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2728 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-02-14 05:20:39
2727 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-02-14 05:20:27
2726 40449664 ?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? 2026-02-14 05:20:04
2725 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी --- ? *तात्त्विक चिंतन* ✨ *सुख का स्थान बाह्य संयोगों में नहीं, आत्मतत्त्व में है* ✨ चक्रवर्ती, बलदेव और तीर्थंकर जैसे ६४ शलाका पुरुष— ? जिन्हें इन्द्रादि देवों द्वारा जुटाई गई सर्वोत्तम भोग-सामग्री प्राप्त थी, ? राज्य, वैभव, सम्मान और सामर्थ्य जिनके चरणों में थे— उन महान पुरुषों को भी उन संयोगों में ❌ *कहीं भी शान्ति* ❌ *कहीं भी सुख* ❌ *कहीं भी निराकुलता* का अनुभव नहीं हुआ। उलटे उन्हें मिला— ? ? *आकुलता* ? ? *असंतोष* ? ?️ *अपूर्णता* ---?️ *बाह्य सुख की विफलता* जहाँ संसार सामान्य जीव को सुख का प्रतीत होता है, वहीं विवेकी महापुरुषों को वही संसार ? *अत्यंत आकुलता का कारण बनता है*। इसीलिए— ? वे *राज्य में नहीं* रुके ? *वैभव में नहीं* अटके ? *सम्बन्धों की गणना* में नहीं पड़े उन्होंने यह प्रश्न तक नहीं किया— > ❓ “हम नहीं रहेंगे तो राज्य का क्या होगा?” ❓ “माता–पिता, स्त्री–पुत्रों का क्या होगा?” क्योंकि— ? *जिसे अपना ही नहीं माना,* उसके छूटने की चिंता कैसी? ---? *आत्मसुख की खोज* जब उन्होंने स्पष्ट देखा कि— ❌ बाह्य संयोगों में सुख नहीं है ✅ और *आत्मतत्त्व में ही वास्तविक आनन्द का स्रोत है* तो उन्होंने— ✔️ *पहले श्रद्धान में* ✔️ *फिर ज्ञान में* ✔️ *और अंततः व्यवहार में* सभी बाह्य संयोगों से निवृत्ति कर ली। ?‍♂️ यह पलायन नहीं था, ? *यह जागृति थी।* ---? *जंगल का रहस्य* यह ठीक से समझ लेना चाहिए कि— > ? जंगल में सुख नहीं है। परन्तु— ?️ *वहाँ भोग के साधन* नहीं होते ? *उपयोग को बाहर खींचने वाले विषय* नहीं होते इसलिए— ?‍♂️ ऐकांत में *स्वरूप-साधना* सहज हो जाती है। इसी कारण वे महापुरुष जंगल की ओर गए— ❌ सुख की खोज में नहीं, ✅ बल्कि *उपयोग की एकाग्रता* के लिए। --? *“त्याग” का तात्त्विक अर्थ* > ? वास्तव में त्याग हुआ ही नहीं। क्योंकि— ? *जो अपना है, वह छोड़ा नहीं जा सकता* ? *और जो छोड़ा गया, वह कभी अपना था ही नहीं* इसलिए “त्याग” कहना केवल ? व्यवहार-कथन है। वास्तविकता यह है कि— पहले *अज्ञानवश जिन बाह्य संयोगों* को अपना माना गया और जिन पर उपयोग केंद्रित किया गया स्वरूप के अनुभव के बल से ? *वहाँ से उपयोग की निवृत्ति कर ली गई* जब *उपयोग हटता* है— ? *बाहर संयोगों का अभाव* दिखाई देता है, और उसी को *लोकभाषा में “त्याग”* कहा जाता है। ---? *यह मार्ग किसका है?* यह मार्ग— ? डरपोक जीवों का नहीं ? संसार में सुख मानने वाले अज्ञानी जीवों का नहीं ? केवल बातें करने वालों का नहीं यह मार्ग है— ⚔️ *वीरों का मार्ग* ? *साधकों का मार्ग* ? *स्वरूप-साधना में प्राण अर्पण करने वालों का मार्ग* जिन्हें— ❗ संसार के तुच्छ संयोगों से भी सुख-बुद्धि नहीं छूटी, उनके लिए यह मार्ग नहीं। परन्तु जिन्हें— ✔️ *अपने चैतन्य स्वरूप में सुख का श्रद्धान हुआ है* ✔️ *अल्पकाल के लिए उसका रसास्वादन हुआ है* ✔️ *और अनन्तकाल तक उसी रस में रहने की तीव्र भावना है* ✨ ऐसे जीव ही समस्त *संयोगों से निवृत्त* होकर ? एकमात्र *आत्मतत्त्व की साधना में प्रवृत्त* होते हैं। ---? *निष्कर्ष* ? ? *सुख बाहर नहीं है* ? ? *त्याग वस्तु का नहीं, उपयोग का है* ? ?️ *मार्ग कठिन नहीं, दृष्टि बदलने का है* > ✨ “मैं संयोग नहीं हूँ, मैं चैतन्य हूँ” ✨ इस अनुभव की ओर बढ़ना ही ?️ *सच्ची साधना* है। ---✍️ — *राजेश जैन, मैनपुरी* 2026-02-14 05:16:32
2724 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ *✨ आज की ✨* *?? कहानी ??* *??‍♂️सफलता की तैयारी?* *कहते हैं, सफलता अचानक नहीं मिलती, वह पहले मन और मेहनत में आकार लेती है। जो व्यक्ति लक्ष्य पाने से पहले स्वयं को उसके योग्य बना लेता है, सफलता अक्सर उसी के कदम चूमती है।* *यह कहानी भी ऐसी ही एक शांत लेकिन गहरी सीख देने वाली घटना है।* *शहर से कुछ दूर, एक बेहद शांत इलाके में एक बुज़ुर्ग दम्पत्ती रहते थे। चारों ओर सन्नाटा था, कभी-कभार ही कोई राहगीर उस रास्ते से गुजरता। एक भोर की सुबह उन्होंने देखा कि एक युवक साइकिल पर फावड़ा रखे कहीं जा रहा है। कुछ देर वह दिखाई दिया और फिर मोड़ के बाद ओझल हो गया। उन्होंने अधिक ध्यान नहीं दिया।* *पर अगले दिन फिर वही दृश्य…और फिर उसके अगले दिन भी।* *अब यह रोज़ की आदत बन चुकी थी। रोज़ सुबह वही युवक, वही फावड़ा, वही रास्ता।* *सुनसान इलाके में इस तरह की नियमित आवाजाही ने दम्पत्ती को सोचने पर मजबूर कर दिया। एक दिन उन्होंने निश्चय किया—आज इसका रहस्य जानकर रहेंगे।* *अगली सुबह जैसे ही युवक गुजरा, बुजुर्ग अपनी गाड़ी से उसके पीछे-पीछे चल पड़े। कुछ दूरी पर युवक एक पेड़ के पास रुका, साइकिल खड़ी की और आगे बढ़ गया। 15–20 कदम चलकर वह रुका और फावड़े से ज़मीन खोदने लगा—पूरी लगन से, पसीना बहाते हुए।* *बुजुर्ग ने पास जाकर पूछा,“बेटा, इस वीराने में रोज़ ज़मीन क्यों खोदते हो?”* *युवक मुस्कराया और बोला,“जी, दो दिन बाद मुझे एक किसान के यहाँ खेत में काम मांगने के लिये जाना है। उन्हें ऐसा व्यक्ति चाहिए जिसे खेतों में काम करने का अनुभव हो। मैंने कभी खेतों में काम नहीं किया, इसलिए यहाँ आकर खुद को तैयार कर रहा हूँ।”* *यह सुनकर बुर्जुग स्तब्ध रह गए। बिना काम मिले ही, बिना किसी आदेश के, वह युवक अनुशासित रूप में स्वयं को योग्य बना रहा था।* *बुज़ुर्ग ने भावुक होकर कहा, “बेटा, तुम्हारी मेहनत और काम के प्रति ईमानदारी देखकर लग रहा है कि तुम्हें काम ही नहीं—ज़रूर सफलता भी मिलेगी।”* *“जो तैयारी से नहीं डरता, वह परीक्षा से कभी नहीं हारता।”* *सफलता केवल इच्छा से नहीं, पूर्व तैयारी से मिलती है।जिस ईमानदारी, अनुशासन और समर्पण से उस युवक ने अपने लक्ष्य की तैयारी की, वही हर क्षेत्र में सफलता की कुंजी है। याद रखिए—अवसर जब आता है, तब वह तैयारी युक्त व्यक्ति को ही चुनता है।* *_ 2026-02-14 05:15:52
2723 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ 2026-02-14 05:12:48
2722 40449675 ?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? 1️⃣4️⃣➖0️⃣2️⃣➖2️⃣0️⃣2️⃣6️⃣ *विरागविशुद्ध युवारत्न* ☄️ *श्रमण विनियोगसागर जी मुनिराज* ? *नियम निभाए पुण्य बढ़ाएं*~ ?*कोई भी एक फल का त्याग* ? *मुनिश्री जलगांव महाराष्ट्र में विराजमान है।* 2026-02-14 05:11:48
2721 40449665 2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म नमोस्तु गुरुदेव 2026-02-14 05:09:17
2720 40449684 ?(5)णमोकार मंत्र तीर्थ उद्धारक आचार्य श्री प्रबल सागर ?????? 2026-02-14 05:07:07
2719 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी ??पार्श्व प्रभु तव दर्शन से✨ पार्श्व प्रभो तव दर्शन से, मम मिथ्यादृष्टि पलाई। मेरा पार्श्व प्रभो अन्तर में, देता मुझे दिखाई ।।टेक।। तेरे जीवन की समता, आदर्श रहे नित मेरी। तेरे सम निज में दृढ़ता ही, मेंटे भव-भव फेरी।। संकट त्राता आनन्द दाता, ज्ञायकदृष्टि सु पाई ।।1।। बैर-क्षोभ वश होय कमठ, उपसर्ग किया भयकारी। नहिं अन्तर तक पहुँच सका, प्रभु अन्तर गुप्ति धारी।। ज्ञेयमात्र ही रहा कमठ, किंचित् न शत्रुता आई ।2।। आ उपसर्ग धरणेन्द्र निवारा, पद्मा मंगल गाये। धन्य-धन्य समवृत्तिधारी, किंचित् नहिं हरषाये।। वीतराग प्रभु घातिकर्म तज, केवल-लक्ष्मी पाई ।।3।। आत्मसाधना देख कमठ भी, प्रभु चरणों में नत था। आत्मबोध पाकर वह भी तो, निज में हुआ विनत था।। दूर हुए दुर्भाव विकारी, सम्यक्-निधि उपजाई ।।4।। निज में ही एकत्व सत्य, शिव सुन्दर संकटहारी। दिव्यतत्त्व दर्शाती प्रभुवर, मुद्रा दिव्य तुम्हारी।। दर्पण से मुख त्यों तुमसे, निज निधि मैंने लख पाई ।।5।। ज्ञानमात्र निज आत्मभाव, में शक्ति अनन्त उछलती। रागादिक मल बाहर भागें, शान्ति किलोलें करती।। शान्ति सिंधु में मगन होय मैं, नमन करूँ सुखदाई ।।6।। • श्रद्धेय ब्र. रवीन्द्रजी 'आत्मन्' 2026-02-14 05:06:55