WhatsApp Messages Dashboard

Total Records in Table: 15212

Records Matching Filters: 15212

From: To: Global Search:

Messages

ID Chat ID
Chat Name
Sender
Phone
Message
Status
Date View
69394 40449705 ☸️ अच्छीबातेअमृतवाणी ग्रुप 2026-04-06 14:53:34
69393 40449705 ☸️ अच्छीबातेअमृतवाणी ग्रुप 2026-04-06 14:53:33
69391 40449706 मुनिश्रीनीरागसागरजीकेभक्त 1⃣ *मम हृदय सम्राट पूज्य गुरुदेव मुनि श्री नीरागसागरजी महाराज जी ❣️???‍♂️* <a href="https://www.instagram.com/reel/DWyOuUSDCg8/?igsh=" target="_blank">https://www.instagram.com/reel/DWyOuUSDCg8/?igsh=</a> 2026-04-06 14:50:21
69392 40449706 मुनिश्रीनीरागसागरजीकेभक्त 1⃣ *मम हृदय सम्राट पूज्य गुरुदेव मुनि श्री नीरागसागरजी महाराज जी ❣️???‍♂️* <a href="https://www.instagram.com/reel/DWyOuUSDCg8/?igsh=" target="_blank">https://www.instagram.com/reel/DWyOuUSDCg8/?igsh=</a> 2026-04-06 14:50:21
69390 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन <a href="https://youtube.com/shorts/c66sFITETA4?feature=share" target="_blank">https://youtube.com/shorts/c66sFITETA4?feature=share</a> 2026-04-06 14:47:34
69389 40449677 तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन <a href="https://youtube.com/shorts/c66sFITETA4?feature=share" target="_blank">https://youtube.com/shorts/c66sFITETA4?feature=share</a> 2026-04-06 14:47:33
69388 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *सबसे ज्यादा चोरियां*- *जैन मंदिरों में क्यों?* *सोनागिर तीर्थ पर फिर चोरी*।। ?????? जैन धर्म अपरिग्रह, अहिंसा, जीव दया और आत्म-कल्याण की शिक्षा देता है, लेकिन जैन मंदिरों में समाज का सोना- चांदी- अष्टधातु- हीरे- जवाहरात के प्रति अंधा मोह इन्हें चोरों का सबसे बड़ा शिकार बना रहा है। कोई महीना ऐसा नहीं जाता है जबकि किसी जैन मंदिर में चोरी की घटना नहीं घटती हो। जैन समाज को इन चोरियों से सालाना करोड़ों रुपये का भारी नुकसान हो रहा है। पर फिर भी जैन समाज न तो बदलने को तैयार हैं और न समझने - संभलने को। एक चोरी की घटना पर एक पुलिस अधिकारी ने टिप्पणी की कि "_हमारे हनुमानजी के मन्दिर से तो कभी चोरी नहीं होती, मंदिर खुले पड़े रहते हैं। पर जैन मंदिरों में धन के बोलवाले के कारण चोर वहां नहीं आयेंगे तो और क्या करेंगे? क्या पत्थर की प्रतिमा से पूजा -भक्ति नहीं हो सकती?..समय के अनुसार आप जैन लोग क्यों नहीं बदलते हैं_?" उपरोक्त प्रश्न तो बाजिव है पर जैनियों को कौन समझाएगा और कौन समझेगा? आज जब चांदी की कीमत *₹2.5 लाख प्रति किलो* के आसपास पहुंच गई है, तो जैन मंदिर तो चोरों के लिए 'गोल्डमाइन' क्यों नहीं बनेंगे? जो भी मिल जाये सो बहुत है। हजारों सामान्य हिंदू मंदिर हैं, लेकिन उनमें ऐसी चोरियां क्यों नहीं होतीं? कारण साफ है—जैन मंदिरों में कीमती धातुओं की सामग्री का ढेर लगा रहता है। *अपरिग्रह का सिद्धांत: भावना कहां खो गई?* जैन धर्म भावना-आधारित है, और अपरिग्रह इसका मजबूत स्तंभ है। आगम भी सिखाते हैं कि संपत्ति बंधन है, केवल आवश्यक रखो; पूजा चित्त से करो, धातु के आकर्षण से नहीं। फिर मंदिरों में कीमती धातुओं, हीरे-जवाहरात जड़ने में अपरिग्रह कहां रहा? भावना की जगह प्रदर्शन हावी—यह विडंबना है। असुरक्षित धन मोह बढ़ाता है, चोरियां आमंत्रित करता है। *ऐतिहासिक सबक*: इतिहास गवाह है कि पाषाण बची रहती है, धातु लुप्त हो जाती है। पुरातत्व खुदाई में 2-4 हजार साल पुरानी जैन धरोहर हमेशा पाषाण की ही मिलती है—5 फीट, 7 फीट, 9 फीट, या 11 फीट की विशाल प्रतिमाएं जो अपना इतिहास स्पष्ट बताती हैं। पर सोना- चांदी- पीतल या हीरे- जवाहरात की कोई प्रतिमा क्यों नहीं मिलती? *पूज्य श्री नेमिचंद्र आचार्य* ने '*जीव कांड*' जैसे ग्रंथों की रचना नेमिनाथ भगवान की रत्नमयी प्रतिमा के सामने की थी, लेकिन श्रवणबेलगोला (गोम्मटेश्वर) में वह प्रतिमा आज है क्या?—सब चोर शासक ले गए। उसी कालखंड में कर्नाटक की चालुक्य वंश की रानी एवं उत्कृष्ट श्राविका श्री *अत्तिमब्बेजी* को इतिहास में उनके असाधारण दान और परोपकार के लिए "*दान चिंतामणि*" (दान की इच्छा पूर्ति करने वाली मणि) के नाम से जाना जाता है। युद्ध में पति के देहावसान के बाद उन्होंने विधवा जीवन में भी जैन धर्म की अपूर्व सेवा की थी। उन्होंने अपने आराध्य तीर्थंकर *श्री शांति नाथ भगवान* की सोने की *1500 तीर्थंकर मूर्तियाँ* दान की थीं। कहां हैं वे मूर्तियां? मुगल आक्रमणकारियों एवं अन्य विद्वेषी धर्मावलंबी शासकों ने जब मौका मिला, जैनों की पाषाण प्रतिमाएं तोड़ दीं और सोने- चांदी- जवाहरात की मूर्तियां लूट लीं। आज धरती के गर्भ में छिपी पाषाण मूर्तियां और उनके अवशेष तो अपना इतिहास आज भी बयान करते हैं। लेकिन जो सोना- चांदी- हीरा -मोती जवाहरात लूट लिए गए—उनका कोई निशान तक नहीं बचा। इतिहासकार भविष्य में इन्हीं पाषाण प्रतिमाओं से जैन धर्म का प्रमाण पाएंगे। आज भी सच्चाई यही है कि सैकड़ों गांवों के जैन मंदिरों में 50-100 साल पहले तक भी सोने-चांदी के सिंहासन, बर्तन, मुकुट आदि भरे पड़े थे; आज एक भी शेष नहीं। कहां गये सब? *भयावह चोरियां*: पहले तो पता ही नहीं चलता था, पर अब मीडिया में चोरी की घटनाएं समय समय पर आती रहती हैं। हालांकि प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं भी विदेशी ब्लैक मार्केट के लिए अंतरराष्ट्रीय गैंग्स का निशाना बनती रहती हैं। सोने-चांदी की मूर्तियों, कलश, छत्र, सिंहासन, भामंडल आदि पर तो छोटे-मोटे चोरों की नजर लगी ही रहती है। वे मुंह ढंककर चोरी करने आते हैं, सो CCTV भी बेकार हो जाता है। दिगंबर -श्वेतांबर जैन मंदिरों में चोरी की कुछ प्रमुख घटनाओं पर एक दृष्टि डालते हैं: *उदयपुर (राजस्थान), 2019*: 6 करोड़ की रत्न जड़ी प्रतिमा चोरी। *पाटन (गुजरात), 2020*: 8 करोड़ का सोना-जवाहरात, पुजारी की मिलीभगत सामने आई। *दिल्ली चांदनी चौक, 2021*: 2.5 करोड़ का सोना-हीरा जड़ा मुकुट गायब। *बेलगावी (कर्नाटक), 2021*: 12वीं सदी की पार्श्वनाथ पाषाण मूर्ति—ब्रुसेल्स ब्लैक मार्केट में बिकी। *नागौर (राजस्थान), 2022*: 5 करोड़ की चांदी प्रतिमा और सोने के बर्तन चोरी। *पल्लवकालीन मंदिर (तमिलनाडु), 2022*: 10वीं सदी की 7 फीट पाषाण की भगवान ऋषभनाथ की प्रतिमा की चोरी—इंटरपोल अलर्ट। *कोल्हापुर (महाराष्ट्र), 2023*: 14 करोड़ के सोना-चांदी-हीरे के आभूषणों की चोरी। *अहमदाबाद (गुजरात), 2023*: 2 करोड़ का अष्टधातु का सिंहासन चोरी। *जयपुर (राजस्थान), 2024*: 4 करोड़ के चांदी कलश-छत्र की चोरी। *बाघनगर- गंजबासौदा (मप्र), 2024*: 1.5 करोड़ के चांदी-सोने के बर्तन चोरी गये। *मुंबई, 2025:* 3 करोड़ के सोना-चांदी थाल—चोरी में चौकीदार की संदिग्ध भूमिका। *ज्योति नगर (दिल्ली), 2025*: 40-50 लाख का सोना-मढ़ा कलश चोरी। *पचराई, तिमानगढ, गोलाकोट और चंपापुर* तीर्थों से प्राचीन‌ एतिहासिक महत्व की पाषाण मूर्तियों की चोरी प्रसिद्ध है। चोरी के बाद जैन समाज कुछ दिन तो रोता-पीटता है, फिर वही कीमती संग्रह जुटाने लगता है—यह चक्र चलता रहता है। क्या गरीब पुजारी या चौकीदार पर निर्भरता जैन मंदिरों की संपत्ति को बचा सकती है ? कई बार तो स्टाफ की ही मिलीभगत होती है। *आध्यात्मिक चेतावनी*: पूजन करो, प्रदर्शन मत करो! जैन आगम पूजन पर, तप- साधना पर जोर देते हैं, प्रदर्शन पर नहीं। क्या मंदिरों में सोना- चांदी- हीरा- माणिक दान देकर कल्याण हो जाता है? अगर इनकी सुरक्षा ही न हो सके तो इन की चोरी के पाप का भागी कौन बनेगा—दानकर्ता, साधु या पूरा समाज? सोचिये कि आज की सुरक्षा कल अपर्याप्त हो जाएगी। 20-50 साल बाद इसे कैसे बढ़ाया जाए—कोई स्थायी योजना नहीं। *अपरिग्रह क्यों*?: अपरिग्रह पर जैन धर्म के प्राचीन *आचार्य नेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ति* द्वारा रचित जीवकांड ग्रंथ से प्रेरित निम्न श्लोक देखें: _दस वयं परिग्गहो_, _जो न संजुट्टं विहाय।_ _परिग्गहं अप्पाणं,_ _वुज्झई अरिहंतं जिणं॥_ हिंदी अनुवाद: दस प्रकार के परिग्रह (संपत्ति) को त्यागकर, जो स्वयं से असंबद्ध हैं, उस परिग्रह को त्यागकर ही अरिहंत (जैन तीर्थंकर) को जाना जा सकता है। अपरिग्रह ही मोक्ष का मार्ग है। विस्तृत संदर्भग्रंथ: दसमस्मरण (10 स्मरण पाठ), जैन परंपरा का प्रमुख साधना ग्रंथ। अध्याय: अपरिग्रह व्रत पर चर्चा वाले खंड में। अर्थ पुनः: दस प्रकार के परिग्रह (भूमि, चांदी, सोना, घर, अनाज, स्त्री, गुलाम, पशु, जल, व्यापार) को त्यागकर ही आत्मा जैन तीर्थंकरों को पहचानती है। **** धन का सही उपयोग तो जैन शिक्षा, साधर्मी सहायता, जीव- रक्षा और प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार में है।आवश्यकता पड़ने पर नये जैन मंदिर तो बनाएं पर जिन बिंब पाषाण के ही विराजमान करें। किसी साधु या पंडित के बहकावे में आकर बहुमूल्य धातु-रत्न मंदिरों में न संग्रह करें।अपनी बुद्धि-ज्ञान का सही उपयोग करें। *जैन समाज जागो!* *पाषाण प्रतिमा से पूजन करो*, *मंदिरों में अपरिग्रह जियो*, *ऐतिहासिक धरोहरें बचाओ।।* ??? - *नीलमकांत जीवमित्र* 9910378087 nk.jeevmitra@ outlook.com *सबसे ज्यादा चोरियां*- *जैन मंदिरों में क्यों?* *सोनागिर तीर्थ पर फिर चोरी*।। ?????? जैन धर्म अपरिग्रह, अहिंसा, जीव दया और आत्म-कल्याण की शिक्षा देता है, लेकिन जैन मंदिरों में समाज का सोना- चांदी- अष्टधातु- हीरे- जवाहरात के प्रति अंधा मोह इन्हें चोरों का सबसे बड़ा शिकार बना रहा है। कोई महीना ऐसा नहीं जाता है जबकि किसी जैन मंदिर में चोरी की घटना नहीं घटती हो। जैन समाज को इन चोरियों से सालाना करोड़ों रुपये का भारी नुकसान हो रहा है। पर फिर भी जैन समाज न तो बदलने को तैयार हैं और न समझने - संभलने को। एक चोरी की घटना पर एक पुलिस अधिकारी ने टिप्पणी की कि "_हमारे हनुमानजी के मन्दिर से तो कभी चोरी नहीं होती, मंदिर खुले पड़े रहते हैं। पर जैन मंदिरों में धन के बोलवाले के कारण चोर वहां नहीं आयेंगे तो और क्या करेंगे? क्या पत्थर की प्रतिमा से पूजा -भक्ति नहीं हो सकती?..समय के अनुसार आप जैन लोग क्यों नहीं बदलते हैं_?" उपरोक्त प्रश्न तो बाजिव है पर जैनियों को कौन समझाएगा और कौन समझेगा? आज जब चांदी की कीमत *₹2.5 लाख प्रति किलो* के आसपास पहुंच गई है, तो जैन मंदिर तो चोरों के लिए 'गोल्डमाइन' क्यों नहीं बनेंगे? जो भी मिल जाये सो बहुत है। हजारों सामान्य हिंदू मंदिर हैं, लेकिन उनमें ऐसी चोरियां क्यों नहीं होतीं? कारण साफ है—जैन मंदिरों में कीमती धातुओं की सामग्री का ढेर लगा रहता है। *अपरिग्रह का सिद्धांत: भावना कहां खो गई?* जैन धर्म भावना-आधारित है, और अपरिग्रह इसका मजबूत स्तंभ है। आगम भी सिखाते हैं कि संपत्ति बंधन है, केवल आवश्यक रखो; पूजा चित्त से करो, धातु के आकर्षण से नहीं। फिर मंदिरों में कीमती धातुओं, हीरे-जवाहरात जड़ने में अपरिग्रह कहां रहा? भावना की जगह प्रदर्शन हावी—यह विडंबना है। असुरक्षित धन मोह बढ़ाता है, चोरियां आमंत्रित करता है। *ऐतिहासिक सबक*: इतिहास गवाह है कि पाषाण बची रहती है, धातु लुप्त हो जाती है। पुरातत्व खुदाई में 2-4 हजार साल पुरानी जैन धरोहर हमेशा पाषाण की ही मिलती है—5 फीट, 7 फीट, 9 फीट, या 11 फीट की विशाल प्रतिमाएं जो अपना इतिहास स्पष्ट बताती हैं। पर सोना- चांदी- पीतल या हीरे- जवाहरात की कोई प्रतिमा क्यों नहीं मिलती? *पूज्य श्री नेमिचंद्र आचार्य* ने '*जीव कांड*' जैसे ग्रंथों की रचना नेमिनाथ भगवान की रत्नमयी प्रतिमा के सामने की थी, लेकिन श्रवणबेलगोला (गोम्मटेश्वर) में वह प्रतिमा आज है क्या?—सब चोर शासक ले गए। उसी कालखंड में कर्नाटक की चालुक्य वंश की रानी एवं उत्कृष्ट श्राविका श्री *अत्तिमब्बेजी* को इतिहास में उनके असाधारण दान और परोपकार के लिए "*दान चिंतामणि*" (दान की इच्छा पूर्ति करने वाली मणि) के नाम से जाना जाता है। युद्ध में पति के देहावसान के बाद उन्होंने विधवा जीवन में भी जैन धर्म की अपूर्व सेवा की थी। उन्होंने अपने आराध्य तीर्थंकर *श्री शांति नाथ भगवान* की सोने की *1500 तीर्थंकर मूर्तियाँ* दान की थीं। कहां हैं वे मूर्तियां? मुगल आक्रमणकारियों एवं अन्य विद्वेषी धर्मावलंबी शासकों ने जब मौका मिला, जैनों की पाषाण प्रतिमाएं तोड़ दीं और सोने- चांदी- जवाहरात की मूर्तियां लूट लीं। आज धरती के गर्भ में छिपी पाषाण मूर्तियां और उनके अवशेष तो अपना इतिहास आज भी बयान करते हैं। लेकिन जो सोना- चांदी- हीरा -मोती जवाहरात लूट लिए गए—उनका कोई निशान तक नहीं बचा। इतिहासकार भविष्य में इन्हीं पाषाण प्रतिमाओं से जैन धर्म का प्रमाण पाएंगे। आज भी सच्चाई यही है कि सैकड़ों गांवों के जैन मंदिरों में 50-100 साल पहले तक भी सोने-चांदी के सिंहासन, बर्तन, मुकुट आदि भरे पड़े थे; आज एक भी शेष नहीं। कहां गये सब? *भयावह चोरियां*: पहले तो पता ही नहीं चलता था, पर अब मीडिया में चोरी की घटनाएं समय समय पर आती रहती हैं। हालांकि प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं भी विदेशी ब्लैक मार्केट के लिए अंतरराष्ट्रीय गैंग्स का निशाना बनती रहती हैं। सोने-चांदी की मूर्तियों, कलश, छत्र, सिंहासन, भामंडल आदि पर तो छोटे-मोटे चोरों की नजर लगी ही रहती है। वे मुंह ढंककर चोरी करने आते हैं, सो CCTV भी बेकार हो जाता है। दिगंबर -श्वेतांबर जैन मंदिरों में चोरी की कुछ प्रमुख घटनाओं पर एक दृष्टि डालते हैं: *उदयपुर (राजस्थान), 2019*: 6 करोड़ की रत्न जड़ी प्रतिमा चोरी। *पाटन (गुजरात), 2020*: 8 करोड़ का सोना-जवाहरात, पुजारी की मिलीभगत सामने आई। *दिल्ली चांदनी चौक, 2021*: 2.5 करोड़ का सोना-हीरा जड़ा मुकुट गायब। *बेलगावी (कर्नाटक), 2021*: 12वीं सदी की पार्श्वनाथ पाषाण मूर्ति—ब्रुसेल्स ब्लैक मार्केट में बिकी। *नागौर (राजस्थान), 2022*: 5 करोड़ की चांदी प्रतिमा और सोने के बर्तन चोरी। *पल्लवकालीन मंदिर (तमिलनाडु), 2022*: 10वीं सदी की 7 फीट पाषाण की भगवान ऋषभनाथ की प्रतिमा की चोरी—इंटरपोल अलर्ट। *कोल्हापुर (महाराष्ट्र), 2023*: 14 करोड़ के सोना-चांदी-हीरे के आभूषणों की चोरी। *अहमदाबाद (गुजरात), 2023*: 2 करोड़ का अष्टधातु का सिंहासन चोरी। *जयपुर (राजस्थान), 2024*: 4 करोड़ के चांदी कलश-छत्र की चोरी। *बाघनगर- गंजबासौदा (मप्र), 2024*: 1.5 करोड़ के चांदी-सोने के बर्तन चोरी गये। *मुंबई, 2025:* 3 करोड़ के सोना-चांदी थाल—चोरी में चौकीदार की संदिग्ध भूमिका। *ज्योति नगर (दिल्ली), 2025*: 40-50 लाख का सोना-मढ़ा कलश चोरी। *पचराई, तिमानगढ, गोलाकोट और चंपापुर* तीर्थों से प्राचीन‌ एतिहासिक महत्व की पाषाण मूर्तियों की चोरी प्रसिद्ध है। चोरी के बाद जैन समाज कुछ दिन तो रोता-पीटता है, फिर वही कीमती संग्रह जुटाने लगता है—यह चक्र चलता रहता है। क्या गरीब पुजारी या चौकीदार पर निर्भरता जैन मंदिरों की संपत्ति को बचा सकती है ? कई बार तो स्टाफ की ही मिलीभगत होती है। *आध्यात्मिक चेतावनी*: पूजन करो, प्रदर्शन मत करो! जैन आगम पूजन पर, तप- साधना पर जोर देते हैं, प्रदर्शन पर नहीं। क्या मंदिरों में सोना- चांदी- हीरा- माणिक दान देकर कल्याण हो जाता है? अगर इनकी सुरक्षा ही न हो सके तो इन की चोरी के पाप का भागी कौन बनेगा—दानकर्ता, साधु या पूरा समाज? सोचिये कि आज की सुरक्षा कल अपर्याप्त हो जाएगी। 20-50 साल बाद इसे कैसे बढ़ाया जाए—कोई स्थायी योजना नहीं। *अपरिग्रह क्यों*?: अपरिग्रह पर जैन धर्म के प्राचीन *आचार्य नेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ति* द्वारा रचित जीवकांड ग्रंथ से प्रेरित निम्न श्लोक देखें: _दस वयं परिग्गहो_, _जो न संजुट्टं विहाय।_ _परिग्गहं अप्पाणं,_ _वुज्झई अरिहंतं जिणं॥_ हिंदी अनुवाद: दस प्रकार के परिग्रह (संपत्ति) को त्यागकर, जो स्वयं से असंबद्ध हैं, उस परिग्रह को त्यागकर ही अरिहंत (जैन तीर्थंकर) को जाना जा सकता है। अपरिग्रह ही मोक्ष का मार्ग है। विस्तृत संदर्भग्रंथ: दसमस्मरण (10 स्मरण पाठ), जैन परंपरा का प्रमुख साधना ग्रंथ। अध्याय: अपरिग्रह व्रत पर चर्चा वाले खंड में। अर्थ पुनः: दस प्रकार के परिग्रह (भूमि, चांदी, सोना, घर, अनाज, स्त्री, गुलाम, पशु, जल, व्यापार) को त्यागकर ही आत्मा जैन तीर्थंकरों को पहचानती है। **** धन का सही उपयोग तो जैन शिक्षा, साधर्मी सहायता, जीव- रक्षा और प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार में है।आवश्यकता पड़ने पर नये जैन मंदिर तो बनाएं पर जिन बिंब पाषाण के ही विराजमान करें। किसी साधु या पंडित के बहकावे में आकर बहुमूल्य धातु-रत्न मंदिरों में न संग्रह करें।अपनी बुद्धि-ज्ञान का सही उपयोग करें। *जैन समाज जागो!* *पाषाण प्रतिमा से पूजन करो*, *मंदिरों में अपरिग्रह जियो*, *ऐतिहासिक धरोहरें बचाओ।।* ??? - *नीलमकांत जीवमित्र* 9910378087 nk.jeevmitra@ outlook.com <a href="https://chat.whatsapp.com/HkzDXVvU42K1PNtF2NM84e?mode=gi_t" target="_blank">https://chat.whatsapp.com/HkzDXVvU42K1PNtF2NM84e?mode=gi_t</a> 2026-04-06 14:47:13
69387 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी *सबसे ज्यादा चोरियां*- *जैन मंदिरों में क्यों?* *सोनागिर तीर्थ पर फिर चोरी*।। ?????? जैन धर्म अपरिग्रह, अहिंसा, जीव दया और आत्म-कल्याण की शिक्षा देता है, लेकिन जैन मंदिरों में समाज का सोना- चांदी- अष्टधातु- हीरे- जवाहरात के प्रति अंधा मोह इन्हें चोरों का सबसे बड़ा शिकार बना रहा है। कोई महीना ऐसा नहीं जाता है जबकि किसी जैन मंदिर में चोरी की घटना नहीं घटती हो। जैन समाज को इन चोरियों से सालाना करोड़ों रुपये का भारी नुकसान हो रहा है। पर फिर भी जैन समाज न तो बदलने को तैयार हैं और न समझने - संभलने को। एक चोरी की घटना पर एक पुलिस अधिकारी ने टिप्पणी की कि "_हमारे हनुमानजी के मन्दिर से तो कभी चोरी नहीं होती, मंदिर खुले पड़े रहते हैं। पर जैन मंदिरों में धन के बोलवाले के कारण चोर वहां नहीं आयेंगे तो और क्या करेंगे? क्या पत्थर की प्रतिमा से पूजा -भक्ति नहीं हो सकती?..समय के अनुसार आप जैन लोग क्यों नहीं बदलते हैं_?" उपरोक्त प्रश्न तो बाजिव है पर जैनियों को कौन समझाएगा और कौन समझेगा? आज जब चांदी की कीमत *₹2.5 लाख प्रति किलो* के आसपास पहुंच गई है, तो जैन मंदिर तो चोरों के लिए 'गोल्डमाइन' क्यों नहीं बनेंगे? जो भी मिल जाये सो बहुत है। हजारों सामान्य हिंदू मंदिर हैं, लेकिन उनमें ऐसी चोरियां क्यों नहीं होतीं? कारण साफ है—जैन मंदिरों में कीमती धातुओं की सामग्री का ढेर लगा रहता है। *अपरिग्रह का सिद्धांत: भावना कहां खो गई?* जैन धर्म भावना-आधारित है, और अपरिग्रह इसका मजबूत स्तंभ है। आगम भी सिखाते हैं कि संपत्ति बंधन है, केवल आवश्यक रखो; पूजा चित्त से करो, धातु के आकर्षण से नहीं। फिर मंदिरों में कीमती धातुओं, हीरे-जवाहरात जड़ने में अपरिग्रह कहां रहा? भावना की जगह प्रदर्शन हावी—यह विडंबना है। असुरक्षित धन मोह बढ़ाता है, चोरियां आमंत्रित करता है। *ऐतिहासिक सबक*: इतिहास गवाह है कि पाषाण बची रहती है, धातु लुप्त हो जाती है। पुरातत्व खुदाई में 2-4 हजार साल पुरानी जैन धरोहर हमेशा पाषाण की ही मिलती है—5 फीट, 7 फीट, 9 फीट, या 11 फीट की विशाल प्रतिमाएं जो अपना इतिहास स्पष्ट बताती हैं। पर सोना- चांदी- पीतल या हीरे- जवाहरात की कोई प्रतिमा क्यों नहीं मिलती? *पूज्य श्री नेमिचंद्र आचार्य* ने '*जीव कांड*' जैसे ग्रंथों की रचना नेमिनाथ भगवान की रत्नमयी प्रतिमा के सामने की थी, लेकिन श्रवणबेलगोला (गोम्मटेश्वर) में वह प्रतिमा आज है क्या?—सब चोर शासक ले गए। उसी कालखंड में कर्नाटक की चालुक्य वंश की रानी एवं उत्कृष्ट श्राविका श्री *अत्तिमब्बेजी* को इतिहास में उनके असाधारण दान और परोपकार के लिए "*दान चिंतामणि*" (दान की इच्छा पूर्ति करने वाली मणि) के नाम से जाना जाता है। युद्ध में पति के देहावसान के बाद उन्होंने विधवा जीवन में भी जैन धर्म की अपूर्व सेवा की थी। उन्होंने अपने आराध्य तीर्थंकर *श्री शांति नाथ भगवान* की सोने की *1500 तीर्थंकर मूर्तियाँ* दान की थीं। कहां हैं वे मूर्तियां? मुगल आक्रमणकारियों एवं अन्य विद्वेषी धर्मावलंबी शासकों ने जब मौका मिला, जैनों की पाषाण प्रतिमाएं तोड़ दीं और सोने- चांदी- जवाहरात की मूर्तियां लूट लीं। आज धरती के गर्भ में छिपी पाषाण मूर्तियां और उनके अवशेष तो अपना इतिहास आज भी बयान करते हैं। लेकिन जो सोना- चांदी- हीरा -मोती जवाहरात लूट लिए गए—उनका कोई निशान तक नहीं बचा। इतिहासकार भविष्य में इन्हीं पाषाण प्रतिमाओं से जैन धर्म का प्रमाण पाएंगे। आज भी सच्चाई यही है कि सैकड़ों गांवों के जैन मंदिरों में 50-100 साल पहले तक भी सोने-चांदी के सिंहासन, बर्तन, मुकुट आदि भरे पड़े थे; आज एक भी शेष नहीं। कहां गये सब? *भयावह चोरियां*: पहले तो पता ही नहीं चलता था, पर अब मीडिया में चोरी की घटनाएं समय समय पर आती रहती हैं। हालांकि प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं भी विदेशी ब्लैक मार्केट के लिए अंतरराष्ट्रीय गैंग्स का निशाना बनती रहती हैं। सोने-चांदी की मूर्तियों, कलश, छत्र, सिंहासन, भामंडल आदि पर तो छोटे-मोटे चोरों की नजर लगी ही रहती है। वे मुंह ढंककर चोरी करने आते हैं, सो CCTV भी बेकार हो जाता है। दिगंबर -श्वेतांबर जैन मंदिरों में चोरी की कुछ प्रमुख घटनाओं पर एक दृष्टि डालते हैं: *उदयपुर (राजस्थान), 2019*: 6 करोड़ की रत्न जड़ी प्रतिमा चोरी। *पाटन (गुजरात), 2020*: 8 करोड़ का सोना-जवाहरात, पुजारी की मिलीभगत सामने आई। *दिल्ली चांदनी चौक, 2021*: 2.5 करोड़ का सोना-हीरा जड़ा मुकुट गायब। *बेलगावी (कर्नाटक), 2021*: 12वीं सदी की पार्श्वनाथ पाषाण मूर्ति—ब्रुसेल्स ब्लैक मार्केट में बिकी। *नागौर (राजस्थान), 2022*: 5 करोड़ की चांदी प्रतिमा और सोने के बर्तन चोरी। *पल्लवकालीन मंदिर (तमिलनाडु), 2022*: 10वीं सदी की 7 फीट पाषाण की भगवान ऋषभनाथ की प्रतिमा की चोरी—इंटरपोल अलर्ट। *कोल्हापुर (महाराष्ट्र), 2023*: 14 करोड़ के सोना-चांदी-हीरे के आभूषणों की चोरी। *अहमदाबाद (गुजरात), 2023*: 2 करोड़ का अष्टधातु का सिंहासन चोरी। *जयपुर (राजस्थान), 2024*: 4 करोड़ के चांदी कलश-छत्र की चोरी। *बाघनगर- गंजबासौदा (मप्र), 2024*: 1.5 करोड़ के चांदी-सोने के बर्तन चोरी गये। *मुंबई, 2025:* 3 करोड़ के सोना-चांदी थाल—चोरी में चौकीदार की संदिग्ध भूमिका। *ज्योति नगर (दिल्ली), 2025*: 40-50 लाख का सोना-मढ़ा कलश चोरी। *पचराई, तिमानगढ, गोलाकोट और चंपापुर* तीर्थों से प्राचीन‌ एतिहासिक महत्व की पाषाण मूर्तियों की चोरी प्रसिद्ध है। चोरी के बाद जैन समाज कुछ दिन तो रोता-पीटता है, फिर वही कीमती संग्रह जुटाने लगता है—यह चक्र चलता रहता है। क्या गरीब पुजारी या चौकीदार पर निर्भरता जैन मंदिरों की संपत्ति को बचा सकती है ? कई बार तो स्टाफ की ही मिलीभगत होती है। *आध्यात्मिक चेतावनी*: पूजन करो, प्रदर्शन मत करो! जैन आगम पूजन पर, तप- साधना पर जोर देते हैं, प्रदर्शन पर नहीं। क्या मंदिरों में सोना- चांदी- हीरा- माणिक दान देकर कल्याण हो जाता है? अगर इनकी सुरक्षा ही न हो सके तो इन की चोरी के पाप का भागी कौन बनेगा—दानकर्ता, साधु या पूरा समाज? सोचिये कि आज की सुरक्षा कल अपर्याप्त हो जाएगी। 20-50 साल बाद इसे कैसे बढ़ाया जाए—कोई स्थायी योजना नहीं। *अपरिग्रह क्यों*?: अपरिग्रह पर जैन धर्म के प्राचीन *आचार्य नेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ति* द्वारा रचित जीवकांड ग्रंथ से प्रेरित निम्न श्लोक देखें: _दस वयं परिग्गहो_, _जो न संजुट्टं विहाय।_ _परिग्गहं अप्पाणं,_ _वुज्झई अरिहंतं जिणं॥_ हिंदी अनुवाद: दस प्रकार के परिग्रह (संपत्ति) को त्यागकर, जो स्वयं से असंबद्ध हैं, उस परिग्रह को त्यागकर ही अरिहंत (जैन तीर्थंकर) को जाना जा सकता है। अपरिग्रह ही मोक्ष का मार्ग है। विस्तृत संदर्भग्रंथ: दसमस्मरण (10 स्मरण पाठ), जैन परंपरा का प्रमुख साधना ग्रंथ। अध्याय: अपरिग्रह व्रत पर चर्चा वाले खंड में। अर्थ पुनः: दस प्रकार के परिग्रह (भूमि, चांदी, सोना, घर, अनाज, स्त्री, गुलाम, पशु, जल, व्यापार) को त्यागकर ही आत्मा जैन तीर्थंकरों को पहचानती है। **** धन का सही उपयोग तो जैन शिक्षा, साधर्मी सहायता, जीव- रक्षा और प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार में है।आवश्यकता पड़ने पर नये जैन मंदिर तो बनाएं पर जिन बिंब पाषाण के ही विराजमान करें। किसी साधु या पंडित के बहकावे में आकर बहुमूल्य धातु-रत्न मंदिरों में न संग्रह करें।अपनी बुद्धि-ज्ञान का सही उपयोग करें। *जैन समाज जागो!* *पाषाण प्रतिमा से पूजन करो*, *मंदिरों में अपरिग्रह जियो*, *ऐतिहासिक धरोहरें बचाओ।।* ??? - *नीलमकांत जीवमित्र* 9910378087 nk.jeevmitra@ outlook.com *सबसे ज्यादा चोरियां*- *जैन मंदिरों में क्यों?* *सोनागिर तीर्थ पर फिर चोरी*।। ?????? जैन धर्म अपरिग्रह, अहिंसा, जीव दया और आत्म-कल्याण की शिक्षा देता है, लेकिन जैन मंदिरों में समाज का सोना- चांदी- अष्टधातु- हीरे- जवाहरात के प्रति अंधा मोह इन्हें चोरों का सबसे बड़ा शिकार बना रहा है। कोई महीना ऐसा नहीं जाता है जबकि किसी जैन मंदिर में चोरी की घटना नहीं घटती हो। जैन समाज को इन चोरियों से सालाना करोड़ों रुपये का भारी नुकसान हो रहा है। पर फिर भी जैन समाज न तो बदलने को तैयार हैं और न समझने - संभलने को। एक चोरी की घटना पर एक पुलिस अधिकारी ने टिप्पणी की कि "_हमारे हनुमानजी के मन्दिर से तो कभी चोरी नहीं होती, मंदिर खुले पड़े रहते हैं। पर जैन मंदिरों में धन के बोलवाले के कारण चोर वहां नहीं आयेंगे तो और क्या करेंगे? क्या पत्थर की प्रतिमा से पूजा -भक्ति नहीं हो सकती?..समय के अनुसार आप जैन लोग क्यों नहीं बदलते हैं_?" उपरोक्त प्रश्न तो बाजिव है पर जैनियों को कौन समझाएगा और कौन समझेगा? आज जब चांदी की कीमत *₹2.5 लाख प्रति किलो* के आसपास पहुंच गई है, तो जैन मंदिर तो चोरों के लिए 'गोल्डमाइन' क्यों नहीं बनेंगे? जो भी मिल जाये सो बहुत है। हजारों सामान्य हिंदू मंदिर हैं, लेकिन उनमें ऐसी चोरियां क्यों नहीं होतीं? कारण साफ है—जैन मंदिरों में कीमती धातुओं की सामग्री का ढेर लगा रहता है। *अपरिग्रह का सिद्धांत: भावना कहां खो गई?* जैन धर्म भावना-आधारित है, और अपरिग्रह इसका मजबूत स्तंभ है। आगम भी सिखाते हैं कि संपत्ति बंधन है, केवल आवश्यक रखो; पूजा चित्त से करो, धातु के आकर्षण से नहीं। फिर मंदिरों में कीमती धातुओं, हीरे-जवाहरात जड़ने में अपरिग्रह कहां रहा? भावना की जगह प्रदर्शन हावी—यह विडंबना है। असुरक्षित धन मोह बढ़ाता है, चोरियां आमंत्रित करता है। *ऐतिहासिक सबक*: इतिहास गवाह है कि पाषाण बची रहती है, धातु लुप्त हो जाती है। पुरातत्व खुदाई में 2-4 हजार साल पुरानी जैन धरोहर हमेशा पाषाण की ही मिलती है—5 फीट, 7 फीट, 9 फीट, या 11 फीट की विशाल प्रतिमाएं जो अपना इतिहास स्पष्ट बताती हैं। पर सोना- चांदी- पीतल या हीरे- जवाहरात की कोई प्रतिमा क्यों नहीं मिलती? *पूज्य श्री नेमिचंद्र आचार्य* ने '*जीव कांड*' जैसे ग्रंथों की रचना नेमिनाथ भगवान की रत्नमयी प्रतिमा के सामने की थी, लेकिन श्रवणबेलगोला (गोम्मटेश्वर) में वह प्रतिमा आज है क्या?—सब चोर शासक ले गए। उसी कालखंड में कर्नाटक की चालुक्य वंश की रानी एवं उत्कृष्ट श्राविका श्री *अत्तिमब्बेजी* को इतिहास में उनके असाधारण दान और परोपकार के लिए "*दान चिंतामणि*" (दान की इच्छा पूर्ति करने वाली मणि) के नाम से जाना जाता है। युद्ध में पति के देहावसान के बाद उन्होंने विधवा जीवन में भी जैन धर्म की अपूर्व सेवा की थी। उन्होंने अपने आराध्य तीर्थंकर *श्री शांति नाथ भगवान* की सोने की *1500 तीर्थंकर मूर्तियाँ* दान की थीं। कहां हैं वे मूर्तियां? मुगल आक्रमणकारियों एवं अन्य विद्वेषी धर्मावलंबी शासकों ने जब मौका मिला, जैनों की पाषाण प्रतिमाएं तोड़ दीं और सोने- चांदी- जवाहरात की मूर्तियां लूट लीं। आज धरती के गर्भ में छिपी पाषाण मूर्तियां और उनके अवशेष तो अपना इतिहास आज भी बयान करते हैं। लेकिन जो सोना- चांदी- हीरा -मोती जवाहरात लूट लिए गए—उनका कोई निशान तक नहीं बचा। इतिहासकार भविष्य में इन्हीं पाषाण प्रतिमाओं से जैन धर्म का प्रमाण पाएंगे। आज भी सच्चाई यही है कि सैकड़ों गांवों के जैन मंदिरों में 50-100 साल पहले तक भी सोने-चांदी के सिंहासन, बर्तन, मुकुट आदि भरे पड़े थे; आज एक भी शेष नहीं। कहां गये सब? *भयावह चोरियां*: पहले तो पता ही नहीं चलता था, पर अब मीडिया में चोरी की घटनाएं समय समय पर आती रहती हैं। हालांकि प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं भी विदेशी ब्लैक मार्केट के लिए अंतरराष्ट्रीय गैंग्स का निशाना बनती रहती हैं। सोने-चांदी की मूर्तियों, कलश, छत्र, सिंहासन, भामंडल आदि पर तो छोटे-मोटे चोरों की नजर लगी ही रहती है। वे मुंह ढंककर चोरी करने आते हैं, सो CCTV भी बेकार हो जाता है। दिगंबर -श्वेतांबर जैन मंदिरों में चोरी की कुछ प्रमुख घटनाओं पर एक दृष्टि डालते हैं: *उदयपुर (राजस्थान), 2019*: 6 करोड़ की रत्न जड़ी प्रतिमा चोरी। *पाटन (गुजरात), 2020*: 8 करोड़ का सोना-जवाहरात, पुजारी की मिलीभगत सामने आई। *दिल्ली चांदनी चौक, 2021*: 2.5 करोड़ का सोना-हीरा जड़ा मुकुट गायब। *बेलगावी (कर्नाटक), 2021*: 12वीं सदी की पार्श्वनाथ पाषाण मूर्ति—ब्रुसेल्स ब्लैक मार्केट में बिकी। *नागौर (राजस्थान), 2022*: 5 करोड़ की चांदी प्रतिमा और सोने के बर्तन चोरी। *पल्लवकालीन मंदिर (तमिलनाडु), 2022*: 10वीं सदी की 7 फीट पाषाण की भगवान ऋषभनाथ की प्रतिमा की चोरी—इंटरपोल अलर्ट। *कोल्हापुर (महाराष्ट्र), 2023*: 14 करोड़ के सोना-चांदी-हीरे के आभूषणों की चोरी। *अहमदाबाद (गुजरात), 2023*: 2 करोड़ का अष्टधातु का सिंहासन चोरी। *जयपुर (राजस्थान), 2024*: 4 करोड़ के चांदी कलश-छत्र की चोरी। *बाघनगर- गंजबासौदा (मप्र), 2024*: 1.5 करोड़ के चांदी-सोने के बर्तन चोरी गये। *मुंबई, 2025:* 3 करोड़ के सोना-चांदी थाल—चोरी में चौकीदार की संदिग्ध भूमिका। *ज्योति नगर (दिल्ली), 2025*: 40-50 लाख का सोना-मढ़ा कलश चोरी। *पचराई, तिमानगढ, गोलाकोट और चंपापुर* तीर्थों से प्राचीन‌ एतिहासिक महत्व की पाषाण मूर्तियों की चोरी प्रसिद्ध है। चोरी के बाद जैन समाज कुछ दिन तो रोता-पीटता है, फिर वही कीमती संग्रह जुटाने लगता है—यह चक्र चलता रहता है। क्या गरीब पुजारी या चौकीदार पर निर्भरता जैन मंदिरों की संपत्ति को बचा सकती है ? कई बार तो स्टाफ की ही मिलीभगत होती है। *आध्यात्मिक चेतावनी*: पूजन करो, प्रदर्शन मत करो! जैन आगम पूजन पर, तप- साधना पर जोर देते हैं, प्रदर्शन पर नहीं। क्या मंदिरों में सोना- चांदी- हीरा- माणिक दान देकर कल्याण हो जाता है? अगर इनकी सुरक्षा ही न हो सके तो इन की चोरी के पाप का भागी कौन बनेगा—दानकर्ता, साधु या पूरा समाज? सोचिये कि आज की सुरक्षा कल अपर्याप्त हो जाएगी। 20-50 साल बाद इसे कैसे बढ़ाया जाए—कोई स्थायी योजना नहीं। *अपरिग्रह क्यों*?: अपरिग्रह पर जैन धर्म के प्राचीन *आचार्य नेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्ति* द्वारा रचित जीवकांड ग्रंथ से प्रेरित निम्न श्लोक देखें: _दस वयं परिग्गहो_, _जो न संजुट्टं विहाय।_ _परिग्गहं अप्पाणं,_ _वुज्झई अरिहंतं जिणं॥_ हिंदी अनुवाद: दस प्रकार के परिग्रह (संपत्ति) को त्यागकर, जो स्वयं से असंबद्ध हैं, उस परिग्रह को त्यागकर ही अरिहंत (जैन तीर्थंकर) को जाना जा सकता है। अपरिग्रह ही मोक्ष का मार्ग है। विस्तृत संदर्भग्रंथ: दसमस्मरण (10 स्मरण पाठ), जैन परंपरा का प्रमुख साधना ग्रंथ। अध्याय: अपरिग्रह व्रत पर चर्चा वाले खंड में। अर्थ पुनः: दस प्रकार के परिग्रह (भूमि, चांदी, सोना, घर, अनाज, स्त्री, गुलाम, पशु, जल, व्यापार) को त्यागकर ही आत्मा जैन तीर्थंकरों को पहचानती है। **** धन का सही उपयोग तो जैन शिक्षा, साधर्मी सहायता, जीव- रक्षा और प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार में है।आवश्यकता पड़ने पर नये जैन मंदिर तो बनाएं पर जिन बिंब पाषाण के ही विराजमान करें। किसी साधु या पंडित के बहकावे में आकर बहुमूल्य धातु-रत्न मंदिरों में न संग्रह करें।अपनी बुद्धि-ज्ञान का सही उपयोग करें। *जैन समाज जागो!* *पाषाण प्रतिमा से पूजन करो*, *मंदिरों में अपरिग्रह जियो*, *ऐतिहासिक धरोहरें बचाओ।।* ??? - *नीलमकांत जीवमित्र* 9910378087 nk.jeevmitra@ outlook.com <a href="https://chat.whatsapp.com/HkzDXVvU42K1PNtF2NM84e?mode=gi_t" target="_blank">https://chat.whatsapp.com/HkzDXVvU42K1PNtF2NM84e?mode=gi_t</a> 2026-04-06 14:47:12
69385 48283815 Jain pramukh pathshala 1 ?*आचार्य प्रमुख सागराय नम:*? *कल* के प्रमुख प्रश्न श्रंखला प्रश्न के विजेता हैं ? Monika Jain 9818494487 ( Note: *विजेता का चयन, रात 8 बजे तक जवाब देने वाले सभी नामों में से, random number generator app की मदद से ड्रॉ करके किया जाता है*?) Congratulations ? For the prize money, please send your gpay number to..?? 9436063 533 Dr Rajani Sethi ?????? 2026-04-06 14:46:37
69386 48283815 Jain pramukh pathshala 1 ?*आचार्य प्रमुख सागराय नम:*? *कल* के प्रमुख प्रश्न श्रंखला प्रश्न के विजेता हैं ? Monika Jain 9818494487 ( Note: *विजेता का चयन, रात 8 बजे तक जवाब देने वाले सभी नामों में से, random number generator app की मदद से ड्रॉ करके किया जाता है*?) Congratulations ? For the prize money, please send your gpay number to..?? 9436063 533 Dr Rajani Sethi ?????? 2026-04-06 14:46:37