*
(1) *कहानी*
*"अधर्म का दुष्परिणाम कब"*
एक गांव में एक परचून की दुकान करता था, उसके सामने ही एक हलवाई की दुकान भी थी दोनों की दुकान आमने-सामने थी इन दोनों में परचुनी तो ईमानदारी से धर्म पूर्वक सौदा बेचता था और हलवाई दूध में पानी मिलाकर बेईमानी और अधर्म पूर्वक व्यवहार करता था।
थोड़े ही दिनों में हलवाई मालदार हो गया और परचुनी गरीब ही बना रहा, परचुनी इस विषय में पंडितों से प्रश्न किया करता कि धन कैसे होता है, इसका यह उत्तर कि धर्म से ही धन होता है उसके समझ में नहीं आता था क्योंकि उसका पड़ोसी हलवाई तो अधर्म करके ही मालदार हुवा था।
एक दिन एक विरक्त महात्मा आए। उनसे भी परचुनी ने यही प्रश्न किया महात्मा चुप हो गए और वहीं रहने लगे कुछ दिन बाद महात्मा बोले तुम गंगा स्नान को चलो, वहां पहुंचकर महात्मा ने गंगा किनारे एक गड्ढा आदमी की ऊंचाई से गहरा तैयार कराया और परचुनी से उसके भीतर खड़े होने को कहा उसके खड़े हो जाने पर वह दूसरे आदमियों द्वारा उस गड्ढे में जल डलवाने लगे सौ दो सौ घड़ा जल डालने पर परचूनी की गर्दन तक जल आगया।
इस परचुनी बोला कि अब यदि दो-चार घडे और डलवाए तो मैं डूब कर मर जाऊंगा महात्मा बोले यदि सौ घड़ा पानी डालने पर तू नहीं मारा तो दो चार घडे डलवाने से कैसे मर जाएगा।
फिर उपदेश किया देखो इस जल की ही तरह जब तक पाप मनुष्य के कंठ तक रहता है तब तक पता नहीं चलता, जब आगे बढ़ता है और दम घुटने लगता है तभी उसका दुष्परिणाम जान पड़ता है, इसी प्रकार जब अधर्म उपार्जित संपत्ति को चोर चुरा लेते हैं अग्नि भस्म कर देती है अथवा रोग या मुकदमा बाजी उसे समाप्त कर देती है तभी उसका दुष्परिणाम मालूम होता है वास्तव में तो धर्म से ही धन की रक्षा होती है।
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(2) *कहानी*
एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी। चलते-चलते वह थक गई थी। तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख बुढ़िया ने आवाज दी,
‘अरे बेटा, एक बात तो सुन।’
घुड़सवार रुक गया।
उसने पूछा, ‘क्या बात है माई?’
बुढ़िया ने कहा, ‘बेटा, मुझे उस सामने वाले
गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं जाती। तू भी शायद उधर ही जा रहा है।यह गठरी घोड़े पर रख ले।
मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर
हूं। गांव अभी बहुत दूर है। पता नहीं तू कब
तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। वहां पहुंचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?’ यह कहकर वह चल पड़ा।
कुछ ही दूर जाने के बाद उसने अपने आप से
कहा, ‘तू भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है,
ठीक से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे
ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं। तुझे
गठरी दे रही थी। संभव है उस गठरी में कोई
कीमती सामान हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता। चल वापस, गठरी ले ले। ‘
वह घूमकर वापस आ गया और बुढ़िया से
बोला, ‘माई, ला अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।’
बुढ़िया ने कहा, ‘न बेटा, अब तू जा, मुझे
गठरी नहीं देनी।’
घुड़सवार ने कहा,
‘अभी तो तू कह रही थी कि ले
चल। अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही।
ऐसा क्यों?
यह उलटी बात तुझे किसने समझाई है?’
बुढ़िया मुस्कराकर बोली, ‘उसी ने समझाई
है जिसने तुझे यह समझाया कि माई
की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है
वही मेरे भीतर भी बैठा है।
तुझे उसने कहा कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी।’
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(3) *कहानी*
*एक राजा के पास कई हाथी थे,*
*लेकिन एक हाथी बहुत शक्तिशाली आज्ञाकारी,समझदार व युद्ध-कौशल में निपुण था।* युद्धों में वह राजा को विजय दिलाकर ही वापस लौटता था*....
*इसलिए वह महाराज का सबसे प्रिय हाथी था।*
*समय गुजरता गया ..*
*और वह वृद्ध दिखने लगा।*
*एक दिन वह सरोवर में जल पीने के लिए गया, कीचड़ में उसका पैर धँस गया और फिर धँसता ही चला गया।*
*उस हाथी ने बहुत कोशिश की, लेकिन वह उस कीचड़ से स्वयं को नहीं निकाल पाया।*
हाथी के फँसने का समाचार राजा तक भी पहुँचा।*
*राजा समेत सभी लोग हाथी के आसपास ईकट्ठे हो गए और विभिन्न प्रकार के प्रयत्न उसे निकालने के लिए करने लगे।*
*लेकिन बहुत देर तक प्रयास करने के उपरांत कोई मार्ग नहीं निकला..*
*तभी गौतम बुद्ध मार्गभ्रमण कर रहे थे। राजा और सारा मंत्रीमंडल तथागत गौतम बुद्ध के पास गये और अनुरोध किया कि आप हमें इस विकट परिस्थिति में मार्गदर्शन करें गौतम बुद्ध ने सबसे पहले घटनास्थल का निरीक्षण किया और फिर राजा को सुझाव दिया कि सरोवर के चारों और युद्ध के नगाड़े बजाए जाएँ।*
*सुनने वालों को विचित्र लगा कि भला नगाड़े बजाने से वह फँसा हुआ हाथी बाहर कैसे निकलेगा।
जैसे ही युद्ध के नगाड़े बजने प्रारंभ हुए, वैसे ही उस मृतप्राय हाथी के हाव-भाव में परिवर्तन आने लगा।*
*पहले तो वह धीरे-धीरे करके खड़ा हुआ और फिर सबको हतप्रभ करते हुए स्वयं ही कीचड़ से बाहर निकल आया।*
*गौतम बुद्ध ने सबको स्पष्ट किया कि हाथी की शारीरिक क्षमता में कमी नहीं थी, आवश्यकता मात्र उसके अंदर उत्साह के संचार करने की थी।*
*जीवन में उत्साह बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य सकारात्मक चिंतन बनाए रखें और निराशा को हावी न होने दें...*
*कभी – कभी निरंतर मिलने वाली असफलताओं से व्यक्ति यह मान लेता है कि अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर सकता, लेकिन यह पूर्ण सच नहीं है.....*
*"सकारात्मक सोच ही आदमी को "अपनी मंजिल तक ले जाती है...।।*
*आप हमेशा सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण , स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें*
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(4) *कहानी*
*उत्तम आचरण का मूल्य अधिक है, धन संपत्ति का कम।*
दो मित्र थे, मोहन और महेश। अनेक विषयों में उनके विचार मिलते थे, और किसी-किसी बात में नहीं भी मिलते थे। *(क्योंकि संसार में ऐसा देखा जाता है कि किन्हीं भी दो व्यक्तियों के विचार 100 % एक समान नहीं होते। कहीं न कहीं, कुछ-न-कुछ अंतर तो होता ही है।)*
फिर भी अनेक विषयों में मोहन और महेश के विचार मिलते थे, इस कारण उनकी मित्रता बन गई। दोनों पढ़े लिखे और बुद्धिमान थे। परोपकारी स्वभाव के भी थे । दोनों में अंतर यह था कि मोहन की रुचि धन संपत्ति इकट्ठी करने में अधिक थी। परंतु महेश की रुचि उत्तम आचरण में अधिक थी।
अपनी रुचि के अनुसार मोहन ने व्यापार करके धन संपत्ति जमा की, और महेश ने उत्तम आचरण करके पुण्य जमा किया। संसार के बुद्धिमान लोगों ने उन दोनों का परीक्षण किया और अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार दोनों को नंबर दिए। मोहन के नंबर कम रहे। महेश के नंबर अधिक रहे। क्या आप सोच पाएंगे, कि ऐसा क्यों हुआ?
इसलिए *कि धन संपत्ति का मूल्य कम है, और उत्तम आचरण का मूल्य अधिक है। क्योंकि धन संपत्ति से सुविधाएं तो मिलती हैं, परंतु शांति नहीं मिलती। जबकि उत्तम आचरण करने से स्वयं को और दूसरों को भी शांति मिलती है।*
इसलिये सुविधाओं की अपेक्षा शांति का मूल्य अधिक होने से, मोहन की अपेक्षा महेश को नंबर अधिक मिले।
अब मृत्यु के बाद अगले जन्म में, ईश्वर भी उन दोनों को नंबर देगा। तो आप समझ ही गए होंगे, कि ईश्वर भी किसको नंबर कम और किसको अधिक देगा?
*ईश्वर भी अगले जन्म में मोहन को नंबर और सुविधाएं कम देगा। तथा महेश को नंबर और सुविधाएं अधिक देगा। यही न्याय है।*
अब आप यदि स्वयं को बुद्धिमान समझते हैं, तो विचार करें, कि *मोहन का अनुकरण किया जाए, या महेश का?*
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(5) *कहानी*
एक बार समुद्री तूफ़ान के बाद हजारों लाखों मछलियाँ किनारे पर रेत पर तड़प तड़प कर मर रहीँ थीं ! इस भयानक स्थिति को देखकर पास में रहने वाले एक 6 वर्ष के बच्चे से रहा नहीं गया, और वह एक एक मछली उठा कर समुद्र में वापस फेकनें लगा ! यह देख कर उसकी माँ बोली, बेटा लाखों की संख्या में है , तू कितनों की जान बचाएगा ,यह सुनकर बच्चे ने अपनी गति और बढ़ा दी, माँ फिर बोली बेटा रहनें दे कोई फ़र्क नहीं पड़ता ! बच्चा जोर जोर से रोने लगा और एक मछली को समुद्र में फेकतें हुए जोर से बोला- माँ ,इसको तो फ़र्क पड़ता है.
दूसरी मछली को उठाता और फिर बोलता- माँ, इसको तो फ़र्क पड़ता हैं ! माँ ने बच्चे को सीने से लगा लिया !
हो सके तो लोगों को हमेशा होंसला और उम्मीद देनें की कोशिश करो, न जानें कब आपकी वजह से किसी की जिन्दगी बदल जाए!
क्योंकि आपको कोई फ़र्क नहीं पड़ता पर
'उसको तो फ़र्क पड़ता है' .....
इस महामारी में अगर हम किसी एक को भी बचा सके तो हमारा सौभाग्य होगा।
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2026-06-12 05:25:09 |
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40449664 |
?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? |
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2026-06-12 05:25:04 |
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?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? |
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2026-06-12 05:25:04 |
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| 223323 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*?सभी शब्दों का अर्थ मिल*
*सकता है;*
*परन्तु*
*जीवन का अर्थ*
*जीवन जी कर*
*और*
*आस्था का अर्थ*
*आस्तिक बनने पर ही मिल*
*सकता है;...!!*
जय जिनेंद्र |
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2026-06-12 05:24:20 |
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| 223324 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*?सभी शब्दों का अर्थ मिल*
*सकता है;*
*परन्तु*
*जीवन का अर्थ*
*जीवन जी कर*
*और*
*आस्था का अर्थ*
*आस्तिक बनने पर ही मिल*
*सकता है;...!!*
जय जिनेंद्र |
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2026-06-12 05:24:20 |
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49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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?? *प्रेरक वचन* ?
सही मौके पर बोलना साहस है, लेकिन मौके की नजाकत देख खामोश रहना उससे बड़ा साहस है।
? *जय जिनेन्द्र*? |
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2026-06-12 05:24:18 |
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49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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?? *प्रेरक वचन* ?
सही मौके पर बोलना साहस है, लेकिन मौके की नजाकत देख खामोश रहना उससे बड़ा साहस है।
? *जय जिनेन्द्र*? |
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2026-06-12 05:24:18 |
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40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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2026-06-12 05:22:48 |
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