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232516 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा *श्री रत्नाकर पच्चीसी का सरल भावार्थ* पश्चाताप की पवित्र भावना से रचित इस सुंदर स्तोत्र का सच्चा भाव यदि हमारे जीवन में उतर जाए, तो भवसागर से पार होने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। आइए, प्रत्येक गाथा के पीछे छिपे हृदयस्पर्शी और दिव्य भाव को सरल भाषा में समझें। *भावार्थ हिन्दी में*?? <a href="https://youtu.be/qhVY0T5rTHc?si=PLOSv094Sv7eh9yu" target="_blank">https://youtu.be/qhVY0T5rTHc?si=PLOSv094Sv7eh9yu</a> *ભાવાર્થ ગુજરાતી માં*?? <a href="https://youtu.be/yIKdK-YPTp4?si=04LV9FHERGOSiJO_" target="_blank">https://youtu.be/yIKdK-YPTp4?si=04LV9FHERGOSiJO_</a> ➖➖➖➖➖➖➖➖ *Jain Library Whatsapp Group* +91 8128994987 2026-06-15 16:16:16
232513 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा 2026-06-15 16:15:31
232514 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा 2026-06-15 16:15:31
232512 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा 2026-06-15 16:15:29
232511 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा 2026-06-15 16:15:28
232509 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा सफेद पट्टी भारत-पाकिस्तान की बॉर्डर है क्या? आज सोशल मीडिया के इस दौर में व्यूज़ की भूख और वायरल होने की सनक ने एक नई जमात को जन्म दिया है—कथित 'इन्फ्लुएंसर्स' की जमात। इस जमात में कुछ लोग यकीनन काबिल-ए-तारीफ काम कर रहे हैं, लेकिन एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जिसका समाज, सच, या सांप्रदायिक सौहार्द से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। उनका एकमात्र धर्म, ईमान और मकसद सिर्फ एक है, किसी भी तरह विवाद खड़ा करना और वायरल हो जाना। मुंबई के घाटकोपर की एक सोसायटी में हाल ही में जो हुआ, वह इसी बीमार मानसिकता का जीता-जागता और शर्मनाक उदाहरण है। जैन मुनियों के आगमन के लिए सोसायटी के परिसर में एक साधारण सी सफेद पट्टी बनाई गई थी। इसके पीछे की वजह पूरी तरह मानवीय और वैज्ञानिक थी ताकि चिलचिलाती धूप में ज़मीन कम तपे, बरसात के मौसम में नंगे पैर चलने वाले साधु-संतों का पैर न फिसले, उन्हें कंकड़-पत्थर न चुभें और रास्ते के सूक्ष्म जीवों की रक्षा हो सके। लेकिन अफ़सोस! रील के भूखे कुछ गिद्धों ने इस सामान्य, मानवीय और सेवा भाव से किए गए कार्य को धर्म और क्षेत्रवाद का रंग दे दिया। मैं सीधा और तीखा सवाल पूछता हूँ, क्या उस सफेद पट्टी से किसी का रत्ती भर भी नुकसान हुआ? क्या किसी को उस पर चलने से रोका गया? क्या किसी की ज़मीन हड़प ली गई? क्या सोसायटी के अन्य निवासियों को उससे कोई तकलीफ थी? अगर इन सभी सवालों का जवाब "नहीं" है, तो फिर यह ज़हरीला विवाद किस बात का? भारत वो देश है जहाँ सदियों से राहगीरों के लिए प्याऊ लगाना, मंदिरों के बाहर छांव की व्यवस्था करना, गुरुद्वारों में बिना भेदभाव के चौबीसों घंटे लंगर चलाना और छतों पर पक्षियों के लिए दाना-पानी रखना हमारी रगों में बसा है। यह हमारी साझी संस्कृति है। जैन मुनि तो वो हैं जो किसी जीव को तकलीफ न पहुंचे, इसके लिए अपना पूरा जीवन नंगे पैर चलकर और अहिंसा के मार्ग पर बिता देते हैं। अगर किसी श्रद्धालु ने उनके पैरों की सहूलियत के लिए एक चूने या पेंट की पट्टी बना दी, तो इसमें पहाड़ टूट पड़ने जैसी क्या बात थी? अगर आज हम इस सफेद पट्टी पर विवाद स्वीकार कर लेते हैं, तो कल ये लोग पूछेंगे कि पक्षियों के लिए पानी क्यों रखा? परसों सवाल उठाएंगे कि गरीबों को मुफ्त भोजन क्यों कराया? फिर किसी बीमार की मदद करने पर भी ये धर्म का चश्मा लगा देंगे! अगर समाज के हर अच्छे और सेवा कार्य में हम नफरत और विवाद का कीड़ा ढूंढने लगेंगे, तो एक इंसानी समाज के रूप में हम आगे बढ़ेंगे या आदिम युग में लौट जाएंगे? कड़वा सच तो यह है कि इन नफरत के सौदागरों को बहुत अच्छे से पता है कि प्रेम, भाईचारे और सद्भाव की बातों से रील्स पर 'लाइक' और 'व्यूज' की बरसात नहीं होती। सुर्खियां बटोरने के लिए विवाद का तड़का लगाना पड़ता है। इसलिए ये लोग तिल का ताड़ बनाते हैं और भाई को भाई से लड़ाने की स्क्रिप्ट लिखते हैं। इन्हें समाज के बिखरने का कोई गम नहीं है, इन्हें बस अपने फॉलोअर्स की संख्या बढ़ने की खुशी होती है। ये घटनाएं स्क्रीन पर छोटी दिखती हैं, लेकिन समाज के भीतर अविश्वास और दूरी का ऐसा धीमा ज़हर घोलती हैं जिसे मिटाना नामुमकिन हो जाता है। हमें जागना होगा। किसी भी रील या पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देने या उसे शेयर करने से पहले खुद से पूछिए "कहीं मैं किसी की सस्ती लोकप्रियता और टीआरपी का मोहरा तो नहीं बन रहा?" याद रखिए, किसी शीशे या समाज को तोड़ना बेहद आसान है, लेकिन उसके टुकड़ों को जोड़कर पहले जैसा बनाना सबसे मुश्किल काम है। नफरत फैलाने वाले आपको हर मोड़ पर हज़ारों मिल जाएंगे, लेकिन इस देश के ताने-बाने को, इसके प्रेम और सद्भाव को बचाकर रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है। साफ़ लफ़्ज़ों में समझ लीजिए, वह सफेद पट्टी कोई भारत-पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर नहीं थी, जिसे देखकर छाती पीटी जाए या हंगामा खड़ा किया जाए। वह सिर्फ सेवा, सम्मान और सुविधा के लिए की गई एक अस्थाई व्यवस्था थी। खतरा उस निर्जीव सफेद पट्टी से कभी था ही नहीं; असली खतरा उस बीमार और संकीर्ण सोच से है जो हर पवित्र और मानवीय कार्य में भी नफरत का एजेंडा खोज लेती है। समाज को जोड़ने का जरिया बनिए, उसे तोड़ने का औजार मत बनिए। क्योंकि याद रखिए, ज़हर की एक छोटी सी बूंद भी पूरे घड़े के अमृत जैसे पानी को बर्बाद करने के लिए काफी होती है। 2026-06-15 16:15:27
232510 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा सफेद पट्टी भारत-पाकिस्तान की बॉर्डर है क्या? आज सोशल मीडिया के इस दौर में व्यूज़ की भूख और वायरल होने की सनक ने एक नई जमात को जन्म दिया है—कथित 'इन्फ्लुएंसर्स' की जमात। इस जमात में कुछ लोग यकीनन काबिल-ए-तारीफ काम कर रहे हैं, लेकिन एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जिसका समाज, सच, या सांप्रदायिक सौहार्द से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। उनका एकमात्र धर्म, ईमान और मकसद सिर्फ एक है, किसी भी तरह विवाद खड़ा करना और वायरल हो जाना। मुंबई के घाटकोपर की एक सोसायटी में हाल ही में जो हुआ, वह इसी बीमार मानसिकता का जीता-जागता और शर्मनाक उदाहरण है। जैन मुनियों के आगमन के लिए सोसायटी के परिसर में एक साधारण सी सफेद पट्टी बनाई गई थी। इसके पीछे की वजह पूरी तरह मानवीय और वैज्ञानिक थी ताकि चिलचिलाती धूप में ज़मीन कम तपे, बरसात के मौसम में नंगे पैर चलने वाले साधु-संतों का पैर न फिसले, उन्हें कंकड़-पत्थर न चुभें और रास्ते के सूक्ष्म जीवों की रक्षा हो सके। लेकिन अफ़सोस! रील के भूखे कुछ गिद्धों ने इस सामान्य, मानवीय और सेवा भाव से किए गए कार्य को धर्म और क्षेत्रवाद का रंग दे दिया। मैं सीधा और तीखा सवाल पूछता हूँ, क्या उस सफेद पट्टी से किसी का रत्ती भर भी नुकसान हुआ? क्या किसी को उस पर चलने से रोका गया? क्या किसी की ज़मीन हड़प ली गई? क्या सोसायटी के अन्य निवासियों को उससे कोई तकलीफ थी? अगर इन सभी सवालों का जवाब "नहीं" है, तो फिर यह ज़हरीला विवाद किस बात का? भारत वो देश है जहाँ सदियों से राहगीरों के लिए प्याऊ लगाना, मंदिरों के बाहर छांव की व्यवस्था करना, गुरुद्वारों में बिना भेदभाव के चौबीसों घंटे लंगर चलाना और छतों पर पक्षियों के लिए दाना-पानी रखना हमारी रगों में बसा है। यह हमारी साझी संस्कृति है। जैन मुनि तो वो हैं जो किसी जीव को तकलीफ न पहुंचे, इसके लिए अपना पूरा जीवन नंगे पैर चलकर और अहिंसा के मार्ग पर बिता देते हैं। अगर किसी श्रद्धालु ने उनके पैरों की सहूलियत के लिए एक चूने या पेंट की पट्टी बना दी, तो इसमें पहाड़ टूट पड़ने जैसी क्या बात थी? अगर आज हम इस सफेद पट्टी पर विवाद स्वीकार कर लेते हैं, तो कल ये लोग पूछेंगे कि पक्षियों के लिए पानी क्यों रखा? परसों सवाल उठाएंगे कि गरीबों को मुफ्त भोजन क्यों कराया? फिर किसी बीमार की मदद करने पर भी ये धर्म का चश्मा लगा देंगे! अगर समाज के हर अच्छे और सेवा कार्य में हम नफरत और विवाद का कीड़ा ढूंढने लगेंगे, तो एक इंसानी समाज के रूप में हम आगे बढ़ेंगे या आदिम युग में लौट जाएंगे? कड़वा सच तो यह है कि इन नफरत के सौदागरों को बहुत अच्छे से पता है कि प्रेम, भाईचारे और सद्भाव की बातों से रील्स पर 'लाइक' और 'व्यूज' की बरसात नहीं होती। सुर्खियां बटोरने के लिए विवाद का तड़का लगाना पड़ता है। इसलिए ये लोग तिल का ताड़ बनाते हैं और भाई को भाई से लड़ाने की स्क्रिप्ट लिखते हैं। इन्हें समाज के बिखरने का कोई गम नहीं है, इन्हें बस अपने फॉलोअर्स की संख्या बढ़ने की खुशी होती है। ये घटनाएं स्क्रीन पर छोटी दिखती हैं, लेकिन समाज के भीतर अविश्वास और दूरी का ऐसा धीमा ज़हर घोलती हैं जिसे मिटाना नामुमकिन हो जाता है। हमें जागना होगा। किसी भी रील या पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देने या उसे शेयर करने से पहले खुद से पूछिए "कहीं मैं किसी की सस्ती लोकप्रियता और टीआरपी का मोहरा तो नहीं बन रहा?" याद रखिए, किसी शीशे या समाज को तोड़ना बेहद आसान है, लेकिन उसके टुकड़ों को जोड़कर पहले जैसा बनाना सबसे मुश्किल काम है। नफरत फैलाने वाले आपको हर मोड़ पर हज़ारों मिल जाएंगे, लेकिन इस देश के ताने-बाने को, इसके प्रेम और सद्भाव को बचाकर रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है। साफ़ लफ़्ज़ों में समझ लीजिए, वह सफेद पट्टी कोई भारत-पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर नहीं थी, जिसे देखकर छाती पीटी जाए या हंगामा खड़ा किया जाए। वह सिर्फ सेवा, सम्मान और सुविधा के लिए की गई एक अस्थाई व्यवस्था थी। खतरा उस निर्जीव सफेद पट्टी से कभी था ही नहीं; असली खतरा उस बीमार और संकीर्ण सोच से है जो हर पवित्र और मानवीय कार्य में भी नफरत का एजेंडा खोज लेती है। समाज को जोड़ने का जरिया बनिए, उसे तोड़ने का औजार मत बनिए। क्योंकि याद रखिए, ज़हर की एक छोटी सी बूंद भी पूरे घड़े के अमृत जैसे पानी को बर्बाद करने के लिए काफी होती है। 2026-06-15 16:15:27
232508 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा अब वाइट पट्टा लगाने से भी दिक्कत होने लगी है जब की वाइट पट्टे से पेर नही जलते है ठंडा रहता है गुरु महाराज नंगे पाओ चलते है तो उनके लिए लगाया जाता है इस पट्टे से ना कोई रास्ता रुकता है ना किसी को ठेस पहुंचती है ना किसी धर्म का अपमान होता है तो फिर इस पट्टे से एक आदमी को इतनी दिक्कत क्यों ये कहता है हर जैन ???? 2026-06-15 16:15:25
232507 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा अब वाइट पट्टा लगाने से भी दिक्कत होने लगी है जब की वाइट पट्टे से पेर नही जलते है ठंडा रहता है गुरु महाराज नंगे पाओ चलते है तो उनके लिए लगाया जाता है इस पट्टे से ना कोई रास्ता रुकता है ना किसी को ठेस पहुंचती है ना किसी धर्म का अपमान होता है तो फिर इस पट्टे से एक आदमी को इतनी दिक्कत क्यों ये कहता है हर जैन ???? 2026-06-15 16:15:24
232506 40449678 1)जैन गुरुकुल से एकता, धर्म और समाज का उत्थान और तीर्थ रक्षा *?राजनीति से जिनका मुंह काला हो चुका है, वह मुंह काला करने की बात कर रहे हैं।।* *?राजनीति में जब विचार समाप्त होने लगते हैं, तब भाषा की मर्यादा भी टूटने लगती है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सबको है, किंतु विरोध की अभिव्यक्ति यदि धमकी, अपमान और सामाजिक वैमनस्य में बदल जाए, तो वह केवल राजनीतिक दिवालियापन का परिचायक बन जाता है।दूसरों का मुंह काला करने की बात करने वालों महाराष्ट्र की राजनीति में आपका मुंह पहले ही काला हो चुका है.......* *मुंबई के घाटकोपर-विद्याविहार क्षेत्र में जैन साधु-साध्वियों के लिए सड़क पर सफेद पट्टी बनाए जाने का मामला इन दिनों राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेताओं ने जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया, उसने केवल जैन समाज ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं को मानने वाले हर नागरिक को चिंतित किया है।* *जैन साधु-साध्वियों की परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। वे नंगे पैर चलकर संयम, तप और अहिंसा का संदेश देते हैं। तपती सड़क पर उनके चरण झुलस न जाएं, इसके लिए यदि स्थानीय श्रद्धालुओं ने सफेद पट्टी बनवा दी, तो यह किसी प्रकार का अपराध नहीं कहा जा सकता। यह न तो सरकारी धन का दुरुपयोग था और न ही किसी समुदाय पर थोपी गई व्यवस्था। यह केवल श्रद्धा और संवेदना का एक छोटा-सा प्रतीक था।* *परंतु दुर्भाग्य यह है कि आज की राजनीति में संवेदनाएं नहीं, केवल अवसरवाद बचा है। मनसे नेता संदीप देशपांडे ने इसे “सांस्कृतिक आतंकवाद” बताते हुए संबंधित लोगों का “मुंह काला” करने की चेतावनी दी। यह बयान न केवल अमर्यादित है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए भी घातक है। जिन नेताओं का राजनीतिक अस्तित्व जनता ने लगातार नकार दिया हो, जिनका राजनीतिक चेहरा स्वयं जनता के बीच काला पड़* *चुका हो, वे यदि दूसरों का मुंह* *काला करने की बात करें, तो यह हास्यास्पद भी है और दुखद भी।* *यह वही राजनीति है जो वास्तविक जनसमस्याओं पर मौन रहती है। मुंबई की टूटी सड़कें, जलभराव, बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई और मराठी युवाओं के भविष्य पर कभी इतनी आक्रामकता दिखाई नहीं देती। लेकिन जब किसी शांतिप्रिय समाज की धार्मिक परंपरा सामने आती है, तब अचानक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जाग उठता है। यह विरोध नहीं, बल्कि सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने का प्रयास अधिक प्रतीत होता है।* *♦️जैन समाज देश का सबसे शांतिप्रिय और अनुशासित समाज माना जाता है। उसने कभी हिंसा, उग्र आंदोलन या सामाजिक विद्वेष का रास्ता नहीं चुना। भगवान महावीर की अहिंसा और अपरिग्रह की शिक्षा आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा है। ऐसे समाज की साधु-साध्वियों के प्रति* *अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना केवल एक समुदाय का नहीं, भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा का अपमान है।* *भारत विविधताओं का देश है। यहां हर धर्म, हर परंपरा और हर जीवन-पद्धति को सम्मान देने की परंपरा रही है। यदि सिखों के लिए लंगर की व्यवस्था सम्माननीय है, यदि कांवड़ यात्रियों के लिए मार्गों पर सुविधाएं उपलब्ध कराना स्वीकार्य है, यदि अमरनाथ यात्रियों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं, तो जैन साधुओं के लिए श्रद्धावश बनाई गई सफेद पट्टी पर इतना आक्रोश क्यों? क्या सहिष्णुता केवल राजनीति की सुविधा तक सीमित रह गई है?* *असल समस्या यह नहीं कि सड़क पर सफेद पट्टी बनाई गई। समस्या यह है कि कुछ राजनीतिक दल समाज को भावनात्मक मुद्दों में उलझाकर अपनी प्रासंगिकता बचाना चाहते हैं। जिनके पास विकास का एजेंडा नहीं बचता, वे विवादों की राजनीति करते हैं। जिनका राजनीतिक चेहरा जनता बार-बार नकार चुकी हो, वे समाज में तनाव पैदा कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं।* *लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, किंतु धमकी का नहीं। यदि किसी व्यवस्था पर आपत्ति थी, तो प्रशासन से संवाद किया जा सकता था। न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जा सकती थी। लेकिन “मुंह काला करने” जैसी भाषा यह दर्शाती है कि राजनीतिक संस्कार किस स्तर तक गिर चुके हैं।* *आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति समाज को जोड़ने का माध्यम बने, तोड़ने का नहीं। धर्म और परंपराओं के सम्मान को राजनीतिक नफरत का विषय न बनाया जाए। जैन साधुओं के चरणों की रक्षा के लिए बनाई गई सफेद पट्टी को यदि कुछ लोग अपनी राजनीति चमकाने का माध्यम बना रहे हैं, तो यह उनके राजनीतिक और वैचारिक दिवालियेपन का प्रमाण है।* *वास्तव में जिनका राजनीति में चेहरा जनता के बीच पहले ही काला हो चुका है, वही आज दूसरों का मुंह काला करने की बातें कर रहे हैं। जनता सब देख रही है, और समय आने पर लोकतंत्र में जवाब* *भी वही देती है।...?* 2026-06-15 16:15:22