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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Phone
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Message
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Status
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Date |
View |
| 68023 |
40449676 |
राष्ट्रीय मुनी सेवा संघ |
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2026-04-06 06:27:50 |
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| 68024 |
40449676 |
राष्ट्रीय मुनी सेवा संघ |
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2026-04-06 06:27:50 |
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| 68022 |
40449676 |
राष्ट्रीय मुनी सेवा संघ |
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2026-04-06 06:27:48 |
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| 68021 |
40449676 |
राष्ट्रीय मुनी सेवा संघ |
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2026-04-06 06:27:47 |
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| 68020 |
40449676 |
राष्ट्रीय मुनी सेवा संघ |
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2026-04-06 06:27:46 |
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| 68019 |
40449676 |
राष्ट्रीय मुनी सेवा संघ |
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2026-04-06 06:27:45 |
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| 68017 |
40449659 |
सकल जैन महिला मंडळ फलटण |
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?????????
आज का नियम है पावभाजी नही खाना |
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2026-04-06 06:26:41 |
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| 68018 |
40449659 |
सकल जैन महिला मंडळ फलटण |
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?????????
आज का नियम है पावभाजी नही खाना |
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2026-04-06 06:26:41 |
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| 68016 |
47534159 |
Maharstra (kartick) |
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*आत्मचिंतन - (सं.2577)*
**************************
*श्रीतत्त्वार्थसूत्र तथा मोक्षशास्त्र*
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
(*207*)
*श्रीतत्त्वार्थसूत्र* उर्फ *मोक्षशास्त्र* एक बहुत ही महत्वपूर्ण पुस्तक / आगम / शास्त्र है, जो जैन दर्शन का सुंदर विश्लेषण करता है। हम इसकी व्याख्या चरण दर चरण समझ रहे हैं -
*॥ द्वितीय अध्याय ॥*
*तैजसमपि॥*
(अध्याय 2 / सूत्र 48)
*तैजसम् अपि ॥ 2/48॥*
*व्याख्या -*
~~~~~~~~~~
(1)
*तैजस शरीर भी लब्धिप्रत्यय है। यह तैजस शरीर, वैक्रियिक शरीर की तरह, तपस्या (लब्धि) से प्राप्त होता है..*
*..ऐसे तैजस शरीर के दो मुख्य भेद तथा उन भेदों में से एक के दो उप भेद इस प्रकार देखे जाते हैं. आइये अब इनके विषय में क्रम से जानें..*
*1) अनिःसरणात्मक तैजस शरीर -*
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
औदारिक, वैक्रियिक, आहारक के शरीर में जिस प्रकार का तेज या कांति विद्यमान होती है, जो किसके कारण होती है, उसे *अनिःसरणात्मक तैजस शरीर* कहते हैं ।
हमारे द्वारा खाए गए भोजन के पचने के पश्चात शरीर के भीतर से जिस प्रकार का तेज निकलता है, उसे अनिःसरणात्मक तैजस शरीर कहते हैं!
*(क्रमशः) (ता. 06/04/2026)*
*--डॉ. अजीत जे. पाटिल जैन, सांगली, महाराष्ट्र*
???
(कु.9607/आ.3236) |
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2026-04-06 06:26:34 |
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| 68015 |
47534159 |
Maharstra (kartick) |
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*आत्मचिंतन - (सं.2577)*
**************************
*श्रीतत्त्वार्थसूत्र तथा मोक्षशास्त्र*
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
(*207*)
*श्रीतत्त्वार्थसूत्र* उर्फ *मोक्षशास्त्र* एक बहुत ही महत्वपूर्ण पुस्तक / आगम / शास्त्र है, जो जैन दर्शन का सुंदर विश्लेषण करता है। हम इसकी व्याख्या चरण दर चरण समझ रहे हैं -
*॥ द्वितीय अध्याय ॥*
*तैजसमपि॥*
(अध्याय 2 / सूत्र 48)
*तैजसम् अपि ॥ 2/48॥*
*व्याख्या -*
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(1)
*तैजस शरीर भी लब्धिप्रत्यय है। यह तैजस शरीर, वैक्रियिक शरीर की तरह, तपस्या (लब्धि) से प्राप्त होता है..*
*..ऐसे तैजस शरीर के दो मुख्य भेद तथा उन भेदों में से एक के दो उप भेद इस प्रकार देखे जाते हैं. आइये अब इनके विषय में क्रम से जानें..*
*1) अनिःसरणात्मक तैजस शरीर -*
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औदारिक, वैक्रियिक, आहारक के शरीर में जिस प्रकार का तेज या कांति विद्यमान होती है, जो किसके कारण होती है, उसे *अनिःसरणात्मक तैजस शरीर* कहते हैं ।
हमारे द्वारा खाए गए भोजन के पचने के पश्चात शरीर के भीतर से जिस प्रकार का तेज निकलता है, उसे अनिःसरणात्मक तैजस शरीर कहते हैं!
*(क्रमशः) (ता. 06/04/2026)*
*--डॉ. अजीत जे. पाटिल जैन, सांगली, महाराष्ट्र*
???
(कु.9607/आ.3236) |
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2026-04-06 06:26:33 |
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