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Chat ID
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Chat Name
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Sender
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Phone
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Message
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Status
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Date |
View |
| 233501 |
40449677 |
तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन |
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2026-06-16 05:39:35 |
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| 233500 |
40449677 |
तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन |
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2026-06-16 05:39:34 |
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| 233499 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*कहानी बड़ी सुहानी*
(1) *कहानी*
*माँ बेटे का प्यार*
*अख़बार बेचने वाला 10 वर्षीय बालक एक मकान का गेट बजा रहा है।*
*मालकिन - बाहर आकर पूछी क्या है ?*
*बालक - आंटी जी क्या मैं आपका गार्डेन साफ कर दूं ?*
*मालकिन - नहीं, हमें नहीं करवाना है, और आज अखबार क्यों नही लाया ।*
*बालक - हाथ जोड़ते हुए दयनीय स्वर में.. "प्लीज आंटी जी करा लीजिये न, अच्छे से साफ करूंगा,आज अखबार नही छपा,कल छुट्टी थी दशहरे की ।"*
*मालकिन - द्रवित होते हुए "अच्छा ठीक है, कितने पैसा लेगा ?"*
*बालक - पैसा नहीं आंटी जी, खाना दे देना।"*
*मालकिन- ओह !! आ जाओ अच्छे से काम करना ।*
*(लगता है बेचारा भूखा है पहले खाना दे देती हूँ..मालकिन बुदबुदायी।)*
*मालकिन- ऐ लड़के..पहले खाना खा ले, फिर काम करना ।*
*बालक -नहीं आंटी जी, पहले काम कर लूँ फिर आप खाना दे देना।*
*मालकिन - ठीक है, कहकर अपने काम में लग गयी।*
*बालक - एक घंटे बाद "आंटी जी देख लीजिए, सफाई अच्छे से हुई कि नहीं।*
*मालकिन -अरे वाह! तूने तो बहुत बढ़िया सफाई की है, गमले भी करीने से जमा दिए। यहां बैठ, मैं खाना लाती हूँ।*
*जैसे ही मालकिन ने उसे खाना दिया, बालक जेब से पन्नी निकाल कर उसमें खाना रखने लगा।*
*मालकिन - भूखे काम किया है, अब खाना तो यहीं बैठकर खा ले। जरूरत होगी तो और दे दूंगी।*
*बालक - नहीं आंटी, मेरी बीमार माँ घर पर है,सरकारी अस्पताल से दवा तो मिल गयी है,पर डाॅ साहब ने कहा है दवा खाली पेट नहीं देना है।*
*मालकिन की पलके गीली हो गई..और अपने हाथों से मासूम को उसकी दूसरी माँ बनकर खाना खिलाया फिर उसकी माँ के लिए रोटियां बनाई और साथ उसके घर जाकर उसकी माँ को रोटियां दे आयी ।*
*और आते आते कह कर आयी "बहन आप बहुत अमीर हो जो दौलत आपने अपने बेटे को दी है वो हम भी अपने बच्चों को नहीं दे पाते हैं" ।*
*माँ बेटे की तरफ डबडबाई आंखों से देखे जा रही थी...बेटा बीमार मां से लिपट गया...*
*माँ ने खाना खाया और दवाई लेकर आराम करने लेट गई।।*
*और बेटा माँ को खाना खिलाकर बहुत प्रसन्न मुद्रा में पास में बैठ माँ से बाते करने लगा ।*
****************************************
(2) *कहानी*
*पराजय*
एक *डिप्टी कलेक्टर* के तौर पर जब *जिला शिक्षा अधिकारी* का प्रभार मिलने के बाद ज्वाइन किया..तो जानकारी हुई की ये जिला ..स्कूली शिक्षा के लिहाज से बहुत पिछड़ा हुआ हैं...
वरिष्ठ अधिकारियों ने भी कहा आप ग्रामीण इलाकों पर विशेष ध्यान दें..
बस तय कर लिया ... महीने में आठ दस दिन जरूर ग्रामीण स्कूलों को दूंगा..
शीघ्र ही..ग्रामीण इलाकों में दौरों का सिलसिला चल निकला .. पहाड़ी व जंगली इलाका भी था कुछ..
एक दिन मातहत कर्मचारियों से मालूम हुआ.. "बड़ेरी" नामक गांव, जो एक पहाड़ी पर स्थित है..वहां के स्कूल में कोई शिक्षा अधिकारी नहीं जाता है, क्योंकि वहां पहुंचने के लिए.. वाहन छोड़कर ... लगभग पांच-छः किलोमीटर जंगली रास्ते से पैदल ही जाना होता है .....
तय कर लिया अगले दिन वहां जाया जाए..
वहां कोई मिस्टर वी. के. वर्मा हेड मास्टर हैं. जो बरसों से, पता नहीं क्यूं ... वहीं जमे हुए हैं .!
मैंने निर्देश दिए उन्हें कोई अग्रिम सूचना न दी जाय .... सरप्राइज विजिट होगी..!
अगले दिन हम सुबह निकले ... दोपहर बारह बजे .... ड्राइवर ने कहा साहब यहां से आगे .... पहाड़ी पर पैदल ही जाना होगा पाच छः किलोमीटर..
मै और दो अन्य कर्मचारी पैदल ही चल पड़े..
लगभग डेढ़ घंटे सकरे .. पथरीले जंगली रास्ते से होकर हम ऊपर गांव तक पहुंचे..सामने स्कूल का पक्का भवन था..और लगभग दो सौ कच्चे पक्के मकान थे..
स्कूल साफ सुथरा और व्यवस्थित रंगा पुता हुआ था .. बस तीन कमरे और प्रशस्त बरामदा..चारों तरफ सुरम्य हरा भरा वन..
अंदर क्लास रूम में पहुंचे तो तीन कक्षाओं में लगभग सवा सौ बच्चे तल्लीनता पूर्वक पढ़ रहे थे.. हालांकि शिक्षक कोई भी नहीं था..एक बुजुर्ग सज्जन बरामदे में थे जो वहां नियुक्त पियून थे.शायद...
उन्होंने बताया हेड मास्टर साहब आते ही होंगे..
हम बरामदे में बैठ गए थे..तभी देखा एक चालीस पैतालीस वर्ष के सज्जन..अपने दोनो हाथो में पानी की बाल्टियां लिए ऊपर चले आ रहे थे..पायजामा घुटनों तक चढ़ाया हुआ था..ऊपर खादी का कुर्ता जैसा था..!
उन्होंने आते ही परिचय दिया.. मैं *वी के वर्मा* यहां हेड मास्टर हूं..। यहां इन दिनों ..बच्चों के लिए पानी, थोड़ा नीचे जाकर कुंए से लाना होता है..हमारे चपरासी दादा..बुजुर्ग हैं अब उनसे नहीं होता..इसलिए मै ही लेे आता हूं..वर्जिश भी हो जाती है..वे मुस्कुराकर बोले..
उनका चेहरा पहचाना सा लगा और नाम भी..
मैंने उनकी और देखकर पूछा.. "तुम विवेक हो.न!
इंदौर से.. गुजराती कॉलेज..!"
मैंने हैट उतार दिया था.. उसने कुछ पहचानते हुए .. चहकते हुए कहा...... आप अभिनव.. !! *अभिनव श्रीवास्तव..!* मैंने कहा और नहीं तो क्या.. भई..!
लगभग बीस बाईस बरस पहले हम इंदौर में साथ ही पढ़े थे ... बेहद होशियार और पढ़ाकू था वो .... बहुत कोशिश करने के बावजूद शायद ही कभी उससे ज्यादा नंबर आए हों.. मेरे..!
एक *प्रतिस्पर्धा* रहती थी हमारे बीच..जिसमें हमेशा वही जीता करता था..
आज वो हेड मास्टर था और मैं..जिला शिक्षा अधिकारी.. पहली बार उससे आगे निकलने ... जीतने.. का भाव था.. और सच कहूं तो खुशी थी मन में..
मैंने सहज होते हुए पूछा.. यहां कैसे पहुंचे.. भई..?. और कौन कौन है घर पर..?
उसने विस्तार से बताना शुरू किया..
“ एम. कॉम करते समय ही बाबूजी की मालवा मिल वाली नौकरी जाती रही थी..फिर उन्हें दमे की बीमारी भी तो थी..!
.... घर चलाना मुश्किल हो गया था..किसी तरह पढ़ाई पूरी की.. नम्बर अच्छे थे.. इसलिए संविदा शिक्षक वर्ग - 3 की नियुक्ति मिल गई थी..जो छोड़ नहीं सकता था..आगे पढ़ने की न गुंजाइश थी न स्थितियां ... इस *गांव में पोस्टिंग* मिल गई..
मां बाबूजी को लेकर यहां चला आया ... सोचा गांव में कम पैसों में गुजारा हो ही जायेगा..!"
फिर उसने हंसते हुए कहा..
“इस दुर्गम गांव में पोस्टिंग..और वृद्ध.. बीमार मां बाप को देख.. *कोई लड़की वाले लड़की देने तैयार नहीं हुए* .... इसलिए विवाह नहीं हुआ..और ठीक भी है.. कोई पढ़ी लिखी लड़की भला यहां क्या करती..!
अपनी कोई *पहुंच या पकड़* थी नही *पैसे* भी नहीं थे कि यहां से *ट्रांसफर* करा पाते..तो बस यहीं जम गए..
यहां आने के कुछ बरस बाद..मां बाबूजी दोनों ही चल बसे.. यथा संभव उनकी सेवा करने का प्रयास किया..अब यहां बच्चों में ... स्कूल में मन रम गया है.
छुट्टी के दिन बच्चों को लेकर.. आस पास की पहाड़ियों पर वृक्षारोपण करने चला जाता हूं...
.. ..रोज शाम को स्कूल के बरामदे में बुजुर्गों को पढ़ा देता हूं..अब शायद इस गांव में कोई निरक्षर नहीं है..
नशा मुक्ति का अभियान भी चला रक्खा है..अपने हाथों से खाना बना लेता हूं..और किताबें पढ़ता हूं..
बच्चों को अच्छी बुनियादी शिक्षा.. *अच्छे संस्कार* मिल जाएं ... अनुशासन सीखें बस यही ध्येय है.. मै सी ए नहीं कर सका पर मेरे दो विद्यार्थी सी.ए. हैं.... और कुछ अच्छी नौकरी में भी..।
.. मेरा यहां कोई ज्यादा खर्च है नहीं.. मेरी ज्यादातर तनख़ा इन बच्चों के खेल कूद और स्कूल पर खर्च हो जाती हैं...तुम तो जानते हो कॉलेज के जमाने से क्रिकेट खेलने का जुनून था..! वो बच्चों के साथ खेल कर पूरा हो जाता है..बड़ा सुकून मिलता है.."
मैंने टोकते हुए कहा...मां बाबूजी के बाद शादी का विचार नहीं आया..?
उसने मुस्कुराते हुए कहा.. “दुनियां में सारी अच्छी चीजें मेरे लिये नहीं बनी है.."
"इसलिए जो सामने है..उसी को अच्छा करने या बनाने की कोशिश कर रहा हूं.."
फिर अपने परिचित दिलचस्प अंदाज़ में मुस्कुराते हुए बोला.“
अरे वो फ़ैज़ साहेब की एक नज़्म में है न..! .
"अपने बेख्वाब किवाड़ों को मुकफ्फल कर लो..अब यहां कोई नहीं..कोई नहीं आएगा.."
उसकी उस बेलौस हंसी ने भीतर तक भिगो दिया था..
लौटते हुए मैंने उससे कहा..विवेक..तुम जब चाहो तुम्हारा ट्रांसफर मुख्यालय या जहां तुम चाहो करा दूंगा..
उसने मुस्कुराते हुए कहां..अब बहुत देर हो चुकी है.जनाब.. अब यहीं इन लोगों के बीच खुश हूं..कहकर उसने हाथ जोड़ दिए..
मेरी अपनी उपलब्धियों से उपजा दर्प..उससे आगे निकल जाने का अहसास..भरम.. चूर चूर हो गया था..
वो अपनी जिंदगी की तमाम कमियों.. तकलीफों.. असुविधाओं के बावजूद सहज था.
उसकी *कर्तव्यनिष्ठा* देखकर.. मै हतप्रभ था ..जिंदगी से..किसी शिकवे या.. शिकायत की कोई झलक उसके व्यवहार में...नहीं थी..
सुख सुविधाओं..उपलब्धियों.. ओहदों के आधार पर हम लोगों का मूल्यांकन करते हैं..लेकिन वो इन सब के बिना मुझे फिर पराजित कर गया था..!
लौटते समय उस *कर्म ऋषि* को हाथ जोड़कर..भरे मन से इतना ही कह सका..तुम्हारे इस पुनीत कार्य में कभी मेरी जरूरत पड़े तो जरूर याद करना मित्र.
*जीवन दर्शन*
आपका प्रशासनिक औहोदा क्या था या क्या है यह कोई महत्व नहीं रखता यदि आप एक अच्छे इंसान नहीं बन पाए...
****************************************
(3) *धन की परिभाषा*
✍️जब कोई बेटा या बेटी ये कहे कि मेरे माँ बाप ही मेरे भगवान् है….
*ये है “धन”*?
✍️जब कोई माँ बाप अपने बच्चों के लिए ये कहे कि ये हमारे कलेजे की कोर हैं….
*ये है “धन”* ?
✍️शादी के 20 साल बाद भी अगर पति पत्नी एक दूसरे से कहें ।
I Love you…
*ये है “धन”* ?
✍️कोई सास अपनी बहु के लिए कहे कि ये मेरी बहु नहीं बेटी है और कोई बहु अपनी सास के लिए कहे कि ये मेरी सास नहीं मेरी माँ है……
*ये है “धन”*?
✍️जिस घर में बड़ो को मान और छोटो को प्यार भरी नज़रो से देखा जाता है……
*ये है “धन”* ?
✍️जब कोई अतिथि कुछ दिन आपके घर रहने के पशचात् जाते समय दिल से कहे की आपका घर …घर नहीं मंदिर है….
*ये है “धन”*
ऐसी दुआ हैं मेरी, कि आपको ऐसे
*”परम धन”* की प्राप्ति हो।
*”खुश रहिये ……..*
*सदा मुस्कराते रहिये*
*आपका हर लम्हा* *मंगलदायक हो*
********************************
(4) *आज का विचार*.
*दुनिया में आदमी को और कोई इतना परेशान नहीं करता जितना उसकी स्वयं की कमजोरी, गलत आदतें, व्यसन, उसके स्वयं के दुर्गुण। संसार की सारी बाधाओं ने आदमी को उतना दुःखी नहीं किया होगा जितना कि स्वयं की कमजोरियों ने।*
*कभी किसी दूसरे व्यक्ति ने आपको आपकी कमजोरियों की ओर ध्यान दिलाया भी होगा तो उसका आभार मानने की बजाय आप उस पर क्रुद्ध हुए होंगे और आज तक उसे अपना शत्रु भी बना रखा होगा।*
*इस दुनिया का बहुत मुश्किल कार्य अगर कोई है तो वह है स्वयं की कमजोरियों को पहचान लेना। आत्म निरीक्षण बड़ा कठिन है। स्वयं को दोषों को दूर करने का काम कोई साहसी ही कर सकता है। जीवन को सफलता और आनंद की ओर ले जाना है तो अपनी कमजोरियों की लिस्ट बनायें और आज से ही उन्हें दूर करने के लिए प्रतिबद्ध हो जाएँ।*
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2026-06-16 05:38:30 |
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1.श्री सम्मेद शिखर जी |
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*कहानी बड़ी सुहानी*
(1) *कहानी*
*माँ बेटे का प्यार*
*अख़बार बेचने वाला 10 वर्षीय बालक एक मकान का गेट बजा रहा है।*
*मालकिन - बाहर आकर पूछी क्या है ?*
*बालक - आंटी जी क्या मैं आपका गार्डेन साफ कर दूं ?*
*मालकिन - नहीं, हमें नहीं करवाना है, और आज अखबार क्यों नही लाया ।*
*बालक - हाथ जोड़ते हुए दयनीय स्वर में.. "प्लीज आंटी जी करा लीजिये न, अच्छे से साफ करूंगा,आज अखबार नही छपा,कल छुट्टी थी दशहरे की ।"*
*मालकिन - द्रवित होते हुए "अच्छा ठीक है, कितने पैसा लेगा ?"*
*बालक - पैसा नहीं आंटी जी, खाना दे देना।"*
*मालकिन- ओह !! आ जाओ अच्छे से काम करना ।*
*(लगता है बेचारा भूखा है पहले खाना दे देती हूँ..मालकिन बुदबुदायी।)*
*मालकिन- ऐ लड़के..पहले खाना खा ले, फिर काम करना ।*
*बालक -नहीं आंटी जी, पहले काम कर लूँ फिर आप खाना दे देना।*
*मालकिन - ठीक है, कहकर अपने काम में लग गयी।*
*बालक - एक घंटे बाद "आंटी जी देख लीजिए, सफाई अच्छे से हुई कि नहीं।*
*मालकिन -अरे वाह! तूने तो बहुत बढ़िया सफाई की है, गमले भी करीने से जमा दिए। यहां बैठ, मैं खाना लाती हूँ।*
*जैसे ही मालकिन ने उसे खाना दिया, बालक जेब से पन्नी निकाल कर उसमें खाना रखने लगा।*
*मालकिन - भूखे काम किया है, अब खाना तो यहीं बैठकर खा ले। जरूरत होगी तो और दे दूंगी।*
*बालक - नहीं आंटी, मेरी बीमार माँ घर पर है,सरकारी अस्पताल से दवा तो मिल गयी है,पर डाॅ साहब ने कहा है दवा खाली पेट नहीं देना है।*
*मालकिन की पलके गीली हो गई..और अपने हाथों से मासूम को उसकी दूसरी माँ बनकर खाना खिलाया फिर उसकी माँ के लिए रोटियां बनाई और साथ उसके घर जाकर उसकी माँ को रोटियां दे आयी ।*
*और आते आते कह कर आयी "बहन आप बहुत अमीर हो जो दौलत आपने अपने बेटे को दी है वो हम भी अपने बच्चों को नहीं दे पाते हैं" ।*
*माँ बेटे की तरफ डबडबाई आंखों से देखे जा रही थी...बेटा बीमार मां से लिपट गया...*
*माँ ने खाना खाया और दवाई लेकर आराम करने लेट गई।।*
*और बेटा माँ को खाना खिलाकर बहुत प्रसन्न मुद्रा में पास में बैठ माँ से बाते करने लगा ।*
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(2) *कहानी*
*पराजय*
एक *डिप्टी कलेक्टर* के तौर पर जब *जिला शिक्षा अधिकारी* का प्रभार मिलने के बाद ज्वाइन किया..तो जानकारी हुई की ये जिला ..स्कूली शिक्षा के लिहाज से बहुत पिछड़ा हुआ हैं...
वरिष्ठ अधिकारियों ने भी कहा आप ग्रामीण इलाकों पर विशेष ध्यान दें..
बस तय कर लिया ... महीने में आठ दस दिन जरूर ग्रामीण स्कूलों को दूंगा..
शीघ्र ही..ग्रामीण इलाकों में दौरों का सिलसिला चल निकला .. पहाड़ी व जंगली इलाका भी था कुछ..
एक दिन मातहत कर्मचारियों से मालूम हुआ.. "बड़ेरी" नामक गांव, जो एक पहाड़ी पर स्थित है..वहां के स्कूल में कोई शिक्षा अधिकारी नहीं जाता है, क्योंकि वहां पहुंचने के लिए.. वाहन छोड़कर ... लगभग पांच-छः किलोमीटर जंगली रास्ते से पैदल ही जाना होता है .....
तय कर लिया अगले दिन वहां जाया जाए..
वहां कोई मिस्टर वी. के. वर्मा हेड मास्टर हैं. जो बरसों से, पता नहीं क्यूं ... वहीं जमे हुए हैं .!
मैंने निर्देश दिए उन्हें कोई अग्रिम सूचना न दी जाय .... सरप्राइज विजिट होगी..!
अगले दिन हम सुबह निकले ... दोपहर बारह बजे .... ड्राइवर ने कहा साहब यहां से आगे .... पहाड़ी पर पैदल ही जाना होगा पाच छः किलोमीटर..
मै और दो अन्य कर्मचारी पैदल ही चल पड़े..
लगभग डेढ़ घंटे सकरे .. पथरीले जंगली रास्ते से होकर हम ऊपर गांव तक पहुंचे..सामने स्कूल का पक्का भवन था..और लगभग दो सौ कच्चे पक्के मकान थे..
स्कूल साफ सुथरा और व्यवस्थित रंगा पुता हुआ था .. बस तीन कमरे और प्रशस्त बरामदा..चारों तरफ सुरम्य हरा भरा वन..
अंदर क्लास रूम में पहुंचे तो तीन कक्षाओं में लगभग सवा सौ बच्चे तल्लीनता पूर्वक पढ़ रहे थे.. हालांकि शिक्षक कोई भी नहीं था..एक बुजुर्ग सज्जन बरामदे में थे जो वहां नियुक्त पियून थे.शायद...
उन्होंने बताया हेड मास्टर साहब आते ही होंगे..
हम बरामदे में बैठ गए थे..तभी देखा एक चालीस पैतालीस वर्ष के सज्जन..अपने दोनो हाथो में पानी की बाल्टियां लिए ऊपर चले आ रहे थे..पायजामा घुटनों तक चढ़ाया हुआ था..ऊपर खादी का कुर्ता जैसा था..!
उन्होंने आते ही परिचय दिया.. मैं *वी के वर्मा* यहां हेड मास्टर हूं..। यहां इन दिनों ..बच्चों के लिए पानी, थोड़ा नीचे जाकर कुंए से लाना होता है..हमारे चपरासी दादा..बुजुर्ग हैं अब उनसे नहीं होता..इसलिए मै ही लेे आता हूं..वर्जिश भी हो जाती है..वे मुस्कुराकर बोले..
उनका चेहरा पहचाना सा लगा और नाम भी..
मैंने उनकी और देखकर पूछा.. "तुम विवेक हो.न!
इंदौर से.. गुजराती कॉलेज..!"
मैंने हैट उतार दिया था.. उसने कुछ पहचानते हुए .. चहकते हुए कहा...... आप अभिनव.. !! *अभिनव श्रीवास्तव..!* मैंने कहा और नहीं तो क्या.. भई..!
लगभग बीस बाईस बरस पहले हम इंदौर में साथ ही पढ़े थे ... बेहद होशियार और पढ़ाकू था वो .... बहुत कोशिश करने के बावजूद शायद ही कभी उससे ज्यादा नंबर आए हों.. मेरे..!
एक *प्रतिस्पर्धा* रहती थी हमारे बीच..जिसमें हमेशा वही जीता करता था..
आज वो हेड मास्टर था और मैं..जिला शिक्षा अधिकारी.. पहली बार उससे आगे निकलने ... जीतने.. का भाव था.. और सच कहूं तो खुशी थी मन में..
मैंने सहज होते हुए पूछा.. यहां कैसे पहुंचे.. भई..?. और कौन कौन है घर पर..?
उसने विस्तार से बताना शुरू किया..
“ एम. कॉम करते समय ही बाबूजी की मालवा मिल वाली नौकरी जाती रही थी..फिर उन्हें दमे की बीमारी भी तो थी..!
.... घर चलाना मुश्किल हो गया था..किसी तरह पढ़ाई पूरी की.. नम्बर अच्छे थे.. इसलिए संविदा शिक्षक वर्ग - 3 की नियुक्ति मिल गई थी..जो छोड़ नहीं सकता था..आगे पढ़ने की न गुंजाइश थी न स्थितियां ... इस *गांव में पोस्टिंग* मिल गई..
मां बाबूजी को लेकर यहां चला आया ... सोचा गांव में कम पैसों में गुजारा हो ही जायेगा..!"
फिर उसने हंसते हुए कहा..
“इस दुर्गम गांव में पोस्टिंग..और वृद्ध.. बीमार मां बाप को देख.. *कोई लड़की वाले लड़की देने तैयार नहीं हुए* .... इसलिए विवाह नहीं हुआ..और ठीक भी है.. कोई पढ़ी लिखी लड़की भला यहां क्या करती..!
अपनी कोई *पहुंच या पकड़* थी नही *पैसे* भी नहीं थे कि यहां से *ट्रांसफर* करा पाते..तो बस यहीं जम गए..
यहां आने के कुछ बरस बाद..मां बाबूजी दोनों ही चल बसे.. यथा संभव उनकी सेवा करने का प्रयास किया..अब यहां बच्चों में ... स्कूल में मन रम गया है.
छुट्टी के दिन बच्चों को लेकर.. आस पास की पहाड़ियों पर वृक्षारोपण करने चला जाता हूं...
.. ..रोज शाम को स्कूल के बरामदे में बुजुर्गों को पढ़ा देता हूं..अब शायद इस गांव में कोई निरक्षर नहीं है..
नशा मुक्ति का अभियान भी चला रक्खा है..अपने हाथों से खाना बना लेता हूं..और किताबें पढ़ता हूं..
बच्चों को अच्छी बुनियादी शिक्षा.. *अच्छे संस्कार* मिल जाएं ... अनुशासन सीखें बस यही ध्येय है.. मै सी ए नहीं कर सका पर मेरे दो विद्यार्थी सी.ए. हैं.... और कुछ अच्छी नौकरी में भी..।
.. मेरा यहां कोई ज्यादा खर्च है नहीं.. मेरी ज्यादातर तनख़ा इन बच्चों के खेल कूद और स्कूल पर खर्च हो जाती हैं...तुम तो जानते हो कॉलेज के जमाने से क्रिकेट खेलने का जुनून था..! वो बच्चों के साथ खेल कर पूरा हो जाता है..बड़ा सुकून मिलता है.."
मैंने टोकते हुए कहा...मां बाबूजी के बाद शादी का विचार नहीं आया..?
उसने मुस्कुराते हुए कहा.. “दुनियां में सारी अच्छी चीजें मेरे लिये नहीं बनी है.."
"इसलिए जो सामने है..उसी को अच्छा करने या बनाने की कोशिश कर रहा हूं.."
फिर अपने परिचित दिलचस्प अंदाज़ में मुस्कुराते हुए बोला.“
अरे वो फ़ैज़ साहेब की एक नज़्म में है न..! .
"अपने बेख्वाब किवाड़ों को मुकफ्फल कर लो..अब यहां कोई नहीं..कोई नहीं आएगा.."
उसकी उस बेलौस हंसी ने भीतर तक भिगो दिया था..
लौटते हुए मैंने उससे कहा..विवेक..तुम जब चाहो तुम्हारा ट्रांसफर मुख्यालय या जहां तुम चाहो करा दूंगा..
उसने मुस्कुराते हुए कहां..अब बहुत देर हो चुकी है.जनाब.. अब यहीं इन लोगों के बीच खुश हूं..कहकर उसने हाथ जोड़ दिए..
मेरी अपनी उपलब्धियों से उपजा दर्प..उससे आगे निकल जाने का अहसास..भरम.. चूर चूर हो गया था..
वो अपनी जिंदगी की तमाम कमियों.. तकलीफों.. असुविधाओं के बावजूद सहज था.
उसकी *कर्तव्यनिष्ठा* देखकर.. मै हतप्रभ था ..जिंदगी से..किसी शिकवे या.. शिकायत की कोई झलक उसके व्यवहार में...नहीं थी..
सुख सुविधाओं..उपलब्धियों.. ओहदों के आधार पर हम लोगों का मूल्यांकन करते हैं..लेकिन वो इन सब के बिना मुझे फिर पराजित कर गया था..!
लौटते समय उस *कर्म ऋषि* को हाथ जोड़कर..भरे मन से इतना ही कह सका..तुम्हारे इस पुनीत कार्य में कभी मेरी जरूरत पड़े तो जरूर याद करना मित्र.
*जीवन दर्शन*
आपका प्रशासनिक औहोदा क्या था या क्या है यह कोई महत्व नहीं रखता यदि आप एक अच्छे इंसान नहीं बन पाए...
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(3) *धन की परिभाषा*
✍️जब कोई बेटा या बेटी ये कहे कि मेरे माँ बाप ही मेरे भगवान् है….
*ये है “धन”*?
✍️जब कोई माँ बाप अपने बच्चों के लिए ये कहे कि ये हमारे कलेजे की कोर हैं….
*ये है “धन”* ?
✍️शादी के 20 साल बाद भी अगर पति पत्नी एक दूसरे से कहें ।
I Love you…
*ये है “धन”* ?
✍️कोई सास अपनी बहु के लिए कहे कि ये मेरी बहु नहीं बेटी है और कोई बहु अपनी सास के लिए कहे कि ये मेरी सास नहीं मेरी माँ है……
*ये है “धन”*?
✍️जिस घर में बड़ो को मान और छोटो को प्यार भरी नज़रो से देखा जाता है……
*ये है “धन”* ?
✍️जब कोई अतिथि कुछ दिन आपके घर रहने के पशचात् जाते समय दिल से कहे की आपका घर …घर नहीं मंदिर है….
*ये है “धन”*
ऐसी दुआ हैं मेरी, कि आपको ऐसे
*”परम धन”* की प्राप्ति हो।
*”खुश रहिये ……..*
*सदा मुस्कराते रहिये*
*आपका हर लम्हा* *मंगलदायक हो*
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(4) *आज का विचार*.
*दुनिया में आदमी को और कोई इतना परेशान नहीं करता जितना उसकी स्वयं की कमजोरी, गलत आदतें, व्यसन, उसके स्वयं के दुर्गुण। संसार की सारी बाधाओं ने आदमी को उतना दुःखी नहीं किया होगा जितना कि स्वयं की कमजोरियों ने।*
*कभी किसी दूसरे व्यक्ति ने आपको आपकी कमजोरियों की ओर ध्यान दिलाया भी होगा तो उसका आभार मानने की बजाय आप उस पर क्रुद्ध हुए होंगे और आज तक उसे अपना शत्रु भी बना रखा होगा।*
*इस दुनिया का बहुत मुश्किल कार्य अगर कोई है तो वह है स्वयं की कमजोरियों को पहचान लेना। आत्म निरीक्षण बड़ा कठिन है। स्वयं को दोषों को दूर करने का काम कोई साहसी ही कर सकता है। जीवन को सफलता और आनंद की ओर ले जाना है तो अपनी कमजोरियों की लिस्ट बनायें और आज से ही उन्हें दूर करने के लिए प्रतिबद्ध हो जाएँ।*
******************************** |
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2026-06-16 05:38:29 |
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| 233496 |
40449675 |
?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? |
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*मुनिश्री विनियोगसागर जी*
*16.06.2026*
*DAILY MOTIVATION*
*Instagram link* :-
<a href="https://www.instagram.com/viniyogworld?igsh=cmhkcHJzaTMwa29h" target="_blank">https://www.instagram.com/viniyogworld?igsh=cmhkcHJzaTMwa29h</a>
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?*कल का नियम*
खस का त्याग |
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2026-06-16 05:32:59 |
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| 233497 |
40449675 |
?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? |
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*मुनिश्री विनियोगसागर जी*
*16.06.2026*
*DAILY MOTIVATION*
*Instagram link* :-
<a href="https://www.instagram.com/viniyogworld?igsh=cmhkcHJzaTMwa29h" target="_blank">https://www.instagram.com/viniyogworld?igsh=cmhkcHJzaTMwa29h</a>
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?*कल का नियम*
खस का त्याग |
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2026-06-16 05:32:59 |
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40449671 |
1.पुणे चातुर्मास वर्षायोग 2023- वीर सागर जी महाराज |
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2026-06-16 05:31:55 |
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40449671 |
1.पुणे चातुर्मास वर्षायोग 2023- वीर सागर जी महाराज |
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2026-06-16 05:31:54 |
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40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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??वंदामी माताजी?? |
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2026-06-16 05:29:00 |
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40449703 |
गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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??वंदामी माताजी?? |
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2026-06-16 05:29:00 |
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