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Message
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40449664 |
?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? |
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2026-04-10 21:38:41 |
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40449664 |
?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? |
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2026-04-10 21:38:40 |
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| 75635 |
40449697 |
हथकरघा शांतिधारा पूर्णायु 1 |
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*सिद्ध चक्र मंडल विधान के पावन अवसर के दूसरे दिन अपनी और से वितरित करने के लिये सुधा दीदी जयपुर वालो ने ,भक्ति करने का उपकरण सुंदर व आकर्षक चवर सेट (80 Nos) 4 इंच-150 Rs प्रति सेट , सभी परिवारों को वितरित करने हेतु ऑर्डर कर दिए है, यदि आप भी पर्वो के उपलक्ष्य मे प्रभावना हेतु, वितरित करने हेतु कुछ आर्डर करना चाहते है तो शीघ्र सम्पर्क करे, अब भोपाल, इंदौर, दिल्ली, झाँसी, मेरठ, अहमदाबाद मे one day delivery सुविधा उपलब्ध है, शीघ्र सम्पर्क करे, विद्यासागर इंटरप्राइजेज,कोटा,9893112665*??? |
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2026-04-10 21:35:40 |
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| 75636 |
40449697 |
हथकरघा शांतिधारा पूर्णायु 1 |
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*सिद्ध चक्र मंडल विधान के पावन अवसर के दूसरे दिन अपनी और से वितरित करने के लिये सुधा दीदी जयपुर वालो ने ,भक्ति करने का उपकरण सुंदर व आकर्षक चवर सेट (80 Nos) 4 इंच-150 Rs प्रति सेट , सभी परिवारों को वितरित करने हेतु ऑर्डर कर दिए है, यदि आप भी पर्वो के उपलक्ष्य मे प्रभावना हेतु, वितरित करने हेतु कुछ आर्डर करना चाहते है तो शीघ्र सम्पर्क करे, अब भोपाल, इंदौर, दिल्ली, झाँसी, मेरठ, अहमदाबाद मे one day delivery सुविधा उपलब्ध है, शीघ्र सम्पर्क करे, विद्यासागर इंटरप्राइजेज,कोटा,9893112665*??? |
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2026-04-10 21:35:40 |
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| 75633 |
40449657 |
?️?SARVARTHASIDDHI ??️ |
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2026-04-10 21:34:37 |
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| 75634 |
40449657 |
?️?SARVARTHASIDDHI ??️ |
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2026-04-10 21:34:37 |
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| 75631 |
40449749 |
जिनोदय?JINODAYA |
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2026-04-10 21:34:29 |
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| 75632 |
40449749 |
जिनोदय?JINODAYA |
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2026-04-10 21:34:29 |
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| 75629 |
40449749 |
जिनोदय?JINODAYA |
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*“अधिक मास के भ्रम और जैन आगम का सत्य — एक आवश्यक खंडन”*
आजकल एक पत्र के माध्यम से यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि अधिक (मल) मास में किए गए धार्मिक कार्य—जैसे प्रतिष्ठा, ध्वजारोहण आदि—प्रथम अधिक मास या द्वितीय अधिक मास के आधार पर मान्य होंगे। यह कथन सुनने में भले शास्त्रीय प्रतीत हो, लेकिन जब इसे जैन आगम की कसौटी पर परखा जाता है, तो यह स्पष्ट रूप से असंगत और भ्रामक सिद्ध होता है।
सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि जैन धर्म का मूल आधार क्या है। जैन आगम स्पष्ट कहते हैं कि धर्म का संबंध बाहरी गणनाओं से नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और भाव की निर्मलता से है। तत्त्वार्थसूत्र में आचार्य उमास्वाति स्पष्ट कहते हैं
“सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः”
अर्थात् सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं। इसमें कहीं भी “अधिक मास”, “प्रथम-द्वितीय मास” या इस प्रकार की गणनाओं का कोई उल्लेख नहीं है।
इसी प्रकार उत्तराध्ययन सूत्र में कहा गया है कि—
“धम्मो मंगल मुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो”
अर्थात् धर्म का श्रेष्ठ मंगल अहिंसा, संयम और तप है। यहाँ भी धर्म को काल-विशेष से नहीं, बल्कि आचरण से जोड़ा गया है।
अब प्रश्न उठता है—क्या अधिक मास वास्तव में अशुद्ध है?
जैन आगमों में “मल मास” या “अशुद्ध मास” जैसी कोई अवधारणा नहीं मिलती। यह पूर्णतः ज्योतिषीय और पौराणिक परंपराओं से आया हुआ विचार है, न कि जैन सिद्धांत से।
समयसार में आचार्य कुंदकुंददेव ने स्पष्ट कहा है
“न कालो कारणं तत्त्वे, भाव एव हि कारणम्”
अर्थात् तत्त्व की प्राप्ति में काल कारण नहीं है, बल्कि भाव ही कारण है।
यह वचन इस पूरे भ्रम को समाप्त करने के लिए पर्याप्त है।
अब उस पत्र में कहा गया है कि
“यदि शुक्ल पक्ष के अनुष्ठान प्रथम अधिक मास में और कृष्ण पक्ष के द्वितीय में आएँ, तो उसी अनुसार करें।”
यह कथन पूर्णतः मनगढ़ंत और आगम-विरुद्ध है, क्योंकि जैन आगमों में कहीं भी इस प्रकार के “समायोजन नियम” नहीं दिए गए हैं।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार में श्रावक के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा गया है कि
धर्म कार्य सदैव विवेक, शुद्धता और सही ज्ञान के आधार पर करना चाहिए, न कि लोक-प्रचलित भ्रांतियों के आधार पर।
यदि हम इस पत्र की बात मान लें, तो इसका अर्थ होगा कि धर्म का आधार काल गणना और ज्योतिषीय जोड़-तोड़ है, जबकि जैन धर्म स्पष्ट रूप से इसे नकारता है। जैन दर्शन में काल एक द्रव्य है, लेकिन वह धर्म की शुद्धता का निर्धारक नहीं है।
सच्चाई यह है कि
? अधिक मास को लेकर जो भय और भ्रम फैलाया जाता है, वह जैन धर्म का नहीं, बल्कि बाहरी प्रभावों का परिणाम है।
? जैन आगम हमें सिखाते हैं कि धर्म किसी विशेष महीने या तिथि का मोहताज नहीं है।
? यदि भावना शुद्ध है, विधि शुद्ध है, और आचरण शुद्ध है, तो हर समय धर्म करने योग्य है।
अतः यह स्पष्ट निष्कर्ष है कि
यह पत्र जैन आगम के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है, बल्कि परंपरागत भ्रांतियों को बढ़ावा देता है।
जैन समाज को ऐसे भ्रमों से बचकर, शुद्ध आगम और तत्त्वज्ञान के आधार पर ही निर्णय लेना चाहिए।
नितिन जैन
संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा)
जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल
मोबाइल: 9215635871 |
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2026-04-10 21:34:27 |
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जिनोदय?JINODAYA |
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*“अधिक मास के भ्रम और जैन आगम का सत्य — एक आवश्यक खंडन”*
आजकल एक पत्र के माध्यम से यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि अधिक (मल) मास में किए गए धार्मिक कार्य—जैसे प्रतिष्ठा, ध्वजारोहण आदि—प्रथम अधिक मास या द्वितीय अधिक मास के आधार पर मान्य होंगे। यह कथन सुनने में भले शास्त्रीय प्रतीत हो, लेकिन जब इसे जैन आगम की कसौटी पर परखा जाता है, तो यह स्पष्ट रूप से असंगत और भ्रामक सिद्ध होता है।
सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि जैन धर्म का मूल आधार क्या है। जैन आगम स्पष्ट कहते हैं कि धर्म का संबंध बाहरी गणनाओं से नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और भाव की निर्मलता से है। तत्त्वार्थसूत्र में आचार्य उमास्वाति स्पष्ट कहते हैं
“सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः”
अर्थात् सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं। इसमें कहीं भी “अधिक मास”, “प्रथम-द्वितीय मास” या इस प्रकार की गणनाओं का कोई उल्लेख नहीं है।
इसी प्रकार उत्तराध्ययन सूत्र में कहा गया है कि—
“धम्मो मंगल मुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो”
अर्थात् धर्म का श्रेष्ठ मंगल अहिंसा, संयम और तप है। यहाँ भी धर्म को काल-विशेष से नहीं, बल्कि आचरण से जोड़ा गया है।
अब प्रश्न उठता है—क्या अधिक मास वास्तव में अशुद्ध है?
जैन आगमों में “मल मास” या “अशुद्ध मास” जैसी कोई अवधारणा नहीं मिलती। यह पूर्णतः ज्योतिषीय और पौराणिक परंपराओं से आया हुआ विचार है, न कि जैन सिद्धांत से।
समयसार में आचार्य कुंदकुंददेव ने स्पष्ट कहा है
“न कालो कारणं तत्त्वे, भाव एव हि कारणम्”
अर्थात् तत्त्व की प्राप्ति में काल कारण नहीं है, बल्कि भाव ही कारण है।
यह वचन इस पूरे भ्रम को समाप्त करने के लिए पर्याप्त है।
अब उस पत्र में कहा गया है कि
“यदि शुक्ल पक्ष के अनुष्ठान प्रथम अधिक मास में और कृष्ण पक्ष के द्वितीय में आएँ, तो उसी अनुसार करें।”
यह कथन पूर्णतः मनगढ़ंत और आगम-विरुद्ध है, क्योंकि जैन आगमों में कहीं भी इस प्रकार के “समायोजन नियम” नहीं दिए गए हैं।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार में श्रावक के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा गया है कि
धर्म कार्य सदैव विवेक, शुद्धता और सही ज्ञान के आधार पर करना चाहिए, न कि लोक-प्रचलित भ्रांतियों के आधार पर।
यदि हम इस पत्र की बात मान लें, तो इसका अर्थ होगा कि धर्म का आधार काल गणना और ज्योतिषीय जोड़-तोड़ है, जबकि जैन धर्म स्पष्ट रूप से इसे नकारता है। जैन दर्शन में काल एक द्रव्य है, लेकिन वह धर्म की शुद्धता का निर्धारक नहीं है।
सच्चाई यह है कि
? अधिक मास को लेकर जो भय और भ्रम फैलाया जाता है, वह जैन धर्म का नहीं, बल्कि बाहरी प्रभावों का परिणाम है।
? जैन आगम हमें सिखाते हैं कि धर्म किसी विशेष महीने या तिथि का मोहताज नहीं है।
? यदि भावना शुद्ध है, विधि शुद्ध है, और आचरण शुद्ध है, तो हर समय धर्म करने योग्य है।
अतः यह स्पष्ट निष्कर्ष है कि
यह पत्र जैन आगम के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है, बल्कि परंपरागत भ्रांतियों को बढ़ावा देता है।
जैन समाज को ऐसे भ्रमों से बचकर, शुद्ध आगम और तत्त्वज्ञान के आधार पर ही निर्णय लेना चाहिए।
नितिन जैन
संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा)
जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल
मोबाइल: 9215635871 |
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2026-04-10 21:34:27 |
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