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68103 40449699 3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) 2026-04-06 07:01:51
68104 40449699 3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) 2026-04-06 07:01:51
68101 40449699 3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) ಜೈ ಜಿನೇಂದ್ರ ಶುಭೋದಯ ಶುಭ ಸುಪ್ರಭಾತ ಎಲ್ಲ ಸ್ನೇಹಿತರಿಗೆ. ಓಂ ಣಮೋ ಅರ್ಹತೇ ಭಗವತೇ ಶ್ರೀಮತೇ ಚಂದ್ರಪ್ರಭ ತೀರ್ಥಂಕರಾಯ ಶ್ಯಾಮ ಯಕ್ಷ ಜ್ವಾಲಾಮಾಲಿನಿ ಯಕ್ಷೀ ಸಹಿತಾಯ ಸೋಮ ಮಹಾಗ್ರಹ ದೇವಃ ಸರ್ವ ಶಾಂತಿಂ ಕುರು ಕುರು ಸ್ವಾಹಾ. 2026-04-06 07:01:49
68102 40449699 3️⃣ ಜಿನೇಂದ್ರ ವಾಣಿ (G-3️⃣) ಜೈ ಜಿನೇಂದ್ರ ಶುಭೋದಯ ಶುಭ ಸುಪ್ರಭಾತ ಎಲ್ಲ ಸ್ನೇಹಿತರಿಗೆ. ಓಂ ಣಮೋ ಅರ್ಹತೇ ಭಗವತೇ ಶ್ರೀಮತೇ ಚಂದ್ರಪ್ರಭ ತೀರ್ಥಂಕರಾಯ ಶ್ಯಾಮ ಯಕ್ಷ ಜ್ವಾಲಾಮಾಲಿನಿ ಯಕ್ಷೀ ಸಹಿತಾಯ ಸೋಮ ಮಹಾಗ್ರಹ ದೇವಃ ಸರ್ವ ಶಾಂತಿಂ ಕುರು ಕುರು ಸ್ವಾಹಾ. 2026-04-06 07:01:49
68100 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-04-06 07:01:37
68099 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-04-06 07:01:36
68098 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ Wandami matajii ??????????? 2026-04-06 06:59:48
68097 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ Wandami matajii ??????????? 2026-04-06 06:59:47
68096 40449696 ?? श्री सम्मेद शिखर जी ?? *----दूसरी ढाल----* ऐसे मिथ्यादृग-ज्ञानचरण,वश भ्रमत भरत दु:ख जन्म-मरण। तातैं इनको तजिये सुजान, सुन तिन संक्षेप कहूँ बखान॥(1) जीवादि प्रयोजनभूत तत्त्व, सरधै तिनमाँहि विपर्ययत्व। चेतन को है उपयोग रूप, विन मूरति चिन्मूरति अनूप॥(2) पुद्गल नभ धर्म अधर्म काल, इनतैं न्यारी है जीव-चाल। ताकों न जान विपरीत मान, करि करै देह में निज पिछान॥(3) मैं सुखी दुखी मैं रंक राव, मेरे धन गृह गोधन प्रभाव। मेरे सुत तिय मैं सबल दीन, बेरूप सुभग मूरख प्रवीन॥(4) तन उपजत अपनी उपज जान, तन नशत आपको नाश मान। रागादि प्रगट जे दु:ख दैन, तिनही को सेवत गिनत चैन॥(5) शुभ-अशुभ-बन्ध के फल मंझार,रति अरति करै निजपद विसार। आतमहित-हेतु विराग-ज्ञान, ते लखें आपको कष्ट दान॥(6) रोकी न चाह निज शक्ति खोय, शिवरूप निराकुलता न जोय। याही प्रतीतिजुत कछुक ज्ञान, सो दु:खदायक अज्ञान जान॥(7) इन जुत विषयनि में जो प्रवृत्त, ताको जानहु मिथ्याचरित्त। यों मिथ्यात्वादि निसर्ग जेह, अब जे गृहीत सुनिये सु तेह॥(8) जे कुगुरु कुदेव कुधर्म सेव, पोषैं चिर दर्शनमोह एव। अन्तर रागादिक धरैं जेह, बाहर धन अम्बरतैं सनेह॥(9) धारैं कुलिंग लहि महत-भाव, ते कुगुरु जन्म-जल-उपल-नाव। जे रागद्वेष-मल करि मलीन, वनिता गदादिजुत चिह्न चीन।।(10) ते हैं कुदेव तिनकी जु सेव, शठ करत न तिन भवभ्रमण-छेव। रागादि-भाव हिंसा समेत, दर्वित त्रस-थावर मरन-खेत॥(11) जे क्रिया तिन्हैं जानहु कुधर्म, तिन सरधै जीव लहै अशर्म। याकूँ गृहीत मिथ्यात्व जान, अब सुन गृहीत जो है अज्ञान॥(12) एकान्तवाद दूषित समस्त, विषयादिक-पोषक अप्रशस्त। कपिलादिरचित श्रुत को अभ्यास, सो है कुबोध बहु देन त्रास॥(13) जो ख्याति-लाभ पूजादि चाह, धरि करन विविध-विध देहदाह। आतम अनात्म के ज्ञान-हीन, जे जे करनी तन करन-छीन॥(14) ते सब मिथ्याचारित्र त्याग, अब आतम के हित-पन्थ लाग। जगजाल भ्रमण को देहु त्याग, अब ‘दौलत’ निज आतम सुपाग।।(15) 2026-04-06 06:59:09
68095 40449696 ?? श्री सम्मेद शिखर जी ?? *----दूसरी ढाल----* ऐसे मिथ्यादृग-ज्ञानचरण,वश भ्रमत भरत दु:ख जन्म-मरण। तातैं इनको तजिये सुजान, सुन तिन संक्षेप कहूँ बखान॥(1) जीवादि प्रयोजनभूत तत्त्व, सरधै तिनमाँहि विपर्ययत्व। चेतन को है उपयोग रूप, विन मूरति चिन्मूरति अनूप॥(2) पुद्गल नभ धर्म अधर्म काल, इनतैं न्यारी है जीव-चाल। ताकों न जान विपरीत मान, करि करै देह में निज पिछान॥(3) मैं सुखी दुखी मैं रंक राव, मेरे धन गृह गोधन प्रभाव। मेरे सुत तिय मैं सबल दीन, बेरूप सुभग मूरख प्रवीन॥(4) तन उपजत अपनी उपज जान, तन नशत आपको नाश मान। रागादि प्रगट जे दु:ख दैन, तिनही को सेवत गिनत चैन॥(5) शुभ-अशुभ-बन्ध के फल मंझार,रति अरति करै निजपद विसार। आतमहित-हेतु विराग-ज्ञान, ते लखें आपको कष्ट दान॥(6) रोकी न चाह निज शक्ति खोय, शिवरूप निराकुलता न जोय। याही प्रतीतिजुत कछुक ज्ञान, सो दु:खदायक अज्ञान जान॥(7) इन जुत विषयनि में जो प्रवृत्त, ताको जानहु मिथ्याचरित्त। यों मिथ्यात्वादि निसर्ग जेह, अब जे गृहीत सुनिये सु तेह॥(8) जे कुगुरु कुदेव कुधर्म सेव, पोषैं चिर दर्शनमोह एव। अन्तर रागादिक धरैं जेह, बाहर धन अम्बरतैं सनेह॥(9) धारैं कुलिंग लहि महत-भाव, ते कुगुरु जन्म-जल-उपल-नाव। जे रागद्वेष-मल करि मलीन, वनिता गदादिजुत चिह्न चीन।।(10) ते हैं कुदेव तिनकी जु सेव, शठ करत न तिन भवभ्रमण-छेव। रागादि-भाव हिंसा समेत, दर्वित त्रस-थावर मरन-खेत॥(11) जे क्रिया तिन्हैं जानहु कुधर्म, तिन सरधै जीव लहै अशर्म। याकूँ गृहीत मिथ्यात्व जान, अब सुन गृहीत जो है अज्ञान॥(12) एकान्तवाद दूषित समस्त, विषयादिक-पोषक अप्रशस्त। कपिलादिरचित श्रुत को अभ्यास, सो है कुबोध बहु देन त्रास॥(13) जो ख्याति-लाभ पूजादि चाह, धरि करन विविध-विध देहदाह। आतम अनात्म के ज्ञान-हीन, जे जे करनी तन करन-छीन॥(14) ते सब मिथ्याचारित्र त्याग, अब आतम के हित-पन्थ लाग। जगजाल भ्रमण को देहु त्याग, अब ‘दौलत’ निज आतम सुपाग।।(15) 2026-04-06 06:59:09