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1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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### *"धर्मात्मा आत्मा के आश्रय से सुखी है - श्री स्वामी जी"*
### *"शान्ति और आनन्द से परिपूर्ण भरा ज्ञायक मैं हूँ - पारसमणी"*
#### *1. सच्चा सुखी कौन? - जिसके पास "मैं" है*
*तस्वीर का सार एक वाक्य में*: _अहो! आत्मा आनन्दस्वभाव से परिपूर्ण है - ऐसे आत्मा की ओर देखे तो दुःख है ही कहाँ?_
*दुनिया का हिसाब*: _बंगला, बैंक बैलेंस, पद, प्रतिष्ठा = सुखी_। _शरीर बीमार, ब्रह्मांड पलट जाए = दुःखी_।
*धर्मात्मा का हिसाब*: _भले शरीर का चाहे जो हो, ब्रह्मांड पलट जाए_ → _मेरी शांति-मेरा आनंद आत्मा के ही आश्रित है_।
_कल पढ़ा न? स्वकी अस्ति में परकी नास्ति_। _जब "मैं ज्ञायक हूँ" का आश्रय ले लिया_ → _बाहर क्या हुआ, इससे फर्क ही नहीं पड़ता_।
#### *2. सुख बाहर नहीं, स्व-आश्रित है - यही निज वैभव है*
*श्री स्वामी जी बोल रहे हैं*: _मैं अपने आनंद-सागर में डुबकी लगाकर लीन हुआ_।
_वहाँ मेरी शांति में विघ्न डालने वाला जगत में कोई नहीं है_।
*क्यों नहीं है विघ्न डालने वाला?*
_क्योंकि दुःख आता है पर-आश्रय से_। _"इसने बुरा कहा इसलिए दुःख"_, _"नुकसान हो गया इसलिए दुःख"_।
_स्व-आश्रय = "मैं ज्ञायक हूँ, शांत हूँ, आनंद हूँ"_ → _यहाँ कोई विघ्न डाल ही नहीं सकता_।
_कल पढ़ा: जब उपयोग स्वभाव में लगे तो विभाव अपने आप हट जाएं_। _स्वभाव = आनंद_। _उपयोग लगा = सुख प्रकट_।
#### *3. "शान्ति और आनन्द से परिपूर्ण भरा ज्ञायक मैं हूँ"*
*पारसमणी का वचन - पक्का निर्णय*:
*_खाली नहीं हूँ, भरा हुआ हूँ_। _किससे भरा?_ _शांति से, आनंद से, ज्ञान-दर्शन से_।*
_कमी किसकी?_ _किसी की नहीं_। _परद्रव्य की जरूरत ही नहीं_।
_वो सुख कहाँ है?_ _बाहर स्वर्ग में नहीं_ → _तेरे ज्ञायक स्वभाव में_।
### *आज का 10 मिनट का "स्व-आश्रय" प्रयोग*
*जब दुःख, टेंशन, अशांति आए, तुरंत ये 3 बात भासो*:
*1. "अहो! मैं आनंदस्वभाव से परिपूर्ण हूँ"*
*2. "भले शरीर का चाहे जो हो, मेरी शांति आत्मा के आश्रित है"*
*3. "मेरा आनंद-सागर मैं खुद हूँ, इसमें डुबकी लगाता हूँ"*
_बस 10 मिनट स्व में टिके_ → _बाहर की सृष्टि वही रहेगी, पर तुम्हारी सृष्टि शांत हो जाएगी_।
### *सार: 10 दिन की माला का मुकुट*
_1. दृष्टि बदली_ → _2. निश्चय प्रतिक्रमण किया_ → _3. उपयोग स्वभाव में लगाया_ → _4. आज: आत्म-आश्रय से सुखी हुए_
_पहले हम सुख ढूंढते थे_ → _अब हम मै सुख हैं_।
_पहले शांति मांगते थे_ → _अब शांति हम में हैं_।
_धर्मात्मा वो नहीं जो मंदिर जाता है_। _धर्मात्मा वो है जो आत्मा के आश्रय जीता है_।
_आत्मा को कभी मत बेचना - न सुख के लिए, न शांति के लिए_।
_क्योंकि आत्मा खुद आनंदस्वभाव ही है - उसका आश्रय ले लो, बस सुखी हो जाओ_।
_पूर्णता के लक्ष से ही धर्म की शुरुआत होती है_।
*_स्वयंकी ओर देखते हुये स्वयंमें मग्न हुआ वही सच्चा निज-दर्शन हैं_ ?*
*स्वाध्याय परम निर्दोष तप है। आज दिन भर एक ही धुन: "मैं ज्ञायक हूँ, मैं आनंद हूँ, मैं सुखी हूँ"* ?✨
*सर्वज्ञ शासन जयवंत वर्ते*
*शुद्ध आगम वाणी* |
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2026-06-14 09:02:56 |
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