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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Phone
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Message
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Status
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Date |
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| 76668 |
40449657 |
?️?SARVARTHASIDDHI ??️ |
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*आर्यिका मां विज्ञानमति माताजी द्वारा रचित सम्यक्त्व मञ्जूषा एवं सच्चे देव का स्वरूप*
*देवों में सम्यक्त्व उत्पत्ति के चार कारण कहे गए है -*
_१- जिनमहिमा दर्शन २- धर्म श्रवण ३- जाति स्मरण और ४- देव ऋद्धि दर्शन_
*?️ महापुराण 19 सर्ग में केवल एक काललब्धि ही प्ररुपण की गई है, उसमें इन शेष लब्धियों का होना कैसे सम्भव हैं ⁉️*
_?️ नहीं, क्योंकि प्रतिसमय अनन्त गुण हीन अनुभाग की उदीरणा (अर्थात् क्षयोपशम लब्धि) अनन्त गुणित क्रम द्वारा विशुद्धि (विशुद्धि लब्धि) ओर आचार्य के उपदेश की प्राप्ति (देशना लब्धि)का एक काल लब्धि (प्रायोग्य लब्धि) में होना सम्भव है।_ *(धवला ६/२०३-५)* _यदि सबका काल ही कारण मान लिया जाये (अर्थात् केवल काल लब्धि से मुक्ति होना मान लिया जाए) तो बाह्य और अभ्यंतर कारण सामग्री का ही लोप हो जाएगा।_ *(राजवार्तिक २/३)।*
*प्रथमोपशम सम्यक्त्व की प्राप्ति के पूर्व पांच लब्धियां होती है -* _क्षयोपशम लब्धि, विशुद्धि लब्धि, देशना लब्धि,प्रायोग्य लब्धि और करण लब्धि।_
*१- क्षयोपशम लब्धि -* _प्रति समय क्रम से अनन्तगुणी हीन होकर कर्ममल पटल शक्ति की जब उदीरणा होती है तब क्षयोपशम लब्धि होती है।_ *(लब्धिसार - ४)* _निगोदिया एकेन्द्रिय जीव की अवस्था से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय की अवस्था तक तो यह जीव अपने किए हुए कर्मों के फल को ही भोगता रहता है। उस समय तो यह अपने मर्मभेदी कर्मों का सताया हुआ इतना बेहोश रहता है कि आत्मकल्याण के मार्ग की ओर इसकी रुचि ही नहीं हो पाती है। मैं भी एक जीव हूं, मुझे भी अपने आत्महित के लिए कुछ तो करना ही चाहिए, ऐसा विचार भी नहीं होता। जैसे कि - एक नशेबाज आदमी अपने किए हुए नशे का सताया व्यर्थ ही तड़पता रहता है। जब उसका नशा कुछ कम पड़ता है तो वह विचारता है कि देखो ! मैं कैसा पागल हो गया कि मुझे जो अमुक कार्य करना था वो भी अभी तक नहीं हुआ। अब वह कार्य मुझे करना चाहिए इत्यादि। वैसे ही जब यह जीव संज्ञीपने को प्राप्त कर पाता है, इसके अंतरंग में कर्मचेतना का प्रादुर्भाव होता है। तब वह सोचता है कि मुझे भूख-प्यास क्यों लगती है, थकान क्यों होती है ? जिससे मुझे बार-बार कष्ट उठाना पड़ता है। यह भी एक प्रकार का रोग ही है तो क्या इसके मिटाने का भी कोई उपाय है,अगर है तो मैं भी वही करूं इत्यादि। कर्त्तव्य पर विचार आने का नाम कर्मचेतना है जो कि संज्ञीपने के होने पर ही हो सकती है और संज्ञीपने की प्राप्ति कर्मों के क्षयोपशम से होती है अतः इस प्रकार के विशेष क्षयोपशम का होना पहली क्षयोपशम लब्धि है। इसके होने पर इस जीव की अपने हित की तरफ दृष्टि हो सकती है।_ *(सम्यक्त्वसार शतक)*
*क्रमशः.....* |
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2026-04-11 09:21:01 |
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| 76667 |
40449657 |
?️?SARVARTHASIDDHI ??️ |
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*आर्यिका मां विज्ञानमति माताजी द्वारा रचित सम्यक्त्व मञ्जूषा एवं सच्चे देव का स्वरूप*
*देवों में सम्यक्त्व उत्पत्ति के चार कारण कहे गए है -*
_१- जिनमहिमा दर्शन २- धर्म श्रवण ३- जाति स्मरण और ४- देव ऋद्धि दर्शन_
*?️ महापुराण 19 सर्ग में केवल एक काललब्धि ही प्ररुपण की गई है, उसमें इन शेष लब्धियों का होना कैसे सम्भव हैं ⁉️*
_?️ नहीं, क्योंकि प्रतिसमय अनन्त गुण हीन अनुभाग की उदीरणा (अर्थात् क्षयोपशम लब्धि) अनन्त गुणित क्रम द्वारा विशुद्धि (विशुद्धि लब्धि) ओर आचार्य के उपदेश की प्राप्ति (देशना लब्धि)का एक काल लब्धि (प्रायोग्य लब्धि) में होना सम्भव है।_ *(धवला ६/२०३-५)* _यदि सबका काल ही कारण मान लिया जाये (अर्थात् केवल काल लब्धि से मुक्ति होना मान लिया जाए) तो बाह्य और अभ्यंतर कारण सामग्री का ही लोप हो जाएगा।_ *(राजवार्तिक २/३)।*
*प्रथमोपशम सम्यक्त्व की प्राप्ति के पूर्व पांच लब्धियां होती है -* _क्षयोपशम लब्धि, विशुद्धि लब्धि, देशना लब्धि,प्रायोग्य लब्धि और करण लब्धि।_
*१- क्षयोपशम लब्धि -* _प्रति समय क्रम से अनन्तगुणी हीन होकर कर्ममल पटल शक्ति की जब उदीरणा होती है तब क्षयोपशम लब्धि होती है।_ *(लब्धिसार - ४)* _निगोदिया एकेन्द्रिय जीव की अवस्था से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय की अवस्था तक तो यह जीव अपने किए हुए कर्मों के फल को ही भोगता रहता है। उस समय तो यह अपने मर्मभेदी कर्मों का सताया हुआ इतना बेहोश रहता है कि आत्मकल्याण के मार्ग की ओर इसकी रुचि ही नहीं हो पाती है। मैं भी एक जीव हूं, मुझे भी अपने आत्महित के लिए कुछ तो करना ही चाहिए, ऐसा विचार भी नहीं होता। जैसे कि - एक नशेबाज आदमी अपने किए हुए नशे का सताया व्यर्थ ही तड़पता रहता है। जब उसका नशा कुछ कम पड़ता है तो वह विचारता है कि देखो ! मैं कैसा पागल हो गया कि मुझे जो अमुक कार्य करना था वो भी अभी तक नहीं हुआ। अब वह कार्य मुझे करना चाहिए इत्यादि। वैसे ही जब यह जीव संज्ञीपने को प्राप्त कर पाता है, इसके अंतरंग में कर्मचेतना का प्रादुर्भाव होता है। तब वह सोचता है कि मुझे भूख-प्यास क्यों लगती है, थकान क्यों होती है ? जिससे मुझे बार-बार कष्ट उठाना पड़ता है। यह भी एक प्रकार का रोग ही है तो क्या इसके मिटाने का भी कोई उपाय है,अगर है तो मैं भी वही करूं इत्यादि। कर्त्तव्य पर विचार आने का नाम कर्मचेतना है जो कि संज्ञीपने के होने पर ही हो सकती है और संज्ञीपने की प्राप्ति कर्मों के क्षयोपशम से होती है अतः इस प्रकार के विशेष क्षयोपशम का होना पहली क्षयोपशम लब्धि है। इसके होने पर इस जीव की अपने हित की तरफ दृष्टि हो सकती है।_ *(सम्यक्त्वसार शतक)*
*क्रमशः.....* |
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2026-04-11 09:21:00 |
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| 76665 |
40449682 |
तन्मय सागर प्रभावना ग्रुप |
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2026-04-11 09:20:26 |
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| 76666 |
40449682 |
तन्मय सागर प्रभावना ग्रुप |
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2026-04-11 09:20:26 |
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| 76664 |
40449659 |
सकल जैन महिला मंडळ फलटण |
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Niyam swikar hai vandami mataji ??? |
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2026-04-11 09:19:31 |
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| 76663 |
40449659 |
सकल जैन महिला मंडळ फलटण |
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Niyam swikar hai vandami mataji ??? |
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2026-04-11 09:19:30 |
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| 76661 |
40449686 |
सैतवाल मुखपत्र ? |
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2026-04-11 09:16:43 |
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| 76662 |
40449686 |
सैतवाल मुखपत्र ? |
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2026-04-11 09:16:43 |
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| 76659 |
40449660 |
Acharya PulakSagarji 07 |
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*1️⃣1️⃣ अप्रैल 2️⃣0️⃣2️⃣6️⃣*
??????? ?
*सफलता से ज्यादा संतोष अच्छा है*
*कारण आपकी सफलता दूसरे पर निर्भर करती है*
*जबकि संतोष आपकी आत्मा तय करती है*
?❤️❤️❤️❤️❤️❤️?
*मौन, एकांत, स्थिरता और सादगी जिसके पास है*
*उसके पास सबकुछ है*
????????
*❤️? जय जिनेन्द्र* ?❤️ |
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2026-04-11 09:15:22 |
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| 76660 |
40449660 |
Acharya PulakSagarji 07 |
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*1️⃣1️⃣ अप्रैल 2️⃣0️⃣2️⃣6️⃣*
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*सफलता से ज्यादा संतोष अच्छा है*
*कारण आपकी सफलता दूसरे पर निर्भर करती है*
*जबकि संतोष आपकी आत्मा तय करती है*
?❤️❤️❤️❤️❤️❤️?
*मौन, एकांत, स्थिरता और सादगी जिसके पास है*
*उसके पास सबकुछ है*
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*❤️? जय जिनेन्द्र* ?❤️ |
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2026-04-11 09:15:22 |
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