| 1325 |
49028270 |
1.श्री सम्मेद शिखर जी |
|
|
*_॥ चरणानुयोग॥_*
*!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम: !!*
_श्रीमद्-भगवत्कुन्दकुन्दाचार्य-देव-प्रणीत_
*॥श्री बारसणुपेक्खा॥*
मूल प्राकृत गाथा : उग्रसेन जैन
पूज्य श्री आचार्य नमिसागर जी महाराज
_मंगलाचरण और प्रतिज्ञावाक्य -_
*णमिऊण सव्वसिद्धे, झाणुत्तमखविददीहसंसारे।*
*दस दस दो दो व जिणे, दस दो अणुपेहणं वोच्छे ॥1॥*
_नत्वा सर्व सिद्धान् ध्यानोत्तमक्षपित दीर्घ संसारान् ।_
_दश दश द्वौ द्वौ च जिनान् दश द्वौ अणुप्रेक्षाणि वक्ष्ये ॥_
*सूत्रार्थ* - जिन्होंने (झाणुत्तम खविद दीहसंसारे) उत्तम ध्यान के द्वारा दीर्घसंसारको नष्ट कर दिया है। ऐसे (सव्वसिद्धे) सभी सिद्धों को (व) और (दस दस दो दो जिणे) 10+10+2+2 = 24 अर्थात 24 तीर्थंकरों को (णमिउण) नमस्कार करके (दस दो अणुपेहणं) वाले 10+2 = 12 अनुप्रेक्षाओं को ("वोच्छे") कहूँगा ॥ 1 ॥
*अन्वयार्थ* : जिन्होंने उत्तम ध्यान के द्वारा दीर्घ संसार का नाश कर दिया है ऐसे समस्त सिद्धों तथा चौबीस तीर्थंकरों को नमस्कार कर बारह अनुप्रेक्षाओं को कहूँगा ॥१॥
*अध्धुवमसरणमे गत्तमण्णसंसार लोगमसुचित्तं ।*
*आसव संवर णिज्जर धम्मं बोहिं च चिंते ज्जौ ॥*
_अध्रु वमशरणमेकत्वमन्य संसारौ लोकमशुचित्वं ।_
_आस्रवसंवर निर्जग धग्र्मं वोधिं च चिन्तयेत् ॥_
*सूत्रार्थ* -(अध्दुवं) अनित्य (असरणं) अशरण (एगत्तं) एकत्व (अण्णसंसारलोगं) अन्यत्व, संसार, लोक (असुचित्तं) अशुचित्व (आसवसंवरणिज्जरधम्मं) आस्रव, संवर, निर्जरा, धर्म (बोहिं च) और बोधि अर्थात् बोधिदुर्लभ का (चिंतेजो) चिन्तन करना चाहिए ॥2॥
*अन्वयार्थ* - अनित्य, अशरण, एकत्व, अन्यत्त्व, संसार, लोक, अशुचित्व, आस्रव, संवर, निर्जरा, धर्म, और बोधि दुर्लभ इन बारह भावनाओं का चिंतवन करना चाहिये । |
|
2026-02-12 23:44:38 |
|