| ID |
Chat ID
|
Chat Name
|
Sender
|
Phone
|
Message
|
Status
|
Date |
View |
| 77751 |
50889696 |
श्री सर्वतोभद्र नवग्रह तीर्थ प्रतिष्ठान क्षेत्र आर्यिका श्री चंद्रामती माताजी मंगसुळी |
|
|
|
|
2026-04-11 16:57:40 |
|
| 77752 |
50889696 |
श्री सर्वतोभद्र नवग्रह तीर्थ प्रतिष्ठान क्षेत्र आर्यिका श्री चंद्रामती माताजी मंगसुळी |
|
|
|
|
2026-04-11 16:57:40 |
|
| 77750 |
50889696 |
श्री सर्वतोभद्र नवग्रह तीर्थ प्रतिष्ठान क्षेत्र आर्यिका श्री चंद्रामती माताजी मंगसुळी |
|
|
|
|
2026-04-11 16:57:39 |
|
| 77749 |
50889696 |
श्री सर्वतोभद्र नवग्रह तीर्थ प्रतिष्ठान क्षेत्र आर्यिका श्री चंद्रामती माताजी मंगसुळी |
|
|
|
|
2026-04-11 16:57:38 |
|
| 77747 |
40449680 |
श्री हुमड़ जैन समाज, पुणे |
|
|
?आचार्य,उपाध्याय,मुनि महाराज द्वारा अभिषेक पूजन~
?(१) मुनियोंके श्रेष्ठ संघ द्वारा जिनेन्द्र देवकी अष्ट से द्रव्य पूजा-
शास्त्र:-हरिवंश पुराण
आचार्य:-जिनसेन
द्वादशः सर्गः, पेज नंबर-२१५
उद्घः संघोऽस्य मौनः स्फुटभुवनगुरोर्देवदेवस्थ देहं देवौघश्चक्रवर्तिप्रमुखनृपगणश्चातिभक्त्या समेत्य । गन्धैः पुष्पैश्च धूपैः सुरभिभिरमलैरक्षतैश्च प्रदीपैः संपूज्यानम्य सम्यग्वृषभजिनगुणश्रीफलं याचते स्म ॥८२॥
इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतो वृषभेश्वरपरिनिर्वाणवर्णनो नाम द्वादशः सर्गः ॥१२॥
?अर्थ-मोक्षप्राप्तिके अनन्तर मुनियोंका श्रेष्ठ संघ, देवोंका समूह और चक्रवर्ती आदि प्रमुख राजाओंका समूह - इन सबने तीव्र भक्तिवश आकर गन्ध, पुष्प, सुगन्धित धूप, उज्जल अक्षत और देदीप्यमान दीपकके द्वारा त्रिजगद्गुरु देवादि देव वृषभदेवके शरीरकी पूजा कर तथा अच्छी तरह नमस्कार कर यही याचना की कि हम लोगोंको श्री ऋषभ जिनेन्द्रके गुण लक्ष्मीरूपी फलकी प्राप्ति होवे ॥८२॥
इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें श्रीवृषभदेवकी निर्वाण प्राप्तिका वर्णन करनेवाला बारहवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥१२।।
????????????
?(२) जिस क्रिया को देखने से पुण्य होता हैं, वह क्रिया स्वयं करे तो पाप बंध कैसे हो सकता हैं ।अर्थात् मुनि महाराज को अभिषेक ~पूजन देखने से पुण्य मिलता हैं, तो मुनि महाराज अभिषेक~पूजन करें तो पुण्य ही प्राप्त होगा । ( कृत~कारित ~अनुमोदना )
????????????
?(३) गुरु के पाद प्रक्षालन मुनि महाराज कर सकते है तो भगवान का अभिषेक ~पूजन करने में क्या बाधा होगी अर्थात् मुनि महाराज भगवान का अभिषेक ~पूजन कर सकते हैं ।
??????????????????????
?(४)भगवान का अभिषेक करना पूजन का ही एक अंग हैं ।
????????????
?(५) पुण्य बन्धके कारणभूत कामोंको जैसे देशव्रती श्रावक करता है वैसे ही मुनि भी करता हैं, मुनिके लिये उनका एकान्तसे निषेध नहीं है ।[शास्त्र~जयधवला ~ कषाय पाहुड पेज नंबर~८]
अर्थात् पुण्य बन्धके कारणभूत कामोंको जैसे देशव्रती श्रावक के लिए अभिषेक ~पूजन करना कर्तव्य होता हैं वैसे ही मुनि महाराज के लिए स्तवन आवश्यक क्रियामें अभिषेक ~पूजन करना कर्तव्य होता हैं ।
????????????
?(६) मूलाचार गाथा ~24 पेज नंबर ~३०
उसहादिजिणवराणं णामणिरुत्तिं गुणाणुकित्तिं च काऊण अच्चिदूण यच तिसुद्धपणमो थओ णेओ ।24।
?अर्थ ~ऋषभ अजित आदि चौबीस तीर्थंकरों के नाम की निरुक्ति के अनुसार अर्थ करना, उनके असाधारण गुणों को प्रगट करना, उनके चरणों को पूजकर मन-वचन-काय की शुद्धता से स्तुति करना उसे चतुर्विंशतिस्तव कहते हैं।
?टिका अर्थ ~आचारवृत्ति-ऋषभ, अजीत, संभव, अभिनंदन, सुमति, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चंद्रप्रभ, पुष्पदंत, शीतल, श्रेयांस, वासुपूज्य, विमल, अनंत, धर्म, शांति, कुंन्थु, अर, मल्ली, मुनिसुव्रत, नमि, अरिष्टनेमी, पार्श्व और वर्धमान इस प्रकार से नाम उच्चारण करना नाम स्तवन कहलाता है। इन्हीं तीर्थंकरों के असाधारण धर्मरूप गुणों का वर्णन करना गुणनुकीर्तन है, अर्थात् निर्दोष आप्त का लक्षण करते हुए उनकी स्तुति करना, जैसे, हे भगवन् ! आप लोक में उद्योत करनेवाले हैं, धर्मतीर्थ के कर्ता हैं; सुर, असुर और मनुष्यों के इन्द्रों से स्तुति को प्राप्त है वास्तविक तत्त्व के स्वरूप को देखनेवाले हैं, और कठोर घातिया कर्मों को नष्ट कर चुके हैं-इत्यादि प्रकार से अनेक-अनेक गुणों का कीर्तन करना भी गुणानुकीर्तन है। इस प्रकार तीर्थकरों का गुणग्रहणपूर्वक नामग्रहण करके तथा मलपटल से रहित सुगन्धित दिव्यरूप ला गये प्रासुक गन्ध पुष्प धूप-दीप आदि के द्वारा चौबीस तीर्थंकरों के पद-युगलों की अर्चना करके मन, वचन, काय को शुद्धिपूर्वक उनको प्रणाम करना - स्तवन करना स्तव आवश्यक है।
????????????
?(७) गणधरदेव भी जिनेन्द्र देवकी पूजा करते हैं ।
तिलोयपणत्ती
आचार्यश्री यतिवृषभाचार्य विरचित
चतुर्थ अधिकार
गाथा -८८२-८८३
आरुहिवूणं तेसु','गणहर देवादि बारस- गणा ते ।
कादूण 'ति व्यवहणमति मुहं मुहं णाहं ॥८८२॥
थोदूण जुदा साएहिं, असंखगुणसेढि-कम्म-निज्जरणं ।
कादूण पसण्ण मचा, णिय णिय कोट्ठेसु पवइसंतइ ।।८८३।।
?अर्थ :- वे गणधरदेवाधिक बारह-गण उन पीठों पर चढ़कर और तीन प्रदक्षिणा देकर बार-बार जिनेन्द्र देवकी पूजा करते हैं, तथा सेंकड़ों स्तुतियों द्वारा कीर्तन कर कर्मोकी असंख्यात- गुणश्रेणीरूपनिर्जरा करके प्रसन्न-चित्त होते हुए अपने-अपने कोठों में प्रवेश करते हैं। अर्थात् अपने- अपने कोठोंमें बैठ जाते हैं ।।८८२-८८३।।
????????????
?(८) मुनि महाराज कोअभिषेक वंदना करते समय सिध्दभक्ति, चैत्यभक्ति, पंचमहागुरु भक्ति, शान्तिभक्ति समाधिभक्ति करनी चाहिए ।
????????????
?(९) ?प्रभाचन्द्राचार्य कृत संस्कृत भाष्य से युक्त सामायिक पाठ में एक प्राचीन श्लोक है ~
स्नपनार्चास्तुतिजपान् साम्यार्थं प्रतिमार्पिते ।
युज्यां यथाम्नायमाद्यादृते संकल्पितेऽर्हति ॥२१॥
?अर्थ:- प्रतिमामें अर्पित जिनेश्वर का अभिषेक, पूजन, स्तुति और जाप समभाव के लिए - रागद्वेषादि दोषों के अभाव के लिए करना चाहिए ।
????????????
(१०) अभिषेक पूजन तत्कालीन बंध की अपेक्षा असंख्यातगुणी कर्म निर्जरा का कारण है।[कषायपाहुड़ 1/1/9/2]
????????????
(११) पंचकल्याणक में तपकल्याणक, ज्ञानकल्याणक, मोक्षकल्याणक की पुजन की क्रियाएं साधुओं के द्वारा कराई जाती हैं ।
????????????
(१२)? शास्त्र:- मूलाचार भाग-1
नाम वंदना का प्रतिपादन~
आचार्य :- श्रीमद् वट्टकेर
गाथा नं-578; पेज नं- 429
साधुओं के द्वारा पूजा कर्म- जिन अक्षर आदिकों के व्दारा अरिहंत देव आदि पूजे जाते हैं - अर्चेजाते है ऐसा बहुवचन से उच्चारण कर उनको जो पुष्पमाला चंदन आदि चढाये जाते हैं वह पूजा कर्म कहलाता है ।
????????????
(१३) ?पद्मनन्दि पंचविंशतिका/6/14
प्रपश्यंति जिनं भक्त्या पूजयंति स्तुवंति ये। ते च दृश्याश्च पूज्याश्च स्तुत्याश्च भुवनत्रये। 14।
जो साधु भक्ति से जिन भगवान् का पूजन, दर्शन और स्तुति करते हैं वे तीनों लोकों में स्वयं ही दर्शन, पूजन और स्तुति के योग्य हो जाते हैं अर्थात् स्वयं भी परमात्मा बन जाते हैं। [जैसा करोगे वैसा भरोगे" (जैसी करनी, वैसी भरनी),आप जो बीज बोएंगे, वही काटेंगे]
✋शुभाशीर्वाद
आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति |
|
2026-04-11 16:57:36 |
|
| 77748 |
40449680 |
श्री हुमड़ जैन समाज, पुणे |
|
|
?आचार्य,उपाध्याय,मुनि महाराज द्वारा अभिषेक पूजन~
?(१) मुनियोंके श्रेष्ठ संघ द्वारा जिनेन्द्र देवकी अष्ट से द्रव्य पूजा-
शास्त्र:-हरिवंश पुराण
आचार्य:-जिनसेन
द्वादशः सर्गः, पेज नंबर-२१५
उद्घः संघोऽस्य मौनः स्फुटभुवनगुरोर्देवदेवस्थ देहं देवौघश्चक्रवर्तिप्रमुखनृपगणश्चातिभक्त्या समेत्य । गन्धैः पुष्पैश्च धूपैः सुरभिभिरमलैरक्षतैश्च प्रदीपैः संपूज्यानम्य सम्यग्वृषभजिनगुणश्रीफलं याचते स्म ॥८२॥
इत्यरिष्टनेमिपुराणसंग्रहे हरिवंशे जिनसेनाचार्यकृतो वृषभेश्वरपरिनिर्वाणवर्णनो नाम द्वादशः सर्गः ॥१२॥
?अर्थ-मोक्षप्राप्तिके अनन्तर मुनियोंका श्रेष्ठ संघ, देवोंका समूह और चक्रवर्ती आदि प्रमुख राजाओंका समूह - इन सबने तीव्र भक्तिवश आकर गन्ध, पुष्प, सुगन्धित धूप, उज्जल अक्षत और देदीप्यमान दीपकके द्वारा त्रिजगद्गुरु देवादि देव वृषभदेवके शरीरकी पूजा कर तथा अच्छी तरह नमस्कार कर यही याचना की कि हम लोगोंको श्री ऋषभ जिनेन्द्रके गुण लक्ष्मीरूपी फलकी प्राप्ति होवे ॥८२॥
इस प्रकार अरिष्टनेमि पुराणके संग्रहसे युक्त, जिनसेनाचार्य रचित हरिवंश पुराणमें श्रीवृषभदेवकी निर्वाण प्राप्तिका वर्णन करनेवाला बारहवाँ सर्ग समाप्त हुआ ॥१२।।
????????????
?(२) जिस क्रिया को देखने से पुण्य होता हैं, वह क्रिया स्वयं करे तो पाप बंध कैसे हो सकता हैं ।अर्थात् मुनि महाराज को अभिषेक ~पूजन देखने से पुण्य मिलता हैं, तो मुनि महाराज अभिषेक~पूजन करें तो पुण्य ही प्राप्त होगा । ( कृत~कारित ~अनुमोदना )
????????????
?(३) गुरु के पाद प्रक्षालन मुनि महाराज कर सकते है तो भगवान का अभिषेक ~पूजन करने में क्या बाधा होगी अर्थात् मुनि महाराज भगवान का अभिषेक ~पूजन कर सकते हैं ।
??????????????????????
?(४)भगवान का अभिषेक करना पूजन का ही एक अंग हैं ।
????????????
?(५) पुण्य बन्धके कारणभूत कामोंको जैसे देशव्रती श्रावक करता है वैसे ही मुनि भी करता हैं, मुनिके लिये उनका एकान्तसे निषेध नहीं है ।[शास्त्र~जयधवला ~ कषाय पाहुड पेज नंबर~८]
अर्थात् पुण्य बन्धके कारणभूत कामोंको जैसे देशव्रती श्रावक के लिए अभिषेक ~पूजन करना कर्तव्य होता हैं वैसे ही मुनि महाराज के लिए स्तवन आवश्यक क्रियामें अभिषेक ~पूजन करना कर्तव्य होता हैं ।
????????????
?(६) मूलाचार गाथा ~24 पेज नंबर ~३०
उसहादिजिणवराणं णामणिरुत्तिं गुणाणुकित्तिं च काऊण अच्चिदूण यच तिसुद्धपणमो थओ णेओ ।24।
?अर्थ ~ऋषभ अजित आदि चौबीस तीर्थंकरों के नाम की निरुक्ति के अनुसार अर्थ करना, उनके असाधारण गुणों को प्रगट करना, उनके चरणों को पूजकर मन-वचन-काय की शुद्धता से स्तुति करना उसे चतुर्विंशतिस्तव कहते हैं।
?टिका अर्थ ~आचारवृत्ति-ऋषभ, अजीत, संभव, अभिनंदन, सुमति, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चंद्रप्रभ, पुष्पदंत, शीतल, श्रेयांस, वासुपूज्य, विमल, अनंत, धर्म, शांति, कुंन्थु, अर, मल्ली, मुनिसुव्रत, नमि, अरिष्टनेमी, पार्श्व और वर्धमान इस प्रकार से नाम उच्चारण करना नाम स्तवन कहलाता है। इन्हीं तीर्थंकरों के असाधारण धर्मरूप गुणों का वर्णन करना गुणनुकीर्तन है, अर्थात् निर्दोष आप्त का लक्षण करते हुए उनकी स्तुति करना, जैसे, हे भगवन् ! आप लोक में उद्योत करनेवाले हैं, धर्मतीर्थ के कर्ता हैं; सुर, असुर और मनुष्यों के इन्द्रों से स्तुति को प्राप्त है वास्तविक तत्त्व के स्वरूप को देखनेवाले हैं, और कठोर घातिया कर्मों को नष्ट कर चुके हैं-इत्यादि प्रकार से अनेक-अनेक गुणों का कीर्तन करना भी गुणानुकीर्तन है। इस प्रकार तीर्थकरों का गुणग्रहणपूर्वक नामग्रहण करके तथा मलपटल से रहित सुगन्धित दिव्यरूप ला गये प्रासुक गन्ध पुष्प धूप-दीप आदि के द्वारा चौबीस तीर्थंकरों के पद-युगलों की अर्चना करके मन, वचन, काय को शुद्धिपूर्वक उनको प्रणाम करना - स्तवन करना स्तव आवश्यक है।
????????????
?(७) गणधरदेव भी जिनेन्द्र देवकी पूजा करते हैं ।
तिलोयपणत्ती
आचार्यश्री यतिवृषभाचार्य विरचित
चतुर्थ अधिकार
गाथा -८८२-८८३
आरुहिवूणं तेसु','गणहर देवादि बारस- गणा ते ।
कादूण 'ति व्यवहणमति मुहं मुहं णाहं ॥८८२॥
थोदूण जुदा साएहिं, असंखगुणसेढि-कम्म-निज्जरणं ।
कादूण पसण्ण मचा, णिय णिय कोट्ठेसु पवइसंतइ ।।८८३।।
?अर्थ :- वे गणधरदेवाधिक बारह-गण उन पीठों पर चढ़कर और तीन प्रदक्षिणा देकर बार-बार जिनेन्द्र देवकी पूजा करते हैं, तथा सेंकड़ों स्तुतियों द्वारा कीर्तन कर कर्मोकी असंख्यात- गुणश्रेणीरूपनिर्जरा करके प्रसन्न-चित्त होते हुए अपने-अपने कोठों में प्रवेश करते हैं। अर्थात् अपने- अपने कोठोंमें बैठ जाते हैं ।।८८२-८८३।।
????????????
?(८) मुनि महाराज कोअभिषेक वंदना करते समय सिध्दभक्ति, चैत्यभक्ति, पंचमहागुरु भक्ति, शान्तिभक्ति समाधिभक्ति करनी चाहिए ।
????????????
?(९) ?प्रभाचन्द्राचार्य कृत संस्कृत भाष्य से युक्त सामायिक पाठ में एक प्राचीन श्लोक है ~
स्नपनार्चास्तुतिजपान् साम्यार्थं प्रतिमार्पिते ।
युज्यां यथाम्नायमाद्यादृते संकल्पितेऽर्हति ॥२१॥
?अर्थ:- प्रतिमामें अर्पित जिनेश्वर का अभिषेक, पूजन, स्तुति और जाप समभाव के लिए - रागद्वेषादि दोषों के अभाव के लिए करना चाहिए ।
????????????
(१०) अभिषेक पूजन तत्कालीन बंध की अपेक्षा असंख्यातगुणी कर्म निर्जरा का कारण है।[कषायपाहुड़ 1/1/9/2]
????????????
(११) पंचकल्याणक में तपकल्याणक, ज्ञानकल्याणक, मोक्षकल्याणक की पुजन की क्रियाएं साधुओं के द्वारा कराई जाती हैं ।
????????????
(१२)? शास्त्र:- मूलाचार भाग-1
नाम वंदना का प्रतिपादन~
आचार्य :- श्रीमद् वट्टकेर
गाथा नं-578; पेज नं- 429
साधुओं के द्वारा पूजा कर्म- जिन अक्षर आदिकों के व्दारा अरिहंत देव आदि पूजे जाते हैं - अर्चेजाते है ऐसा बहुवचन से उच्चारण कर उनको जो पुष्पमाला चंदन आदि चढाये जाते हैं वह पूजा कर्म कहलाता है ।
????????????
(१३) ?पद्मनन्दि पंचविंशतिका/6/14
प्रपश्यंति जिनं भक्त्या पूजयंति स्तुवंति ये। ते च दृश्याश्च पूज्याश्च स्तुत्याश्च भुवनत्रये। 14।
जो साधु भक्ति से जिन भगवान् का पूजन, दर्शन और स्तुति करते हैं वे तीनों लोकों में स्वयं ही दर्शन, पूजन और स्तुति के योग्य हो जाते हैं अर्थात् स्वयं भी परमात्मा बन जाते हैं। [जैसा करोगे वैसा भरोगे" (जैसी करनी, वैसी भरनी),आप जो बीज बोएंगे, वही काटेंगे]
✋शुभाशीर्वाद
आर्षमार्ग संरक्षक प्रभावना प्रभाकर आगम दिवाकर आचार्य पावनकीर्ति |
|
2026-04-11 16:57:36 |
|
| 77745 |
40449677 |
तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन |
|
|
✨ आज की विशेष प्रस्तुति ✨
? मध्यप्रदेश की धर्मनगरी उज्जैन स्थित
राजाराम रिसॉर्ट में
श्री दिगंबर जैन महासमिति महिला द्वारा उज्जैन में आयोजित
? अधिवेशन एवं अलंकरण समारोह ?
? समाज सेवा, संगठन और सम्मान से जुड़े इस भव्य आयोजन की झलक
आज देखना न भूलें।
? आज — 11 अप्रैल 2026
? रात्रि 09:00 बजे
सिर्फ़ जिनवाणी चैनल पर
✨ देखते रहिए – जिनवाणी
संस्कार, संगठन और समाज का सशक्त माध्यम ?
<a href="https://www.youtube.com/@jinvanichannelofficial??" target="_blank">https://www.youtube.com/@jinvanichannelofficial??</a> |
|
2026-04-11 16:56:48 |
|
| 77746 |
40449677 |
तीर्थ बचाओ धर्म बचाओ जन आंदोलन |
|
|
✨ आज की विशेष प्रस्तुति ✨
? मध्यप्रदेश की धर्मनगरी उज्जैन स्थित
राजाराम रिसॉर्ट में
श्री दिगंबर जैन महासमिति महिला द्वारा उज्जैन में आयोजित
? अधिवेशन एवं अलंकरण समारोह ?
? समाज सेवा, संगठन और सम्मान से जुड़े इस भव्य आयोजन की झलक
आज देखना न भूलें।
? आज — 11 अप्रैल 2026
? रात्रि 09:00 बजे
सिर्फ़ जिनवाणी चैनल पर
✨ देखते रहिए – जिनवाणी
संस्कार, संगठन और समाज का सशक्त माध्यम ?
<a href="https://www.youtube.com/@jinvanichannelofficial??" target="_blank">https://www.youtube.com/@jinvanichannelofficial??</a> |
|
2026-04-11 16:56:48 |
|
| 77743 |
40449749 |
जिनोदय?JINODAYA |
|
|
✨ एक और प्रीमियम इंस्टॉलेशन सफलतापूर्वक पूरा हुआ! ✅
MAMA ENTERPRISES Imami Gate Somwara, Bhopal के लिए बनाया गया
Premium 3D Acrylic Sign Board ?✨
अपने बिज़नेस को दीजिए
प्रीमियम, क्लासी और आकर्षक पहचान ?
? Visit Us:
46, मालीपुरा, Opposite Chirayu Hospital, पीरगेट, भोपाल, म.प्र.
? Call: 9893046583, 9893557509
? Customized Premium 3D LED Sign Board बुक करने के लिए अभी DM करें
? Store Location:
<a href="https://maps.app.goo.gl/oMBwEdnNYiDnaig58?g_st=ic" target="_blank">https://maps.app.goo.gl/oMBwEdnNYiDnaig58?g_st=ic</a>
Instagram pr follow kare:
<a href="https://www.instagram.com/globalprintingadvertising?igsh=bGI5ZXZpOTAycW1s" target="_blank">https://www.instagram.com/globalprintingadvertising?igsh=bGI5ZXZpOTAycW1s</a>
✨ अभी ऑर्डर करें और अपने brand को और भी ज़्यादा चमकदार बनाइए! |
|
2026-04-11 16:56:28 |
|
| 77744 |
40449749 |
जिनोदय?JINODAYA |
|
|
✨ एक और प्रीमियम इंस्टॉलेशन सफलतापूर्वक पूरा हुआ! ✅
MAMA ENTERPRISES Imami Gate Somwara, Bhopal के लिए बनाया गया
Premium 3D Acrylic Sign Board ?✨
अपने बिज़नेस को दीजिए
प्रीमियम, क्लासी और आकर्षक पहचान ?
? Visit Us:
46, मालीपुरा, Opposite Chirayu Hospital, पीरगेट, भोपाल, म.प्र.
? Call: 9893046583, 9893557509
? Customized Premium 3D LED Sign Board बुक करने के लिए अभी DM करें
? Store Location:
<a href="https://maps.app.goo.gl/oMBwEdnNYiDnaig58?g_st=ic" target="_blank">https://maps.app.goo.gl/oMBwEdnNYiDnaig58?g_st=ic</a>
Instagram pr follow kare:
<a href="https://www.instagram.com/globalprintingadvertising?igsh=bGI5ZXZpOTAycW1s" target="_blank">https://www.instagram.com/globalprintingadvertising?igsh=bGI5ZXZpOTAycW1s</a>
✨ अभी ऑर्डर करें और अपने brand को और भी ज़्यादा चमकदार बनाइए! |
|
2026-04-11 16:56:28 |
|