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? आचार्य सुधीन्द्र संदेश ? |
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मुनि सुव्रतनाथ चालीसा का बहुत महात्म्य माना गया है। जो भी व्यक्ति चालीस दिन तक चालीस बार इसका पाठ करता है, वह श्री मुनि की राह का पथिक बन जाता है और इस भवसागर से उसका बेड़ा पार हो जाता है। मुनि सुव्रतनाथ चालीसा का अक्षर-अक्षर ऊर्जा से परिपूर्ण है। इस ऊर्जा को अपने जीवन में धारण करने का तरीक़ा है इस चालीसा का प्रतिदिन पाठ। पढ़ें मुनि सुव्रतनाथ चालीसा–
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श्री मुनि सुव्रतनाथ का चिह्न – कछुआ
दोहा
अरिहंत सिद्ध आचार्य को,
शत्-शत करूँ प्रणाम।
उपाध्याय सर्वसाधु,
करते स्वपर कल्याण॥
जिनधर्म, जिनागम,
जिन मन्दिर पवित्र धाम।
वीतराग की प्रतिमा को,
कोटि-कोटि प्रणाम॥
चौपाई
जय मुनिसुव्रत दया के सागर,
नाम प्रभु का लोक उजागर स्मित्र॥
राजा के तुम नन्दा,
माँ शामा की आंखों के चन्दा॥
श्यामवर्ण मरत प्रभु की प्यारी,
गुणगान करे निशदिन नर नारी॥
मुनिसुव्रत जिन हो अन्तरयामी,
श्रद्धा भाव सहित तुम्हें प्रणामी॥
भक्ति आपकी जो निशदिन करता,
पाप ताप भय संकट हरता।
प्रभू संकटमोचन नाम तुम्हारा,
दीन दुखी जीवों का सहारा।
कोई दरिद्री या तन का रोगी,
प्रभु दर्शन से होते हैं निरोगी।
मिथ्या तिमिर भयो अति भारी,
भव भव की बाधा हरो हमारी॥
यह संसार महा दुखाई,
सुख नहीं यहां दुख की खाई॥
मोह जाल में फंसा है बंदा,
काटो प्रभु भव भव का फंदा॥
रोग शोक भय व्याधि मिटावो,
भव सागर से पार लगाओ॥
घिरा कर्म से चौरासी भटका,
मोह माया बन्धन में अटका॥
संयोग-वियोग भव-भव का नाता,
राग द्वेष जग में भटकाता॥
हित मित प्रिय प्रभु की वाणी,
स्वपर कल्याण करे मुनि ध्यानी॥
भव सागर बीच नाव हमारी,
प्रभु पार करो यह विरद तिहारी॥
मन विवेक मेरा अन जागा,
प्रभु दर्शन से कर्ममल भागा॥
नाम आपका जपे जो भाई,
लोका लोक सुख सम्पदा पाई॥
कृपा दृष्टि जब आपकी होवे,
धन आरोग्य सुख समृद्धि पावे॥
प्रभू चरणन में जो जो आवे,
श्रद्ध भक्ति फल वांछित पावे॥
प्रभु आपका चमत्कार है प्यारा,
संकट मोचन प्रभु नाम तुम्हारा॥
सर्वज्ञ अनंत चतुष्टय के धारी,
मन वच तन वंदना हमारी॥
सम्मेद शिखर से मोक्ष सिधारे,
उद्धार करो मैं शरण तिहारे॥
महाराष्ट्र का पैठण तीर्थ,
सुप्रसिद्ध यह अतिशय क्षेत्र।
मनोज्ञ मन्दिर बना है भारी,
वीतराग की प्रतिमा सुखकारी॥
चतुर्थ कालीन मूर्ति है निराली,
मुनिसुव्रत प्रभु की छवि है प्यारी॥
मानस्तंभ उत्तंग की शोभा न्यारी,
देखत गलत मान कषाय भारी॥
मुनिसुव्रत शनिग्रह अधिष्टाता,
दुख संकट हरे देवे सुख साता॥
शनि अमावस की महिमा भारी,
दूर-दूर से यहां आते नर नारी॥
दोहा
सम्यक् श्रद्धा से चालीसा,
चालीस दिन पढ़िये नर-नार।
मुनि पथ के राही बन,
भक्ति से होवे भव पार॥
जाप – ॐ ह्रीं अर्हं श्री मुनिसुव्रतनाथाय नम:॥ |
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2026-02-14 05:56:58 |
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