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Chat ID
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Chat Name
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Message
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Status
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Date |
View |
| 233394 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-06-16 04:08:47 |
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| 233395 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-06-16 04:08:47 |
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| 233392 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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Ashirwad |
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2026-06-16 04:02:45 |
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| 233393 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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Ashirwad |
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2026-06-16 04:02:45 |
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| 233391 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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*कहानी बड़ी सुहानी*
(1) *कहानी*
*ईश्वर का गणित*
_एक बार दो आदमी एक मंदिर के पास बैठे गपशप कर रहे थे । वहां अंधेरा छा रहा था और बादल मंडरा रहे थे ।_
_थोड़ी देर में वहां एक आदमी आया और वो भी उन दोनों के साथ बैठकर गपशप करने लगा ।_
_कुछ देर बाद वो आदमी बोला उसे बहुत भूख लग रही है, उन दोनों को भी भूख लगने लगी थी ।
पहला आदमी बोला मेरे पास 3 रोटी हैं, दूसरा बोला मेरे पास 5 रोटी हैं, हम तीनों मिल बांट कर खा लेते हैं।_
_उसके बाद सवाल आया कि 8 (3+5) रोटी तीन आदमियों में कैसे बांट पाएंगे ??_
_पहले आदमी ने राय दी कि ऐसा करते हैं कि हर रोटी के 3 टुकडे करते हैं, अर्थात 8 रोटी के 24 टुकडे (8 X 3 = 24) हो जाएंगे और हम तीनों में 8 - 8 टुकड़े बराबर बराबर बंट जाएंगे।_
_तीनों को उसकी राय अच्छी लगी और 8 रोटी के 24 टुकडे करके प्रत्येक ने 8 - 8 रोटी के टुकड़े खाकर भूख शांत की और फिर बारिश के कारण मंदिर के प्रांगण में ही सो गए ।_
_सुबह उठने पर तीसरे आदमी ने उनके उपकार के लिए दोनों को धन्यवाद दिया और प्रेम से 8 रोटी के टुकड़ों के बदले दोनों को उपहार स्वरूप 8 सोने की गिन्नी देकर अपने घर की ओर चला गया ।_
_उसके जाने के बाद दूसरे आदमी ने पहले आदमी से कहा हम दोनों 4 - 4 गिन्नी बांट लेते हैं ।_
_पहला आदमी बोला नहीं मेरी 3 रोटी थी और तुम्हारी 5 रोटी थी, अतः मैं 3 गिन्नी लुंगा, तुम्हें 5 गिन्नी रखनी होगी ।_
_इस पर दोनों में बहस होने लगी ।_
_इसके बाद वे दोनों समाधान के लिये मंदिर के पुजारी के पास गए और उन्हें समस्या बताई तथा समाधान के लिए प्रार्थना की ।_
_पुजारी भी असमंजस में पड़ गया, दोनों दूसरे को ज्यादा देने के लिये लड़ रहे है । पुजारी ने कहा तुम लोग ये 8 गिन्नियाँ मेरे पास छोड़ जाओ और मुझे सोचने का समय दो, मैं कल सवेरे जवाब दे पाऊंगा ।_
_पुजारी को दिल में वैसे तो दूसरे आदमी की 3-5 की बात ठीक लग रही थी पर फिर भी वह गहराई से सोचते-सोचते गहरी नींद में सो गया।_
_कुछ देर बाद उसके सपने में भगवान प्रगट हुए तो पुजारी ने सब बातें बताई और न्यायिक मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना की और बताया कि मेरे ख्याल से 3 - 5 बंटवारा ही उचित लगता है ।_
_भगवान मुस्कुरा कर बोले- नहीं,
पहले आदमी को 1 गिन्नी मिलनी चाहिए और दूसरे आदमी को 7 गिन्नी मिलनी चाहिए ।_
_भगवान की बात सुनकर पुजारी अचंभित हो गया और अचरज से पूछा-
प्रभु, ऐसा कैसे ?
_भगवन फिर एक बार मुस्कुराए और बोले :_
_इसमें कोई शंका नहीं कि पहले आदमी ने अपनी 3 रोटी के 9 टुकड़े किये परंतु उन 9 में से उसने सिर्फ 1 बांटा और 8 टुकड़े स्वयं खाया अर्थात उसका त्याग सिर्फ 1 रोटी के टुकड़े का था इसलिए वो सिर्फ 1 गिन्नी का ही हकदार है ।_
_दूसरे आदमी ने अपनी 5 रोटी के 15 टुकड़े किये जिसमें से 8 टुकड़े उसने स्वयं खाऐ और 7 टुकड़े उसने बांट दिए । इसलिए वो न्यायानुसार 7 गिन्नी का हकदार है .. ये ही मेरा गणित है और ये ही मेरा न्याय है !_
_ईश्वर की न्याय का सटिक विश्लेषण सुनकर पुजारी नतमस्तक हो गया।_
_इस कहानी का सार ये ही है कि हमारी वस्तुस्थिति को देखने की, समझने की दृष्टि और ईश्वर का दृष्टिकोण एकदम भिन्न है । हम ईश्वरीय न्यायलीला को जानने समझने में सर्वथा अज्ञानी हैं ।_
_हम अपने त्याग का गुणगान करते है, परंतु ईश्वर हमारे त्याग की तुलना हमारे सामर्थ्य एवं भोग तौर कर यथोचित निर्णय करते हैं ।_
*_यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हम कितने धन संपन्न है, महत्वपूर्ण यहीं है कि हमारे सेवाभाव कार्य में त्याग कितना है।_*
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(2) *कहानी*
*सीमा में रहना अच्छा*
*सड़क किनारे एक बुढिया अपना ढाबा चलाती थी।*
*एक मुसाफिर आया।दिन भर का थका, उसने विश्राम करने की सोची।बुढिया से कहा,क्या रात्रि भर यहां आश्रय मिल सकेगा?' बुढिया ने कहा,क्यों नहीं, आराम से यहां रात भर सो सकते हो।'*
*यात्री ने पास में पड़ी चारपाइयों की ओर संकेत कर कहा,इस पर सोने का क्या चार्ज लगेगा?' बुढिया ने कहा, चारपाई के सिर्फ आठ आना।'यात्री ने सोचा रात भर की ही तो बात है।बेकार में अठन्नी क्यों खर्च की जाए।आंगन में काफी जगह है,वहीं सो जाऊंगा।*
*यह सोचकर उसने फिर कहा,'और अगर चारपाई पर न सोकर आंगन की भूमि पर ही रात काट लूं तो क्या लगेगा?''फिर पूरा एक रूपया लगेगा।'बुढिया ने कहा।*
*बुढिया की बात सुन यात्री को उसके दिमाग पर संदेह हुआ।चारपाई पर सोने का आठ आना और भूमि पर चादर बिछाकर सोने का एक रूपया।यह तो बड़ी विचित्र बात है।उसने बुढिया से पूछा, 'ऎसा क्यों?'*
*बुढिया ने कहा, चारपाई की सीमा है।तीन फुट चौड़ी, छह फुट लंबी जगह ही घेरोगे। बिना चारपाई सोओगे तो पता नहीं कितनी जगह घेर लो।' सीमा में रहना ही ठीक है। असीम की बात समस्या पैदा करती है*।
*मान मर्यादा,नियम सयंम में रहना ही श्रेष्ठ है,सदैव प्रसन्न रहिये!!*
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(3) *कहानी*
*साहसी बालक*
?शहर के बाहर एक विशाल पार्क था। उसी के साथ एक गहरी नदी तीव्र वेग से बहती थी।
? शाम के समय बच्चे, बूढ़े और जवान सभी पार्क में बिछी हरी हरी दूब, क्यारियों में खिले रंग बिरंगे फूल, तरह तरह के पेड़, लताएं और फव्वारों के बीच बैठकर फुरसत के क्षणों का आनन्द लूटते थे।
? एक दिन पार्क में दो बच्चे खेलते कूदते नदी के तट पर पहुंच गये। शरारत तो बच्चों का स्वभाव है। दोनों एक दूसरे के साथ धक्का मुक्की करते हुए नदी में जा गिरे।
? नदी में बहते-डूबते बच्चों पर मां की निगाह पड़ी और वह एकदम बदहवास सी पागलों की तरह चिल्लाने लगी- अरे, कोई मेरे बच्चों को बचाओ। देखो, मेरे दोनों बच्चे डूब रहे हैं। कोई तो सहायता करो।
? स्त्री के चिल्लाने की आवाज सुनकर वहां भीड़ इकटठे हो गई। नदी गहरी थी। किसी की भी नदी में कूदने की हिम्मत नहीं हो रही थी। सब मूक दर्शक बने खड़े थे। मां हाथ पीट कर चिल्ला रही थी।
? वह स्वयं ही दौड़कर नदी में कूदने ही वाली थी कि तभी अचानक कहीं से एक लड़का दौड़ता हुआ आया। उसने बच्चों को डूबते हुए देखा तो प्राणों की परवाह किये बिना ही उसने तुरन्त नदी में छलांग लगा दी।
? वह तीर की तरह तैर कर, डूबते-उठते बच्चों के पास पहुंचा। उन्हें पकड़ कर पीठ पर लादा और तैरते हुए बच्चों को सुरक्षित किनारे पर ले आया। सभी दर्शक उसकी उदार साहसिकता को देखकर अचम्भित रह गये।
? सभी मुक्त कंठ से लड़के की प्रशंसा करते हुए कह रहे थे यह तो कोई मसीहा है जो अचानक प्रकट होकर बच्चों की रक्षा के लिये आ गया।
? बच्चों की मां ने रोते रोते लड़के को सैंकड़ों दुआएं दे डाली। उसने कई बार प्यार से उसका माथा चूमा। इस साहसी और वीर बालक का जन्म एक गरीब किसान परिवार में हुआ था।
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(4) *आज की हकीकत*
*गुम हो गए #संयुक्त_परिवार*
*एक वो दौर था* जब पति , *अपनी भाभी को आवाज़ लगाकर*
घर आने की खबर अपनी पत्नी को देता था ।
पत्नी की *छनकती पायल और खनकते कंगन* बड़े उतावलेपन के साथ पति का स्वागत करते थे ।
बाऊजी की बातों का .. *”हाँ बाऊजी"* , *"जी बाऊजी"*'
के अलावा दूसरा जवाब नही होता था ।
*आज बेटा बाप से बड़ा हो गया, रिश्तों का केवल नाम रह गया*
ये *"समय - समय"* की नही , *"समझ - समझ"* की बात है l
बीवी से तो दूर, बड़ो के सामने, अपने बच्चों तक से बात नही करते थे
*आज बड़े बैठे रहते हैं हम सिर्फ बीवी* से बात करते हैं l
दादाजी के कंधे तो मानो , पोतों - पोतियों के लिए आरक्षित होते थे, *काका* ही *भतीजों के दोस्त हुआ करते थे ।*
आज वही दादू - दादी *वृद्धाश्रम* की पहचान है ,
*चाचा - चाची* बस, *रिश्तेदारों की सूची का नाम है ।*
बड़े पापा सभी का ख्याल रखते थे, अपने बेटे के लिए जो खिलौना खरीदा वैसा ही खिलौना परिवार के सभी बच्चों के लिए लाते थे ।
*'ताऊजी'* आज *सिर्फ पहचान* रह गए
और ,......
*छोटे के बच्चे* पता नही *कब जवान* हो गये ..??
दादी जब बिलोना करती थी , बेटों को भले ही छाछ दे पर *मक्खन* तो
*केवल पोतों में ही बाँटती थी।*
*दादी ने* ... *पोतों की आस छोड़ दी*,
क्योंकि ,...
*पोतों ने अपनी राह* .... *अलग मोड़ दी ।*
राखी पर *बुआ* आती थी, घर मे नही *मोहल्ले* में ,
*फूफाजी* को *चाय - नाश्ते पर बुलाते थे ।*
अब बुआजी, बस *दादा - दादी* के बीमार होने पर आते है ,
किसी और को उनसे मतलब नही ,
चुपचाप नयननीर बरसा कर वो भी चले जाते है ।
शायद *मेरे शब्दों* का कोई *महत्व ना* हो ,
पर *कोशिश* करना , इस *भीड़* में
*खुद को पहचानने की*,
*कि*,.......
*हम "ज़िंदा है"* या *बस "जी रहे" हैं"*
अंग्रेजी ने अपना स्वांग रचा दिया ,
*"शिक्षा के चक्कर में* ... *संस्कारों को ही भुला दिया"।*
बालक की प्रथम पाठशाला *परिवार*
पहला शिक्षक उसकी *माँ* होती थी ,
आज ......
*परिवार* ही नही रहे पहली *शिक्षक* का क्या काम ...??
"ये *समय - समय* की नही ,
*समझ - समझ* की बात है.
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2026-06-16 04:02:44 |
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| 233390 |
40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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*कहानी बड़ी सुहानी*
(1) *कहानी*
*ईश्वर का गणित*
_एक बार दो आदमी एक मंदिर के पास बैठे गपशप कर रहे थे । वहां अंधेरा छा रहा था और बादल मंडरा रहे थे ।_
_थोड़ी देर में वहां एक आदमी आया और वो भी उन दोनों के साथ बैठकर गपशप करने लगा ।_
_कुछ देर बाद वो आदमी बोला उसे बहुत भूख लग रही है, उन दोनों को भी भूख लगने लगी थी ।
पहला आदमी बोला मेरे पास 3 रोटी हैं, दूसरा बोला मेरे पास 5 रोटी हैं, हम तीनों मिल बांट कर खा लेते हैं।_
_उसके बाद सवाल आया कि 8 (3+5) रोटी तीन आदमियों में कैसे बांट पाएंगे ??_
_पहले आदमी ने राय दी कि ऐसा करते हैं कि हर रोटी के 3 टुकडे करते हैं, अर्थात 8 रोटी के 24 टुकडे (8 X 3 = 24) हो जाएंगे और हम तीनों में 8 - 8 टुकड़े बराबर बराबर बंट जाएंगे।_
_तीनों को उसकी राय अच्छी लगी और 8 रोटी के 24 टुकडे करके प्रत्येक ने 8 - 8 रोटी के टुकड़े खाकर भूख शांत की और फिर बारिश के कारण मंदिर के प्रांगण में ही सो गए ।_
_सुबह उठने पर तीसरे आदमी ने उनके उपकार के लिए दोनों को धन्यवाद दिया और प्रेम से 8 रोटी के टुकड़ों के बदले दोनों को उपहार स्वरूप 8 सोने की गिन्नी देकर अपने घर की ओर चला गया ।_
_उसके जाने के बाद दूसरे आदमी ने पहले आदमी से कहा हम दोनों 4 - 4 गिन्नी बांट लेते हैं ।_
_पहला आदमी बोला नहीं मेरी 3 रोटी थी और तुम्हारी 5 रोटी थी, अतः मैं 3 गिन्नी लुंगा, तुम्हें 5 गिन्नी रखनी होगी ।_
_इस पर दोनों में बहस होने लगी ।_
_इसके बाद वे दोनों समाधान के लिये मंदिर के पुजारी के पास गए और उन्हें समस्या बताई तथा समाधान के लिए प्रार्थना की ।_
_पुजारी भी असमंजस में पड़ गया, दोनों दूसरे को ज्यादा देने के लिये लड़ रहे है । पुजारी ने कहा तुम लोग ये 8 गिन्नियाँ मेरे पास छोड़ जाओ और मुझे सोचने का समय दो, मैं कल सवेरे जवाब दे पाऊंगा ।_
_पुजारी को दिल में वैसे तो दूसरे आदमी की 3-5 की बात ठीक लग रही थी पर फिर भी वह गहराई से सोचते-सोचते गहरी नींद में सो गया।_
_कुछ देर बाद उसके सपने में भगवान प्रगट हुए तो पुजारी ने सब बातें बताई और न्यायिक मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना की और बताया कि मेरे ख्याल से 3 - 5 बंटवारा ही उचित लगता है ।_
_भगवान मुस्कुरा कर बोले- नहीं,
पहले आदमी को 1 गिन्नी मिलनी चाहिए और दूसरे आदमी को 7 गिन्नी मिलनी चाहिए ।_
_भगवान की बात सुनकर पुजारी अचंभित हो गया और अचरज से पूछा-
प्रभु, ऐसा कैसे ?
_भगवन फिर एक बार मुस्कुराए और बोले :_
_इसमें कोई शंका नहीं कि पहले आदमी ने अपनी 3 रोटी के 9 टुकड़े किये परंतु उन 9 में से उसने सिर्फ 1 बांटा और 8 टुकड़े स्वयं खाया अर्थात उसका त्याग सिर्फ 1 रोटी के टुकड़े का था इसलिए वो सिर्फ 1 गिन्नी का ही हकदार है ।_
_दूसरे आदमी ने अपनी 5 रोटी के 15 टुकड़े किये जिसमें से 8 टुकड़े उसने स्वयं खाऐ और 7 टुकड़े उसने बांट दिए । इसलिए वो न्यायानुसार 7 गिन्नी का हकदार है .. ये ही मेरा गणित है और ये ही मेरा न्याय है !_
_ईश्वर की न्याय का सटिक विश्लेषण सुनकर पुजारी नतमस्तक हो गया।_
_इस कहानी का सार ये ही है कि हमारी वस्तुस्थिति को देखने की, समझने की दृष्टि और ईश्वर का दृष्टिकोण एकदम भिन्न है । हम ईश्वरीय न्यायलीला को जानने समझने में सर्वथा अज्ञानी हैं ।_
_हम अपने त्याग का गुणगान करते है, परंतु ईश्वर हमारे त्याग की तुलना हमारे सामर्थ्य एवं भोग तौर कर यथोचित निर्णय करते हैं ।_
*_यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हम कितने धन संपन्न है, महत्वपूर्ण यहीं है कि हमारे सेवाभाव कार्य में त्याग कितना है।_*
मैसेज अच्छा लगे तो अपने परिजनों से शेयर अवश्य करें!
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(2) *कहानी*
*सीमा में रहना अच्छा*
*सड़क किनारे एक बुढिया अपना ढाबा चलाती थी।*
*एक मुसाफिर आया।दिन भर का थका, उसने विश्राम करने की सोची।बुढिया से कहा,क्या रात्रि भर यहां आश्रय मिल सकेगा?' बुढिया ने कहा,क्यों नहीं, आराम से यहां रात भर सो सकते हो।'*
*यात्री ने पास में पड़ी चारपाइयों की ओर संकेत कर कहा,इस पर सोने का क्या चार्ज लगेगा?' बुढिया ने कहा, चारपाई के सिर्फ आठ आना।'यात्री ने सोचा रात भर की ही तो बात है।बेकार में अठन्नी क्यों खर्च की जाए।आंगन में काफी जगह है,वहीं सो जाऊंगा।*
*यह सोचकर उसने फिर कहा,'और अगर चारपाई पर न सोकर आंगन की भूमि पर ही रात काट लूं तो क्या लगेगा?''फिर पूरा एक रूपया लगेगा।'बुढिया ने कहा।*
*बुढिया की बात सुन यात्री को उसके दिमाग पर संदेह हुआ।चारपाई पर सोने का आठ आना और भूमि पर चादर बिछाकर सोने का एक रूपया।यह तो बड़ी विचित्र बात है।उसने बुढिया से पूछा, 'ऎसा क्यों?'*
*बुढिया ने कहा, चारपाई की सीमा है।तीन फुट चौड़ी, छह फुट लंबी जगह ही घेरोगे। बिना चारपाई सोओगे तो पता नहीं कितनी जगह घेर लो।' सीमा में रहना ही ठीक है। असीम की बात समस्या पैदा करती है*।
*मान मर्यादा,नियम सयंम में रहना ही श्रेष्ठ है,सदैव प्रसन्न रहिये!!*
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(3) *कहानी*
*साहसी बालक*
?शहर के बाहर एक विशाल पार्क था। उसी के साथ एक गहरी नदी तीव्र वेग से बहती थी।
? शाम के समय बच्चे, बूढ़े और जवान सभी पार्क में बिछी हरी हरी दूब, क्यारियों में खिले रंग बिरंगे फूल, तरह तरह के पेड़, लताएं और फव्वारों के बीच बैठकर फुरसत के क्षणों का आनन्द लूटते थे।
? एक दिन पार्क में दो बच्चे खेलते कूदते नदी के तट पर पहुंच गये। शरारत तो बच्चों का स्वभाव है। दोनों एक दूसरे के साथ धक्का मुक्की करते हुए नदी में जा गिरे।
? नदी में बहते-डूबते बच्चों पर मां की निगाह पड़ी और वह एकदम बदहवास सी पागलों की तरह चिल्लाने लगी- अरे, कोई मेरे बच्चों को बचाओ। देखो, मेरे दोनों बच्चे डूब रहे हैं। कोई तो सहायता करो।
? स्त्री के चिल्लाने की आवाज सुनकर वहां भीड़ इकटठे हो गई। नदी गहरी थी। किसी की भी नदी में कूदने की हिम्मत नहीं हो रही थी। सब मूक दर्शक बने खड़े थे। मां हाथ पीट कर चिल्ला रही थी।
? वह स्वयं ही दौड़कर नदी में कूदने ही वाली थी कि तभी अचानक कहीं से एक लड़का दौड़ता हुआ आया। उसने बच्चों को डूबते हुए देखा तो प्राणों की परवाह किये बिना ही उसने तुरन्त नदी में छलांग लगा दी।
? वह तीर की तरह तैर कर, डूबते-उठते बच्चों के पास पहुंचा। उन्हें पकड़ कर पीठ पर लादा और तैरते हुए बच्चों को सुरक्षित किनारे पर ले आया। सभी दर्शक उसकी उदार साहसिकता को देखकर अचम्भित रह गये।
? सभी मुक्त कंठ से लड़के की प्रशंसा करते हुए कह रहे थे यह तो कोई मसीहा है जो अचानक प्रकट होकर बच्चों की रक्षा के लिये आ गया।
? बच्चों की मां ने रोते रोते लड़के को सैंकड़ों दुआएं दे डाली। उसने कई बार प्यार से उसका माथा चूमा। इस साहसी और वीर बालक का जन्म एक गरीब किसान परिवार में हुआ था।
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(4) *आज की हकीकत*
*गुम हो गए #संयुक्त_परिवार*
*एक वो दौर था* जब पति , *अपनी भाभी को आवाज़ लगाकर*
घर आने की खबर अपनी पत्नी को देता था ।
पत्नी की *छनकती पायल और खनकते कंगन* बड़े उतावलेपन के साथ पति का स्वागत करते थे ।
बाऊजी की बातों का .. *”हाँ बाऊजी"* , *"जी बाऊजी"*'
के अलावा दूसरा जवाब नही होता था ।
*आज बेटा बाप से बड़ा हो गया, रिश्तों का केवल नाम रह गया*
ये *"समय - समय"* की नही , *"समझ - समझ"* की बात है l
बीवी से तो दूर, बड़ो के सामने, अपने बच्चों तक से बात नही करते थे
*आज बड़े बैठे रहते हैं हम सिर्फ बीवी* से बात करते हैं l
दादाजी के कंधे तो मानो , पोतों - पोतियों के लिए आरक्षित होते थे, *काका* ही *भतीजों के दोस्त हुआ करते थे ।*
आज वही दादू - दादी *वृद्धाश्रम* की पहचान है ,
*चाचा - चाची* बस, *रिश्तेदारों की सूची का नाम है ।*
बड़े पापा सभी का ख्याल रखते थे, अपने बेटे के लिए जो खिलौना खरीदा वैसा ही खिलौना परिवार के सभी बच्चों के लिए लाते थे ।
*'ताऊजी'* आज *सिर्फ पहचान* रह गए
और ,......
*छोटे के बच्चे* पता नही *कब जवान* हो गये ..??
दादी जब बिलोना करती थी , बेटों को भले ही छाछ दे पर *मक्खन* तो
*केवल पोतों में ही बाँटती थी।*
*दादी ने* ... *पोतों की आस छोड़ दी*,
क्योंकि ,...
*पोतों ने अपनी राह* .... *अलग मोड़ दी ।*
राखी पर *बुआ* आती थी, घर मे नही *मोहल्ले* में ,
*फूफाजी* को *चाय - नाश्ते पर बुलाते थे ।*
अब बुआजी, बस *दादा - दादी* के बीमार होने पर आते है ,
किसी और को उनसे मतलब नही ,
चुपचाप नयननीर बरसा कर वो भी चले जाते है ।
शायद *मेरे शब्दों* का कोई *महत्व ना* हो ,
पर *कोशिश* करना , इस *भीड़* में
*खुद को पहचानने की*,
*कि*,.......
*हम "ज़िंदा है"* या *बस "जी रहे" हैं"*
अंग्रेजी ने अपना स्वांग रचा दिया ,
*"शिक्षा के चक्कर में* ... *संस्कारों को ही भुला दिया"।*
बालक की प्रथम पाठशाला *परिवार*
पहला शिक्षक उसकी *माँ* होती थी ,
आज ......
*परिवार* ही नही रहे पहली *शिक्षक* का क्या काम ...??
"ये *समय - समय* की नही ,
*समझ - समझ* की बात है.
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2026-06-16 04:02:43 |
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40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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2026-06-16 04:01:52 |
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गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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2026-06-16 04:01:52 |
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1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-06-16 03:46:16 |
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1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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2026-06-16 03:46:15 |
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