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Date |
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| 73812 |
40449749 |
जिनोदय?JINODAYA |
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2026-04-10 07:19:10 |
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| 73811 |
40449749 |
जिनोदय?JINODAYA |
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2026-04-10 07:19:09 |
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| 73810 |
40449749 |
जिनोदय?JINODAYA |
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आज शुभचिंतकों स्नेहीजनों द्वारा किए गए इस आत्मीय स्वागत सम्मान प्यार के लिए हृदय से आभार
*सचिन जैन*
*जिला सह संयोजक सोशल मीडिया भाजपा जिला फिरोजाबाद* |
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2026-04-10 07:19:07 |
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| 73809 |
40449749 |
जिनोदय?JINODAYA |
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आज शुभचिंतकों स्नेहीजनों द्वारा किए गए इस आत्मीय स्वागत सम्मान प्यार के लिए हृदय से आभार
*सचिन जैन*
*जिला सह संयोजक सोशल मीडिया भाजपा जिला फिरोजाबाद* |
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2026-04-10 07:19:06 |
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| 73807 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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*? ॥ श्री वृषभनाथाय नमः ॥ ?*
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? *प्रथमानुयोग कथा*
━━━━━━━━━━━━━━━━━━
*? 129.भक्तामर ?*
. *? 41.सर्प भी चरणों में आता?*
???????????
<a href="https://quizzory.in/id/69d8557db86cdfe2ea71b35b" target="_blank">https://quizzory.in/id/69d8557db86cdfe2ea71b35b</a>
*इस लिंक के द्वारा कथा में आए प्रश्नों को 24 घंटे में हल किया जा सकता है*
???????????
*रक्तेक्षणं समद कोकिल कण्ठ नीलं,*
*क्रोधोद्भूतं फणिनं मुक्तण मापतन्तम्।*
*आक्रमति क्रम युगॆन निरस्तशंकः,*
*त्वन्नाम नाग दमनी हृदि यस्य पुंसः॥ 41॥*
अन्वयार्थ—
(यस्य) जिस, (पुंसः) पुरुष के, (हृदि) हृदय में, (त्वन्नाम) आपके नाम रूपी, (नागदमनी) जो जड़ी-बूटी है, (सः) वह, (निरस्तशंकः) निःशंक होकर, (रक्तेक्षणम्) लाल नेत्रों वाले, (समदकोकिल) मद युक्त कोयल के, (कण्ठनीलम्) कंठ के समान काले, (क्रोधोद्भूतम्) क्रोध से फुंकारते हुए, (आपतन्तम्) सामने आते हुए, (उत्कण्ठम्) ऊपर को फन उठाए हुए, (फणिनम्) साँप को, (क्रमयुगॆन) अपने पाद युगल द्वारा, (आक्रमति) लाँघ जाता है।
भावार्थ—
जिसके हृदय में आपके नाम रूपी नागदमनी (जड़ी-बूटी) है वह पुरुष लाल नेत्र वाले एवं मतवाले कोयल के कंठ के समान काले, क्रोध से फुंकार करते और फन को ऊँचा उठाकर सामने आते हुए भयंकर साँप को लाँघता हुआ चला जाता है अर्थात् आपका निःशंक भक्त सर्प भय से मुक्त रहता है।
*विध्नौया: प्रलयं यान्ति, शाकिनी भूत पन्नगाः।*
*विषं निर्विषतां याति, स्तूयमाने जिनेश्वरे॥*
हे परमात्मा! आपके नाम का स्मरण करते ही संकटों का समूह पलायन कर जाता है, समाप्त हो जाता है, नष्ट हो जाता है और शाकिनी-डाकिनी, भूत-प्रेत भाग जाते हैं, विष निर्विष हो जाता है।
बंधुओं! धनञ्जय कवि के विषय में एक घटना आती है कि एक बार धनञ्जय कवि जिन मंदिर में परमात्मा भक्ति में लीन थे, तभी घर में उनके पुत्र को एक नाग ने डस लिया। पत्नी घबराई और क्रोधावेश में मूर्छित पुत्र को उनके सामने लाकर पटक दिया और विलाप करती हुई बोली, “अगर तुम्हारी भक्ति में शक्ति हो तो इसे जिंदा करो। पत्थर की मूर्तियों के सामने रात-दिन माथा टेकने से क्या होगा? अगर तुम्हारे भगवान सच्चे हैं तो जिंदा करो इसे।” उसी क्षण धनञ्जय कवि ने विषापहार स्तोत्र की रचना की। भक्ति काव्य पूर्ण होते ही बालक सचेत हो गया। भगवान के अभिषेक का गंधोदक उसके ऊपर छिड़का तो वह पूर्ववत खेलने लगा। मूर्छित बालक का विष निर्विष हो गया।
बंधुओं! नाग भी दो प्रकार के होते हैं—एक बाह्य सर्प और दूसरा अंतरंग सर्प। बाह्य सर्प के काटने पर एक ही भव समाप्त होता है और अंतरंग अज्ञान रूपी तथा विषय भोग रूपी पंचमुखी सर्प के काटने पर भव-भव तक प्राण हरता है, तड़पाता है, पीड़ित करता है। आचार्य देव काव्य में विषय भोग के सर्प की बात कर रहे हैं। मोह-मिथ्यात्व कषाय रूपी नागों के विष से मुक्त होने के लिए आपके गुण स्मरण रूपी नागदमनी औषधि ही कार्यकारी है। उस अज्ञान को तिरोहित करने के लिए मात्र देव-शास्त्र-गुरु के गुण स्मरण और आचरण रूपी औषधि की आवश्यकता है। अज्ञान के जहर को निकालने, नष्ट करने में परमात्म स्मरण और आचरण ही समर्थ है। आप अगर अपने आपको पीड़ित समझते हैं तथा पीड़ा से मुक्त होना चाहते हैं तो वीतरागी संतों पर आस्था रखो, उनका समादर करो, तदनुकूल आचरण करो, परिणाम निर्मल रखो—कर्मों का जहर नष्ट हो जाएगा, परम स्वास्थ्य का लाभ होगा और परम निरोगता का जन्म होगा।
*इस काव्य से संबंधित घटना शास्त्रों में मिलती है—*
एक धनपति के एक सुंदर कन्या थी। विद्या अध्ययन के लिए उसने उसे एक दिगम्बर मुनिराज के चरणों में छोड़ दिया था। मुनिराज ने उसे आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ व्यवहारिक जीवन की कठिनाइयों और आपत्तियों से मुक्त होने का उपाय भी बताया। उसे भक्तामर काव्य का पाठ, मंत्र, स्तुति, जप आदि करना भी सिखाया। विद्याध्ययन करके पुत्री अपने पिता के घर वापस लौट आई। धनपति को उसके विवाह की चिंता हुई।क्योंकि पुत्री अत्यधिक सुंदर थी। धनपति ने पुत्री की शादी कर दी। वह अपने ससुराल चली गई किन्तु ससुराल पक्ष के सभी लोग रूक्ष थे। धर्म-कर्म जानते ही नहीं थे। कन्या दुविधा में पड़ जाती है। सास उससे कहती है, “बेटी खाना खा लो।” रात्रि का समय था। वह कहती है, “माँ मैं रात्रि में भोजन नहीं करती हूँ क्योंकि मेरा रात्रि भोजन का त्याग है।” उसकी सास गुस्सा हो गई। उसने कहा— “तू ढोंगी साधुओं के बीच फँस गई है। जैन धर्म तो झूठा है, उसमें तो त्याग-ही-त्याग की बात है, जीवन तो खाने-पीने, मौज उड़ाने के लिए मिला है।” उस कन्या को उसकी सास व पति ने मिलकर खूब मारा-पीटा, हाथ-पाँव बाँधे और एक कमरे में डाल दिया। शादी के प्रथम दिन ही उसका यह स्वागत हुआ। तीन दिन तक वह कमरे में पड़ी रही। न उसने खाना खाया, न पानी पिया और वह तीन दिन तक अहर्निश एकाग्रचित्त होकर भक्तामर के इकतालीसवें काव्य के ध्यान में डूबी रही।
सास के मन में शंका हुई। उसने सोचा अगर कहीं यह मर गई तो हत्या का दोष मेरे सिर आएगा और जेल जाना पड़ेगा। सास ने उसके बंधन खोल दिए तथा दिन में भोजन दिया। कन्या ने सास को जैन धर्म के तप, त्याग की महिमा को बताया लेकिन सास को समझाना “भैंस के आगे बीन बजाना” के समान था। साँप को दूध पिलाने से विष ही बढ़ता है। गंदे पात्र में रखा गया अच्छा पदार्थ भी विकृत हो जाता है। सास जैन धर्म की महिमा को सुनकर ईर्ष्या से भर गई।
एक दिवस उसने एक साँप पकड़ने वाले को कुछ पैसे देकर एक नागिन बुलवाई और एक सुंदर से मटके में डालकर अपने पुत्र के कमरे में मटका रख दिया। पति भी इस षड्यंत्र में शामिल था। वह पति अपनी पत्नी से बोला, “हमारा मित्र परदेश यात्रा से लौटा है, उसने मेरे लिए सुगंधित पुष्प पहुँचाए हैं, इस मटके में रखे हैं—निकाल लाओ।” मटके में फूल नहीं नागिन थी। उसने सोचा मटके में हाथ डालेगी तो इसे नागिन डस लेगी। पत्नी मर जाएगी और माथे पर हत्या का कलंक भी नहीं लगेगा। कह देंगे साँप ने डस लिया। उसने हाथ डाला तो उसमें नागिन के स्थान पर एक बहुत सुंदर, सुगंधित हार निकला। लड़का आश्चर्यचकित हुआ। मटके में तो नागिन थी, निकला हार। सास खिड़की की ओट में खड़ी होकर यह तमाशा देख रही थी। सबको अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ।
लड़का मटके के पास जाकर जैसे ही मटके में हाथ डालता है, नागिन उसे डस लेती है। “स्वयं का पाप, स्वयं को खा जाता है।” धर्मात्मा अगर भयंकर साँप को भी लाँघ जाए तो कुछ नहीं होता और पापी पास से ही निकल जाए तो मूर्छित हो जाता है। घर के लोग बहू पर टूट पड़े, उन्हें तो मात्र बहाना चाहिए था। उसे मारा-पीटा, उल्टा-सीधा कहा और सम्राट से जाकर शिकायत की।
सम्राट ने बहू को बुलाया और पूछा, “क्या तुमने ऐसा जघन्य अपराध किया है?” उसने कहा, “भला मैं ऐसा अपराध क्यों करूँगी? मुझे इस संबंध में कुछ नहीं मालूम। मेरे कमरे में मटका सास ने एक आदमी से रखवाया था।” सम्राट ने उस आदमी को बुलवाया और पूछा, “क्या तुमने यह मटका कमरे में ले जाकर रखा था?” उसने सब कुछ बता दिया। साँप पकड़ने वाले को बुलाया गया। उसने बताया कि इस बुढ़ी औरत ने उसे पैसे देकर नागिन खरीदी थी। अंत में सासू का अपराध सिद्ध हुआ लेकिन अंततः कन्या को पूर्णतः निर्दोष माना गया ।
सिद्ध करने के लिए उसकी परीक्षा ली गई। सासू कहती है कि अगर यह निर्दोष है तो कल नगर का द्वार कच्चे धागे से खोलकर दिखाए। अगर द्वार खोल दिया तो कन्या को निरपराध घोषित किया जाएगा। नगर का द्वार बंद कर दिया गया। कन्या अहर्निश भक्तामर काव्य की आराधना में डूब गई। सुबह उसने कच्चे धागे से नगर का विशाल फाटक खोल दिया। सारे नगर में उसके सती धर्म की और जैन धर्म के प्रति सच्ची आस्था की जय-जयकार गूँज गई। नगर के सम्राट सहित अनेक लोग जैन धर्म के प्रति दृढ़ श्रद्धावान हो गए।
धार्मिक आस्था बहुत बड़ी वस्तु है। एक ऐसी औषधि है जो मोह रूपी विष को नष्ट करती है। आपके अंदर भी ऐसी गहन आस्था पैदा हो तो मोह विष से, कषाय रूपी विष से पीड़ित आत्मा निर्विष हो जाती है। परमात्मा के नाम स्मरण रूपी औषधि से आप भी पाँच इन्द्रियों के विषय रूपी नागों के विष को निर्विष करें और अपनी आत्मा का कल्याण करें।
*बोलिए – ‘आचार्य श्री मानतुंग महाराज की जय’*
⭕⭕⭕⭕⭕⭕⭕⭕⭕⭕
*✍? संकलन*
*?️ पं. मुकेश शास्त्री*
*? सुसनेर*
*? 9425935221*
*? 10.अप्रैल2026*
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2026-04-10 07:18:55 |
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| 73808 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
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*? ॥ श्री वृषभनाथाय नमः ॥ ?*
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? *प्रथमानुयोग कथा*
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*? 129.भक्तामर ?*
. *? 41.सर्प भी चरणों में आता?*
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*इस लिंक के द्वारा कथा में आए प्रश्नों को 24 घंटे में हल किया जा सकता है*
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*रक्तेक्षणं समद कोकिल कण्ठ नीलं,*
*क्रोधोद्भूतं फणिनं मुक्तण मापतन्तम्।*
*आक्रमति क्रम युगॆन निरस्तशंकः,*
*त्वन्नाम नाग दमनी हृदि यस्य पुंसः॥ 41॥*
अन्वयार्थ—
(यस्य) जिस, (पुंसः) पुरुष के, (हृदि) हृदय में, (त्वन्नाम) आपके नाम रूपी, (नागदमनी) जो जड़ी-बूटी है, (सः) वह, (निरस्तशंकः) निःशंक होकर, (रक्तेक्षणम्) लाल नेत्रों वाले, (समदकोकिल) मद युक्त कोयल के, (कण्ठनीलम्) कंठ के समान काले, (क्रोधोद्भूतम्) क्रोध से फुंकारते हुए, (आपतन्तम्) सामने आते हुए, (उत्कण्ठम्) ऊपर को फन उठाए हुए, (फणिनम्) साँप को, (क्रमयुगॆन) अपने पाद युगल द्वारा, (आक्रमति) लाँघ जाता है।
भावार्थ—
जिसके हृदय में आपके नाम रूपी नागदमनी (जड़ी-बूटी) है वह पुरुष लाल नेत्र वाले एवं मतवाले कोयल के कंठ के समान काले, क्रोध से फुंकार करते और फन को ऊँचा उठाकर सामने आते हुए भयंकर साँप को लाँघता हुआ चला जाता है अर्थात् आपका निःशंक भक्त सर्प भय से मुक्त रहता है।
*विध्नौया: प्रलयं यान्ति, शाकिनी भूत पन्नगाः।*
*विषं निर्विषतां याति, स्तूयमाने जिनेश्वरे॥*
हे परमात्मा! आपके नाम का स्मरण करते ही संकटों का समूह पलायन कर जाता है, समाप्त हो जाता है, नष्ट हो जाता है और शाकिनी-डाकिनी, भूत-प्रेत भाग जाते हैं, विष निर्विष हो जाता है।
बंधुओं! धनञ्जय कवि के विषय में एक घटना आती है कि एक बार धनञ्जय कवि जिन मंदिर में परमात्मा भक्ति में लीन थे, तभी घर में उनके पुत्र को एक नाग ने डस लिया। पत्नी घबराई और क्रोधावेश में मूर्छित पुत्र को उनके सामने लाकर पटक दिया और विलाप करती हुई बोली, “अगर तुम्हारी भक्ति में शक्ति हो तो इसे जिंदा करो। पत्थर की मूर्तियों के सामने रात-दिन माथा टेकने से क्या होगा? अगर तुम्हारे भगवान सच्चे हैं तो जिंदा करो इसे।” उसी क्षण धनञ्जय कवि ने विषापहार स्तोत्र की रचना की। भक्ति काव्य पूर्ण होते ही बालक सचेत हो गया। भगवान के अभिषेक का गंधोदक उसके ऊपर छिड़का तो वह पूर्ववत खेलने लगा। मूर्छित बालक का विष निर्विष हो गया।
बंधुओं! नाग भी दो प्रकार के होते हैं—एक बाह्य सर्प और दूसरा अंतरंग सर्प। बाह्य सर्प के काटने पर एक ही भव समाप्त होता है और अंतरंग अज्ञान रूपी तथा विषय भोग रूपी पंचमुखी सर्प के काटने पर भव-भव तक प्राण हरता है, तड़पाता है, पीड़ित करता है। आचार्य देव काव्य में विषय भोग के सर्प की बात कर रहे हैं। मोह-मिथ्यात्व कषाय रूपी नागों के विष से मुक्त होने के लिए आपके गुण स्मरण रूपी नागदमनी औषधि ही कार्यकारी है। उस अज्ञान को तिरोहित करने के लिए मात्र देव-शास्त्र-गुरु के गुण स्मरण और आचरण रूपी औषधि की आवश्यकता है। अज्ञान के जहर को निकालने, नष्ट करने में परमात्म स्मरण और आचरण ही समर्थ है। आप अगर अपने आपको पीड़ित समझते हैं तथा पीड़ा से मुक्त होना चाहते हैं तो वीतरागी संतों पर आस्था रखो, उनका समादर करो, तदनुकूल आचरण करो, परिणाम निर्मल रखो—कर्मों का जहर नष्ट हो जाएगा, परम स्वास्थ्य का लाभ होगा और परम निरोगता का जन्म होगा।
*इस काव्य से संबंधित घटना शास्त्रों में मिलती है—*
एक धनपति के एक सुंदर कन्या थी। विद्या अध्ययन के लिए उसने उसे एक दिगम्बर मुनिराज के चरणों में छोड़ दिया था। मुनिराज ने उसे आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ व्यवहारिक जीवन की कठिनाइयों और आपत्तियों से मुक्त होने का उपाय भी बताया। उसे भक्तामर काव्य का पाठ, मंत्र, स्तुति, जप आदि करना भी सिखाया। विद्याध्ययन करके पुत्री अपने पिता के घर वापस लौट आई। धनपति को उसके विवाह की चिंता हुई।क्योंकि पुत्री अत्यधिक सुंदर थी। धनपति ने पुत्री की शादी कर दी। वह अपने ससुराल चली गई किन्तु ससुराल पक्ष के सभी लोग रूक्ष थे। धर्म-कर्म जानते ही नहीं थे। कन्या दुविधा में पड़ जाती है। सास उससे कहती है, “बेटी खाना खा लो।” रात्रि का समय था। वह कहती है, “माँ मैं रात्रि में भोजन नहीं करती हूँ क्योंकि मेरा रात्रि भोजन का त्याग है।” उसकी सास गुस्सा हो गई। उसने कहा— “तू ढोंगी साधुओं के बीच फँस गई है। जैन धर्म तो झूठा है, उसमें तो त्याग-ही-त्याग की बात है, जीवन तो खाने-पीने, मौज उड़ाने के लिए मिला है।” उस कन्या को उसकी सास व पति ने मिलकर खूब मारा-पीटा, हाथ-पाँव बाँधे और एक कमरे में डाल दिया। शादी के प्रथम दिन ही उसका यह स्वागत हुआ। तीन दिन तक वह कमरे में पड़ी रही। न उसने खाना खाया, न पानी पिया और वह तीन दिन तक अहर्निश एकाग्रचित्त होकर भक्तामर के इकतालीसवें काव्य के ध्यान में डूबी रही।
सास के मन में शंका हुई। उसने सोचा अगर कहीं यह मर गई तो हत्या का दोष मेरे सिर आएगा और जेल जाना पड़ेगा। सास ने उसके बंधन खोल दिए तथा दिन में भोजन दिया। कन्या ने सास को जैन धर्म के तप, त्याग की महिमा को बताया लेकिन सास को समझाना “भैंस के आगे बीन बजाना” के समान था। साँप को दूध पिलाने से विष ही बढ़ता है। गंदे पात्र में रखा गया अच्छा पदार्थ भी विकृत हो जाता है। सास जैन धर्म की महिमा को सुनकर ईर्ष्या से भर गई।
एक दिवस उसने एक साँप पकड़ने वाले को कुछ पैसे देकर एक नागिन बुलवाई और एक सुंदर से मटके में डालकर अपने पुत्र के कमरे में मटका रख दिया। पति भी इस षड्यंत्र में शामिल था। वह पति अपनी पत्नी से बोला, “हमारा मित्र परदेश यात्रा से लौटा है, उसने मेरे लिए सुगंधित पुष्प पहुँचाए हैं, इस मटके में रखे हैं—निकाल लाओ।” मटके में फूल नहीं नागिन थी। उसने सोचा मटके में हाथ डालेगी तो इसे नागिन डस लेगी। पत्नी मर जाएगी और माथे पर हत्या का कलंक भी नहीं लगेगा। कह देंगे साँप ने डस लिया। उसने हाथ डाला तो उसमें नागिन के स्थान पर एक बहुत सुंदर, सुगंधित हार निकला। लड़का आश्चर्यचकित हुआ। मटके में तो नागिन थी, निकला हार। सास खिड़की की ओट में खड़ी होकर यह तमाशा देख रही थी। सबको अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ।
लड़का मटके के पास जाकर जैसे ही मटके में हाथ डालता है, नागिन उसे डस लेती है। “स्वयं का पाप, स्वयं को खा जाता है।” धर्मात्मा अगर भयंकर साँप को भी लाँघ जाए तो कुछ नहीं होता और पापी पास से ही निकल जाए तो मूर्छित हो जाता है। घर के लोग बहू पर टूट पड़े, उन्हें तो मात्र बहाना चाहिए था। उसे मारा-पीटा, उल्टा-सीधा कहा और सम्राट से जाकर शिकायत की।
सम्राट ने बहू को बुलाया और पूछा, “क्या तुमने ऐसा जघन्य अपराध किया है?” उसने कहा, “भला मैं ऐसा अपराध क्यों करूँगी? मुझे इस संबंध में कुछ नहीं मालूम। मेरे कमरे में मटका सास ने एक आदमी से रखवाया था।” सम्राट ने उस आदमी को बुलवाया और पूछा, “क्या तुमने यह मटका कमरे में ले जाकर रखा था?” उसने सब कुछ बता दिया। साँप पकड़ने वाले को बुलाया गया। उसने बताया कि इस बुढ़ी औरत ने उसे पैसे देकर नागिन खरीदी थी। अंत में सासू का अपराध सिद्ध हुआ लेकिन अंततः कन्या को पूर्णतः निर्दोष माना गया ।
सिद्ध करने के लिए उसकी परीक्षा ली गई। सासू कहती है कि अगर यह निर्दोष है तो कल नगर का द्वार कच्चे धागे से खोलकर दिखाए। अगर द्वार खोल दिया तो कन्या को निरपराध घोषित किया जाएगा। नगर का द्वार बंद कर दिया गया। कन्या अहर्निश भक्तामर काव्य की आराधना में डूब गई। सुबह उसने कच्चे धागे से नगर का विशाल फाटक खोल दिया। सारे नगर में उसके सती धर्म की और जैन धर्म के प्रति सच्ची आस्था की जय-जयकार गूँज गई। नगर के सम्राट सहित अनेक लोग जैन धर्म के प्रति दृढ़ श्रद्धावान हो गए।
धार्मिक आस्था बहुत बड़ी वस्तु है। एक ऐसी औषधि है जो मोह रूपी विष को नष्ट करती है। आपके अंदर भी ऐसी गहन आस्था पैदा हो तो मोह विष से, कषाय रूपी विष से पीड़ित आत्मा निर्विष हो जाती है। परमात्मा के नाम स्मरण रूपी औषधि से आप भी पाँच इन्द्रियों के विषय रूपी नागों के विष को निर्विष करें और अपनी आत्मा का कल्याण करें।
*बोलिए – ‘आचार्य श्री मानतुंग महाराज की जय’*
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*✍? संकलन*
*?️ पं. मुकेश शास्त्री*
*? सुसनेर*
*? 9425935221*
*? 10.अप्रैल2026*
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2026-04-10 07:18:55 |
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| 73806 |
40449672 |
वीरसागर जी के भक्त 34 |
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*Wellness Retreat 2026 (WIT In Association With HL) Meditation | 09 अप्रैल 2026 | निर्यापक श्रमण मुनिश्री वीरसागर जी महाराज*
?
*<a href="https://www.youtube.com/live/YDBBBOrs9Ko*" target="_blank">https://www.youtube.com/live/YDBBBOrs9Ko*</a>
*? निर्यापक श्रमण मुनिश्री वीरसागर जी से जुड़ी समस्त जानकारी के लिए व्हाट्सएप्प चैनल से जुड़े ?*
*<a href="https://whatsapp.com/channel/0029Vb59FgNA89MgtLOVV90Y*" target="_blank">https://whatsapp.com/channel/0029Vb59FgNA89MgtLOVV90Y*</a> |
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2026-04-10 07:18:41 |
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| 73805 |
40449672 |
वीरसागर जी के भक्त 34 |
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*Wellness Retreat 2026 (WIT In Association With HL) Meditation | 09 अप्रैल 2026 | निर्यापक श्रमण मुनिश्री वीरसागर जी महाराज*
?
*<a href="https://www.youtube.com/live/YDBBBOrs9Ko*" target="_blank">https://www.youtube.com/live/YDBBBOrs9Ko*</a>
*? निर्यापक श्रमण मुनिश्री वीरसागर जी से जुड़ी समस्त जानकारी के लिए व्हाट्सएप्प चैनल से जुड़े ?*
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2026-04-10 07:18:40 |
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| 73804 |
40476112 |
+120363390826692662 |
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---छठवीं ढाल----
षट्काय जीव न हनन तैं, सब विधि दरब-हिंसा टरी।
रागादि भाव निवारतैं, हिंसा न भावित अवतरी॥
जिनके न लेश मृषा न जल मृण हू बिना दीयो गहैं।
अठदशसहस विधि शीलधर, चिद्ब्रह्म में नित रमि रहैं ॥(1)
अन्तर चतुर्दश भेद बाहिर, संग दशधा तैं टलैं।
परमाद तजि चउ कर मही लखि, समिति ईर्या तैं चलैं॥
जग सुहितकर सब अहितहर, श्रुतिसुखद सब संशय हरैं।
भ्रम-रोग-हर जिनके वचन, मुखचन्द्र तैं अमृत झरैं॥(2)
छ्यालीस दोष बिना सुकुल, श्रावक तनैं घर अशन को।
लैं तप बढ़ावन हेतु, नहिं तन पोषते तजि रसन को।
शुचि ज्ञान संयम उपकरण, लखिकैं गहैं लखिकैं धरैं।
निर्जन्तु थान विलोक तन-मल, मूत्र श्लेषम परिहरैं ॥(3)
सम्यक् प्रकार निरोध मन-वच-काय आतम ध्यावते।
तिन सुथिर-मुद्रा देखि मृग-गण, उपल खाज खुजावते॥
रस रूप गन्ध तथा फरस, अरु शब्द शुभ असुहावने।
तिनमें न राग विरोध, पंचेन्द्रिय-जयन पद पावने ॥(4)
समता सम्हारैं थुति उचारैं, वन्दना जिनदेव को।
नित करैं श्रुतरति करै प्रतिक्रम, तजैं तन अहमेव को॥
जिनके न न्हौंन न दन्त-धोवन, लेश अम्बर आवरन।
भूमाहिं पिछली रयनि में कछु, शयन एकासन करन ॥(5)
इक बार दिन में लैं अहार, खड़े अलप निज पान में।
कचलोंच करत न डरत परीषह, सों लगे निज ध्यान में॥
अरि मित्र महल मसान कंचन-काँच निन्दन-थुति करन।
अर्घावतारन असि-प्रहारन, में सदा समता धरन ॥(6)
तप तपैं द्वादश धरैं वृष दश, रत्न-त्रय सेवैं सदा।
मुनि-साथ में वा एक विचरैं चहैं नहिं भव-सुख कदा॥
यों है सकलसंयमचरित, सुनिये स्वरूपाचरन अब।
जिस होत प्रगटै आपनी निधि, मिटै पर की प्रवृत्ति सब॥(7)
जिन परमपैनी सुबुधि - छैनी, डारि अन्तर भेदिया।
वरणादि अरु रागादि तैं, निज-भाव को न्यारा किया।।
निजमाहिं निज के हेतु निज कर, आपको आपै गह्यो।
गुण गुणी ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय, मंझार कछु भेद न रह्यो॥(8)
जहँ ध्यान ध्याता ध्येय को न, विकल्प वच भेद न जहाँ।
चिद्भाव कर्म चिदेश कर्ता, चेतना किरिया तहाँ॥
तीनों अभिन्न अखिन्न शुध उपयोग की निश्चल दसा।
प्रगटी जहाँ दृग-ज्ञान-व्रत ये तीनधा एकै लसा ॥(9)
परमाण नय निक्षेप को न उद्योत अनुभव में दिखैं।
दृग-ज्ञान-सुख-बलमय सदा, नहिं आन भाव जु मो विखैं।
मैं साध्य साधक मैं अबाधक, कर्म अरु तसु फलनितैं।
चित् पिण्ड चण्ड अखण्ड सुगुणकरण्ड च्युत पुनि कलनितैं॥(10)
यों चिन्त्य निज में थिर भये, तिन अकथ जो आनन्द लह्यो।
सो इन्द्र नाग नरेन्द्र वा, अहमिन्द्र के नाहीं कह्यो॥
तब ही शुकलध्यानाग्नि करि, चउ-घातिविधि कानन दह्यो।
सब लख्यो केवलज्ञान करि, भविलोक को शिवमग कह्यो॥(11)
पुनि घाति शेष अघातिविधि, छिन माहिं अष्टम-भू बसैं।
वसुकर्म विनसै सुगुण वसु, सम्यक्त्व आदिक सब लसैं॥
संसार खार अपार पारावार, तरि तीरहिं गये।
अविकार अकल अरूप शुचि,चिद्रूप अविनाशी भये ॥(12)
निजमाँहि लोक अलोक गुण, परजाय प्रतिबिम्बित भये।
रहि हैं अनन्तानन्तकाल, यथा तथा शिव परिणये॥
धनि धन्य हैं जे जीव, नर-भव पाय, यह कारज किया।
तिनही अनादि भ्रमण पञ्च प्रकार तजि वर सुख लिया॥(13)
मुख्योपचार दुभेद यों बड़भागि रत्नत्रय धरैं।
अरु धरैंगे ते शिव लहैं तिन, सुयश-जल-जग-मल हरैं॥
इमि जानि आलस हानि, साहस ठानि यह सिख आदरो।
जबलौं न रोग जरा गहै तबलौं झटिति निज हित करो॥(14)
यह राग आग दहै सदा, तातैं समामृत सेइये।
चिर भजे विषय कषाय अब तो त्याग निजपद बेइये॥
कहा रच्यो पर-पद में न तेरो पद यहै क्यों दु:ख सहै।
अब ‘दौल’ होउ सुखी स्व-पद रचि, दाव मत चूकौ यहै ।।(15)
(दोहा)
इक नव वसु इक वर्ष की, तीज शुकल वैशाख।
कर्यो तत्त्व उपदेश यह, लखि ‘बुधजन’ की भाख॥(1)
लघु-धी तथा प्रमादतैं, शब्द - अर्थ की भूल।
सुधी सुधार पढ़ो सदा, जो पावो भव-कूल॥(2) |
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2026-04-10 07:18:13 |
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---छठवीं ढाल----
षट्काय जीव न हनन तैं, सब विधि दरब-हिंसा टरी।
रागादि भाव निवारतैं, हिंसा न भावित अवतरी॥
जिनके न लेश मृषा न जल मृण हू बिना दीयो गहैं।
अठदशसहस विधि शीलधर, चिद्ब्रह्म में नित रमि रहैं ॥(1)
अन्तर चतुर्दश भेद बाहिर, संग दशधा तैं टलैं।
परमाद तजि चउ कर मही लखि, समिति ईर्या तैं चलैं॥
जग सुहितकर सब अहितहर, श्रुतिसुखद सब संशय हरैं।
भ्रम-रोग-हर जिनके वचन, मुखचन्द्र तैं अमृत झरैं॥(2)
छ्यालीस दोष बिना सुकुल, श्रावक तनैं घर अशन को।
लैं तप बढ़ावन हेतु, नहिं तन पोषते तजि रसन को।
शुचि ज्ञान संयम उपकरण, लखिकैं गहैं लखिकैं धरैं।
निर्जन्तु थान विलोक तन-मल, मूत्र श्लेषम परिहरैं ॥(3)
सम्यक् प्रकार निरोध मन-वच-काय आतम ध्यावते।
तिन सुथिर-मुद्रा देखि मृग-गण, उपल खाज खुजावते॥
रस रूप गन्ध तथा फरस, अरु शब्द शुभ असुहावने।
तिनमें न राग विरोध, पंचेन्द्रिय-जयन पद पावने ॥(4)
समता सम्हारैं थुति उचारैं, वन्दना जिनदेव को।
नित करैं श्रुतरति करै प्रतिक्रम, तजैं तन अहमेव को॥
जिनके न न्हौंन न दन्त-धोवन, लेश अम्बर आवरन।
भूमाहिं पिछली रयनि में कछु, शयन एकासन करन ॥(5)
इक बार दिन में लैं अहार, खड़े अलप निज पान में।
कचलोंच करत न डरत परीषह, सों लगे निज ध्यान में॥
अरि मित्र महल मसान कंचन-काँच निन्दन-थुति करन।
अर्घावतारन असि-प्रहारन, में सदा समता धरन ॥(6)
तप तपैं द्वादश धरैं वृष दश, रत्न-त्रय सेवैं सदा।
मुनि-साथ में वा एक विचरैं चहैं नहिं भव-सुख कदा॥
यों है सकलसंयमचरित, सुनिये स्वरूपाचरन अब।
जिस होत प्रगटै आपनी निधि, मिटै पर की प्रवृत्ति सब॥(7)
जिन परमपैनी सुबुधि - छैनी, डारि अन्तर भेदिया।
वरणादि अरु रागादि तैं, निज-भाव को न्यारा किया।।
निजमाहिं निज के हेतु निज कर, आपको आपै गह्यो।
गुण गुणी ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय, मंझार कछु भेद न रह्यो॥(8)
जहँ ध्यान ध्याता ध्येय को न, विकल्प वच भेद न जहाँ।
चिद्भाव कर्म चिदेश कर्ता, चेतना किरिया तहाँ॥
तीनों अभिन्न अखिन्न शुध उपयोग की निश्चल दसा।
प्रगटी जहाँ दृग-ज्ञान-व्रत ये तीनधा एकै लसा ॥(9)
परमाण नय निक्षेप को न उद्योत अनुभव में दिखैं।
दृग-ज्ञान-सुख-बलमय सदा, नहिं आन भाव जु मो विखैं।
मैं साध्य साधक मैं अबाधक, कर्म अरु तसु फलनितैं।
चित् पिण्ड चण्ड अखण्ड सुगुणकरण्ड च्युत पुनि कलनितैं॥(10)
यों चिन्त्य निज में थिर भये, तिन अकथ जो आनन्द लह्यो।
सो इन्द्र नाग नरेन्द्र वा, अहमिन्द्र के नाहीं कह्यो॥
तब ही शुकलध्यानाग्नि करि, चउ-घातिविधि कानन दह्यो।
सब लख्यो केवलज्ञान करि, भविलोक को शिवमग कह्यो॥(11)
पुनि घाति शेष अघातिविधि, छिन माहिं अष्टम-भू बसैं।
वसुकर्म विनसै सुगुण वसु, सम्यक्त्व आदिक सब लसैं॥
संसार खार अपार पारावार, तरि तीरहिं गये।
अविकार अकल अरूप शुचि,चिद्रूप अविनाशी भये ॥(12)
निजमाँहि लोक अलोक गुण, परजाय प्रतिबिम्बित भये।
रहि हैं अनन्तानन्तकाल, यथा तथा शिव परिणये॥
धनि धन्य हैं जे जीव, नर-भव पाय, यह कारज किया।
तिनही अनादि भ्रमण पञ्च प्रकार तजि वर सुख लिया॥(13)
मुख्योपचार दुभेद यों बड़भागि रत्नत्रय धरैं।
अरु धरैंगे ते शिव लहैं तिन, सुयश-जल-जग-मल हरैं॥
इमि जानि आलस हानि, साहस ठानि यह सिख आदरो।
जबलौं न रोग जरा गहै तबलौं झटिति निज हित करो॥(14)
यह राग आग दहै सदा, तातैं समामृत सेइये।
चिर भजे विषय कषाय अब तो त्याग निजपद बेइये॥
कहा रच्यो पर-पद में न तेरो पद यहै क्यों दु:ख सहै।
अब ‘दौल’ होउ सुखी स्व-पद रचि, दाव मत चूकौ यहै ।।(15)
(दोहा)
इक नव वसु इक वर्ष की, तीज शुकल वैशाख।
कर्यो तत्त्व उपदेश यह, लखि ‘बुधजन’ की भाख॥(1)
लघु-धी तथा प्रमादतैं, शब्द - अर्थ की भूल।
सुधी सुधार पढ़ो सदा, जो पावो भव-कूल॥(2) |
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2026-04-10 07:18:12 |
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